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Class 9 Hindi Elective Poem 3 Question Answer | नर हो, न निराश करो मन को | ASSEB

ASSEB (Assam State Board of Secondary Education) की कक्षा 9 की हिंदी ऐच्छिक पाठ्यपुस्तक आलोक भाग-1 का ग्यारहवाँ पाठ (पद्य खंड की तीसरी कविता) “नर हो, न निराश करो मन को” हिंदी के राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित एक अत्यंत प्रेरणादायक कविता है। इस कविता में कवि ने मनुष्य को निराशा त्यागकर कर्मठ बनने का संदेश दिया है। यहाँ इस कविता के पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर, सप्रसंग व्याख्या और अतिरिक्त महत्वपूर्ण प्रश्न दिए गए हैं।


कविता-सारांश (Hindi Summary)

“नर हो, न निराश करो मन को” मैथिलीशरण गुप्त की एक अत्यंत प्रेरणादायक राष्ट्रीय कविता है। इस कविता में कवि मनुष्य को संबोधित करते हुए कहते हैं कि वह निराश न हो, बल्कि कर्म करता रहे। कवि के अनुसार मनुष्य का जन्म सार्थक है — उसे कुछ ऐसा काम करना चाहिए जिससे वह जग में अपना नाम अमर कर सके। जीवन में आए सुयोग को हाथ से जाने नहीं देना चाहिए, क्योंकि सद्उपाय कभी व्यर्थ नहीं जाता। कवि कहते हैं कि इस संसार को केवल सपना मत समझो — यह वास्तविक है और तुम्हें यहाँ अपना पथ स्वयं प्रशस्त करना है।

कवि आगे कहते हैं कि जब ईश्वर ने मनुष्य को सभी तत्त्व और योग्यताएँ प्रदान की हैं, तो वह अमरत्व का विधान स्वयं कर सकता है। उसे अपने गौरव का सदा ध्यान रखना चाहिए। मनुष्य को अपने साधन नहीं त्यागने चाहिए। ईश्वर ने जो शक्ति और वस्तुएँ दी हैं, उन्हें प्राप्त करना स्वयं मनुष्य का दायित्व है। कोई भी गौरव मनुष्य की पहुँच से बाहर नहीं है, क्योंकि वह भी जगदीश्वर का ही जन है। अंत में कवि यह संदेश देते हैं कि उद्यम ही विधि है — केवल परिश्रम से ही सुख की निधि प्राप्त होती है। अतः निष्क्रिय जीवन को धिक्कार है और कर्मठ जीवन ही श्रेष्ठ है।

इस कविता का केंद्रीय भाव यह है कि मनुष्य अपने प्रयत्न और कर्म से हर असफलता को सफलता में बदल सकता है। निराशा मनुष्य की सबसे बड़ी शत्रु है और कर्म उसका सबसे बड़ा मित्र। आत्मविश्वास, कर्मठता और आशावादिता — ये तीन गुण मनुष्य को महान बनाते हैं।


Summary (English)

“Nar Ho, Na Nirash Karo Man Ko” (Be a Man — Do Not Despair) is an inspiring motivational poem by Rashtrakavi Maithilisharan Gupt, included as the third poem (Chapter 11) in the Class 9 Hindi Elective textbook Alok Bhag-1 prescribed by ASSEB. In this poem, the poet addresses human beings and urges them to abandon despair and embrace action. He emphasises that human birth is meaningful — one must do something worthwhile to leave an immortal name in the world. Opportunities must not be allowed to slip away, for a good effort is never wasted. The poet reminds us that this world is not a mere dream — it is real, and every person must carve their own path through hard work and determination. God has given humans all the essential qualities and tools; it is up to them to use these gifts and achieve immortality through deeds and character.

The poet further says that one must always be conscious of one’s own honour and self-worth. No glory is beyond the reach of a human being, for every person is a child of the Almighty. The central message of the poem is that effort and industry are the only true paths to happiness and success. A passive, idle life deserves condemnation, while an active, hardworking life is truly praiseworthy. This poem from the ASSEB Class 9 Hindi Elective curriculum teaches students the values of self-confidence, perseverance, and optimism — virtues that are essential for success in the HSLC examination and in life.


