असम बोर्ड (ASSEB) की कक्षा 9 की हिंदी ऐच्छिक पाठ्यपुस्तक आलोक भाग-1 का चौदहवाँ अध्याय (पद्य खंड का छठा पाठ) “साबरमती के संत” हिंदी के महान राष्ट्रकवि और गीतकार कवि प्रदीप द्वारा रचित एक अमर देशभक्ति गीत है। यह गीत राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की महानता, उनकी अहिंसा-नीति और भारत को स्वतंत्र कराने में उनकी अद्भुत भूमिका का गुणगान करता है। यहाँ इस कविता के पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर और अतिरिक्त महत्वपूर्ण प्रश्न दिए गए हैं।
कविता-पाठ (The Poem)
दे दी हमें आज़ादी बिना खड़ग बिना ढाल,
साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल।
आँधी में भी जलती रही गाँधी तेरी मशाल,
साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल।।
जग में जिया है कोई तो बापू तू ही जिया,
तूने वतन की राह में सब कुछ लुटा दिया।
माँगा न कोई तख्त न कोई ताज भी लिया,
अमृत दिया तो ठीक मगर खुद ज़हर पिया।
जिस दिन तेरी चिता जली, रोया था महाकाल,
साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल।।
धरती पे लड़ी तूने अजब ढंग की लड़ाई,
दागी न कहीं तोप ना बंदूक चलाई।
दुश्मन के किले पर भी न की तूने चढ़ाई,
वाह रे फ़क़ीर खूब करामात दिखाई।
चुटकी में दुश्मनों को दिया देश से निकाल,
साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल।।
शतरंज बिछाकर यहाँ बैठा था ज़माना,
लगता था कि मुश्किल है फिरंगी को हराना।
टक्कर थी बड़े ज़ोर की, दुश्मन भी था ताना,
पर तू भी था बापू बड़ा उस्ताद पुराना।
मारा वो कसके दाँव कि उलटी सभी की चाल,
साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल।।
जब-जब तेरा बिगुल बजा जवान चल पड़े,
मज़दूर चल पड़े थे और किसान चल पड़े।
हिंदू और मुसलमान सिख पठान चल पड़े,
कदमों पे तेरे कोटि-कोटि प्राण चल पड़े।
फूलों की सेज छोड़ के दौड़े जवाहरलाल,
साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल।।
मन में थी अहिंसा की लगन, तन पे लँगोटी,
लाखों में घूमता था लिए सत्य की सोटी।
वैसे तो देखने में थी हस्ती तेरी छोटी,
लेकिन तुझपे झुकती थी हिमालय की चोटी।
दुनिया में तू बेजोड़ था इंसान बेमिसाल,
साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल।।
— कवि प्रदीप
कविता का सारांश (Summary of the Poem)
कवि प्रदीप द्वारा रचित “साबरमती के संत” राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को समर्पित एक अमर देशभक्ति गीत है। इस गीत में कवि ने गांधीजी के असाधारण व्यक्तित्व, उनकी अहिंसा की नीति और भारत को स्वाधीन कराने में उनकी चमत्कारिक भूमिका का मार्मिक और प्रेरणादायक वर्णन किया है। गीत की मुख्य पंक्ति है — “दे दी हमें आज़ादी बिना खड़ग बिना ढाल” अर्थात् गांधीजी ने बिना तलवार और ढाल के, केवल सत्य और अहिंसा के बल पर देश को अंग्रेजों के चंगुल से मुक्त करा लिया। यह उनका सबसे बड़ा कमाल था। विपरीत परिस्थितियों में भी उनके आदर्शों की मशाल कभी नहीं बुझी।
