असम बोर्ड (ASSEB) की कक्षा 9 की हिंदी ऐच्छिक पाठ्यपुस्तक आलोक भाग-1 का तेरहवाँ अध्याय (पद्य-खंड की पाँचवीं कविता) “गाँव से शहर की ओर” प्रयोगवाद के प्रवर्तक कवि सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ द्वारा रचित एक विचारोत्तेजक कविता है। इस कविता में कवि ने गाँव और शहर के बीच बदलते संबंधों तथा ग्रामीण समाज के नगरीकरण की ओर बढ़ते कदमों को मार्मिक ढंग से चित्रित किया है। यहाँ इस कविता के कवि-परिचय, कविता का सारांश, सप्रसंग व्याख्या और पाठ्यपुस्तक के समस्त प्रश्नोत्तर दिए गए हैं।
कवि-परिचय
सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ का जन्म 7 मार्च 1911 को उत्तर प्रदेश के कसया (कुशीनगर) में एक पुरातत्व-खुदाई शिविर में हुआ था। उनके पिता पंडित हीरानंद शास्त्री भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग में अधिकारी थे और प्राचीन लिपियों के विशेषज्ञ थे। पिता की नौकरी के कारण अज्ञेय का बचपन लखनऊ, श्रीनगर, जम्मू आदि कई स्थानों पर व्यतीत हुआ। उनकी प्रारंभिक शिक्षा घर पर ही संस्कृत, फारसी, अंग्रेजी और बांग्ला माध्यम से हुई। उन्होंने 1925 में पंजाब से मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की और मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज तथा फॉर्मन कॉलेज, लाहौर में अध्ययन किया। लाहौर से विज्ञान स्नातक करने के पश्चात् वे अंग्रेजी में एम.ए. कर रहे थे, किंतु क्रांतिकारी आंदोलन में सक्रिय भागीदारी के कारण उन्हें अध्ययन बीच में ही छोड़ना पड़ा।
अज्ञेय 1930 से 1936 तक विभिन्न कारावासों में रहे — लगभग चार वर्ष जेल में और दो वर्ष नजरबंदी में। जेल से मुक्त होने के बाद उन्होंने साहित्य-सृजन और पत्रकारिता में अपनी पूरी ऊर्जा लगाई। उन्होंने सैनिक (आगरा), विशाल भारत (कलकत्ता), दिनमान (दिल्ली) और नया प्रतीक जैसी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं का संपादन किया। वे जोधपुर विश्वविद्यालय में तुलनात्मक साहित्य विभाग के निदेशक रहे और अमेरिका में भारतीय साहित्य व संस्कृति के अध्यापक के रूप में भी कार्य किया। उन्होंने पश्चिमी यूरोप, जापान, फिलीपींस सहित अनेक देशों की यात्राएँ कीं। हिंदी साहित्य में प्रयोगवाद के प्रवर्तक के रूप में उनका नाम अमर है — उनके संपादन में 1943 में प्रकाशित तारसप्तक ने नई काव्य-धारा की नींव रखी। उनकी प्रमुख काव्य-कृतियाँ हैं — भग्नदूत (1933), हरी घास पर क्षण भर (1949), बावरा अहेरी (1954), आँगन के पार द्वार, कितनी नावों में कितनी बार (1967)। उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार (1964) तथा भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार (1978) से सम्मानित किया गया। 4 अप्रैल 1987 को नई दिल्ली में उनका निधन हुआ।
कविता का सारांश
“गाँव से शहर की ओर” कविता में अज्ञेय ने नगरीकरण की प्रक्रिया और उससे उत्पन्न ग्राम-शहर के बदलते संबंधों को बड़े मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया है। कवि ने दो अलग-अलग समयों की यात्राओं के माध्यम से एक गहरा अंतर दर्शाया है। पहली बार कवि ने गाँव से शहर की ओर सैर की — तब ऐसा लगा जैसे गाँव से बाहर निकलना बहुत कठिन था, जैसे गाँव की हरियाली, पगडंडियाँ और अपनापन ही जीवन का केंद्र था। गाँव के बाहर तक उनकी पहुँच नहीं थी — अर्थात् उस समय के लोग गाँव को ही सर्वस्व मानते थे और शहर की ओर जाना नहीं चाहते थे। गाँव का माहौल और हरे-भरे खेत लोगों को बाँधे रखते थे।
