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Class 9 Hindi Elective Poem 8 Question Answer | टूटा पहिया | ASSEB

असम बोर्ड (ASSEB) की कक्षा 9 की हिंदी ऐच्छिक पाठ्यपुस्तक आलोक भाग-1 का सोलहवाँ अध्याय (पद्य खंड का आठवाँ और अंतिम पाठ) “टूटा पहिया” हिंदी की नई कविता के प्रतिनिधि कवि डॉ. धर्मवीर भारती की एक प्रतीकात्मक और विचारोत्तेजक कविता है। यह कविता महाभारत के चक्रव्यूह-प्रसंग से प्रेरित होकर आधुनिक समाज में असत्य, अन्याय और शोषण के विरुद्ध संघर्षरत साहसी व्यक्ति की शक्ति का उद्घोष करती है। यहाँ इस कविता के पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर और अतिरिक्त महत्वपूर्ण प्रश्न दिए गए हैं।


कविता-पाठ (The Poem)

मैं
रथ का टूटा हुआ पहिया हूँ
लेकिन मुझे फेंको मत!

क्या जाने कब
इस दुरूह चक्रव्यूह में
अक्षौहिणी सेनाओं को चुनौती देता हुआ
कोई दुस्साहसी अभिमन्यु आकर घिर जाय!

अपने पक्ष को असत्य जानते हुए भी
बड़े-बड़े महारथी
अकेली निहत्थी आवाज़ को
अपने ब्रह्मास्त्रों से कुचल देना चाहें
तब मैं
रथ का टूटा हुआ पहिया
उसके हाथों में
ब्रह्मास्त्रों से लोहा ले सकता हूँ!

मैं रथ का टूटा पहिया हूँ
लेकिन मुझे फेंको मत
इतिहासों की सामूहिक गति
सहसा झूठी पड़ जाने पर
क्या जाने
सच्चाई टूटे हुए पहियों का आश्रय ले!

— धर्मवीर भारती


कविता का सारांश (Summary of the Poem)

डॉ. धर्मवीर भारती द्वारा रचित “टूटा पहिया” उनके काव्य-संग्रह ‘सात गीत वर्ष’ से ली गई एक छोटी किंतु अत्यंत अर्थपूर्ण कविता है। इस कविता में कवि ने रथ के टूटे हुए पहिए के माध्यम से उस उपेक्षित और लघु मानव का प्रतीक प्रस्तुत किया है जिसे समाज बेकार समझकर फेंक देता है। कविता में ‘मैं’ सर्वनाम का प्रयोग करते हुए टूटा पहिया स्वयं कहता है — “मुझे फेंको मत।” कवि ने महाभारत के चक्रव्यूह-प्रसंग को इस कविता का आधार बनाया है। अभिमन्यु ने अकेले ही दुरूह चक्रव्यूह में प्रवेश किया और जब कौरव पक्ष के महारथियों ने उसके सारे शस्त्र-अस्त्र नष्ट कर दिए, तब उसने रथ के टूटे पहिए को ही अस्त्र बनाकर उनका सामना किया। कवि इस प्रसंग को आधुनिक संदर्भ में जोड़ते हैं। आज भी असत्य और अन्याय की शक्तियाँ किसी साहसी व्यक्ति की अकेली और निहत्थी आवाज़ को अपने ‘ब्रह्मास्त्रों’ — अर्थात् सत्ता, धन, बल और षड्यंत्र — से कुचलना चाहती हैं। ऐसे समय में टूटा पहिया, यानी लघु मानव, उस साहसी की सहायता कर सकता है।

कविता की अंतिम पंक्तियाँ विशेष रूप से गहन अर्थ लिए हुई हैं — “इतिहासों की सामूहिक गति / सहसा झूठी पड़ जाने पर / क्या जाने / सच्चाई टूटे हुए पहियों का आश्रय ले!” कवि कहते हैं कि जब इतिहास की मुख्यधारा — अर्थात् बहुसंख्यक समाज, सत्ताधारी वर्ग और स्थापित व्यवस्था — असत्य और अन्याय का साथ दे, तब सच्चाई को भी इन उपेक्षित और तुच्छ समझे जाने वाले लघु मानवों का ही सहारा लेना पड़ता है। अतः किसी भी वस्तु या व्यक्ति को व्यर्थ समझकर उपेक्षित नहीं करना चाहिए। ‘टूटा पहिया’ एक प्रतीकात्मक कविता है जो लघु मानव की गरिमा, उसकी संभावनाओं और उसके नैतिक साहस का उद्घोष करती है।


