असम बोर्ड (ASSEB) की कक्षा 9 की हिंदी ऐच्छिक पाठ्यपुस्तक आलोक भाग-1 का पंद्रहवाँ अध्याय (पद्य खंड का सातवाँ पाठ) “चरैवेति” हिंदी साहित्य के प्रतिष्ठित कवि श्रीनरेश मेहता द्वारा रचित एक प्रेरणादायक कविता है। ‘चरैवेति’ एक प्राचीन वैदिक मंत्र है जिसका अर्थ है — चलते रहो। इस कविता में कवि ने सूर्य, नदी, मेघ और प्रकृति के अन्य तत्वों के माध्यम से मनुष्य को निरंतर आगे बढ़ते रहने का संदेश दिया है। यहाँ इस कविता के पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर और अतिरिक्त महत्वपूर्ण प्रश्न दिए गए हैं।
कविता-पाठ (The Poem)
चलते चलो, चलते चलो सूरज के संग-संग चलते चलो, चलते चलो!
तम के जो बंदी थे सूरज ने मुक्त किए
किरनों से गगन पोंछ धरती को रँग दिए,
सूरज को विजय मिली, ऋतुओं की रात हुई
कह दो इन तारों से चंदा के संग-संग
चलते चलो, चलते चलो!
रत्नमयी वसुधा पर चलने को चरण दिए
बैठी उस क्षितिज पार लक्ष्मी, श्रृंगार किए,
आज तुम्हें मुक्ति मिली, कौन तुम्हें दास कहे
स्वामी तुम ऋतुओं के, संवत् के संग-संग
चलते चलो, चलते चलो!
नदियों ने चलकर ही सागर का रूप लिया
मेघों ने चलकर ही धरती को गर्भ दिया,
रुकने का मरण नाम, पीछे सब प्रस्तर है
आगे है देवयान, युग के ही संग-संग
चलते चलो, चलते चलो!
मानव जिस ओर गया नगर बसे, तीर्थ बने
तुमसे है कौन बड़ा गगन-सिंधु मित्र बने,
भूमा का भोगो सुख, नदियों का सोम पियो
त्यागो सब जीर्ण वसन, नूतन के संग-संग
चलते चलो, चलते चलो!
— श्रीनरेश मेहता
कविता का सारांश (Summary of the Poem)
श्रीनरेश मेहता द्वारा रचित “चरैवेति” कविता एक प्रेरणादायक रचना है जो प्राचीन वैदिक मंत्र ‘चरैवेति’ अर्थात् ‘चलते रहो’ के संदेश को नए युग के संदर्भ में प्रस्तुत करती है। कवि ने सूर्य, चंद्रमा, तारे, नदी, मेघ जैसे प्राकृतिक तत्वों को अपना आदर्श मानते हुए मनुष्य को सदा आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा दी है। कविता का मुख्य स्वर (टेक) है — “चलते चलो, चलते चलो सूरज के संग-संग”। पहले छंद में कवि कहते हैं कि सूरज ने अंधकार के बंदियों को किरणों से मुक्त किया, धरती को रँग दिया, उसे विजय मिली — ठीक इसी तरह मनुष्य को भी चंद्रमा और तारों की तरह निरंतर गतिमान रहना चाहिए।
दूसरे छंद में कवि कहते हैं कि इस रत्नमयी (रत्नों से भरी) धरती पर मनुष्य को चलने के लिए पैर दिए गए हैं। क्षितिज के उस पार लक्ष्मी (समृद्धि) श्रृंगार करके खड़ी है — अर्थात् सफलता और संपन्नता उन्हीं को मिलती है जो चलते रहते हैं। आज मनुष्य को दासता से मुक्ति मिल गई है, वह ऋतुओं का स्वामी है — इसलिए उसे संवत् (काल-चक्र) के साथ चलते रहना है। तीसरे छंद में प्रकृति के उदाहरण दिए गए हैं — नदी ने चलकर ही सागर का रूप पाया, मेघ ने चलकर ही धरती को उर्वर (गर्भवती) किया। रुकना ही मृत्यु है, पीछे पत्थर की तरह निर्जीवता है, आगे देवयान (देवलोक का मार्ग, उच्चतम लक्ष्य) है — इसलिए युग के साथ चलते रहो। चौथे और अंतिम छंद में कवि मनुष्य की श्रेष्ठता का उद्घोष करते हैं — मनुष्य जिस ओर गया, नगर बसे, तीर्थ बने। आकाश और सागर भी उसके मित्र हैं। पृथ्वी के सुख भोगो, नदियों का अमृत-जल पियो और पुरानी रूढ़ियों (जीर्ण वसन) को त्यागकर नवीनता के साथ आगे बढ़ते चलो।
Summary (English)