दूसरी बार जब कवि शहर से गाँव की ओर लौटने निकले, तो उन्होंने पाया कि स्थिति बिल्कुल उलट हो गई है। अब गाँव के लोग दल-बल सहित शहर की ओर दौड़ रहे हैं और वे वापस गाँव लौटना नहीं चाहते। शहर की चकाचौंध, रोजगार के अवसर, आधुनिक सुविधाएँ और शिक्षा के संस्थानों ने ग्रामीणों को अपनी ओर आकर्षित कर लिया है। अब गाँव तक कवि की पहुँच नहीं रही — अर्थात् शहर से गाँव तक लौट जाना, या गाँव की उस पुरानी सरल जिंदगी को पाना, लगभग असंभव हो गया है। कवि इस परिवर्तन को एक विडंबना के रूप में चित्रित करता है — जो गाँव कभी सब कुछ था, आज वह खाली हो रहा है। कविता आधुनिकीकरण की विडंबना और ग्रामीण जीवन के क्षरण को बड़ी सूक्ष्मता से उजागर करती है।
कविता की भाषा सरल, प्रतीकात्मक और प्रयोगवादी है। “पहुँच नहीं है” और “पहुँच नहीं रही” — ये दोनों पंक्तियाँ दो अलग-अलग युगों की मानसिकता को एक साथ व्यक्त करती हैं। पहली पंक्ति में गाँव की सीमितता का बोध है, दूसरी में शहर की ओर पलायन की पीड़ा। कविता में ‘सैर’, ‘डगर’, ‘पगडंडियाँ’ जैसे ग्रामीण शब्द कविता को जमीनी यथार्थ से जोड़ते हैं। अज्ञेय ने इस छोटी-सी कविता में एक बड़े सामाजिक सत्य को प्रभावशाली ढंग से व्यक्त किया है।
Summary (English)
The poem “Gaon Se Shahar Ki Or” (From Village to City) by Agyeya presents a striking contrast between two journeys taken at different times. During the first journey — from village to city — the poet felt that the village was all-encompassing and people could not reach beyond it. Villages held people back with their green fields, narrow footpaths, and close-knit community life, and no one wished to venture toward the city. But during the second journey — from city back to the village — the poet finds the situation completely reversed: now the villagers are rushing toward the city in large numbers and refuse to return. Urban attractions like employment, education, modern amenities, and a faster-paced life have drawn people away from their roots. The poet observes with sadness that the village, which was once the centre of life, is now being abandoned. The phrase “our reach does not extend beyond the village” in the first journey becomes “our reach no longer extends to the village” in the second — a powerful irony capturing the tragedy of rapid urbanization. The poem is a quiet but profound commentary on the social transformation caused by modernization, and the loss of rural identity it brings.
पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर (Textbook Questions and Answers)
बोध एवं विचार
1. पूर्ण वाक्य में उत्तर दो
(क) पहली बार कवि कहाँ से कहाँ सैर करने निकले थे?
उत्तरः पहली बार कवि गाँव से शहर की ओर सैर करने निकले थे।
(ख) दूसरी बार कवि कहाँ से कहाँ सैर करने निकले?
उत्तरः दूसरी बार कवि शहर से गाँव की ओर सैर करने निकले।
(ग) ‘गाँव के बाहर हमारी पहुँच नहीं है’ — हमारे जीवन की किस स्थिति का परिचायक है?
उत्तरः ‘गाँव के बाहर हमारी पहुँच नहीं है’ — यह हमारे जीवन की सीमित और संकुचित स्थिति का परिचायक है, जब लोग गाँव को ही सब कुछ मानते थे और शहर की ओर जाने की इच्छा या क्षमता नहीं रखते थे।
(घ) ‘गाँव तक हमारी पहुँच नहीं रही’ — इस कथन से कवि का क्या आशय है?
उत्तरः इस कथन से कवि का आशय है कि शहर से गाँव तक वापस लौटना अब संभव नहीं रहा — गाँव के लोग शहर की ओर पलायन कर चुके हैं और वे वापस नहीं आना चाहते, इसलिए गाँव की पुरानी जिंदगी और अपनापन अब दूर होता जा रहा है।
(ङ) इस कविता के कवि का नाम क्या है?
उत्तरः इस कविता के कवि का नाम सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ है।
(च) अज्ञेय किस साहित्यिक आंदोलन के प्रवर्तक माने जाते हैं?