दूसरे छंद में कवि कहते हैं कि बापू ने अपने देश की राह में सब कुछ न्योछावर कर दिया। उन्होंने न कोई सिंहासन माँगा, न ताज लिया। दूसरों को अमृत देकर स्वयं ज़हर पी लिया — अर्थात् सबको सुख देकर स्वयं कष्ट सहते रहे। जब उनकी चिता जली, तो ऐसा लगा मानो महाकाल भी रो पड़े। तीसरे छंद में कवि उनकी लड़ाई की विशेषता बताते हैं — यह अनोखी लड़ाई थी जिसमें न तोप दागी गई, न बंदूक चलाई गई, न दुश्मन के किले पर चढ़ाई की गई, फिर भी उन्होंने फ़क़ीर की तरह चुटकी में दुश्मनों को देश से निकाल दिया। चौथे छंद में कवि कहते हैं कि जिस समय सारे संसार को लग रहा था कि अंग्रेजों को हराना असंभव है, वहाँ बापू ने ऐसा दाँव मारा कि सबकी चाल उलट गई।
पाँचवें छंद में उनकी जन-संग्रहण शक्ति का चित्रण है — जब बापू का बिगुल बजता था, तो जवान, मज़दूर, किसान, हिंदू, मुसलमान, सिख, पठान — सभी उनके पीछे चल पड़ते थे। जवाहरलाल नेहरू भी सुख-सुविधाएँ छोड़कर उनके साथ आ जाते थे। अंतिम छंद में गांधीजी के व्यक्तित्व का चित्रण है — मन में अहिंसा, तन पर लँगोटी, हाथ में सत्य की लाठी। देखने में उनकी काया छोटी थी, परंतु उनके समक्ष हिमालय की चोटी भी झुकती थी। वे वास्तव में दुनिया में बेजोड़ और बेमिसाल इंसान थे। यह गीत 1954 की हिंदी फ़िल्म ‘जागृति’ में शामिल किया गया था।
Summary (English)
“Sabarmati Ke Sant” (The Saint of Sabarmati) is an immortal patriotic poem written by Kavi Pradeep, included in the ASSEB Class 9 Hindi Elective textbook Aalok Bhag-1 as Chapter 14, the sixth poem in the poetry section. The poem is dedicated to the Father of the Nation, Mahatma Gandhi. The central theme of the poem is captured in its opening lines: Gandhi gave India its freedom “without sword or shield” — that is, through the power of truth and non-violence alone, without any weapons or violence, he expelled the British rulers from the country, which was a miracle in itself. The poem describes how Gandhi’s torch of ideals kept burning even in the fiercest storms. He gave everything for the country — asking for no throne or crown in return — giving nectar to others while himself drinking poison (enduring hardships). The poem celebrates his unique style of warfare: no cannons were fired, no guns used, no fort attacked, yet he drove the enemy out with a single stroke, like a true saint. When Gandhi’s call went out, people of all communities — labourers, farmers, Hindus, Muslims, Sikhs, and Pathans — rallied behind him. Even Jawaharlal Nehru left all comforts to join his cause. The final stanza paints a vivid picture of Gandhi’s personality: a heart full of non-violence, a loincloth on the body, a staff of truth in hand — though small in stature, even the Himalayan peaks bowed before him. The poem ends by calling Gandhi a peerless, unmatched human being in the history of the world.
कवि-परिचय (About the Poet)
कवि प्रदीप का वास्तविक नाम रामचंद्र नारायण द्विवेदी था। उनका जन्म 6 फरवरी 1915 को मध्य प्रदेश के उज्जैन जिले के बड़नगर नामक कस्बे में हुआ था। उनके पिता का नाम नारायण भट्ट था। वे उदीच्य ब्राह्मण परिवार से थे। बचपन से ही उन्हें हिंदी कविता लिखने में गहरी रुचि थी। उन्होंने इंदौर के शिवाजी राव हाई स्कूल से प्रारंभिक शिक्षा और इलाहाबाद के दरागंज हाई स्कूल से माध्यमिक शिक्षा प्राप्त की। 