कवि-परिचय (About the Poet)

मैथिलीशरण गुप्त का जन्म 3 अगस्त, 1886 को उत्तर प्रदेश के झाँसी जिले के चिरगाँव नामक स्थान पर हुआ था। उनके पिता का नाम सेठ रामशरण गुप्त था, जो स्वयं हिंदी के अच्छे कवि थे और “कनकलता” उपनाम से काव्य-रचना किया करते थे। पिता की काव्य-प्रतिभा का प्रभाव मैथिलीशरण पर बाल्यकाल से ही पड़ा। उनकी माता का नाम काशी बाई था। उनकी औपचारिक शिक्षा अधूरी रही, किंतु उन्होंने घर पर ही हिंदी, संस्कृत और बाँगला का गहन अध्ययन किया।

मैथिलीशरण गुप्त आधुनिक हिंदी काव्य में खड़ी बोली के प्रथम महत्त्वपूर्ण कवि माने जाते हैं। उनकी कृति भारत-भारती (1912) भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अत्यंत प्रभावशाली सिद्ध हुई, जिसके कारण महात्मा गांधी ने उन्हें ‘राष्ट्रकवि’ की पदवी प्रदान की। उनकी प्रमुख रचनाओं में साकेत (महाकाव्य), यशोधरा, पंचवटी, जयद्रथ-वध, द्वापर, रंग में भंग, किसान और भारत-भारती प्रमुख हैं। भारत सरकार ने उन्हें सन् 1954 में पद्मभूषण से अलंकृत किया। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय ने उन्हें डी.लिट्. की मानद उपाधि प्रदान की। 12 दिसंबर, 1964 को उनका निधन हो गया।


कविता-पाठ (The Poem)

नर हो, न निराश करो मन को
— मैथिलीशरण गुप्त

नर हो, न निराश करो मन को,
कुछ काम करो, कुछ काम करो।
जग में रह कर कुछ नाम करो,
यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो!
समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो,
कुछ तो उपयुक्त करो तन को।
नर हो, न निराश करो मन को।।

सँभलो कि सुयोग न जाय चला,
कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला?
समझो जग को न निरा सपना,
पथ आप प्रशस्त करो अपना।
अखिलेश्वर है अवलंबन को,
नर हो, न निराश करो मन को।।

जब प्राप्त तुम्हें सब तत्त्व यहाँ,
फिर जा सकता वह सत्त्व कहाँ?
तुम स्वत्त्व सुधा-रस पान करो,
उठकर अमरत्व विधान करो।
दव-रूप रहो भव-कानन को,
नर हो, न निराश करो मन को।।

निज गौरव का नित ज्ञान रहे,
हम भी कुछ हैं यह ध्यान रहे।
मरणोत्तर गुंजित गान रहे,
सब जाय अभी पर मान रहे।
कुछ हो न तजो निज साधन को,
नर हो, न निराश करो मन को।।

प्रभु ने तुमको कर दान किए,
सब वांछित वस्तु विधान किए।
तुम प्राप्त करो उनको न अहो!
फिर है यह किसका दोष कहो?
समझो न अलभ्य किसी धन को,
नर हो, न निराश करो मन को।।

किस गौरव के तुम योग्य नहीं,
कब कौन तुम्हें सुख-भोग्य नहीं?
जन हो तुम भी जगदीश्वर के,
सब है जिसके अपने घर के।
फिर दुर्लभ क्या उसके जन को?
नर हो, न निराश करो मन को।।

करके विधि-वाद न खेद करो,
निज लक्ष्य निरंतर भेद करो।
बनता बस उद्यम ही विधि है,
मिलती जिससे सुख की निधि है।
समझो धिक् निष्क्रिय जीवन को।
नर हो, न निराश करो मन को।।
कुछ काम करो, कुछ काम करो।।


शब्दार्थ (Word Meanings)