उत्तरः अज्ञेय हिंदी साहित्य में प्रयोगवाद के प्रवर्तक माने जाते हैं।
2. अति लघु उत्तरीय प्रश्न (लगभग 25 शब्दों में)
(क) पहले समय में गाँव के लोग शहर की ओर क्यों नहीं जाना चाहते थे?
उत्तरः पहले समय में गाँव के लोग शहर की ओर इसलिए नहीं जाना चाहते थे क्योंकि गाँव का हरा-भरा वातावरण, सरल जीवन, आपसी अपनापन और खेत-खलिहान उन्हें बाँधे रखते थे। शहर तक पहुँचना भी कठिन था और वहाँ जाने की आवश्यकता महसूस नहीं होती थी।
(ख) वर्तमान समय में लोग गाँव की अपेक्षा शहर में रहना अधिक पसंद क्यों करते हैं?
उत्तरः वर्तमान समय में लोग शहर में रहना इसलिए पसंद करते हैं क्योंकि वहाँ रोजगार के अधिक अवसर हैं, आधुनिक सुविधाएँ — बिजली, पानी, यातायात — सुलभ हैं, उच्च शिक्षा के संस्थान और बेहतर स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध हैं, तथा जीवन-स्तर ऊँचा है।
(ग) ‘पहुँच नहीं है’ और ‘पहुँच नहीं रही’ — इन दोनों में क्या अंतर है?
उत्तरः ‘पहुँच नहीं है’ — इसका अभिप्राय है कि पहले गाँव से बाहर यानी शहर तक पहुँचना कठिन था; लोग गाँव तक ही सीमित थे। ‘पहुँच नहीं रही’ — इसका अभिप्राय है कि अब शहर से गाँव तक वापस लौटना संभव नहीं रहा; लोग शहर में बस गए हैं और गाँव खाली होता जा रहा है।
(घ) कवि ने इस कविता में किस समस्या की ओर ध्यान आकर्षित किया है?
उत्तरः कवि ने इस कविता में नगरीकरण और पलायन की समस्या की ओर ध्यान आकर्षित किया है। ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों की ओर बढ़ते पलायन के कारण गाँव उजड़ रहे हैं, ग्रामीण संस्कृति और जीवन-शैली नष्ट हो रही है — यही इस कविता की मूल चिंता है।
(ङ) ‘गाँव के लोग शहर की ओर आने लगे और वे वापस नहीं जाना चाहते’ — कवि इससे क्या कहना चाहता है?
उत्तरः कवि इससे यह कहना चाहता है कि नगरीकरण की प्रक्रिया ने ग्रामीण जनमानस को इतना बदल दिया है कि वे अपनी जड़ों से कट गए हैं। शहरी जीवन की सुविधाओं और चकाचौंध ने उनके मन से गाँव का आकर्षण मिटा दिया है, जो एक सामाजिक त्रासदी है।
3. लघु उत्तरीय प्रश्न (लगभग 50 शब्दों में)
(क) “गाँव से शहर की ओर” कविता में कवि ने किस परिवर्तन का चित्रण किया है?
उत्तरः इस कविता में कवि ने दो समयों के बीच के मूलभूत परिवर्तन का चित्रण किया है। पहले का समय वह था जब गाँव के लोग गाँव को ही सर्वस्व मानते थे और शहर तक उनकी पहुँच नहीं थी। अब परिस्थितियाँ बिल्कुल उलटी हो गई हैं — गाँव के लोग दल-बल सहित शहर की ओर पलायन कर रहे हैं और वापस लौटना नहीं चाहते। यह परिवर्तन नगरीकरण और आधुनिकीकरण की देन है, जिसने ग्रामीण जीवन को खोखला कर दिया है।
(ख) कविता में ‘सैर’ शब्द का क्या महत्व है?
उत्तरः ‘सैर’ शब्द कविता में दो अलग-अलग यात्राओं का प्रतीक है — पहली सैर गाँव से शहर की ओर और दूसरी सैर शहर से गाँव की ओर। दोनों सैरों में कवि को जो अनुभव हुआ वह बिल्कुल विपरीत था। ‘सैर’ शब्द केवल यात्रा नहीं, बल्कि दो युगों, दो मानसिकताओं और दो सामाजिक स्थितियों के बीच के अंतर को रेखांकित करने का माध्यम बन गया है।
(ग) इस कविता में ‘पहुँच’ शब्द का प्रयोग किस-किस अर्थ में हुआ है?
