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Class 9 Hindi Elective Poem 4 Question Answer | मुरझाया फूल | ASSEB

असम बोर्ड (ASSEB) की कक्षा 9 की हिंदी ऐच्छिक पाठ्यपुस्तक आलोक भाग-1 का बारहवाँ अध्याय (पद्य खंड का चौथा पाठ) “मुरझाया फूल” छायावाद की महान कवयित्री महादेवी वर्मा द्वारा रचित एक भावपूर्ण कविता है। इस कविता में मुरझाए हुए फूल को माध्यम बनाकर कवयित्री ने मानव-जीवन की नश्वरता और संसार की स्वार्थपरता पर गहरी टिप्पणी की है। यहाँ इस कविता के पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर और अतिरिक्त महत्वपूर्ण प्रश्न दिए गए हैं।


कविता-पाठ (The Poem)

था कली के रूप शैशव में, अहो सूखे सुमन!
हास्य करता था, खिलाती अंक में तुझको पवन।
खिल गया जब पूर्ण तू मंजुल, सुकोमल पुष्पवर,
लुब्ध मधु के हेतु मंडराते लगे आने भ्रमर।।

स्निग्ध किरणें चंद्र की तुझको हँसाती थीं सदा,
रात तुझ पर वारती थी मोतियों की संपदा।
लोरियाँ गाकर मधुप निद्रा-विवश करते तुझे,
यत्न माली का रहा आनंद से भरता तुझे।।

कर रहा अठखेलियाँ इतरा सदा उद्यान में,
अंत का यह दृश्य आया था कभी क्या ध्यान में?
सो रहा अब तू धरा पर, शुष्क बिखराया हुआ,
गंध कोमलता नहीं, मुख मंजु मुरझाया हुआ।।

आज तुझको देख कर चाहक भ्रमर आता नहीं,
लाल अपना राग तुझ पर प्रात बरसाता नहीं।
जिस पवन ने अंक में ले प्यार तुझको था किया,
तीव्र झोकों से सुला उसने तुझे भू पर दिया।।

कर दिया मधु और सौरभ दान सारा एक दिन,
किंतु रोता कौन है तेरे लिये दानी सुमन?
मत व्यथित हो फूल, सुख किसको दिया संसार ने,
स्वार्थमय सबको बनाया है यहाँ करतार ने।।

विश्व में हे फूल! सबके हृदय तू भाता रहा,
दान कर सर्वस्व फिर भी हाय! हर्षाता रहा।
जब न तेरी ही दशा पर दुख हुआ संसार को,
कौन रोएगा सुमन! हम-से मनुज निःसार को।।

— महादेवी वर्मा


कविता का सारांश (Summary of the Poem)

महादेवी वर्मा की कविता “मुरझाया फूल” एक मार्मिक और विचारोत्तेजक रचना है, जिसमें फूल के जीवन-चक्र के माध्यम से मानव जीवन की सच्चाई उजागर की गई है। कविता में कवयित्री एक मुरझाए हुए फूल से सीधे संवाद करती हैं। पहले दो छंदों में फूल के वैभवशाली अतीत का चित्रण है — जब वह नन्हीं कली थी, तब पवन उसे गोद में लेकर खेलाती थी; जब वह पूर्ण खिला, तो भ्रमर मधु-पान के लिए मँडराते थे; चंद्रमा की स्निग्ध किरणें उसे हँसाती थीं; रात की ओस के मोती उसे सजाते थे; भँवरे लोरियाँ गाकर उसे सुलाते थे और माली की देखभाल उसे आनंद से भरती थी।