Summary (English)

“Tuta Pahiya” (The Broken Wheel) is a short yet profoundly symbolic poem by Dr. Dharmaveer Bharati, taken from his poetry collection ‘Saat Git Varsh’, and included in the ASSEB Class 9 Hindi Elective textbook Aalok Bhag-1 as Chapter 16 — the eighth and final poem in the poetry section. Speaking in the first person, the broken chariot wheel says: “Do not throw me away.” The poem draws its central metaphor from the Mahabharata episode in which the young warrior Abhimanyu, after entering the complex chakravyuh (a circular military formation), finds all his weapons destroyed by the combined assault of the Kaurava maharathis (great warriors). Even knowing their cause to be unjust, these powerful warriors attempt to crush his lone, unarmed voice with their brahmastra (ultimate weapons). In this moment, the broken wheel becomes Abhimanyu’s only weapon — and it proves sufficient to face the mightiest powers. The poet draws a parallel with modern times: today too, forces of untruth and injustice — wielding power, wealth, and political machinery — try to silence the lone courageous voice of truth. At such moments, the “broken wheel” — symbolising the marginalised, neglected common person — can come to the aid of the one who fights for truth. The closing lines carry the poem’s deepest message: when the collective momentum of history suddenly turns false — when the majority, the powerful, and the established order align themselves with untruth — then truth itself may have to seek refuge in broken wheels, in the seemingly insignificant and discarded. The poem is a powerful assertion of the dignity and latent strength of the marginalised individual.


कवि-परिचय (About the Poet)

डॉ. धर्मवीर भारती का जन्म 25 दिसंबर 1926 को इलाहाबाद (प्रयागराज), उत्तर प्रदेश के अतरसुईया मोहल्ले में हुआ था। उनके पिता का नाम चिरंजीव लाल वर्मा और माता का नाम चंदादेवी था। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिंदी में एम.ए. परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की (1947) और 1954 में ‘सिद्ध साहित्य’ विषय पर पी.एच.डी. की उपाधि प्राप्त की। विद्यार्थी जीवन से ही वे पत्रकारिता और साहित्य से जुड़े रहे। उन्होंने कुछ समय इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में अध्यापन कार्य भी किया। 1959 से वे मुंबई से प्रकाशित होने वाली देश की सर्वाधिक लोकप्रिय साप्ताहिक पत्रिका ‘धर्मयुग’ के संपादक बने और लगभग तीन दशकों तक इस पद पर रहकर हिंदी पत्रकारिता और साहित्य को एक नई ऊँचाई तक पहुँचाया।

धर्मवीर भारती हिंदी साहित्य के बहुविध और बहुआयामी रचनाकार थे। उनके प्रमुख काव्य-संग्रह हैं — ठंडा लोहा (1952), सात गीत वर्ष (1959), कनुप्रिया (1959), सपना अभी भी (1993), आद्यन्त (1996)। उनके प्रसिद्ध उपन्यास हैं — गुनाहों का देवता (1949) और सूरज का सातवाँ घोड़ा (1952)। उनका पद्य-नाटक अंधा युग (1954) महाभारत की समाप्ति की पृष्ठभूमि पर आधारित है और हिंदी साहित्य की अत्यंत महत्वपूर्ण कृति मानी जाती है। निबंध-संग्रहों में ठेले पर हिमालय, पश्यन्ती और कहनी-अनकहनी उल्लेखनीय हैं। उनकी साहित्यिक सेवाओं के लिए भारत सरकार ने उन्हें 1972 में पद्मश्री से सम्मानित किया। इसके अतिरिक्त उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1981), हल्दीघाटी श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार (1984), भारत भारती पुरस्कार (1989) और व्यास सम्मान सहित अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कार प्राप्त हुए। 4 सितंबर 1997 को मुंबई में उनका निधन हो गया।


सप्रसंग व्याख्या (Contextual Explanation)

१. “मैं / रथ का टूटा हुआ पहिया हूँ / लेकिन मुझे फेंको मत!”