उत्तरः कविता में ‘पहुँच’ शब्द का प्रयोग दो अलग-अलग संदर्भों में हुआ है। पहले संदर्भ में ‘गाँव के बाहर पहुँच नहीं है’ — यहाँ ‘पहुँच’ का अर्थ है भौतिक पहुँच, यानी गाँव के बाहर जाने की क्षमता या इच्छाशक्ति। दूसरे संदर्भ में ‘गाँव तक पहुँच नहीं रही’ — यहाँ ‘पहुँच’ का अर्थ है वापस गाँव की उस पुरानी जिंदगी तक लौट पाने की संभावना।
(घ) कविता में कवि ने किस प्रकार के जीवन-यथार्थ को उजागर किया है?
उत्तरः कवि ने इस कविता में आधुनिक भारत के एक कटु जीवन-यथार्थ को उजागर किया है — वह है ग्रामीण पलायन की त्रासदी। विज्ञान और नगरीकरण की प्रगति के कारण गाँव के लोग शहरों की ओर खिंचते जा रहे हैं। इससे एक ओर शहर भीड़-भरे और प्रदूषित होते जा रहे हैं, तो दूसरी ओर गाँव उजड़ते जा रहे हैं। ग्रामीण संस्कृति, सरलता और आपसी जुड़ाव धीरे-धीरे समाप्त होता जा रहा है।
4. दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (लगभग 100-150 शब्दों में)
(क) “गाँव से शहर की ओर” कविता का सारांश अपने शब्दों में लिखो।
उत्तरः “गाँव से शहर की ओर” कविता में अज्ञेय ने दो यात्राओं के माध्यम से दो अलग-अलग युगों की मानसिकता का तुलनात्मक चित्रण किया है। पहली यात्रा में कवि गाँव से शहर की ओर निकले। उस समय गाँव की हरियाली, पगडंडियाँ और आपसी अपनापन इतना प्रबल था कि गाँव के बाहर निकल पाना ही मुश्किल लगता था — यानी लोगों की पहुँच गाँव से बाहर नहीं थी। दूसरी यात्रा में कवि शहर से गाँव की ओर चले। तब उन्होंने देखा कि स्थिति पूरी तरह बदल गई है। अब गाँव के लोग झुंड बनाकर शहर की ओर जा रहे हैं और वापस लौटने का नाम नहीं लेते। शहर की रोशनी, रोजगार और सुविधाओं ने उन्हें मोह लिया है। अब शहर से गाँव तक लौट पाना, यानी उस सरल ग्राम-जीवन को पुनः पाना, असंभव हो गया है — कवि की पहुँच अब गाँव तक नहीं रही। कविता नगरीकरण के दुष्प्रभावों और ग्रामीण जीवन के क्षरण की मार्मिक अभिव्यक्ति है।
(ख) कवि अज्ञेय का साहित्यिक परिचय देते हुए उनके हिंदी साहित्य में योगदान की चर्चा करो।
उत्तरः सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ आधुनिक हिंदी साहित्य के महान कवि, उपन्यासकार, पत्रकार और सम्पादक थे। उनका जन्म 1911 में और निधन 1987 में हुआ। उन्होंने हिंदी साहित्य में ‘प्रयोगवाद’ की नींव रखी — 1943 में ‘तारसप्तक’ का संपादन इसकी शुरुआत थी। उनकी कविताओं में प्रकृति-प्रेम, मानवीय मनोद्वंद्व, आधुनिकता, प्रेम और दार्शनिकता का अद्भुत संगम मिलता है। उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं — कविता-संग्रह: ‘हरी घास पर क्षण भर’, ‘आँगन के पार द्वार’, ‘कितनी नावों में कितनी बार’; उपन्यास: ‘शेखर: एक जीवनी’, ‘नदी के द्वीप’, ‘अपने-अपने अजनबी’। उन्हें 1964 में साहित्य अकादमी पुरस्कार और 1978 में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। अज्ञेय ने हिंदी काव्य-भाषा को नए प्रतीकों, नए बिम्बों और मुक्त छंद से समृद्ध किया। उनका योगदान हिंदी साहित्य में अविस्मरणीय है।
(ग) आज के समय में गाँवों से शहरों की ओर पलायन की समस्या पर अपने विचार प्रकट करो।