शब्दअर्थ
नरमनुष्य, पुरुष (human being/man)
निराशहताश, आशाहीन (hopeless, despairing)
जगसंसार, दुनिया (world)
अर्थमतलब, उद्देश्य (meaning, purpose)
अहोखेद या आश्चर्य का भाव (alas! / expression of wonder)
उपयुक्तठीक, उचित (appropriate, suitable)
तनशरीर (body)
सँभलोसावधान हो जाओ (be careful, be alert)
सुयोगअच्छा अवसर (good opportunity)
सदुपायअच्छा उपाय (good means/method)
निराकेवल, मात्र (only, mere)
पथरास्ता, मार्ग (path, way)
प्रशस्तसुगम, विस्तृत करना (to pave, to make smooth)
अखिलेश्वरसर्वशक्तिमान ईश्वर (the Almighty God)
अवलंबनसहारा, आश्रय (support, refuge)
तत्त्वमूलभूत तत्व, योग्यताएँ (essential elements/qualities)
सत्त्वसार, गुण (essence, virtue)
स्वत्त्वअपनापन, पहचान (self-identity, own nature)
सुधा-रसअमृत रस (nectar)
अमरत्वअमरता (immortality)
दवजंगल की आग (forest fire)
भव-काननसंसार रूपी वन (the forest of worldly existence)
मरणोत्तरमृत्यु के बाद (after death)
गुंजितगूँजता हुआ (resounding, echoing)
मानसम्मान, इज्जत (honour, self-respect)
साधनउपाय, माध्यम (means, tools)
वांछितइच्छित, चाहा हुआ (desired, wished for)
अलभ्यजो मिलना कठिन हो (difficult to obtain)
जगदीश्वरजगत के ईश्वर (God of the universe)
दुर्लभबहुत कठिनाई से मिलने वाला (rare, hard to get)
विधि-वादभाग्य को दोष देना (blaming fate/destiny)
उद्यमपरिश्रम, मेहनत (industry, hard work)
निधिखजाना, भंडार (treasure)
निष्क्रियआलसी, काम न करने वाला (inactive, idle)

पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर (Textbook Questions and Answers)

बोध एवं विचार

1. सही विकल्प चुनो (पूर्ण वाक्य में उत्तर दो)

(क) कवि ने हमें प्रेरणा दी है —

उत्तरः कवि ने हमें कर्म की प्रेरणा दी है।

(ख) कवि के अनुसार मनुष्य को अमरत्व प्राप्त हो सकता है —

उत्तरः कवि के अनुसार मनुष्य को अमरत्व अपने व्यक्तित्व और कर्मों से प्राप्त हो सकता है।

(ग) कवि के अनुसार ‘न निराश करो मन को’ का आशय है —

उत्तरः कवि के अनुसार इस पंक्ति का आशय यह है कि मनुष्य अपने प्रयत्न से असफलता को भी सफलता में बदल सकता है

(घ) कवि के अनुसार ‘जग को निरा सपना’ न समझने का अर्थ है —

उत्तरः कवि के अनुसार इस संसार को केवल सपना नहीं समझना चाहिए, क्योंकि यह वास्तविक है और यहाँ कर्म करके ही जीवन सार्थक होता है


2. अति लघु उत्तरीय प्रश्न (लगभग 25 शब्दों में)

(क) तन को उपयुक्त बनाए रखने के क्या उपाय हैं?

उत्तरः कवि के अनुसार मनुष्य को अपने जीवन में सदा कुछ न कुछ सार्थक कार्य करते रहना चाहिए। कर्म करने से शरीर और मन दोनों सक्रिय रहते हैं। निष्क्रिय जीवन शरीर को व्यर्थ बना देता है। इसलिए उद्यमशील जीवन ही शरीर को उपयुक्त बनाए रखने का सर्वोत्तम उपाय है।

(ख) कवि के अनुसार जग को निरा सपना क्यों नहीं समझना चाहिए?

उत्तरः इस संसार को केवल सपना मान लेने पर मनुष्य कर्म करना छोड़ देता है और निष्क्रिय हो जाता है। यह जग वास्तविक है — यहाँ कर्म, प्रयत्न और उद्यम से ही सफलता मिलती है। इसलिए कवि कहते हैं कि अपना पथ स्वयं प्रशस्त करो और ईश्वर पर भरोसा रखकर आगे बढ़ो।

(ग) ‘अमरत्व विधान करो’ से कवि का क्या तात्पर्य है?

उत्तरः कवि का तात्पर्य है कि जब ईश्वर ने मनुष्य को सभी आवश्यक गुण और शक्तियाँ दी हैं, तो वह अपने सत्कर्मों और व्यक्तित्व से अमर हो सकता है। अर्थात् मनुष्य की कीर्ति और यश मृत्यु के बाद भी गूँजती रहे — यही सच्चा अमरत्व है।

(घ) अपने गौरव का किस प्रकार ध्यान रखना चाहिए?