प्रसंग: ये पंक्तियाँ डॉ. धर्मवीर भारती द्वारा रचित कविता “टूटा पहिया” के आरंभ से ली गई हैं। कवि ने इस कविता में महाभारत के चक्रव्यूह-प्रसंग का प्रतीक के रूप में उपयोग करते हुए आधुनिक युग में लघु मानव की शक्ति और सार्थकता को प्रतिपादित किया है।

व्याख्या: कवि ने ‘मैं’ सर्वनाम का प्रयोग करते हुए टूटे पहिए को ही वक्ता बना दिया है। रथ का टूटा हुआ पहिया समाज के उस उपेक्षित, लघु और असहाय मानव का प्रतीक है जिसे बेकार और निरर्थक समझकर समाज की मुख्यधारा से बाहर फेंक दिया जाता है। किंतु कवि चेतावनी देते हैं — “मुझे फेंको मत।” अर्थात् किसी भी व्यक्ति को, चाहे वह कितना भी दुर्बल या उपेक्षित क्यों न लगे, व्यर्थ और निरर्थक मानकर नहीं छोड़ना चाहिए। विपत्ति के समय वही तुच्छ समझी जाने वाली वस्तु या व्यक्ति अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो सकता है।

२. “क्या जाने कब / इस दुरूह चक्रव्यूह में / अक्षौहिणी सेनाओं को चुनौती देता हुआ / कोई दुस्साहसी अभिमन्यु आकर घिर जाय!”

प्रसंग: ये पंक्तियाँ कविता के मध्यवर्ती भाग से हैं। इनमें कवि ने महाभारत के प्रसिद्ध चक्रव्यूह-प्रसंग का उल्लेख किया है।

व्याख्या: ‘दुरूह चक्रव्यूह’ का शाब्दिक अर्थ है — चक्र के आकार में बनाया गया अत्यंत जटिल और दुर्भेद्य सैन्य-व्यूह। महाभारत में द्रोणाचार्य ने इस व्यूह की रचना की थी। अभिमन्यु को चक्रव्यूह में प्रवेश करना तो आता था, परंतु बाहर निकलने का मार्ग नहीं पता था। फिर भी उसने ‘दुस्साहस’ (रोमांचकारी साहस) करते हुए अकेले ही ‘अक्षौहिणी’ (विशाल सेना के एक पूर्ण विभाग) को चुनौती दी। आज के संदर्भ में — यह चक्रव्यूह भ्रष्टाचार, अन्याय और शोषण की जटिल व्यवस्था का प्रतीक है; अभिमन्यु उस साहसी युवा का प्रतीक है जो इस जटिल व्यवस्था से अकेले टकरा जाता है। कवि कहते हैं — कौन जाने कब ऐसा साहसी व्यक्ति इस दुनिया के जटिल चक्रव्यूह में फँस जाए — उस समय टूटे पहिए की आवश्यकता पड़ सकती है।

३. “अपने पक्ष को असत्य जानते हुए भी / बड़े-बड़े महारथी / अकेली निहत्थी आवाज़ को / अपने ब्रह्मास्त्रों से कुचल देना चाहें / तब मैं / रथ का टूटा हुआ पहिया / उसके हाथों में / ब्रह्मास्त्रों से लोहा ले सकता हूँ!”