“Charaiveti” (Keep Moving) is an inspiring poem by Shri Naresh Mehta, included in the ASSEB Class 9 Hindi Elective textbook Aalok Bhag-1 as Chapter 15, the seventh poem in the poetry section. The word ‘Charaiveti’ is an ancient Vedic maxim meaning “keep moving” or “keep walking.” The poem’s central message, expressed through a repeating refrain — “Chalte Chalo, Chalte Chalo Suraj Ke Sang-Sang” (Keep moving, keep moving alongside the sun) — is that continuous movement and progress are the essence of life, while stagnation is equivalent to death. The poet draws inspiration from natural elements: the sun liberates those imprisoned in darkness and fills the earth with colour; the rivers flow ceaselessly until they merge with the ocean; the clouds move and give rain to the earth. These images symbolise freedom, progress, development, and prosperity. The poet tells humanity that this gem-rich earth has given us feet to walk on, and the goddess of fortune (Lakshmi) waits beyond the horizon for those who keep moving. Stopping means death — the stone-like inertia of the past — while moving forward leads to the divine path (Devayan). The poem also celebrates human greatness: wherever humans have gone, cities and sacred places have been built; the sky and the ocean are humanity’s friends. The final stanza urges people to enjoy the riches of the earth, drink the nectar of rivers, and shed all worn-out customs and traditions (jierna vasan) to embrace the new. This poem is a powerful call to action, urging every person to move forward with time, shed old prejudices, and stride confidently toward a brighter future.
कवि-परिचय (About the Poet)
श्रीनरेश मेहता का जन्म 15 फरवरी 1922 को मध्यप्रदेश के मालवा क्षेत्र के शाजापुर नगर में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। मात्र ढाई वर्ष की आयु में उनकी माता का निधन हो गया और उनके चाचा शंकरलाल शुक्ल ने उनका पालन-पोषण किया। उन्होंने इंटरमीडिएट की परीक्षा उज्जैन के मध्य कॉलेज से उत्तीर्ण की और उच्च शिक्षा बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से हिंदी विषय में एम.ए. करके प्राप्त की। उनके गुरु केशवप्रसाद मिश्र, जो वेद-उपनिषदों के प्रकांड विद्वान थे, ने उनके बौद्धिक विकास को गहरे रूप से प्रभावित किया। विद्यार्थी जीवन में वे स्वाधीनता आंदोलन में भी सक्रिय रहे। 1948-1953 के बीच उन्होंने आकाशवाणी के कई केंद्रों में प्रोग्राम ऑफिसर के रूप में कार्य किया। उन्होंने ‘कृति’, ‘आगामी कल’ जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं का संपादन किया और 1985-1992 तक प्रेमचंद सृजनपीठ के निदेशक रहे।
नरेश मेहता हिंदी की नई कविता धारा के प्रमुख कवियों में से एक हैं। वे अज्ञेय द्वारा संपादित ‘दूसरे तार सप्तक’ में शामिल होने के बाद हिंदी साहित्य में विशिष्ट पहचान बनाई। उनकी कविता में भारतीय संस्कृति, प्रकृति, लोकजीवन और आस्था के विविध रंग मिलते हैं। उनकी प्रमुख काव्यकृतियाँ हैं — बोलने दो चीड़ को, पिछले दिनों नंगे पैरों, चैत्या; प्रबंध-काव्यों में महाप्रस्थान, प्रवाद पर्व, शबरी उल्लेखनीय हैं। उन्होंने उपन्यास, कहानियाँ, रेडियो नाटक और आलोचना के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनका संपूर्ण काव्य समिधा नाम से प्रकाशित हुआ है। साहित्य के क्षेत्र में उनके अमूल्य योगदान के लिए उन्हें मध्यप्रदेश शासन पुरस्कार, मंगला प्रसाद परितोषिक (1985), साहित्य अकादमी पुरस्कार (1988) और सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार (1992) से सम्मानित किया गया। 22 नवंबर 2000 को 78 वर्ष की आयु में भोपाल में उनका निधन हो गया। वे ‘आस्था और जागृति’ के कवि कहे जाते हैं।