उत्तरः कवि कहते हैं कि मनुष्य को सदा यह स्मरण रहना चाहिए कि वह भी ईश्वर की संतान है और उसमें भी अपार क्षमता है। “हम भी कुछ हैं” — यह आत्मविश्वास बनाए रखकर अपना सम्मान, साधन और लक्ष्य नहीं त्यागना चाहिए।

(ङ) कवि ने किस जीवन को धिक्कार योग्य बताया है?

उत्तरः कवि ने निष्क्रिय जीवन को धिक्कार योग्य बताया है। जो मनुष्य आलस्य में समय गँवाता है, कोई कर्म नहीं करता और भाग्य को दोष देकर बैठा रहता है — उसका जीवन व्यर्थ है। ऐसे जीवन पर कवि को खेद है।


3. लघु उत्तरीय प्रश्न (लगभग 50 शब्दों में)

(क) “सँभलो कि सुयोग न जाय चला” — इस पंक्ति से कवि क्या कहना चाहते हैं?

उत्तरः इस पंक्ति के माध्यम से कवि मैथिलीशरण गुप्त यह कहना चाहते हैं कि जीवन में जो अनुकूल अवसर (सुयोग) आते हैं, उन्हें सावधानी और तत्परता से ग्रहण करना चाहिए। यदि समय रहते नहीं चेते, तो ये सुनहरे मौके निकल जाते हैं और फिर लौटते नहीं। अच्छा उपाय और सही समय पर किया गया परिश्रम कभी व्यर्थ नहीं जाता। अतः जागरूकता और कर्मठता से जीवन में आगे बढ़ना चाहिए।

(ख) कवि के अनुसार ईश्वर ने मनुष्य को क्या-क्या दिया है?

उत्तरः कवि के अनुसार ईश्वर ने मनुष्य को सभी आवश्यक तत्त्व और वांछित वस्तुएँ प्रदान की हैं। उसे बुद्धि, विवेक, शरीर, आत्मशक्ति और सब प्रकार की क्षमताएँ दी हैं। कोई भी गौरव या सुख उसकी पहुँच से बाहर नहीं, क्योंकि वह जगदीश्वर का ही जन है। यदि मनुष्य इन वरदानों का सदुपयोग न करे, तो यह उसी का दोष है।

(ग) “करके विधि-वाद न खेद करो” — इस पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।

उत्तरः इस पंक्ति में कवि मनुष्य को भाग्यवाद का सहारा लेकर रोने से मना करते हैं। “विधि-वाद” का अर्थ है — भाग्य या प्रारब्ध को दोष देना। कवि कहते हैं कि भाग्य को दोष देकर खेद करना उचित नहीं। इसके बजाय अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करो और निरंतर परिश्रम करते रहो। उद्यम ही सच्ची विधि है जिससे सुख की प्राप्ति होती है।


4. दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (लगभग 100 शब्दों में)

(क) “नर हो, न निराश करो मन को” कविता का केंद्रीय भाव (प्रतिपाद्य) अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तरः “नर हो, न निराश करो मन को” कविता का केंद्रीय भाव मनुष्य को कर्मठ, आत्मविश्वासी और आशावादी बनाना है। कवि मैथिलीशरण गुप्त मनुष्य को संबोधित करते हुए कहते हैं कि निराशा त्यागकर कुछ सार्थक काम करो, जिससे जग में नाम हो और जीवन व्यर्थ न जाए। जीवन में आने वाले अवसरों का सदुपयोग करो और संसार को केवल सपना मत समझो। ईश्वर ने मनुष्य को सब कुछ दिया है — बुद्धि, शक्ति, आत्मविश्वास। इन्हें पहचानकर अमरत्व की ओर बढ़ो। अपने गौरव का सदा स्मरण रखो और अपने साधन मत त्यागो। भाग्य को दोष देना व्यर्थ है — उद्यम और परिश्रम ही सच्चे मार्ग हैं। निष्क्रिय जीवन धिक्कार के योग्य है और कर्मशील जीवन ही श्रेष्ठ है। यह कविता राष्ट्रीय चेतना और मानवीय गरिमा का अद्भुत संगम है।