प्रसंग: ये पंक्तियाँ कविता के केंद्रीय भाग से ली गई हैं जो कविता का चरमोत्कर्ष हैं। इनमें टूटे पहिए की सार्थकता का सबसे सशक्त उद्घोष है।

व्याख्या: यहाँ ‘महारथी’ सत्ताधारी और शोषक वर्ग के उन लोगों का प्रतीक है जो जानते हैं कि उनका पक्ष असत्य और अन्यायपूर्ण है, फिर भी वे अपनी सत्ता, धन और शक्ति रूपी ‘ब्रह्मास्त्रों’ से सत्य की उस अकेली और निहत्थी आवाज़ को कुचल देना चाहते हैं। ‘अकेली निहत्थी आवाज़’ सत्य और न्याय के लिए लड़ने वाले उस असहाय व्यक्ति का प्रतीक है जिसके पास न धन है, न सत्ता। इसी समय टूटा पहिया — अर्थात् लघु मानव — उस साहसी की सहायता के लिए आगे आ सकता है। ‘ब्रह्मास्त्रों से लोहा लेना’ का अर्थ है — महाशक्तियों का मुकाबला करना। यह पंक्तियाँ आज के संदर्भ में अत्यंत प्रासंगिक हैं जहाँ शासक वर्ग अपने अधिकार और शक्ति का दुरुपयोग करके आम आदमी की आवाज़ दबाने का प्रयास करता है।

४. “इतिहासों की सामूहिक गति / सहसा झूठी पड़ जाने पर / क्या जाने / सच्चाई टूटे हुए पहियों का आश्रय ले!”

प्रसंग: ये कविता की अंतिम पंक्तियाँ हैं जो कविता का सबसे गहन और दार्शनिक भाग हैं।

व्याख्या: ‘इतिहासों की सामूहिक गति’ से तात्पर्य है — समाज की बहुसंख्यक धारा, स्थापित व्यवस्था और इतिहास लिखने वाला सत्ताधारी वर्ग। कवि कहते हैं कि जब यह ‘सामूहिक गति’ — यानी बहुमत और शक्तिशाली वर्ग — ‘सहसा झूठी पड़ जाए’, अर्थात् असत्य का साथ दे, तब सच्चाई को भी ‘टूटे हुए पहियों’ का — यानी उपेक्षित लघु मानव का — सहारा लेना पड़ता है। यही इस कविता का मूल संदेश है — लघु, तुच्छ और उपेक्षित व्यक्ति की उपेक्षा कभी नहीं करनी चाहिए, क्योंकि संकट के समय सच्चाई का एकमात्र सहारा वही हो सकता है।


भाव-सौंदर्य (Aesthetic Appeal)

१. प्रतीकात्मकता (Symbolism): यह कविता पूर्णतः प्रतीकों पर आधारित है। ‘टूटा पहिया’ = लघु/उपेक्षित मानव; ‘चक्रव्यूह’ = जीवन/समाज की जटिल समस्याएँ और अन्यायपूर्ण व्यवस्था; ‘अभिमन्यु’ = असत्य और अधर्म का विरोध करने वाला साहसी व्यक्ति; ‘महारथी’ = शोषक और सत्ताधारी वर्ग; ‘ब्रह्मास्त्र’ = सत्ता, धन और शक्ति का दुरुपयोग। इन प्रतीकों के माध्यम से कवि ने एक अत्यंत जटिल सामाजिक संदेश को अत्यंत सरल और प्रभावी तरीके से प्रस्तुत किया है।

२. पौराणिक संदर्भ का आधुनिक उपयोग: कवि ने महाभारत के चक्रव्यूह-प्रसंग — जो एक पौराणिक घटना है — को आधुनिक काल के सामाजिक संदर्भ से जोड़ा है। यह नई कविता की एक प्रमुख विशेषता है। इसे ‘पुराकथा का आधुनिकीकरण’ (Mythological Modernisation) कहा जाता है। भारतीजी के प्रसिद्ध नाटक ‘अंधा युग’ में भी यही शिल्प देखने को मिलता है।

३. मुक्त छंद (Free Verse): यह कविता मुक्त छंद में लिखी गई है — इसमें कोई निश्चित तुकबंदी या छंद-विधान नहीं है। फिर भी इसमें एक आंतरिक लय है जो कविता को प्रवाहमान बनाती है। ‘नई कविता’ आंदोलन की यह प्रमुख विशेषता है।