सप्रसंग व्याख्या (Contextual Explanation)
१. “चलते चलो, चलते चलो सूरज के संग-संग चलते चलो, चलते चलो! / तम के जो बंदी थे सूरज ने मुक्त किए / किरनों से गगन पोंछ धरती को रँग दिए।”
प्रसंग: यह पंक्तियाँ श्रीनरेश मेहता द्वारा रचित कविता “चरैवेति” की टेक (मुखड़ा) तथा प्रथम छंद से ली गई हैं। इस कविता में कवि ने प्रकृति के विभिन्न तत्वों के माध्यम से मनुष्य को निरंतर आगे बढ़ने की प्रेरणा दी है।
व्याख्या: कवि सूर्य को अपना प्रेरणास्रोत मानकर मनुष्य को उसके साथ-साथ चलते रहने का आह्वान करते हैं। ‘तम के बंदी’ उन लोगों का प्रतीक है जो अज्ञान, पुरानी रूढ़ियों और निराशा के अंधकार में फँसे हैं। सूर्य की किरणों ने उन्हें मुक्त किया — यह ज्ञान, जागृति और प्रगति का प्रतीक है। ‘किरनों से गगन पोंछना’ — सूर्योदय होते ही आकाश के तारे और अंधकार मिट जाते हैं, वैसे ही ज्ञान से अज्ञान नष्ट होता है। ‘धरती को रँग देना’ — सूर्य की रोशनी से सारी सृष्टि रंगीन और जीवंत हो उठती है। कवि का संदेश है कि जिस तरह सूर्य कभी नहीं रुकता और अपने साथ प्रकाश, उष्मा और जीवन लाता है, उसी तरह मनुष्य को भी कभी नहीं रुकना चाहिए।
२. “रत्नमयी वसुधा पर चलने को चरण दिए / बैठी उस क्षितिज पार लक्ष्मी, श्रृंगार किए, / आज तुम्हें मुक्ति मिली, कौन तुम्हें दास कहे।”
प्रसंग: यह पंक्तियाँ कविता के दूसरे छंद से ली गई हैं, जहाँ कवि मनुष्य की स्वतंत्रता और उसकी असीम संभावनाओं का वर्णन करते हैं।
व्याख्या: ‘रत्नमयी वसुधा’ — यह धरती रत्नों (खनिज, संपदा, जीव-जंतु, वनस्पति) से परिपूर्ण है। इस रत्नमयी धरती पर चलने के लिए ईश्वर ने मनुष्य को पैर दिए हैं — यह अद्भुत वरदान है। ‘क्षितिज पार लक्ष्मी’ — क्षितिज (जहाँ धरती और आकाश मिलते दिखते हैं) के उस पार सौभाग्य और समृद्धि की देवी लक्ष्मी श्रृंगार करके खड़ी है। अर्थात् सफलता, संपन्नता और उपलब्धि उसी के लिए है जो चलते रहता है — जो रुक गया, वह लक्ष्मी को नहीं पा सकता। ‘आज तुम्हें मुक्ति मिली, कौन तुम्हें दास कहे’ — आज मनुष्य स्वतंत्र है, वह किसी का दास नहीं है; वह ऋतुओं और संवत् (काल-चक्र) का स्वामी है। यह पंक्ति गुलामी से मुक्ति और आत्म-सम्मान का उद्घोष है।
३. “नदियों ने चलकर ही सागर का रूप लिया / मेघों ने चलकर ही धरती को गर्भ दिया, / रुकने का मरण नाम, पीछे सब प्रस्तर है / आगे है देवयान, युग के ही संग-संग चलते चलो।”
प्रसंग: यह पंक्तियाँ कविता के तीसरे और सर्वाधिक प्रेरक छंद से ली गई हैं, जहाँ कवि ने प्रकृति के उदाहरणों द्वारा गतिशीलता और जीवन-दर्शन का उपदेश दिया है।
व्याख्या: नदी का उदाहरण अत्यंत सटीक है — नदी ने पर्वत से निकलकर, बिना रुके बहते-बहते ही सागर का विराट रूप प्राप्त किया। यदि वह कहीं ठहर जाती, तो गंदगी और दलदल बन जाती। मेघ ने चलकर — अर्थात् समुद्र का जल वाष्पीभूत होकर बादल बना, वह बादल पर्वतों की ओर चला, बरसा और धरती को उर्वरता (गर्भ) प्रदान की। ‘रुकने का मरण नाम’ — यह कविता की सर्वाधिक प्रसिद्ध पंक्ति है। रुकना ही मृत्यु है; जीवन का दूसरा नाम ही गति है। ‘पीछे सब प्रस्तर है’ — पीछे मुड़कर देखने पर केवल पत्थर जैसी जड़ता और निर्जीवता है। ‘आगे है देवयान’ — देवयान वह मार्ग है जो देवताओं तक पहुँचाता है; यहाँ इसका अर्थ है — उच्चतम लक्ष्य, श्रेष्ठतम उपलब्धि। अतः युग (काल) के साथ कदम मिलाकर आगे बढ़ो।