तीसरे और चौथे छंद में मुरझाने के बाद की दयनीय स्थिति का वर्णन है। जो फूल उद्यान में अठखेलियाँ करता था, वह अब सूखा, बेजान, धरती पर बिखरा पड़ा है। उसकी सुगंध और कोमलता जाती रही। जो भ्रमर उसके पास आते थे, अब उसे देखना भी नहीं चाहते। जो पवन कभी उसे प्यार से झुलाती थी, वही अब अपने तीव्र झोंकों से उसे धरती पर गिरा देती है। पाँचवें और छठे छंद में कवयित्री फूल को सांत्वना देते हुए कहती हैं कि उसने अपना समस्त मधु और सौरभ निःस्वार्थ दान कर दिया, किंतु उसकी दशा पर कोई रोने वाला नहीं है। कारण यह है कि करतार (ईश्वर/विधाता) ने इस संसार में सभी को स्वार्थमय बनाया है। अंत में कवयित्री करुण भाव से कहती हैं — जब एक दानी फूल की दशा पर संसार को दुख नहीं हुआ, तो हम जैसे तुच्छ मनुष्यों के लिए भला कौन रोएगा?

इस कविता का मूल संदेश यह है कि संसार स्वार्थी है — यहाँ सौंदर्य और उपयोगिता होने पर सभी साथ देते हैं, परंतु पतन और बुढ़ापे में सब पीठ फेर लेते हैं। यह स्थिति मनुष्य के जीवन में भी उसी प्रकार आती है जैसे फूल मुरझाने पर उपेक्षित हो जाता है।


Summary (English)

“Murjhaya Phool” (The Withered Flower) by Mahadevi Varma is a poignant poem from the ASSEB Class 9 Hindi Elective textbook Aalok Bhag-1. The poem uses the metaphor of a flower’s life cycle to reflect on the transience of human life and the selfish nature of the world. In its youth as a bud, the flower was lovingly cradled by the breeze; when it bloomed fully, bees swarmed around it for nectar; the moon’s gentle rays adorned it; dewdrops like pearls decorated it at night; and the gardener tended it with care. However, once the flower withers and falls to the ground, all abandon it. The same breeze that once cradled it now blows it harshly to the earth. The bees that once sought its nectar no longer come near. The poetess consoles the withered flower, saying it should not grieve — for God has made this entire world selfish. The flower gave all its nectar and fragrance selflessly, yet no one mourns its passing. The poem ends with a sorrowful reflection: if even a generous flower receives no sympathy from the world in its decline, who would ever grieve for ordinary, insignificant human beings like us?


कवि-परिचय (About the Poet)

महादेवी वर्मा का जन्म 26 मार्च 1907 को उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद में हुआ था। उनके पिता का नाम गोविंद प्रसाद वर्मा और माता का नाम हेमरानी वर्मा था। उनके माता-पिता उदार और प्रगतिशील विचारों वाले थे, जिनके कारण महादेवी जी को शिक्षा ग्रहण करने में कोई बाधा नहीं आई। छठी कक्षा तक की शिक्षा के बाद उनका विवाह हो गया, परंतु वे परिवार के साथ न रहकर अपनी शिक्षा जारी रखती रहीं। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से संस्कृत में एम.ए. किया। जीवन भर उन्होंने शिक्षा और साहित्य की साधना की। वे प्रयाग महिला विद्यापीठ की प्राचार्या रहीं और इस पद पर अपना कार्यजीवन आरंभ से अंत तक बिताया। 11 सितंबर 1987 को उनका निधन हुआ।

महादेवी वर्मा हिंदी साहित्य के छायावाद युग की चार प्रमुख स्तंभों में से एक हैं — जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मा। उन्हें ‘आधुनिक मीरा’ के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि उनकी कविताओं में मीराँबाई की भाँति अपने प्रियतम (अज्ञात सत्ता) के प्रति गहरी विरहानुभूति परिलक्षित होती है। उनकी प्रमुख काव्य-रचनाएँ हैं — नीहार, रश्मि, नीरजा, सांध्यगीत, दीपशिखा और यामा। ‘यामा’ काव्य-संकलन पर उन्हें भारत का सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त हुआ। उनकी गद्य-रचनाओं में स्मृति की रेखाएँ, अतीत के चलचित्र, श्रृंखला की कड़ियाँ आदि प्रमुख हैं। उन्हें पद्मश्री और पद्मविभूषण पुरस्कारों से भी सम्मानित किया गया। महादेवी जी की कविताओं में करुणा, वेदना, प्रकृति-प्रेम और रहस्यवाद का अद्भुत संगम मिलता है।