४. वक्रोक्ति और विरोधाभास (Paradox): एक टूटा हुआ पहिया — जिसे बेकार माना जाता है — वह ‘ब्रह्मास्त्रों से लोहा ले सकता है’ — यह विरोधाभास (Paradox) इस कविता का सबसे प्रभावशाली काव्य-सौंदर्य है। इसी विरोधाभास में कविता का संपूर्ण दर्शन समाया हुआ है।

५. संक्षिप्तता में गहनता: यह एक बहुत छोटी कविता है, किंतु इसमें असाधारण दार्शनिक गहराई है। इतने कम शब्दों में इतना बड़ा सामाजिक-राजनीतिक संदेश देने की क्षमता ही इस कविता को महान बनाती है।

६. प्रासंगिकता: यह कविता हर युग में प्रासंगिक है। जब भी समाज में असत्य और अन्याय हावी होता है, जब सत्य की आवाज़ अकेली और निहत्थी होती है, तब यह कविता एक नई प्रेरणा देती है — लघु मानव की शक्ति और सार्थकता का अहसास कराती है।


प्रश्नोत्तर (Question-Answer)

सही विकल्प का चयन करो (Multiple Choice Questions)

१. रथ का टूटा पहिया स्वयं को न फेंके जाने की सलाह देता है, क्योंकि —

(क) उसे मरम्मत करके फिर से रथ में लगाया जा सकता है।
(ख) किसी दुस्साहसी अभिमन्यु के हाथों में आकर ब्रह्मास्त्र से लोहा ले सकता है।
(ग) इतिहासों की सामूहिक गति झूठी पड़ जाने पर सच्चाई टूटे हुए पहियों का आश्रय ले सकती है।
(घ) ऊपर के ख और ग दोनों सही हैं।

उत्तरः (घ) ऊपर के ख और ग दोनों सही हैं।

२. ‘दुरूह चक्रव्यूह में अक्षौहिणी सेनाओं को चुनौती’ किसने दी थी?

(क) अभिमन्यु ने।
(ख) द्रोणाचार्य ने।
(ग) अर्जुन ने।
(घ) दुर्योधन ने।

उत्तरः (क) अभिमन्यु ने।

३. ‘अपने पक्ष को असत्य जानते हुए भी….’ — यहाँ किसके पक्ष को असत्य कहा गया है?

(क) युधिष्ठिर का।
(ख) दुर्योधन का।
(ग) अभिमन्यु का।
(घ) कृष्ण का।

उत्तरः (ख) दुर्योधन का।

४. ‘ब्रह्मास्त्रों से लोहा ले सकता हूँ’ — यह किसका कथन है?

(क) भीष्म का।
(ख) परशुराम का।
(ग) टूटे हुए पहिए का।
(घ) भीम की गदा का।

उत्तरः (ग) टूटे हुए पहिए का।


पूर्ण वाक्य में उत्तर दो

१. ‘टूटा पहिया’ कविता के कवि कौन हैं और यह किस संग्रह से ली गई है?

उत्तरः ‘टूटा पहिया’ कविता के कवि डॉ. धर्मवीर भारती हैं और यह उनके काव्य-संग्रह ‘सात गीत वर्ष’ से ली गई है।

२. कविता में ‘चक्रव्यूह’ किस महाकाव्य की घटना से संबंधित है?

उत्तरः कविता में ‘चक्रव्यूह’ महाभारत की घटना से संबंधित है, जिसमें अभिमन्यु ने अकेले ही चक्रव्यूह में प्रवेश किया और सात महारथियों से लड़ते हुए रथ के टूटे पहिए को अपना अस्त्र बनाया।

३. ‘ब्रह्मास्त्र’ से कवि का क्या आशय है?

उत्तरः ‘ब्रह्मास्त्र’ से कवि का आशय है — सत्ताधारी और शोषक वर्ग के पास उपलब्ध सत्ता, धन, शक्ति और षड्यंत्र रूपी महाविनाशकारी हथियार, जिनसे वे सत्य की अकेली आवाज़ को कुचलने का प्रयास करते हैं।

४. कविता में ‘अकेली निहत्थी आवाज़’ किसकी है?