1939 में उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से स्नातक की उपाधि प्राप्त की। वे शिक्षक बनना चाहते थे, किंतु एक कवि सम्मेलन के बहाने मुंबई पहुँचे, जहाँ बांबे टॉकीज़ के हिमांशु राय ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें 200 रुपए प्रतिमाह पर नौकरी दे दी। तभी से रामचंद्र द्विवेदी ने “प्रदीप” नाम अपनाया। बाद में अभिनेता प्रदीप कुमार से भ्रम की स्थिति से बचने के लिए वे “कवि प्रदीप” के नाम से जाने जाने लगे। 1942 में उनका विवाह सुभद्रा बेन से हुआ और उनकी दो बेटियाँ — सरगम और मितुल — हुईं।
कवि प्रदीप हिंदी साहित्य और फिल्म जगत के सर्वाधिक प्रतिष्ठित देशभक्ति गीतकारों में से एक हैं। उन्होंने अपने जीवनकाल में लगभग 1,700 गीत लिखे और लगभग 76 हिंदी फिल्मों में अपना योगदान दिया। 1939 में फिल्म “कंगन” से उन्होंने फिल्म जगत में प्रवेश किया। 1940 में फिल्म “बंधन” के लिए उन्होंने गीत लिखे। उनके प्रसिद्ध देशभक्ति गीतों में “दे दी हमें आज़ादी” (जागृति, 1954), “हम लाए हैं तूफान से” (जागृति, 1954) और “ऐ मेरे वतन के लोगों” (1963) सर्वाधिक लोकप्रिय हैं। “ऐ मेरे वतन के लोगों” गीत उन्होंने 1962 के भारत-चीन युद्ध में शहीद हुए सैनिकों की श्रद्धांजलि में लिखा था। यह गीत पहली बार गणतंत्र दिवस 1963 पर लता मंगेशकर ने प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की उपस्थिति में गाया था, जिसे सुनकर नेहरूजी की आँखें भर आई थीं। कवि प्रदीप ने अपनी सबसे लोकप्रिय कृति की रॉयल्टी राशि शहीद सैनिकों की विधवाओं को दान कर दी। उन्हें 1961 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 1995 में भारत के राष्ट्रपति द्वारा ‘राष्ट्रकवि’ की उपाधि और 1998 में भारत के सर्वोच्च सिनेमाई सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार से नवाज़ा गया। 11 दिसंबर 1998 को मुंबई में उनका निधन हो गया।
सप्रसंग व्याख्या (Contextual Explanation)
१. “दे दी हमें आज़ादी बिना खड़ग बिना ढाल, / साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल।”
प्रसंग: यह पंक्तियाँ कवि प्रदीप द्वारा रचित गीत “साबरमती के संत” की टेक (मुखड़ा) हैं। इस गीत में कवि ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की अद्वितीय देशभक्ति और अहिंसक स्वतंत्रता-संग्राम का गुणगान किया है।
व्याख्या: कवि गांधीजी को “साबरमती के संत” कहकर संबोधित करते हैं, क्योंकि गांधीजी का अहमदाबाद स्थित साबरमती आश्रम उनकी कर्मस्थली था। ‘खड़ग’ का अर्थ है तलवार और ‘ढाल’ का अर्थ है शील्ड (ढाल) — दोनों युद्ध के प्रतीक हैं। गांधीजी ने बिना किसी हथियार और हिंसा के, केवल सत्य और अहिंसा के बल पर अंग्रेजों से भारत की आज़ादी छीन ली। यह विश्व इतिहास में एक अभूतपूर्व घटना थी। ‘कमाल’ शब्द से कवि गांधीजी के इस असाधारण कार्य की महत्ता को रेखांकित करते हैं। ‘मशाल’ गांधीजी के आदर्शों और उनके अहिंसक आंदोलन का प्रतीक है जो प्रतिकूल परिस्थितियों में भी जलती रही।
२. “माँगा न कोई तख्त न कोई ताज भी लिया, / अमृत दिया तो ठीक मगर खुद ज़हर पिया।”
प्रसंग: यह पंक्तियाँ गीत के दूसरे छंद से ली गई हैं, जहाँ कवि गांधीजी के निःस्वार्थ जीवन और त्याग का वर्णन करते हैं।