उत्तरः गाँवों से शहरों की ओर पलायन आज भारत की एक गंभीर सामाजिक समस्या बन गई है। रोजगार की तलाश, बेहतर शिक्षा और आधुनिक सुविधाओं के लिए लाखों ग्रामीण हर वर्ष शहरों की ओर आते हैं। इसके परिणामस्वरूप एक ओर शहर अत्यधिक भीड़-भरे, प्रदूषित और आवास-संकट से ग्रस्त होते जा रहे हैं, तो दूसरी ओर गाँव खेतिहर श्रमिकों से रहित होकर उजड़ते जा रहे हैं। गाँव की परंपरागत कलाएँ, संस्कृति और सामाजिक ताना-बाना भी टूटता जा रहा है। इस समस्या का समाधान यह है कि गाँवों में ही रोजगार के अवसर बढ़ाए जाएँ, ग्रामीण बुनियादी ढाँचा — सड़क, बिजली, इंटरनेट, अस्पताल और स्कूल — मजबूत किया जाए। तभी गाँव और शहर के बीच संतुलन बनेगा और पलायन की समस्या पर अंकुश लगेगा। अज्ञेय की यह कविता आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी लिखे जाने के समय थी।
(घ) “गाँव से शहर की ओर” और “शहर से गाँव की ओर” — दोनों यात्राओं के अनुभवों की तुलना करो।
उत्तरः कविता में दोनों यात्राओं के अनुभव बिल्कुल विपरीत हैं। पहली यात्रा (गाँव से शहर की ओर) के समय गाँव के लोगों की मानसिकता थी कि उनका संसार गाँव तक ही सीमित है — “गाँव के बाहर पहुँच नहीं है।” उस समय गाँव का हरा-भरा जीवन, डगर-पगडंडियाँ और आपसी संबंध ही सब कुछ थे। लोगों में शहर की ओर जाने की इच्छा नहीं थी, या जाना संभव नहीं था। दूसरी यात्रा (शहर से गाँव की ओर) के समय स्थिति पूरी तरह उलट गई है। अब गाँव के लोग शहर की ओर भाग रहे हैं और वापस लौटना नहीं चाहते — “गाँव तक पहुँच नहीं रही।” पहली यात्रा में ‘पहुँच नहीं है’ — यह सीमाओं का बोध था; दूसरी यात्रा में ‘पहुँच नहीं रही’ — यह उजड़ते गाँव की पीड़ा है। कवि ने इन दो विपरीत अनुभवों के माध्यम से समय की गति और समाज के परिवर्तन को बड़ी कुशलता से अभिव्यक्त किया है।
सप्रसंग व्याख्या
प्रसंग 1: “पहली बार जब गाँव से शहर की ओर सैर को निकले, तो पाया — गाँव के बाहर हमारी पहुँच नहीं है।”
प्रसंग: प्रस्तुत पंक्तियाँ अज्ञेय की कविता “गाँव से शहर की ओर” से ली गई हैं, जो ASSEB कक्षा 9 की हिंदी ऐच्छिक पाठ्यपुस्तक आलोक भाग-1 में संकलित है।
व्याख्या: कवि ने पहली बार गाँव से शहर की ओर सैर की। उस यात्रा में उन्होंने अनुभव किया कि गाँव के लोग शहर तक नहीं पहुँच पाते — न भौतिक दृष्टि से और न मानसिक दृष्टि से। उस समय का ग्रामीण समाज गाँव की सीमाओं में ही सिमटा था। गाँव की हरी-भरी खेत-खलिहान, पगडंडियाँ और आपसी जीवन इतने पर्याप्त थे कि शहर की आवश्यकता महसूस नहीं होती थी। गाँव के बाहर जाना कठिन भी था और अनावश्यक भी लगता था। यह पंक्ति ग्रामीण जीवन की स्वयंपूर्णता और सीमितता दोनों को एक साथ व्यक्त करती है।
भाव-सौंदर्य: ‘पहुँच नहीं है’ — इस सरल वाक्य में ग्रामीण समाज की दो शताब्दियों की मानसिकता समाहित है। यहाँ ‘पहुँच’ शब्द सांकेतिक है — यह केवल दूरी की पहुँच नहीं, बल्कि आकांक्षाओं और जीवन-दृष्टि की सीमा को भी दर्शाता है।
प्रसंग 2: “दूसरी बार जब शहर से गाँव की ओर सैर को निकले, तो पाया — गाँव तक हमारी पहुँच नहीं रही।”