सप्रसंग व्याख्या (Contextual Explanation)

१. “स्निग्ध किरणें चंद्र की तुझको हँसाती थीं सदा, / रात तुझ पर वारती थी मोतियों की संपदा।”

प्रसंग: यह पंक्तियाँ महादेवी वर्मा द्वारा रचित कविता “मुरझाया फूल” से ली गई हैं। कवयित्री खिले हुए फूल के वैभवशाली जीवन का चित्रण करते हुए प्रकृति के विभिन्न तत्वों द्वारा फूल के प्रति दर्शाए गए स्नेह का वर्णन कर रही हैं।

व्याख्या: कवयित्री कहती हैं कि जब फूल खिला हुआ था और उसका सौंदर्य चरम पर था, तब चंद्रमा की कोमल और निर्मल किरणें उसे सदा हँसाती-मुस्कुराती रहती थीं। रात के समय ओस की बूंदें उस पर इस प्रकार बिखरती थीं मानो कोई मोतियों की माला उस पर वार रहा हो। अर्थात् रात की ओस-बूंदें मोतियों की संपदा के समान फूल को श्रृंगारित करती थीं। यह चित्रण यह बताता है कि युवावस्था और सौंदर्य के दिनों में संसार की हर वस्तु साथ होती है और व्यक्ति चारों तरफ से सुख-सुविधाओं से घिरा रहता है।

२. “कर रहा अठखेलियाँ इतरा सदा उद्यान में, / अंत का यह दृश्य आया था कभी क्या ध्यान में?”

प्रसंग: यह पंक्तियाँ उसी कविता की तीसरी पंक्ति से ली गई हैं। यहाँ कवयित्री फूल के उत्कर्ष और उसके पतन के बीच के विरोधाभास को उजागर कर रही हैं।

व्याख्या: कवयित्री फूल से प्रश्न करती हैं — जब तुम उद्यान में इठलाते, अठखेलियाँ करते, अपने सौंदर्य पर इतराते थे, क्या तब तुम्हें यह भान था कि एक दिन यह दशा होगी? तुम जब अपने पूर्ण यौवन और वैभव में थे, तब संसार के इस अंतिम सत्य को भूल गए। जीवन की क्षणभंगुरता और परिवर्तनशीलता को किसी ने नहीं सोचा। यह पंक्तियाँ मानव जीवन पर भी उतनी ही लागू होती हैं — युवावस्था में हम अपनी शक्ति और सौंदर्य पर इतराते हैं और वृद्धावस्था की उपेक्षा को नहीं सोचते।

३. “मत व्यथित हो फूल, सुख किसको दिया संसार ने, / स्वार्थमय सबको बनाया है यहाँ करतार ने।”

प्रसंग: यह पंक्तियाँ कविता के पाँचवें छंद से ली गई हैं। यहाँ कवयित्री मुरझाए फूल को सांत्वना दे रही हैं और संसार की मूल प्रकृति को स्पष्ट कर रही हैं।

व्याख्या: कवयित्री मुरझाए फूल से कहती हैं कि दुखी मत हो। यह संसार सबके साथ ऐसा ही करता है। संसार ने किसे सुख दिया है? विधाता (करतार/ईश्वर) ने इस संसार में सभी प्राणियों और मनुष्यों को स्वार्थी बनाया है। अर्थात् यहाँ सब अपने-अपने स्वार्थ के लिए चलते हैं — जब तक फूल में मधु और सौरभ था, सब आते रहे; जैसे ही फूल उपयोगहीन हो गया, सबने मुँह फेर लिया। यह दुनिया की अटल नियति है। इसमें फूल का कोई दोष नहीं और न ही इसके लिए किसी को दोषी ठहराया जा सकता है, क्योंकि विधाता ने ही ऐसा संसार बनाया है।

४. “जब न तेरी ही दशा पर दुख हुआ संसार को, / कौन रोएगा सुमन! हम-से मनुज निःसार को।”

प्रसंग: यह पंक्तियाँ कविता की अंतिम पंक्तियाँ हैं। यहाँ कवयित्री की करुणा और वेदना चरम पर है। वे फूल और मनुष्य दोनों की स्थिति को एक साथ देख रही हैं।