४. “मानव जिस ओर गया नगर बसे, तीर्थ बने / तुमसे है कौन बड़ा गगन-सिंधु मित्र बने, / त्यागो सब जीर्ण वसन, नूतन के संग-संग चलते चलो।”
प्रसंग: यह पंक्तियाँ कविता के अंतिम (चौथे) छंद से ली गई हैं, जहाँ कवि मनुष्य की असाधारण क्षमता और उसकी श्रेष्ठता का उद्घोष करते हैं।
व्याख्या: ‘मानव जिस ओर गया नगर बसे, तीर्थ बने’ — यह मनुष्य की सृजनशीलता और उसकी महत्ता का चित्रण है। मनुष्य जहाँ भी गया, वहाँ सभ्यता का निर्माण हुआ — नगर बने, धार्मिक स्थल (तीर्थ) बने। ‘तुमसे है कौन बड़ा गगन-सिंधु मित्र बने’ — आकाश और सागर जैसी विशाल प्राकृतिक शक्तियाँ भी मनुष्य की मित्र बन गई हैं, इससे बड़ा कोई नहीं। ‘भूमा का भोगो सुख, नदियों का सोम पियो’ — ‘भूमा’ अर्थात् परब्रह्म का आनंद; ‘सोम’ अर्थात् अमृत-जल — कवि कहते हैं कि पृथ्वी के श्रेष्ठ सुखों का उपभोग करो। ‘जीर्ण वसन’ — पुरानी रूढ़ियाँ, जड़ परंपराएँ, अंधविश्वास — ये सब फटे-पुराने वस्त्रों के समान हैं जिन्हें त्याग देना चाहिए और नवीन विचारों को अपनाते हुए आगे बढ़ना चाहिए।
भाव-सौंदर्य (Aesthetic Appeal)
१. प्रेरणा-काव्य (Inspirational Poetry): “चरैवेति” एक उत्कृष्ट प्रेरणा-काव्य है। यह कविता किसी एक व्यक्ति या घटना के बारे में नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवजाति को संबोधित है। इसका संदेश — “चलते रहो, रुको मत” — सार्वकालिक और सार्वभौमिक है।
२. प्रकृति-चित्रण और प्रतीक-विधान: कविता में सूर्य (प्रकाश और ऊर्जा का प्रतीक), चंद्रमा-तारे (नियमितता और गति के प्रतीक), नदी (निरंतर प्रवाह का प्रतीक), मेघ (कर्म और फल का प्रतीक), लक्ष्मी (सफलता और समृद्धि का प्रतीक) और देवयान (उच्चतम लक्ष्य का प्रतीक) — ये सभी प्रतीक अत्यंत सटीक और प्रभावशाली हैं।
३. रूपक अलंकार (Metaphor): “रत्नमयी वसुधा” में पृथ्वी को रत्नों की खान कहना; “गगन-सिंधु” में आकाश को सागर की उपमा देना; “जीर्ण वसन” में पुरानी रूढ़ियों को फटे-पुराने वस्त्र बताना — ये सभी प्रभावशाली रूपक हैं जो कविता की अभिव्यंजना को समृद्ध करते हैं।
४. अनुप्रास अलंकार: “चलते चलो, चलते चलो” में ‘च’ और ‘ल’ व्यंजनों की आवृत्ति, “संग-संग” में ‘स’ की पुनरावृत्ति, “गगन पोंछ” में ‘ग’ की आवृत्ति — ये सब अनुप्रास के उत्कृष्ट उदाहरण हैं जो कविता को एक संगीतात्मक लय प्रदान करते हैं।
५. विरोधाभास (Paradox): “रुकने का मरण नाम, पीछे सब प्रस्तर है / आगे है देवयान” — इस पंक्ति में जीवन और मृत्यु, गति और स्थिरता, आगे और पीछे का विरोधाभास अत्यंत मार्मिक और विचारोत्तेजक है।
६. गीत-शैली और टेक (Refrain): यह कविता गीत-शैली में लिखी गई है। “चलते चलो, चलते चलो सूरज के संग-संग” टेक (मुखड़ा) बार-बार आती है जो गीत की लय और केंद्रीय भाव को और सुदृढ़ करती है। प्रत्येक छंद के अंत में ‘चलते चलो’ की पुनरावृत्ति कविता को एक संगीतात्मक प्रवाह देती है।
७. वैदिक संस्कृति की पृष्ठभूमि: ‘चरैवेति’ शब्द ऐतरेय ब्राह्मण (वैदिक साहित्य) से लिया गया है। कवि ने इस प्राचीन ऋषि-वचन को आधुनिक संदर्भ में नवजीवन दिया है। ‘देवयान’, ‘सोम’, ‘भूमा’ जैसे वैदिक शब्दों का प्रयोग कविता को एक आध्यात्मिक गहराई देता है।
प्रश्नोत्तर (Question-Answer)
सही विकल्प का चयन करो (Multiple Choice Questions)
१. ‘चरैवेति’ कविता के कवि कौन हैं?