प्रसंग: प्रस्तुत पंक्तियाँ उसी कविता के दूसरे भाग से ली गई हैं।
व्याख्या: दूसरी बार कवि शहर से गाँव की ओर चले और उन्होंने पाया कि अब गाँव तक पहुँचना ही मुश्किल हो गया है — क्योंकि गाँव अब वह गाँव नहीं रहा जो पहले था। गाँव के लोग शहर की ओर पलायन कर गए हैं। वे अब गाँव वापस आना नहीं चाहते। शहरी जीवन की चकाचौंध, रोजगार और सुख-सुविधाओं ने उनके मन को गाँव से दूर कर दिया है। यह ‘पहुँच नहीं रही’ — पहले वाले ‘पहुँच नहीं है’ से बिल्कुल अलग है। पहला गाँव की सीमितता थी, यह शहरीकरण की त्रासदी है।
भाव-सौंदर्य: ‘पहुँच नहीं रही’ में ‘रही’ क्रिया महत्वपूर्ण है — यह निरंतरता के ह्रास को दर्शाती है। यह केवल वर्तमान की स्थिति नहीं, बल्कि एक चल रहे क्षरण का संकेत है। अज्ञेय की प्रयोगवादी शैली में छोटे-छोटे शब्दों में गहरे भाव छुपे हैं।
भाव-सौंदर्य
1. कविता की भाषा-शैली: अज्ञेय ने इस कविता में अपनी प्रयोगवादी शैली का सुंदर प्रयोग किया है। भाषा अत्यंत सरल और सहज है, किंतु उसमें गहरे भाव छुपे हैं। ‘सैर’, ‘डगर’, ‘पगडंडियाँ’ जैसे ग्रामीण शब्द कविता को जमीनी यथार्थ से जोड़ते हैं। कविता की शब्द-योजना संक्षिप्त किंतु प्रभावशाली है।
2. विरोधाभास (Irony) का प्रयोग: कविता का सबसे बड़ा काव्य-सौंदर्य उसमें निहित विरोधाभास है। ‘पहुँच नहीं है’ और ‘पहुँच नहीं रही’ — इन दो समान-से दिखने वाले वाक्यों में दो बिल्कुल विपरीत सामाजिक स्थितियाँ हैं। यह विरोधाभास कविता को बौद्धिक गहराई देता है।
3. प्रतीकात्मकता: ‘पहुँच’ शब्द प्रतीकात्मक रूप से प्रयुक्त हुआ है। यह केवल भौतिक दूरी नहीं, बल्कि मानसिक जुड़ाव, सांस्कृतिक संबंध और जीवन-दृष्टि का भी प्रतीक है। ‘सैर’ शब्द भी केवल यात्रा नहीं, बल्कि जीवन के दो अलग-अलग दौरों का प्रतीक है।
4. मुक्त छंद: कविता मुक्त छंद में लिखी गई है जो अज्ञेय की विशेषता है। कविता में तुक-मेल नहीं है, किंतु लय और प्रवाह है। यह प्रयोगवादी शैली की पहचान है।
5. सामाजिक चेतना: कविता केवल एक व्यक्तिगत अनुभव नहीं, बल्कि एक सामाजिक वक्तव्य है। कवि ने नगरीकरण की समस्या को कलात्मक रूप में प्रस्तुत किया है। यही इस कविता की सबसे बड़ी विशेषता है।
भाषा-अध्ययन (Language Study)
शब्दार्थ (Vocabulary)
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| सैर | भ्रमण, यात्रा / Journey, Excursion |
| पहुँच | पहुँचने की क्षमता, विस्तार / Reach, Access |
| डगर | रास्ता, पथ / Path, Way |
| पगडंडियाँ | गाँव की संकरी पैदल राहें / Narrow footpaths |
| नगरीकरण | शहर की ओर विकास / Urbanization |
| पलायन | अपना स्थान छोड़कर भाग जाना / Migration, Exodus |
| त्रासद | दुखद, दुर्भाग्यपूर्ण / Tragic |
| चकाचौंध | अत्यधिक चमक-दमक / Dazzle, Glitter |
| आकर्षण | खिंचाव / Attraction |
| विडंबना | विरोधाभासी स्थिति / Irony, Paradox |
| प्रयोगवाद | हिंदी साहित्य में नए प्रयोग करने की काव्यधारा / Experimentalism in Hindi poetry |
| मुक्त छंद | बिना तुक-मेल की कविता / Free verse |