व्याख्या: ‘तख्त’ का अर्थ है सिंहासन और ‘ताज’ का अर्थ है मुकुट — दोनों सत्ता और वैभव के प्रतीक हैं। गांधीजी भारत को स्वतंत्र कराने के बाद चाहते तो राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री का सर्वोच्च पद पाते, परंतु उन्होंने कुछ नहीं माँगा और सदा एक साधारण फ़क़ीर की भाँति जीते रहे। ‘अमृत देना’ का भाव है — सबको स्वतंत्रता, सुख और अधिकार दिलाना; ‘ज़हर पीना’ का भाव है — स्वयं उपवास, यातना, जेल और अंततः गोली से शहादत सहना। यह पंक्ति गांधीजी के परम-त्याग का सटीक चित्रण है।
३. “मन में थी अहिंसा की लगन, तन पे लँगोटी, / लाखों में घूमता था लिए सत्य की सोटी। / वैसे तो देखने में थी हस्ती तेरी छोटी, / लेकिन तुझपे झुकती थी हिमालय की चोटी।”
प्रसंग: यह पंक्तियाँ गीत के अंतिम छंद से ली गई हैं, जहाँ कवि गांधीजी के व्यक्तित्व का सजीव चित्रण करते हैं।
व:याख्या: इन पंक्तियों में गांधीजी के बाह्य और आंतरिक व्यक्तित्व का एक साथ चित्रण है। बाह्य रूप से — उनका शरीर क्षीण (पतला-दुबला) था, वे केवल एक लँगोटी धारण करते थे और हाथ में बाँस की सोटी (छड़ी) लिए लाखों लोगों के बीच घूमते थे। आंतरिक रूप से — उनके मन में अहिंसा के प्रति अटूट लगन थी और उनका एकमात्र हथियार सत्य था। ‘सोटी’ लाठी/छड़ी के लिए प्रयुक्त शब्द है जो गांधीजी की सत्याग्रह-यात्राओं का प्रतीक है। शारीरिक रूप से भले ही उनकी काया छोटी दिखती थी, पर उनके नैतिक बल के समक्ष हिमालय-सी ऊँचाई वाले ब्रिटिश साम्राज्य को भी झुकना पड़ा। वे वास्तव में बेजोड़ और बेमिसाल इंसान थे।
भाव-सौंदर्य (Aesthetic Appeal)
१. वीर रस एवं भक्ति रस का समन्वय: यह गीत वीर रस और भक्ति रस का अद्भुत संगम है। गांधीजी के निडर स्वतंत्रता-संग्राम का वर्णन वीर रस को जन्म देता है, तो उनके संत-स्वरूप की आराधना भक्ति रस को। कवि ने गांधीजी को ‘बापू’, ‘फ़क़ीर’ और ‘साबरमती के संत’ — तीन रूपों में चित्रित किया है।
२. रूपक अलंकार (Metaphor): “गाँधी तेरी मशाल” में मशाल गांधीजी के आदर्शों का रूपक है। “सत्य की सोटी” में सोटी (लाठी) सत्याग्रह और नैतिक बल का रूपक है। “अमृत दिया… ज़हर पिया” में अमृत स्वतंत्रता और सुख का तथा ज़हर कष्ट और शहादत का रूपक है।
३. विरोधाभास (Paradox): “वैसे तो देखने में थी हस्ती तेरी छोटी / लेकिन तुझपे झुकती थी हिमालय की चोटी” — यहाँ शारीरिक लघुता और नैतिक महानता के बीच का विरोधाभास अत्यंत प्रभावशाली है। इसी प्रकार “बिना खड़ग बिना ढाल” — हथियार के बिना युद्ध जीतने की विरोधाभासी स्थिति है।
४. अनुप्रास अलंकार: “बिना खड़ग बिना ढाल” में ‘ब’ वर्ण की आवृत्ति है। “चुटकी में चुनाव…” जैसी पंक्तियों में व्यंजन-साम्य की झलक मिलती है, जो गीत को संगीतात्मकता प्रदान करती है।
५. गीत-शैली (Lyric Form): यह रचना एक गीत है, न कि छंदोबद्ध कविता। इसमें टेक (मुखड़ा) और छंद (बंद) की शैली है। टेक बार-बार दोहराई जाती है जो गीत की लय और प्रभाव को बढ़ाती है। उर्दू शब्दों — ‘खड़ग’, ‘ताज’, ‘तख्त’, ‘फ़क़ीर’, ‘करामात’, ‘बेजोड़’, ‘बेमिसाल’ — का प्रयोग गीत को आम जन के बहुत निकट बनाता है।
६. राष्ट्रीय एकता का संदेश: “हिंदू और मुसलमान सिख पठान चल पड़े” — इस पंक्ति में कवि ने गांधीजी की सबसे बड़ी शक्ति को उजागर किया है — वे समस्त धर्मों और जातियों के लोगों को एक साथ लेकर चले। यह सांप्रदायिक सद्भाव और राष्ट्रीय एकता का सबसे सशक्त उदाहरण है।
प्रश्नोत्तर (Question-Answer)
सही विकल्प का चयन करो (Multiple Choice Questions)
१. इस गीत के कवि कौन हैं?