व्याख्या: कवयित्री अंत में अत्यंत मार्मिक शब्दों में कहती हैं — हे फूल! तू तो दानी था, तूने अपना सर्वस्व दिया, तेरी दशा पर भी यदि संसार को दुख नहीं हुआ, तो फिर हम जैसे तुच्छ, निरर्थक मनुष्यों के लिए भला कौन रोएगा? ‘निःसार’ शब्द का अर्थ है — सार-तत्व से रहित, तुच्छ। कवयित्री अपने आप को और सामान्य मनुष्य को फूल से भी कम महत्वपूर्ण मानती हैं। इन पंक्तियों में जीवन की सार्वभौमिक अनित्यता और संसार की स्वार्थपरता की गहरी पीड़ा व्यक्त है।


भाव-सौंदर्य (Aesthetic Appeal)

१. मानवीकरण (Personification): कविता में पवन, चंद्रमा, भ्रमर, माली — सभी प्रकृति के तत्वों को सजीव और भावनायुक्त रूप में चित्रित किया गया है। पवन माँ की तरह फूल को गोद में लेती है, चंद्रमा उसे हँसाता है, भँवरे लोरियाँ गाते हैं।

२. रूपक (Metaphor): मुरझाया फूल वास्तव में मानव की वृद्धावस्था और जीवन के उत्तरार्ध का रूपक है। खिला फूल युवावस्था का प्रतीक है जब सब साथ होते हैं, और मुरझाया फूल बुढ़ापे या पतन का प्रतीक है जब सब साथ छोड़ देते हैं।

३. करुण रस: समग्र कविता में करुण रस का प्रवाह है। मुरझाए फूल की दुर्दशा का चित्रण पाठक के हृदय में सहानुभूति और वेदना जगाता है।

४. अनुप्रास अलंकार: “सो रहा अब तू धरा पर, शुष्क बिखराया हुआ” में ‘श’ वर्ण की आवृत्ति से संगीतात्मकता उत्पन्न होती है।

५. भाषा-शैली: महादेवी वर्मा ने इस कविता में तत्सम शब्दों — ‘सुमन’, ‘पुष्पवर’, ‘भ्रमर’, ‘स्निग्ध’, ‘सौरभ’, ‘करतार’, ‘निःसार’ — का प्रयोग करके भाषा को गरिमामय और भावपूर्ण बनाया है। कविता माधुर्य गुण से भरपूर है।

६. सामाजिक संदेश: यह कविता केवल फूल की कहानी नहीं है; यह समाज में बुजुर्गों और उपेक्षितों के प्रति अपनाई जाने वाली स्वार्थी प्रवृत्ति पर एक मार्मिक टिप्पणी है। कवयित्री सुझाती हैं कि यह स्वार्थपरता ईश्वर-प्रदत्त प्रकृति है, इसलिए जो देता है उसे अपेक्षा रखकर दुखी नहीं होना चाहिए।


प्रश्नोत्तर (Question-Answer)

सही विकल्प का चयन करो (Multiple Choice Questions)

१. कवयित्री महादेवी वर्मा की तुलना किससे की जाती है?

उत्तरः (ii) मीराबाई के साथ।

२. कवयित्री महादेवी वर्मा का जन्म कहाँ हुआ था?

उत्तरः (iv) फर्रुखाबाद में।

३. महादेवी वर्मा की माता का नाम क्या था?

उत्तरः (i) हेमरानी वर्मा।

४. ‘हास्य करता था, अंक में तुझको पवन’ — यहाँ पवन क्या करता था?

उत्तरः (i) खिलाता था।

५. ‘यत्न माली का रहा _____ से भरता तुझे’ — रिक्त स्थान में कौन-सा शब्द आएगा?

उत्तरः (ii) आनंद।

६. करतार ने धरती पर सबको कैसा बनाया है?