उत्तरः कविता में ‘अकेली निहत्थी आवाज़’ उस लघु और असहाय व्यक्ति की है जो असत्य और अन्याय का विरोध करता है, परंतु जिसके पास न धन है, न सत्ता, न बल — केवल सत्य है।

५. ‘टूटा पहिया’ कविता में ‘मैं’ सर्वनाम का प्रयोग किसके लिए किया गया है?

उत्तरः ‘टूटा पहिया’ कविता में ‘मैं’ सर्वनाम का प्रयोग उस उपेक्षित और लघु मानव के लिए किया गया है जिसे समाज बेकार समझकर फेंक देता है, परंतु जो संकट के समय अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध हो सकता है।


अति संक्षिप्त उत्तर दो (लगभग 25 शब्द)

१. कवि ने अभिमन्यु को ‘दुस्साहसी’ क्यों बताया है?

उत्तरः अभिमन्यु को ‘दुस्साहसी’ इसलिए बताया गया है क्योंकि वह चक्रव्यूह भेदन का पूरा ज्ञान न होने पर भी अकेले ही उसमें प्रवेश करने का साहस करता है और विशाल सेना को चुनौती देता है।

२. ‘दुरूह चक्रव्यूह’ के आज के संदर्भ में क्या अर्थ हैं?

उत्तरः आज के संदर्भ में ‘दुरूह चक्रव्यूह’ भ्रष्टाचार, शोषण, अन्याय और असत्य पर आधारित उस जटिल सामाजिक व्यवस्था का प्रतीक है जिसमें आम आदमी चारों ओर से घिरा हुआ महसूस करता है।

३. ‘लोहा लेना’ मुहावरे का क्या अर्थ है? कविता में इसका प्रयोग किस संदर्भ में हुआ है?

उत्तरः ‘लोहा लेना’ का अर्थ है — मुकाबला करना, सामना करना। कविता में इसका प्रयोग इस संदर्भ में हुआ है कि टूटा पहिया अभिमन्यु के हाथों में आकर शक्तिशाली महारथियों के ब्रह्मास्त्रों का मुकाबला कर सकता है।

४. ‘इतिहासों की सामूहिक गति झूठी पड़ जाना’ से क्या आशय है?

उत्तरः इसका आशय है — जब समाज की बहुसंख्यक धारा, सत्ताधारी वर्ग और स्थापित व्यवस्था सब मिलकर असत्य और अन्याय का साथ दें तथा इतिहास को गलत दिशा में मोड़ने का प्रयास करें।

५. टूटे पहिए को क्यों नहीं फेंकना चाहिए?

उत्तरः टूटे पहिए को इसलिए नहीं फेंकना चाहिए क्योंकि संकट के समय यही टूटा पहिया किसी साहसी अभिमन्यु के हाथ में अस्त्र बन सकता है और जब इतिहास की धारा झूठी पड़ जाए, तब सच्चाई भी इसी का आश्रय ले सकती है।


संक्षिप्त उत्तर दो (लगभग 50 शब्द)

१. ‘टूटा पहिया’ कविता में टूटे पहिए का प्रतीक क्या है? व्याख्या करो।

उत्तरः ‘टूटा पहिया’ लघु और उपेक्षित मानव का प्रतीक है — वह व्यक्ति जिसे समाज बेकार समझकर अपनी मुख्यधारा से बाहर फेंक देता है। कवि धर्मवीर भारती ने इस प्रतीक के माध्यम से यह संदेश दिया है कि ऐसे उपेक्षित व्यक्ति की भी अपनी एक संभावना और सामर्थ्य होती है। जब बड़ी-बड़ी शक्तियाँ मिलकर एक अकेले सत्यवादी को कुचलना चाहें, तब यही लघु मानव उसका सहारा बन सकता है।

२. कविता में अभिमन्यु के प्रसंग का क्या महत्व है?