उत्तरः (ii) प्रदीप।
२. कवि प्रदीप का जन्म कब हुआ था?
उत्तरः (i) 6 फरवरी 1915 को।
३. ‘गाँधी तेरी मशाल’ का किस अर्थ में प्रयोग हुआ है?
उत्तरः (iv) गांधीजी का आदर्श।
४. कवि प्रदीप क्या बनना चाहते थे?
उत्तरः (iii) शिक्षक।
५. गांधीजी के ऊँचे मस्तक के सामने किसकी चोटी झुकती थी?
उत्तरः (ii) हिमालय की।
६. गांधीजी को प्यार से लोग क्या कहकर पुकारते थे?
उत्तरः (ii) बापू।
७. ‘सोटी’ शब्द का क्या अर्थ है?
उत्तरः (i) लाठी/छड़ी।
८. कवि प्रदीप का निधन कब हुआ?
उत्तरः (ii) 11 दिसंबर 1998 को।
९. ‘साबरमती के संत’ किसे कहा गया है?
उत्तरः (iv) महात्मा गांधी को।
१०. कवि प्रदीप ने किस फिल्म में पहली बार गाना लिखा?
उत्तरः (ii) कंगन।
हाँ/नहीं में उत्तर दो
१. “साबरमती के संत” गीत में कवि ने महात्मा गांधी की प्रशंसा की है।
उत्तरः हाँ।
२. गांधीजी ने तलवार और बंदूक से अंग्रेजों को देश से भगाया।
उत्तरः नहीं।
३. कवि प्रदीप का वास्तविक नाम रामचंद्र नारायण द्विवेदी था।
उत्तरः हाँ।
४. गांधीजी ने देश की आज़ादी के बाद राष्ट्रपति का पद स्वीकार किया।
उत्तरः नहीं।
५. “साबरमती के संत” गीत फिल्म ‘जागृति’ (1954) में शामिल था।
उत्तरः हाँ।
पूर्ण वाक्य में उत्तर दो
१. ‘साबरमती के संत’ किसे कहा गया है और क्यों?
उत्तरः ‘साबरमती के संत’ महात्मा गांधीजी को कहा गया है, क्योंकि वे अहमदाबाद के साबरमती आश्रम में रहते थे और संत-जैसे सरल, निःस्वार्थ जीवन जीते थे।
२. गांधीजी ने क्या कमाल कर दिखाया?
उत्तरः गांधीजी ने बिना तलवार (खड़ग) और ढाल के, केवल सत्य और अहिंसा के बल पर देश को अंग्रेजों से स्वतंत्र कराकर कमाल कर दिखाया।
३. महात्मा गांधी का वास्तविक हथियार क्या था?
उत्तरः महात्मा गांधी का वास्तविक हथियार अहिंसा और सत्य था — न कोई तोप, न बंदूक, केवल मन में अहिंसा की लगन और हाथ में सत्य की सोटी।
४. गांधीजी ने लोगों को किस मार्ग पर चलना सिखाया?
उत्तरः गांधीजी ने लोगों को सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलना सिखाया तथा शांतिपूर्ण असहयोग और सत्याग्रह के माध्यम से अन्याय का विरोध करना सिखाया।
५. जब गांधीजी का बिगुल बजता था, तो कौन-कौन चल पड़ते थे?