उत्तरः (iii) स्वार्थमय।


हाँ/नहीं में उत्तर दो

१. महादेवी वर्मा रहस्यवादी कवयित्री थीं।

उत्तरः हाँ।

२. महादेवी वर्मा के माता-पिता उदार विचारों वाले नहीं थे।

उत्तरः नहीं।

३. महादेवी वर्मा ने जीवन भर शिक्षा और साहित्य की साधना की।

उत्तरः हाँ।

४. वायु पंखा झलकर मुरझाए फूल को सुख पहुँचाती है।

उत्तरः नहीं।

५. मुरझाए फूल की दशा पर संसार को दुख नहीं होता।

उत्तरः हाँ।


पूर्ण वाक्य में उत्तर दो

१. महादेवी वर्मा की कविताओं में किसके प्रति विरहानुभूति की तीव्रता परिलक्षित होती है?

उत्तरः महादेवी वर्मा की कविताओं में अपने प्रियतम अज्ञात सत्ता के प्रति विरहानुभूति की तीव्रता परिलक्षित होती है।

२. महादेवी वर्मा का विवाह कब हुआ था?

उत्तरः महादेवी वर्मा का विवाह छठी कक्षा तक शिक्षा प्राप्त करने के बाद हुआ था।

३. महादेवी वर्मा ने अपने कर्म-जीवन का श्रीगणेश कहाँ से किया?

उत्तरः महादेवी वर्मा ने अपने कर्म-जीवन का श्रीगणेश प्रयाग महिला विद्यापीठ की प्राचार्या के रूप में किया।

४. फूल कौन-सा कार्य करते हुए हर्षाता रहा?

उत्तरः फूल दान कार्य करते हुए, अर्थात् अपना मधु और सौरभ (सुगंध) सबको देते हुए हर्षाता रहा।

५. भ्रमर फूल पर क्यों मँडराने लगते हैं?

उत्तरः भ्रमर मधु-पान (शहद पीने) के लिए लुब्ध होकर फूल पर मँडराने लगते हैं।


अति संक्षिप्त उत्तर दो (लगभग 25 शब्द)

१. महादेवी वर्मा की काव्य-रचनाएँ हिंदी पाठकों को प्रिय क्यों हैं?

उत्तरः महादेवी वर्मा ने विरह और व्यक्तिगत दुःख को लोक-कल्याणकारी करुणा भाव से जोड़ा है। उनकी भाषा सरल, संगीतात्मक और भावपूर्ण है, इसीलिए उनकी रचनाएँ पाठकों को विशेष प्रिय रही हैं।

२. महादेवी वर्मा की प्रमुख काव्य-रचनाएँ कौन-सी हैं और उन्हें किस काव्य पर ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला?

उत्तरः उनकी प्रमुख काव्य-रचनाएँ हैं — नीहार, रश्मि, नीरजा, सांध्यगीत, दीपशिखा और यामा। उन्हें ‘यामा’ काव्य-संकलन पर ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त हुआ।

३. मुरझाने के बाद फूल की क्या स्थिति हो जाती है?

उत्तरः मुरझाने के बाद फूल धरा (धरती) पर सूखा और बेजान पड़ा रहता है। उसकी सुगंध और कोमलता जाती रहती है और कोई उसकी परवाह नहीं करता।

४. खिले फूल और मुरझाए फूल के प्रति पवन के व्यवहार में क्या अंतर है?

उत्तरः खिले फूल को पवन अपनी गोद (अंक) में लेकर खेलाती, झुलाती और सुलाती थी। परंतु मुरझाने के बाद वही पवन तीव्र झोंकों से उसे धरती पर गिरा देती है।

५. खिले फूल और मुरझाए फूल के प्रति भ्रमर के व्यवहार में क्या अंतर है?