(ख) कविता में ‘दव-रूप रहो भव-कानन को’ — इस पंक्ति का अर्थ और भाव स्पष्ट कीजिए।

उत्तरः “दव-रूप रहो भव-कानन को” — इस पंक्ति में कवि ने एक अत्यंत सुंदर और शक्तिशाली रूपक का प्रयोग किया है। ‘दव’ का अर्थ है जंगल की आग (दावानल) और ‘भव-कानन’ का अर्थ है संसार रूपी वन। कवि कहते हैं कि जिस प्रकार जंगल की आग पूरे वन को अपनी ऊर्जा से आलोकित और शुद्ध कर देती है, उसी प्रकार मनुष्य को भी अपनी कर्मशीलता, तेज और आत्मशक्ति से इस संसार को प्रकाशित करना चाहिए। अर्थात् मनुष्य को अपने कार्यों, आचरण और व्यक्तित्व से समाज में एक ऊर्जा और प्रकाश का स्रोत बनना चाहिए। यह पंक्ति मनुष्य को महान कर्म करने और समाज को दिशा देने की प्रेरणा देती है।

(ग) कविता में मनुष्य के गौरव और आत्मसम्मान पर कवि के विचार समझाइए।

उत्तरः मैथिलीशरण गुप्त ने इस कविता में मनुष्य के गौरव और आत्मसम्मान पर विशेष बल दिया है। वे कहते हैं कि प्रत्येक मनुष्य जगदीश्वर का जन है, अर्थात् ईश्वर की संतान है। इसीलिए कोई भी गौरव या सुख उसकी पहुँच से बाहर नहीं। मनुष्य को सदा “हम भी कुछ हैं” — इस भाव को मन में रखना चाहिए। मरने के बाद भी उसका यश गूँजे, उसका मान बना रहे — इसके लिए उसे अभी से श्रेष्ठ कार्य करने चाहिए। अपने साधन, अपनी शक्ति और अपने लक्ष्य को कभी नहीं त्यागना चाहिए। प्रभु ने जो क्षमताएँ दी हैं, उनका पूर्ण उपयोग न करना स्वयं मनुष्य की भूल है। यह भाव आत्मनिर्भरता, आत्मविश्वास और राष्ट्रीय गौरव का उद्घोष है।


5. सप्रसंग व्याख्या कीजिए

(क) “सँभलो कि सुयोग न जाय चला, / कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला?”

उत्तरः संदर्भ: प्रस्तुत पंक्तियाँ राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की प्रसिद्ध कविता “नर हो, न निराश करो मन को” से ली गई हैं। यह कविता ASSEB की कक्षा 9 की हिंदी ऐच्छिक पाठ्यपुस्तक आलोक भाग-1 में संकलित है।

व्याख्या: कवि मनुष्य को सावधान करते हुए कहते हैं कि जीवन में जो अनुकूल अवसर (सुयोग) आए हैं, उन्हें हाथ से जाने मत दो। यदि समय पर नहीं चेते, तो यह सुनहरा मौका चला जाएगा और फिर नहीं मिलेगा। कवि प्रश्न पूछते हैं — “कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला?” — अर्थात् कभी भी अच्छा उपाय निष्फल नहीं होता। जो व्यक्ति सही समय पर सही प्रयास करता है, उसे सफलता अवश्य मिलती है। इन पंक्तियों में कवि ने मनुष्य को सतर्कता और कर्मठता का संदेश दिया है। अवसर अनमोल होते हैं — उनकी पहचान कर उनका भरपूर उपयोग करना ही बुद्धिमानी है।

(ख) “निज गौरव का नित ज्ञान रहे, / हम भी कुछ हैं यह ध्यान रहे।”

उत्तरः संदर्भ: प्रस्तुत पंक्तियाँ राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की कविता “नर हो, न निराश करो मन को” से उद्धृत हैं, जो ASSEB कक्षा 9 की हिंदी ऐच्छिक पाठ्यपुस्तक आलोक भाग-1 का ग्यारहवाँ पाठ है।

व्याख्या: इन पंक्तियों में कवि मनुष्य को उसके आत्मगौरव की याद दिलाते हैं। वे कहते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति को सदा यह ज्ञान होना चाहिए कि वह भी महत्त्वपूर्ण है, उसमें भी अपार क्षमता है। “हम भी कुछ हैं” — यह आत्मविश्वास का मूलमंत्र है। जो व्यक्ति अपनी क्षमता को पहचानता है और अपने गौरव का सम्मान करता है, वही महान कार्य कर सकता है। कवि चाहते हैं कि मनुष्य की कीर्ति मृत्यु के बाद भी जीवित रहे — मरणोत्तर गान गूँजे। इसके लिए मनुष्य को अभी से, इसी जीवन में, श्रेष्ठ और सार्थक कर्म करने चाहिए। आत्मसम्मान और आत्मविश्वास ही महानता की नींव हैं।