उत्तरः जब गांधीजी का बिगुल बजता था तो जवान, मज़दूर, किसान, हिंदू, मुसलमान, सिख, पठान — सभी उनके पीछे चल पड़ते थे और जवाहरलाल नेहरू भी फूलों की सेज छोड़कर दौड़ पड़ते थे।
अति संक्षिप्त उत्तर दो (लगभग 25 शब्द)
१. कवि प्रदीप की देशभक्ति-कविताएँ क्यों अमर हैं?
उत्तरः कवि प्रदीप की देशभक्ति-कविताएँ अमर हैं क्योंकि उनमें सच्ची राष्ट्रभक्ति, सरल भाषा और हृदयस्पर्शी संगीत का ऐसा संगम है जो हर भारतीय के मन को छू लेता है।
२. ‘फूलों की सेज छोड़कर दौड़े जवाहरलाल’ — इस पंक्ति का क्या अर्थ है?
उत्तरः इस पंक्ति का अर्थ है कि पंडित जवाहरलाल नेहरू जैसे संपन्न और सुखी व्यक्ति ने भी गांधीजी की आवाज़ पर अपनी सारी सुख-सुविधाएँ त्यागकर स्वतंत्रता-संग्राम में कूद पड़े।
३. ‘शतरंज बिछाकर बैठा था ज़माना’ — इससे कवि का क्या आशय है?
उत्तरः इससे कवि का आशय है कि उस समय अंग्रेज़ भारत पर अपनी चालाक राजनीतिक चालें खेल रहे थे और सभी को लग रहा था कि उन्हें हराना असंभव है।
४. गांधीजी ने कैसी लड़ाई लड़ी, जो अजब (अनोखी) थी?
उत्तरः गांधीजी ने ऐसी लड़ाई लड़ी जिसमें न तोप दागी, न बंदूक चलाई, न दुश्मन के किले पर चढ़ाई की — फिर भी अहिंसा के बल पर दुश्मनों को देश से निकाल दिया।
५. कवि प्रदीप को किस उपाधि से नवाज़ा गया था और किसने?
उत्तरः कवि प्रदीप को 1995 में भारत के राष्ट्रपति ने ‘राष्ट्रकवि’ की उपाधि और 1998 में ‘दादा साहब फाल्के पुरस्कार’ से सम्मानित किया।
संक्षिप्त उत्तर दो (लगभग 50 शब्द)
१. कवि प्रदीप का साहित्यिक परिचय दो।
उत्तरः कवि प्रदीप का वास्तविक नाम रामचंद्र नारायण द्विवेदी था। उनका जन्म 6 फरवरी 1915 को मध्य प्रदेश के बड़नगर में हुआ। उन्होंने लगभग 1,700 गीत लिखे और 76 हिंदी फिल्मों में काम किया। “ऐ मेरे वतन के लोगों” और “दे दी हमें आज़ादी” उनके सर्वाधिक प्रसिद्ध गीत हैं। उन्हें ‘राष्ट्रकवि’ की उपाधि और दादा साहब फाल्के पुरस्कार मिला। 11 दिसंबर 1998 को उनका निधन हुआ।
२. गांधीजी के स्वतंत्रता-संग्राम की विशेषताएँ गीत के आधार पर बताओ।
उत्तरः गांधीजी के स्वतंत्रता-संग्राम की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उसमें हिंसा का नामोनिशान नहीं था। न कोई तोप, न बंदूक, न किले पर धावा — केवल सत्य और अहिंसा के बल पर उन्होंने अंग्रेजों को देश से निकाल दिया। उनका एकमात्र अस्त्र था — अहिंसा की लगन और सत्य की सोटी। यह विश्व इतिहास में अद्वितीय था।
३. गांधीजी की जन-संग्रहण शक्ति का वर्णन गीत के आधार पर करो।
उत्तरः गांधीजी की जन-संग्रहण शक्ति असाधारण थी। जब भी उनका आह्वान होता, जवान, मज़दूर, किसान, हिंदू, मुसलमान, सिख, पठान — सभी वर्गों और धर्मों के लोग उनके पीछे चल पड़ते थे। जवाहरलाल नेहरू जैसे संपन्न नेता भी फूलों की सेज छोड़कर उनके साथ आते थे। करोड़ों प्राण एकसाथ उनके साथ कदम-से-कदम मिलाकर चलते थे।
४. ‘अमृत दिया तो ठीक मगर खुद ज़हर पिया’ — इस पंक्ति की व्याख्या करो।
उत्तरः यह पंक्ति गांधीजी के परम-त्याग का प्रतीकात्मक चित्रण है। ‘अमृत देना’ का अर्थ है — देश को स्वतंत्रता, सत्य और न्याय दिलाना, समाज के हर वर्ग को सम्मान दिलाना। ‘ज़हर पीना’ का अर्थ है — जेल जाना, उपवास सहना, लाठियाँ खाना और अंततः 30 जनवरी 1948 को गोडसे की गोली से शहीद होना। यह परार्थ जीवन का सबसे सजीव उदाहरण है।
सम्यक् उत्तर दो (लगभग 100 शब्द)
१. “साबरमती के संत” गीत के माध्यम से कवि प्रदीप ने किस संदेश को जन-जन तक पहुँचाया है?