उत्तरः जब फूल खिला था, भ्रमर मधु-पान के लिए लालायित होकर उसके पास मँडराते थे। मुरझाने के बाद कोई भी भ्रमर फूल के पास नहीं आता, उसे देखता भी नहीं।


संक्षिप्त उत्तर दो (लगभग 50 शब्द)

१. महादेवी वर्मा की साहित्यिक देन का परिचय दो।

उत्तरः महादेवी वर्मा ने काव्य, कहानियाँ, रेखाचित्र और निबंध लिखे। वे ‘आधुनिक मीरा’ के रूप में जानी जाती हैं। उनकी प्रमुख काव्य-रचनाएँ हैं — नीहार, रश्मि, नीरजा, सांध्यगीत, दीपशिखा और यामा। गद्य में ‘स्मृति की रेखाएँ’ और ‘अतीत के चलचित्र’ प्रसिद्ध हैं। उनके रेखाचित्रों में भारतीय ग्रामीण जनता के दुःख-दर्द का हृदयस्पर्शी चित्रण है। उन्हें पद्मश्री और ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

२. खिले फूल के प्रति प्रकृति के विभिन्न तत्वों का आकर्षण कविता के आधार पर बताओ।

उत्तरः खिले फूल के प्रति प्रकृति के सभी तत्व आकृष्ट होते हैं। पवन उसे गोद में लेकर झुलाती है। चंद्रमा अपनी स्निग्ध किरणों से उसे हँसाता है। रात की ओस मोतियों की संपदा की भाँति उस पर बिखरती है। भ्रमर मधु-पान के लिए मँडराते हैं और लोरियाँ सुनाते हैं। माली भी उसकी यत्नपूर्वक देखभाल करता है।

३. मुरझाए फूल के साथ संसार का क्या बर्ताव होता है?

उत्तरः मुरझाने के बाद फूल के साथ संसार का व्यवहार सर्वथा बदल जाता है। भ्रमर उसके पास नहीं आते। चंद्रमा की प्रात-बेला की किरणें उस पर नहीं बरसतीं। जो पवन कभी उसे प्यार से झुलाती थी, वही अब तीव्र झोंकों से उसे धरती पर गिरा देती है। कोई भी उसकी दशा पर रोता नहीं और वृक्ष भी उदासीन रहता है।

४. ‘दानी सुमन’ के रूप में फूल की क्या भूमिका है?

उत्तरः फूल ने अपना सारा जीवन दूसरों को देने में बिताया। उसने अपना समस्त मधु और सौरभ (सुगंध) निःस्वार्थ भाव से सबको दान किया और सबके हृदय को अपनी सुंदरता से भाता रहा। सर्वस्व दान करके भी वह सदा प्रसन्न रहा। इसीलिए कवयित्री ने उसे ‘दानी सुमन’ कहा है। परंतु इस दान के बावजूद उसकी मुरझाई दशा पर कोई नहीं रोता।


सम्यक् उत्तर दो (लगभग 100 शब्द)

१. महादेवी वर्मा का साहित्यिक परिचय दो।

उत्तरः महादेवी वर्मा का जन्म 26 मार्च 1907 को उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद में हुआ। वे छायावाद के चार स्तंभों में से एक हैं और ‘आधुनिक मीरा’ के नाम से विख्यात हैं। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एम.ए. किया और जीवन भर प्रयाग महिला विद्यापीठ की प्राचार्या रहीं। उनकी प्रमुख काव्य-रचनाएँ हैं — नीहार, रश्मि, नीरजा, सांध्यगीत, दीपशिखा और यामा। ‘यामा’ पर उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला। गद्य में ‘स्मृति की रेखाएँ’, ‘अतीत के चलचित्र’ और ‘श्रृंखला की कड़ियाँ’ प्रसिद्ध हैं। उन्हें पद्मश्री और पद्मविभूषण से भी अलंकृत किया गया। 11 सितंबर 1987 को उनका निधन हुआ।

२. ‘मुरझाया फूल’ कविता में मानव जीवन और फूल के जीवन की तुलना कवयित्री ने किस प्रकार की है?