(ग) “बनता बस उद्यम ही विधि है, / मिलती जिससे सुख की निधि है।”

उत्तरः संदर्भ: प्रस्तुत पंक्तियाँ राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित “नर हो, न निराश करो मन को” कविता से ली गई हैं। यह कविता ASSEB की कक्षा 9 की हिंदी ऐच्छिक पाठ्यपुस्तक आलोक भाग-1 में संकलित है।

व्याख्या: इन पंक्तियों में कवि ने परिश्रम को ही सच्चा मार्ग (विधि) घोषित किया है। ‘उद्यम’ का अर्थ है मेहनत, लगन और परिश्रम। कवि कहते हैं कि जो भाग्य को दोष देकर बैठे रहते हैं, वे सुखी नहीं हो सकते। केवल उद्यमशील व्यक्ति ही सुख की निधि (खजाना) प्राप्त कर सकता है। यह विचार भारतीय दर्शन की उस परंपरा से मेल खाता है जिसमें कर्म को सर्वोच्च माना गया है। आलसी जीवन व्यर्थ है; परिश्रमी जीवन ही वास्तविक जीवन है। इन पंक्तियों में कवि ने सरल और प्रभावशाली भाषा में मनुष्य को सदैव क्रियाशील रहने का संदेश दिया है।


भाव-सौंदर्य (Poetic Beauty)

(क) भाषा और शैली: इस कविता की भाषा परिनिष्ठित खड़ी बोली है जो सरल, प्रवाहमयी और प्रेरणादायक है। कवि मैथिलीशरण गुप्त की यह कविता खड़ी बोली काव्य का एक श्रेष्ठ उदाहरण है। वाक्य-गठन इस प्रकार किया गया है कि पंक्तियाँ हृदय को सीधे प्रभावित करती हैं। आदेशात्मक शैली (imperative mood) का प्रयोग — “करो”, “सँभलो”, “समझो”, “उठकर” — कविता को गतिशील और आह्वानमय बनाता है।

(ख) छंद और तुकबंदी: कविता में तुकांत शब्दों का सुंदर प्रयोग है — काम/नाम, सपना/अपना, चला/भला, तत्व/सत्व, ज्ञान/ध्यान/मान/गान आदि। प्रत्येक पद की अंतिम पंक्ति “नर हो, न निराश करो मन को” — यह ध्रुवपद (refrain) की भूमिका निभाती है जो कविता को संगीतात्मक और स्मरणीय बनाती है।

(ग) अलंकार: कविता में अनेक काव्य-अलंकारों का स्वाभाविक प्रयोग हुआ है। “दव-रूप रहो भव-कानन को” में रूपक अलंकार है — संसार को वन के रूप में और मनुष्य को दावानल के रूप में चित्रित किया गया है। “सुधा-रस” में रूपक है। “कुछ काम करो, कुछ काम करो” में पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है जो जोर देने के लिए प्रयुक्त है। “भव-कानन” में समास और सांकेतिकता का सुंदर प्रयोग है।

(घ) भाव-पक्ष: इस कविता का भाव-पक्ष अत्यंत सशक्त है। यह कविता न केवल व्यक्तिगत उत्थान बल्कि राष्ट्रीय जागरण का भी संदेश देती है। मनुष्य की गरिमा, आत्मशक्ति और कर्मठता — ये तीनों इस कविता के मूल स्तंभ हैं। कवि ने “अखिलेश्वर है अवलंबन को” — कहकर यह स्पष्ट किया है कि ईश्वर पर आस्था रखकर ही मनुष्य आगे बढ़ सकता है।


भाषा एवं व्याकरण (Language and Grammar)

तुकांत शब्द (Rhyming Words)

  • काम — नाम
  • अर्थ — व्यर्थ
  • तन — मन
  • चला — भला
  • सपना — अपना
  • तत्त्व — सत्त्व
  • ज्ञान — ध्यान — गान — मान
  • दान — विधान
  • खेद — भेद
  • विधि — निधि