उत्तरः (i) नरेश मेहता।
२. नरेश मेहता का जन्म कब हुआ था?
उत्तरः (ii) 15 फरवरी 1922 ई. में।
३. ‘चरैवेति’ का अर्थ क्या है?
उत्तरः (i) चलते रहो।
४. नरेश मेहता का स्वर्गवास कब हुआ?
उत्तरः (ii) 22 नवंबर 2000 ई. में।
५. नरेश मेहता ने किस विश्वविद्यालय से एम.ए. किया?
उत्तरः (ii) बनारस हिंदू विश्वविद्यालय।
६. नरेश मेहता को ज्ञानपीठ पुरस्कार कब मिला?
उत्तरः (iii) 1992 ई. में।
७. ‘जीर्ण वसन’ का क्या अर्थ है?
उत्तरः (iv) फटे-पुराने वस्त्र; पुरानी रूढ़ियाँ और अंधविश्वास।
८. कवि ने ‘रुकने का मरण नाम’ क्यों कहा है?
उत्तरः (iii) क्योंकि रुकना जड़ता और निर्जीवता है, जबकि जीवन का अर्थ ही गतिशीलता है।
९. नरेश मेहता का संपूर्ण काव्य किस नाम से प्रकाशित हुआ?
उत्तरः (ii) समिधा।
१०. कवि के अनुसार मनुष्य जिस ओर गया, वहाँ क्या बना?
उत्तरः (i) नगर और तीर्थ।
हाँ/नहीं में उत्तर दो
१. “चरैवेति” कविता में कवि ने मनुष्य को निरंतर आगे बढ़ने की प्रेरणा दी है।
उत्तरः हाँ।
२. नरेश मेहता ने साहित्य अकादमी पुरस्कार से पहले ज्ञानपीठ पुरस्कार पाया।
उत्तरः नहीं। (साहित्य अकादमी 1988 में, ज्ञानपीठ 1992 में मिला।)
३. ‘चरैवेति’ एक प्राचीन वैदिक मंत्र है।
उत्तरः हाँ।
४. कविता में कवि ने रुककर आराम करने को जीवन की सफलता बताया है।
उत्तरः नहीं।
५. नरेश मेहता हिंदी की नई कविता धारा के प्रमुख कवि हैं।
उत्तरः हाँ।
पूर्ण वाक्य में उत्तर दो (बोध एवं विचार)
१. कवि ने ‘चलते चलो’ का संदेश किसे दिया है?
उत्तरः कवि ने ‘चलते चलो’ का संदेश संपूर्ण मनुष्य जाति को दिया है — उन सभी को जो जीवन में आगे बढ़ना चाहते हैं।
२. कवि ने वसुधा को रत्नमयी क्यों कहा है?
उत्तरः कवि ने वसुधा को रत्नमयी इसलिए कहा है क्योंकि हमारी पृथ्वी अनेक प्रकार के रत्न, मणि, धातु, खनिज और प्राकृतिक संपदा से परिपूर्ण है।
३. कवि ने किन-किन के साथ निरंतर चलने का संदेश दिया है?
उत्तरः कवि ने सूर्य, चंद्रमा, तारों, संवत् (काल-चक्र) और युग (समय) के साथ निरंतर चलने का संदेश दिया है।
४. किन पंक्तियों में कवि ने मनुष्य की सामर्थ्य और अजेयता का उल्लेख किया है?
उत्तरः “रत्नमयी वसुधा पर चलने को चरण दिए / बैठी उस क्षितिज पार लक्ष्मी, श्रृंगार किए / आज तुम्हें मुक्ति मिली, कौन तुम्हें दास कहे” — इन पंक्तियों में कवि ने मनुष्य की सामर्थ्य और अजेयता का उल्लेख किया है।
५. निरंतर प्रयत्नशील मनुष्य को कौन-कौन से सुख प्राप्त होते हैं?
उत्तरः निरंतर प्रयत्नशील मनुष्य को दासत्व से मुक्ति, भूमा (परमात्मा) के सुख का भोग, नदियों का सोम (अमृत-जल) और सफलता-समृद्धि (लक्ष्मी) — ये सुख प्राप्त होते हैं।
६. ‘रुकने को मरण’ कहना कहाँ तक उचित है?
उत्तरः कवि का ‘रुकने को मरण’ कहना पूर्णतः उचित है क्योंकि जीवन में गतिशीलता ही विकास और जीवन का आधार है। जो रुक जाता है, वह पत्थर की तरह जड़ हो जाता है — वह प्रगति, सफलता और आनंद से वंचित हो जाता है, जो एक प्रकार की मृत्यु ही है। नदी और मेघ के उदाहरण भी यही सिद्ध करते हैं।
७. कवि ने मनुष्य को ‘तुमसे है कौन बड़ा’ क्यों कहा है?