उत्तरः अभिमन्यु का प्रसंग इस कविता की आत्मा है। अभिमन्यु ने अकेले चक्रव्यूह में प्रवेश किया और जब सात कौरव महारथियों ने मिलकर उसके सारे शस्त्र नष्ट कर दिए, तब उसने रथ के टूटे पहिए को ही अपना अस्त्र बनाकर असत्य पक्ष का सामना किया। यही प्रसंग आज के उस व्यक्ति का प्रतीक है जो अन्यायपूर्ण व्यवस्था से अकेले टकराता है।

३. ‘टूटा पहिया’ कविता की आज के संदर्भ में प्रासंगिकता बताओ।

उत्तरः आज भी समाज में असत्य और अन्याय का बोलबाला है। शोषक वर्ग अपनी सत्ता और धन रूपी ‘ब्रह्मास्त्रों’ से सत्य की आवाज़ को दबाता है। ऐसे में यदि कोई साहसी व्यक्ति इस व्यवस्था से टकराता है तो उसका सहारा कोई लघु और उपेक्षित मानव ही बनता है। यह कविता आम आदमी को उसकी शक्ति और महत्व का एहसास कराती है।

४. डॉ. धर्मवीर भारती का साहित्यिक परिचय संक्षेप में दो।

उत्तरः डॉ. धर्मवीर भारती (1926–1997) हिंदी की नई कविता के प्रमुख कवि, उपन्यासकार, नाटककार और पत्रकार थे। उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं — काव्य-संग्रह ‘ठंडा लोहा’, ‘सात गीत वर्ष’, ‘कनुप्रिया’; उपन्यास ‘गुनाहों का देवता’, ‘सूरज का सातवाँ घोड़ा’; और पद्य-नाटक ‘अंधा युग’। वे ‘धर्मयुग’ पत्रिका के दीर्घकालीन संपादक रहे। उन्हें 1972 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया।


सम्यक् उत्तर दो (लगभग 100 शब्द)

१. ‘टूटा पहिया’ कविता का केंद्रीय भाव क्या है? विस्तार से समझाओ।

उत्तरः ‘टूटा पहिया’ कविता का केंद्रीय भाव है — लघु और उपेक्षित मानव की गरिमा, उसकी सुप्त शक्ति और उसकी अपरिहार्यता। कवि धर्मवीर भारती ने महाभारत के चक्रव्यूह-प्रसंग को एक प्रतीक के रूप में लेकर यह संदेश दिया है कि समाज में किसी भी व्यक्ति को तुच्छ और व्यर्थ नहीं समझना चाहिए। जिस प्रकार अभिमन्यु ने रथ के टूटे पहिए को अपना अस्त्र बनाकर सात महारथियों का सामना किया, उसी प्रकार आज के समाज में भी जब बड़े-बड़े असत्य और अन्यायपूर्ण शक्तियाँ मिलकर किसी साहसी सत्यवादी की आवाज़ को कुचलना चाहती हैं, तब एक उपेक्षित और लघु मानव ही उसका सहारा बन सकता है। कविता की अंतिम पंक्तियाँ और भी गहरा संदेश देती हैं — जब इतिहास की मुख्यधारा, बहुसंख्यक समाज और सत्ताधारी वर्ग असत्य का साथ दे, तब सच्चाई को भी इन्हीं उपेक्षित टूटे पहियों का सहारा लेना पड़ सकता है। अतः हर व्यक्ति — चाहे वह कितना भी सामान्य या कमज़ोर क्यों न लगे — का अपना महत्व है और समाज में उसकी भूमिका अपरिहार्य है।