उत्तरः “साबरमती के संत” गीत के माध्यम से कवि प्रदीप ने महात्मा गांधी के अहिंसक आदर्शों और उनके राष्ट्र-निर्माण के संदेश को जन-जन तक पहुँचाया है। कवि यह बताना चाहते हैं कि सत्य और अहिंसा की शक्ति किसी भी हथियार से बड़ी होती है। गांधीजी ने बिना तलवार उठाए, केवल अपने नैतिक बल से ब्रिटिश साम्राज्य जैसी महाशक्ति को झुका दिया। यह संसार को यह बताता है कि अहिंसा कायरता नहीं, बल्कि सबसे बड़ी वीरता है। इसके साथ ही कवि यह भी संदेश देते हैं कि सच्चा नेता वही है जो अपने लिए कुछ न माँगे, दूसरों को सब दे दे और स्वयं कष्ट सहता रहे। गांधीजी की सबसे बड़ी शक्ति थी उनकी सर्वधर्म-समभाव की नीति — वे हिंदू, मुसलमान, सिख, पठान — सभी को एकता के सूत्र में पिरो सके। यह गीत आज भी हर भारतीय के हृदय में देशभक्ति की लौ जलाता है और गांधीजी के आदर्शों को जीवित रखता है।
२. कवि प्रदीप के जीवन एवं साहित्यिक योगदान पर एक निबंध लिखो।
उत्तरः कवि प्रदीप हिंदी के उन विरले गीतकारों में हैं जिनकी रचनाएँ केवल साहित्य में नहीं, बल्कि इतिहास के पन्नों में अमर हो गई हैं। उनका वास्तविक नाम रामचंद्र नारायण द्विवेदी था और जन्म 6 फरवरी 1915 को बड़नगर, मध्य प्रदेश में हुआ था। लखनऊ विश्वविद्यालय से स्नातक करने के बाद शिक्षक बनने का सपना देखने वाले रामचंद्र द्विवेदी एक कवि सम्मेलन के माध्यम से मुंबई पहुँचे और वहाँ से उनकी जीवन-यात्रा पूरी तरह बदल गई। बांबे टॉकीज़ के हिमांशु राय ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें ‘प्रदीप’ नाम मिला। उन्होंने अपने जीवनकाल में लगभग 1,700 गीत लिखे। 1940 में फिल्म ‘बंधन’, 1943 में ‘किस्मत’ (जिसमें ‘दूर हटो ऐ दुनिया वालों’ गीत था जो अंग्रेजों के विरुद्ध था) और 1954 में ‘जागृति’ — उनकी सर्वाधिक प्रसिद्ध फिल्में हैं। ‘जागृति’ में “दे दी हमें आज़ादी” और “हम लाए हैं तूफान से” जैसे देशभक्ति गीत थे। उनका सर्वोच्च कृतित्व है “ऐ मेरे वतन के लोगों” (1963) जो भारत-चीन युद्ध के शहीदों की याद में लिखा गया था और जिसे सुनकर प्रधानमंत्री नेहरू भी रो पड़े थे। उन्होंने इस गीत की रॉयल्टी शहीद सैनिकों की विधवाओं को दान कर दी। 1995 में ‘राष्ट्रकवि’ और 1998 में ‘दादा साहब फाल्के पुरस्कार’ उनकी अमूल्य साहित्यिक सेवा की पहचान है। 11 दिसंबर 1998 को उनका निधन हुआ, परंतु उनके गीत आज भी करोड़ों भारतीयों के हृदय में जीवित हैं।
भाषा एवं व्याकरण (Language and Grammar)