उत्तरः महादेवी वर्मा ने ‘मुरझाया फूल’ कविता में फूल के जीवन-चक्र को मानव-जीवन का प्रतीक बनाया है। खिला फूल युवावस्था का प्रतीक है — जब व्यक्ति युवा और शक्तिशाली होता है, तो परिवार, मित्र, समाज सभी उससे जुड़े रहते हैं। पवन, चंद्रमा, भ्रमर सभी फूल के पास आते हैं — ठीक उसी प्रकार, युवावस्था में सभी साथ होते हैं। लेकिन जब फूल मुरझा जाता है — अर्थात् मनुष्य बुढ़ापे या पतन की ओर जाता है — तो सब उससे मुख फेर लेते हैं। यह संसार की स्वार्थपरता का कटु सत्य है। कवयित्री अंत में कहती हैं — जब दानी फूल पर भी किसी को दुख नहीं हुआ, तो साधारण मनुष्य के लिए कौन रोएगा? यह कविता जीवन की नश्वरता और संसार की यथार्थ प्रकृति का दर्पण है।

३. ‘मुरझाया फूल’ कविता से हमें क्या संदेश मिलता है? विस्तार से लिखो।

उत्तरः महादेवी वर्मा की ‘मुरझाया फूल’ कविता अनेक महत्वपूर्ण संदेश देती है। पहला संदेश यह है कि जीवन में सुख और दुख दोनों आते हैं; सुख के समय ही जीवन का अंत नहीं सोचना चाहिए, बल्कि अपने पतन के लिए भी तैयार रहना चाहिए। दूसरा संदेश यह है कि संसार स्वार्थी है — यहाँ लोग केवल अपने हित के लिए किसी के साथ रहते हैं। जब व्यक्ति की उपयोगिता समाप्त हो जाती है, तो सब साथ छोड़ देते हैं। तीसरा संदेश है — निःस्वार्थ दान महान है; फूल ने सर्वस्व दिया और हर्षाता रहा, इसीलिए वह प्रशंसनीय है। चौथा संदेश यह है कि हमें वृद्धों और उपेक्षितों के प्रति करुणा और सहानुभूति रखनी चाहिए, उनकी दशा पर आँसू बहाने वाले बनना चाहिए, न कि स्वार्थी संसार की भाँति मुँह फेर लेना चाहिए।

४. कविता के आधार पर मुरझाए फूल और खिले फूल की तुलनात्मक स्थिति बताओ।

उत्तरः कविता में खिले फूल की स्थिति अत्यंत सुखद और वैभवशाली है। पवन उसे गोद में लेकर खेलाती है, चंद्रमा उसे हँसाता है, ओस की बूंदें मोतियों की तरह उसे सजाती हैं, भ्रमर मधु-पान के लिए मँडराते हैं और लोरियाँ सुनाते हैं, माली भी उसकी देखभाल करता है। इसके विपरीत, मुरझाए फूल की स्थिति दयनीय है — वह धरती पर सूखा पड़ा है, उसकी सुगंध और कोमलता जा चुकी है। भ्रमर पास नहीं आते, पवन तीव्र झोंकों से उसे गिरा देती है, कोई देखभाल करने वाला नहीं। खिले फूल की हर ओर से सराहना होती है, जबकि मुरझाए फूल को कोई नहीं रोता। यह तुलना जीवन के उत्थान और पतन की स्वाभाविक नियति को दर्शाती है।


शब्दार्थ (Word Meanings)

शब्दअर्थ
शैशवबचपन, शिशुकाल
सुमनफूल, पुष्प
अंकगोद
मंजुलमनोहर, सुंदर
पुष्पवरश्रेष्ठ फूल
लुब्धलालच में आया हुआ, मोहित
भ्रमरभँवरा, मधुमक्खी
स्निग्धकोमल, स्नेहयुक्त, निर्मल
संपदासंपत्ति, धन
मुक्तामोती
मधुपभँवरा, मधु का पान करने वाला
निद्रा-विवशनींद के कारण विवश, निद्राधीन
यत्नप्रयास, देखभाल, कोशिश
अठखेलियाँचुलबुलापन, हँसी-खेल, मस्ती
इतरानाइठलाना, घमंड से चलना
उद्यानबगीचा
धराधरती, पृथ्वी
शुष्कसूखा, नीरस
सौरभसुगंध, खुशबू
करतारविधाता, ईश्वर, सृष्टिकर्ता
स्वार्थमयस्वार्थ से भरा हुआ
सर्वस्वसब कुछ
निःसारसार-तत्व से रहित, तुच्छ, निरर्थक
व्यथितदुखी, पीड़ित
दानीदान देने वाला

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