उत्तरः कवि ने मनुष्य को ‘तुमसे है कौन बड़ा’ इसलिए कहा है क्योंकि मनुष्य की सृजन-शक्ति और उसकी अदम्य जिजीविषा के कारण उसने जहाँ भी कदम रखे, नगर और तीर्थ बनाए; यहाँ तक कि गगन (आकाश) और सिंधु (सागर) भी उसके मित्र बन गए।
८. ‘युग के ही संग-संग चले चलो’ कथन का आशय स्पष्ट करो।
उत्तरः ‘युग के ही संग-संग चले चलो’ का आशय है कि समय हमेशा बदलता रहता है और आगे बढ़ता रहता है। मनुष्य को भी बदलते युग के साथ कदम-से-कदम मिलाकर चलना चाहिए। पुरानी रूढ़ियों, अंधविश्वासों और जड़ परंपराओं को त्यागकर नए विचारों, नई तकनीक और नई सोच को अपनाना चाहिए।
९. नरेश मेहता ‘आस्था और जागृति’ के कवि हैं — कविता के आधार पर सिद्ध करो।
उत्तरः नरेश मेहता की इस कविता में ‘आस्था’ इस विश्वास में दिखती है कि मनुष्य की गतिशीलता और प्रयत्न सफलता दिलाएंगे — क्षितिज पार लक्ष्मी श्रृंगार करके खड़ी है, आगे देवयान है। ‘जागृति’ इस चेतना में दिखती है कि सूर्य ने तम के बंदियों को मुक्त किया, जीर्ण वसन (पुरानी रूढ़ियाँ) त्यागो और नूतन के साथ चलो। यह कविता मनुष्य की आत्मशक्ति में आस्था और उसे जाग्रत करने का उत्कृष्ट काव्य-प्रयास है।
अति संक्षिप्त उत्तर दो (लगभग 25 शब्द)
१. ‘चरैवेति’ शब्द कहाँ से लिया गया है और इसका क्या अर्थ है?
उत्तरः ‘चरैवेति’ शब्द प्राचीन वैदिक साहित्य (ऐतरेय ब्राह्मण) से लिया गया है। इसका अर्थ है — ‘चलते रहो’ अर्थात् निरंतर गतिशील रहो, कभी मत रुको।
२. नदी और मेघ के उदाहरण से कवि क्या सिद्ध करना चाहते हैं?
उत्तरः नदी ने चलकर सागर का रूप पाया और मेघ ने चलकर धरती को उर्वर किया — इससे कवि सिद्ध करते हैं कि गतिशीलता ही उपलब्धि और सृजन का मार्ग है।
३. ‘जीर्ण वसन’ त्यागने से कवि का क्या आशय है?
उत्तरः ‘जीर्ण वसन’ से कवि का आशय पुरानी रूढ़ियों, अंधविश्वासों और जड़ परंपराओं से है जिन्हें त्यागकर नवीन विचारों को अपनाना चाहिए।
४. ‘गगन-सिंधु मित्र बने’ — इस पंक्ति का क्या भाव है?
उत्तरः इस पंक्ति का भाव है कि मनुष्य की गतिशीलता और सृजन-शक्ति के कारण विशाल आकाश और सागर जैसी प्राकृतिक शक्तियाँ भी उसके अनुकूल हो गई हैं।
५. ‘देवयान’ से कवि का क्या तात्पर्य है?