विलोम शब्द लिखो (Write Antonyms)
| शब्द | विलोम |
|---|---|
| आज़ादी | गुलामी |
| हिंसा | अहिंसा |
| दुश्मन | दोस्त / मित्र |
| सत्य | असत्य / झूठ |
| छोटी | बड़ी |
| बेमिसाल | साधारण |
‘बे’ उपसर्ग से बने शब्द (Words with prefix ‘बे’)
‘बे’ एक उर्दू उपसर्ग है जिसका अर्थ है ‘बिना’ या ‘रहित’। इस गीत में ‘बेजोड़’ और ‘बेमिसाल’ जैसे शब्द आए हैं। अन्य उदाहरण:
- बेजोड़ = जोड़ रहित (बिना जोड़ के) = अनुपम, अतुलनीय
- बेमिसाल = मिसाल (उदाहरण) रहित = अद्वितीय, अनूठा
- बेखौफ = खौफ (भय) रहित = निडर
- बेसहारा = सहारा रहित = निराश्रित
- बेगुनाह = गुनाह (दोष) रहित = निर्दोष
- बेफिक्र = फिक्र (चिंता) रहित = निश्चिंत
मुहावरे और उनके अर्थ (Idioms and their Meanings)
| मुहावरा | अर्थ | वाक्य में प्रयोग |
|---|---|---|
| कमाल करना | अद्भुत कार्य करना | वीर सैनिकों ने दुश्मन को हराकर कमाल कर दिया। |
| सब कुछ लुटा देना | सब कुछ न्योछावर करना | देश के लिए उसने अपना सब कुछ लुटा दिया। |
| दाँव मारना | चाल चलना, रणनीति अपनाना | गांधीजी ने ऐसा दाँव मारा कि अंग्रेज हार गए। |
| बिगुल बजाना | आह्वान करना, युद्ध की घोषणा करना | क्रांतिकारियों ने स्वतंत्रता का बिगुल बजाया। |
| फूलों की सेज छोड़ना | सुख-सुविधाएँ त्यागना | नेहरूजी ने फूलों की सेज छोड़कर आंदोलन में भाग लिया। |
शब्दार्थ (Word Meanings)
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| खड़ग | तलवार |
| ढाल | शील्ड, ढाल (युद्ध में रक्षा का उपकरण) |
| मशाल | मशाल, टॉर्च; यहाँ आदर्शों का प्रतीक |
| वतन | देश, मातृभूमि |
| तख्त | सिंहासन, राज-गद्दी |
| ताज | मुकुट, राजमुकुट |
| चिता | अर्थी, शव जलाने की जगह |
| महाकाल | महान काल/समय; यहाँ भगवान शिव का रूप जो काल के भी काल हैं |
| फ़क़ीर | साधु, संन्यासी, वैरागी |
| करामात | चमत्कार, कमाल |
| फिरंगी | अंग्रेज़, विदेशी शासक |
| उस्ताद | विशेषज्ञ, गुरु, माहिर |
| दाँव | चाल, तरकीब |
| बिगुल | रणभेरी, शंखनाद; यहाँ आह्वान का प्रतीक |
| पठान | पश्तून जाति के लोग (उत्तर-पश्चिम भारत के) |
| कोटि-कोटि | करोड़ों |
| सेज | शय्या, आरामदायक बिस्तर |
| लगन | लीन रहना, समर्पण |
| लँगोटी | छोटी-सी धोती, गांधीजी का परिधान |
| सोटी | लाठी, छड़ी |
| हस्ती | व्यक्तित्व, अस्तित्व, काया |
| बेजोड़ | अतुलनीय, अनुपम |
| बेमिसाल | अद्वितीय, जिसकी कोई मिसाल न हो |