उपसर्ग (Prefixes)

  • नि + राश = निराश
  • उप + युक्त = उपयुक्त
  • सु + योग = सुयोग
  • सत् + उपाय = सदुपाय
  • + मर = अमर (अमरत्व)
  • + लभ्य = अलभ्य
  • दुर् + लभ = दुर्लभ
  • निस् + क्रिय = निष्क्रिय

विलोम शब्द (Antonyms)

शब्दविलोम
निराशआशावान / आशावादी
उपयुक्तअनुपयुक्त
जन्ममृत्यु
व्यर्थसार्थक
निरामिश्रित
ज्ञानअज्ञान
उद्यमआलस्य
दुर्लभसुलभ
निष्क्रियसक्रिय
अमरत्वमरणशीलता

पर्यायवाची शब्द (Synonyms)

शब्दपर्यायवाची
जगसंसार, विश्व, लोक, दुनिया
नरमनुष्य, पुरुष, मानव, इंसान
पथमार्ग, राह, रास्ता
गौरवसम्मान, मान, प्रतिष्ठा, इज्जत
सुधाअमृत, पीयूष, अमिय
उद्यमपरिश्रम, मेहनत, प्रयत्न, कर्म

अतिरिक्त महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (Additional Important Q&A)

प्रश्न 1: मैथिलीशरण गुप्त को ‘राष्ट्रकवि’ की उपाधि क्यों मिली?

उत्तरः मैथिलीशरण गुप्त की कृति भारत-भारती (1912) ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम को गहरी प्रेरणा दी। इस ग्रंथ में उन्होंने भारत की प्राचीन गौरवशाली संस्कृति और तत्कालीन दुर्दशा का चित्रण करते हुए राष्ट्र-जागरण का आह्वान किया। इसी कारण महात्मा गांधी ने उन्हें ‘राष्ट्रकवि’ की पदवी दी।

प्रश्न 2: इस कविता का मुख्य संदेश क्या है?

उत्तरः इस कविता का मुख्य संदेश है कि मनुष्य को निराशा त्यागकर कर्मशील जीवन जीना चाहिए। परिश्रम, आत्मविश्वास और आशावादिता से मनुष्य हर कठिनाई को पार कर सकता है। भाग्य को दोष देने के बजाय अपनी शक्ति पर भरोसा रखना चाहिए। यही मनुष्य को महान और अमर बनाता है।

प्रश्न 3: “अखिलेश्वर है अवलंबन को” — इस पंक्ति का भाव क्या है?

उत्तरः इस पंक्ति में कवि कहते हैं कि जो व्यक्ति इस संसार को केवल सपना न समझकर अपना मार्ग स्वयं बनाता है और आगे बढ़ता है, उसे ईश्वर का सहारा और आशीर्वाद प्राप्त होता है। सर्वशक्तिमान ईश्वर (अखिलेश्वर) उन लोगों का अवलंबन (सहारा) बनते हैं जो कर्म करते हैं। यह पंक्ति ईश्वर पर आस्था और कर्म पर विश्वास का सुंदर संगम है।

प्रश्न 4: कविता में ‘सुधा-रस पान करो’ का क्या अर्थ है?

उत्तरः ‘सुधा’ का अर्थ है अमृत। कवि कहते हैं कि मनुष्य अपने ‘स्वत्व’ (अपनी पहचान और आत्मशक्ति) को पहचानकर उस आत्मानंद का रसपान करे। अर्थात् आत्मज्ञान और आत्मविश्वास ही मनुष्य के लिए अमृत के समान है। इस अमृत-रस को पीकर मनुष्य अमरत्व की ओर बढ़ सकता है।

प्रश्न 5: कविता में कवि ने किन-किन माध्यमों से मनुष्य को प्रेरित किया है?

उत्तरः कवि ने मनुष्य को विभिन्न माध्यमों से प्रेरित किया है — (1) कर्म की महत्ता बताकर, (2) ईश्वर पर आस्था का संदेश देकर, (3) अवसर की क्षणभंगुरता का बोध कराकर, (4) आत्मगौरव और आत्मसम्मान की याद दिलाकर, (5) अमरत्व की अवधारणा प्रस्तुत करके, (6) भाग्यवाद का खंडन करके और (7) उद्यम को ही सच्ची विधि घोषित करके।

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