उत्तरः ‘देवयान’ वह मार्ग है जो देवताओं तक जाता है। यहाँ इसका तात्पर्य है — जीवन का उच्चतम लक्ष्य, सर्वोच्च उपलब्धि, जो केवल निरंतर आगे बढ़ने से प्राप्त होती है।
संक्षिप्त उत्तर दो (लगभग 50 शब्द)
१. नरेश मेहता का साहित्यिक परिचय दो।
उत्तरः नरेश मेहता हिंदी नई कविता के प्रमुख कवि हैं। उनका जन्म 15 फरवरी 1922 को शाजापुर, मध्यप्रदेश में हुआ। उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से एम.ए. किया। वे अज्ञेय के ‘दूसरे तार सप्तक’ में शामिल रहे। उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं — बोलने दो चीड़ को, महाप्रस्थान, शबरी। उन्हें साहित्य अकादमी (1988) और ज्ञानपीठ पुरस्कार (1992) मिला। 22 नवंबर 2000 को उनका निधन हुआ।
२. कविता में सूर्य की भूमिका का वर्णन करो।
उत्तरः कविता में सूर्य एक महान प्रेरक के रूप में है। सूर्य ने अंधकार (तम) के बंदियों को अपनी किरणों से मुक्त किया, गगन को पोंछा और धरती को रंगों से भर दिया। ऋतुओं को विजय दिलाई। कवि मनुष्य को सूर्य के साथ-साथ चलने का आह्वान करते हैं — क्योंकि सूर्य कभी नहीं रुकता, सदा गतिमान रहता है।
३. ‘क्षितिज पार लक्ष्मी’ का प्रतीकात्मक अर्थ समझाओ।
उत्तरः ‘क्षितिज पार लक्ष्मी, श्रृंगार किए बैठी है’ — इसका प्रतीकात्मक अर्थ है कि सफलता और समृद्धि (लक्ष्मी) उन्हीं की प्रतीक्षा कर रही है जो निरंतर चलते रहते हैं। क्षितिज (जहाँ धरती और आकाश मिलते दिखते हैं) एक सुदूर लक्ष्य का प्रतीक है — वह दूर है, पर चलने वाले के लिए पहुँच के भीतर है।
४. कविता के आधार पर मनुष्य की महानता का वर्णन करो।
उत्तरः कवि के अनुसार मनुष्य इस सृष्टि का सबसे महान प्राणी है। उसकी सृजनशीलता के कारण जहाँ भी वह गया, नगर बसे और तीर्थ बने। गगन (आकाश) और सिंधु (सागर) जैसी विशाल प्राकृतिक शक्तियाँ उसकी मित्र बन गईं। धरती रत्नमयी है और वह उसका भोग करने के लिए अधिकृत है। इससे बड़ा और कोई प्राणी नहीं।
सम्यक् उत्तर दो (लगभग 100 शब्द)
१. “चरैवेति” कविता का केंद्रीय भाव अपने शब्दों में लिखो।
उत्तरः श्रीनरेश मेहता की “चरैवेति” कविता का केंद्रीय भाव है — निरंतर गतिशीलता ही जीवन है और स्थिरता मृत्यु के समान है। कवि ने प्राचीन वैदिक मंत्र ‘चरैवेति’ (चलते रहो) को आधुनिक संदर्भ में नवजीवन दिया है। प्रकृति के विभिन्न तत्वों — सूर्य, नदी, मेघ — के माध्यम से कवि यह दर्शाते हैं कि जो चलता है, वही बड़ा होता है। सूर्य चलता है तो अंधकार नष्ट होता है, नदी चलती है तो सागर बनती है, मेघ चलता है तो धरती हरी होती है। मनुष्य को भी इन्हीं से प्रेरणा लेकर निरंतर प्रगति के पथ पर बढ़ते रहना चाहिए। कवि यह भी कहते हैं कि जीवन में पुरानी रूढ़ियों (जीर्ण वसन) को त्यागकर नवीन विचारों को अपनाना चाहिए और युग के साथ कदम मिलाकर चलना चाहिए। “रुकने का मरण नाम, पीछे सब प्रस्तर है, आगे है देवयान” — यह पंक्ति कविता का सार है। यह कविता न केवल व्यक्तिगत जीवन के लिए, बल्कि समाज और राष्ट्र की प्रगति के लिए भी एक सशक्त संदेश है।
२. नरेश मेहता के जीवन एवं साहित्यिक योगदान पर प्रकाश डालो।
उत्तरः श्रीनरेश मेहता हिंदी साहित्य के उन विरले कवियों में हैं जिन्होंने भारतीय संस्कृति, वैदिक परंपरा और आधुनिक जीवन-दर्शन को अपनी कविताओं में एकसाथ जोड़ा। उनका जन्म 15 फरवरी 1922 को मध्यप्रदेश के शाजापुर में हुआ था। मात्र ढाई वर्ष की आयु में माता का निधन हो जाने के बाद उनके चाचा ने उनका लालन-पालन किया। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से हिंदी में एम.