२. डॉ. धर्मवीर भारती के जीवन एवं साहित्यिक योगदान पर निबंध लिखो।

उत्तरः डॉ. धर्मवीर भारती हिंदी साहित्य के उन विरले रचनाकारों में हैं जिन्होंने कविता, उपन्यास, नाटक, निबंध और पत्रकारिता — सभी क्षेत्रों में अपनी अमिट छाप छोड़ी। उनका जन्म 25 दिसंबर 1926 को इलाहाबाद में हुआ। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिंदी में एम.ए. और पी.एच.डी. करने के बाद वे अध्यापन और लेखन से जुड़े। 1959 से ‘धर्मयुग’ के संपादक बनकर उन्होंने हिंदी पत्रकारिता को नई ऊँचाई दी। साहित्य में उनका पहला उपन्यास ‘गुनाहों का देवता’ (1949) अत्यंत लोकप्रिय हुआ। ‘सूरज का सातवाँ घोड़ा’ में उन्होंने उपन्यास की संरचना के साथ प्रयोग किए। काव्य-क्षेत्र में ‘ठंडा लोहा’, ‘सात गीत वर्ष’ और ‘कनुप्रिया’ उनकी श्रेष्ठ रचनाएँ हैं। उनका पद्य-नाटक ‘अंधा युग’ महाभारत के युद्ध की समाप्ति पर लिखी गई एक कालजयी रचना है, जो आज भी भारत के प्रमुख रंगमंचों पर प्रस्तुत होती है। ‘टूटा पहिया’, ‘कनुप्रिया’ जैसी रचनाओं ने उन्हें नई कविता के सर्वश्रेष्ठ कवियों में स्थान दिलाया। 1972 में पद्मश्री, 1981 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और 1989 में भारत भारती पुरस्कार उनकी उत्कृष्ट साहित्यिक सेवा की पहचान हैं। 4 सितंबर 1997 को मुंबई में उनका निधन हुआ, परंतु उनकी रचनाएँ हिंदी साहित्य में अमर हैं।


भाषा एवं व्याकरण (Language and Grammar)

प्रत्यय अलग करो (Identify the Suffix)

शब्दमूल शब्दप्रत्यय
सामूहिकसमूहइक
दुस्साहसीसाहस
निहत्थीहाथ
सामूहिकसमूहइक
महारथीमहारथ
आश्रयआश्र

उपसर्ग अलग करो (Identify the Prefix)

शब्दउपसर्गमूल शब्द
दुस्साहसदुःसाहस
निहत्थानिहत्था
अक्षौहिणीक्षौहिणी
दुरूहदुर्ऊह
असत्यसत्य
सामूहिकसम्ऊह

मुहावरे और उनके अर्थ (Idioms and Meanings)

मुहावराअर्थवाक्य में प्रयोग
लोहा लेनामुकाबला करना, सामना करनाछोटे देश ने भी बड़ी ताकत से लोहा लिया।
आश्रय लेनासहारा लेनाविपत्ति में उसने मित्र का आश्रय लिया।
घिर जानाचारों ओर से घेर लिया जानाजंगल में वे दुश्मनों से घिर गए।
कुचल देनानष्ट कर देना, दबा देनाअन्यायी शासक ने जनता की आवाज़ कुचल दी।

शब्दार्थ (Word Meanings)

शब्दअर्थ
दुरूहकठिन, जटिल, दुर्बोध
चक्रव्यूहचक्र के आकार में बनाई गई सैन्य-संरचना; जटिल जाल
अक्षौहिणीसेना का एक पूर्ण विभाग जिसमें हाथी, रथ, घोड़े और पैदल सैनिक सभी होते हैं
दुस्साहसीखतरे से भरे कार्य में साहस दिखाने वाला; अत्यधिक साहसी
अभिमन्युमहाभारत का वीर योद्धा, अर्जुन का पुत्र, जो चक्रव्यूह में अकेले लड़ा
महारथीमहान योद्धा; वह जो अकेले दस हजार सैनिकों से लड़ सकता है
निहत्थीहथियार-रहित, निशस्त्र
ब्रह्मास्त्रमहाविनाशकारी दिव्यास्त्र; यहाँ — सत्ता, धन और शक्ति का दुरुपयोग
लोहा लेनामुकाबला करना, सामना करना (मुहावरा)
सामूहिकसामूहिक, सबका मिलकर
सहसाअचानक, एकाएक
आश्रयसहारा, शरण
दुस्साहसखतरनाक साहस
पहियारथ/गाड़ी का चक्र
इतिहासइतिहास, अतीत की घटनाएँ

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