ए. करने के बाद उन्होंने आकाशवाणी में सेवा की, पत्रिकाओं का संपादन किया और प्रेमचंद सृजनपीठ के निदेशक रहे। वे अज्ञेय के ‘दूसरे तार सप्तक’ में शामिल होने के बाद हिंदी साहित्य में स्थापित हुए। उनकी प्रमुख काव्य-रचनाएँ हैं — बोलने दो चीड़ को, पिछले दिनों नंगे पैरों, महाप्रस्थान, प्रवाद पर्व, शबरी। उन्होंने उपन्यास (डूबते मस्तूल, यह पथ बंधु था), कहानियाँ और नाटक भी लिखे। उनका संपूर्ण काव्य ‘समिधा’ के नाम से प्रकाशित है। उन्हें मंगला प्रसाद परितोषिक (1985), साहित्य अकादमी पुरस्कार (1988) और ज्ञानपीठ पुरस्कार (1992) प्राप्त हुए। 22 नवंबर 2000 को भोपाल में उनका निधन हो गया। वे ‘आस्था और जागृति’ के कवि के रूप में हिंदी साहित्य में सदा अमर रहेंगे।
भाषा एवं व्याकरण (Language and Grammar)
एक शब्द लिखो (One-Word Substitutions)
| वाक्यांश | एक शब्द |
|---|---|
| जो दूसरों के अधीन हो | गुलाम / दास |
| जो दूसरों के उपकार को मानता हो | कृतज्ञ |
| जो बच्चों को पढ़ाते हैं | शिक्षक |
| जो गीत की रचना करते हैं | गीतकार |
| जो खेती-बाड़ी का काम करता हो | किसान / कृषक |
समास विग्रह करो (Compound Word Analysis)
| समस्त पद | विग्रह | समास का नाम |
|---|---|---|
| पीताम्बर | पीत है अम्बर जिसका | बहुव्रीही समास |
| यथाशक्ति | शक्ति के अनुसार | अव्ययीभाव समास |
| धनी-निर्धन | धनी और निर्धन | द्वंद्व समास |
| कमल-नयन | कमल के समान नयन | कर्मधारय समास |
| त्रिफला | तीन फलों का समाहार | द्विगु समास |
| गगन-सिंधु | गगन रूपी सिंधु | कर्मधारय समास |
मुहावरे और उनके अर्थ (Idioms and their Meanings)
| मुहावरा | अर्थ | वाक्य में प्रयोग |
|---|---|---|
| अपना उल्लू सीधा करना | स्वार्थ पूरा करना | वह हमेशा अपना उल्लू सीधा करके चला जाता है। |
| आँखों का तारा | अत्यंत प्रिय | राम अपने माता-पिता की आँखों का तारा है। |
| उन्नीस-बीस का अंतर | बहुत कम अंतर | दोनों भाइयों में उन्नीस-बीस का ही अंतर है। |
| जान पर खेलना | अपनी जान जोखिम में डालना | देश की रक्षा के लिए सैनिक जान पर खेलते हैं। |
| बाएँ हाथ का खेल | अत्यंत सरल काम | यह गणित का सवाल उसके लिए बाएँ हाथ का खेल है। |
| घी के दीए जलाना | खुशी मनाना, उत्सव करना | परीक्षा में प्रथम आने पर उसने घर में घी के दीए जलाए। |
विलोम शब्द लिखो (Write Antonyms)
| शब्द | विलोम |
|---|---|
| मुक्त | बंदी / कैद |
| नूतन | पुरातन / जीर्ण |
| विजय | पराजय |
| आगे | पीछे |
| मरण | जीवन |
| दास | स्वामी |
शब्दार्थ (Word Meanings)
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| चरैवेति | चलते रहो (प्राचीन वैदिक मंत्र) |
| तम | अंधकार, अज्ञान |
| बंदी | कैदी, दास, गुलाम |
| किरन | किरण, प्रकाश की लकीर |
| गगन | आकाश |
| रत्नमयी | रत्नों से भरी हुई, बहुमूल्य संपदा से युक्त |
| वसुधा | पृथ्वी, धरती |
| चरण | पैर, कदम |
| क्षितिज | जहाँ धरती और आकाश मिलते दिखते हैं |
| लक्ष्मी | धन और समृद्धि की देवी; यहाँ सफलता का प्रतीक |
| श्रृंगार | सजावट, अलंकरण |
| संवत् | वर्ष, काल-चक्र (हिंदी कैलेंडर का वर्ष) |
| मेघ | बादल |
| गर्भ दिया | उर्वर किया, वर्षा से धरती को उपजाऊ बनाया |
| प्रस्तर | पत्थर; यहाँ जड़ता और निर्जीवता का प्रतीक |
| देवयान | देवताओं का मार्ग; यहाँ उच्चतम लक्ष्य का प्रतीक |
| तीर्थ | पवित्र स्थान, धार्मिक क्षेत्र |
| गगन-सिंधु | आकाश रूपी सागर; आकाश को सागर की तरह विशाल बताना |
| भूमा | परमात्मा, ब्रह्म; यहाँ पृथ्वी की विशालता और उसका दिव्य सुख |
| सोम | अमृत-जल, चंद्रमा का रस; यहाँ नदियों का पवित्र जल |
| जीर्ण वसन | फटे-पुराने वस्त्र; यहाँ पुरानी रूढ़ियाँ और जड़ परंपराएँ |
| नूतन | नया, नवीन |