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Class 9 Hindi Elective Poem 2 Question Answer | दोहा दशक | ASSEB

असम बोर्ड (ASSEB) की कक्षा 9 की हिंदी ऐच्छिक पाठ्यपुस्तक आलोक भाग-1 का दसवाँ पाठ “दोहा दशक” रीतिकाल के सर्वश्रेष्ठ कवि बिहारीलाल द्वारा रचित दस दोहों का संकलन है। इन दोहों में भक्ति, नीति और श्रृंगार के गहन भाव एक साथ समाहित हैं। कवि ने इन दोहों के माध्यम से कृष्ण-भक्ति की महिमा, सच्ची और आडंबर-रहित उपासना का महत्व, सज्जन-दुर्जन के स्वभाव, धन की मादकता और नीच व्यक्ति की सीमाओं जैसे गहन विषयों पर अत्यंत कम शब्दों में गहरी बात कही है। यहाँ इस पाठ के पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर और अतिरिक्त महत्वपूर्ण प्रश्न दिए गए हैं।


कविता का सारांश (Summary of the Poem)

“दोहा दशक” में बिहारीलाल के दस चुने हुए दोहे संकलित हैं जो उनकी प्रसिद्ध रचना बिहारी सतसई से लिए गए हैं। इन दोहों का विषय विस्तृत और विविध है। पहले दोहे में कवि श्रीकृष्ण के मनोहर रूप — सिर पर मुकुट, कमर पर पीतांबर, हाथ में मुरली और गले में माल — का वर्णन करते हुए प्रार्थना करते हैं कि यही रूप उनके मन में सदा बसा रहे। दूसरे दोहे में कवि कहते हैं कि करोड़ों की संपत्ति संचय करने से क्या लाभ — यदुपति (कृष्ण) ही वह सच्ची संपत्ति हैं जो सदा साथ रहते हैं और विपत्तियों का नाश करते हैं। तीसरे दोहे में कवि अनुरागी चित्त के रहस्य को उजागर करते हैं — जितना अधिक कृष्ण के श्याम रंग में डूबो, उतना ही उज्ज्वल होते जाओ।

चौथे दोहे में बिहारी बाहरी धर्म के आडंबर — जप, माला, छापे, तिलक — की निरर्थकता बताते हैं और स्पष्ट करते हैं कि सच्चे (साँचे) मन से ही राम प्रसन्न होते हैं। पाँचवें दोहे में कवि गोपीनाथ कृष्ण से प्रार्थना करते हैं कि जिस तरह पहले पतितों का उद्धार किया, उसी प्रकार उनका भी उद्धार करें। छठे दोहे में सज्जन के स्नेह की गहराई का सुंदर वर्णन है — सज्जन का प्रेम मंजीठ के रंग जैसा होता है जो कभी नहीं उतरता, चाहे वस्त्र घिस जाए। सातवें दोहे में दुर्जन से सावधान रहने की नीति बताई गई है — दुर्जन का स्वभाव काँटे के समान है जो विपत्ति में प्राण ले लेता है।

आठवें और सर्वाधिक प्रसिद्ध दोहे में बिहारी ने ‘कनक’ शब्द के दो अर्थों (सोना और धतूरा) के माध्यम से धन की मादकता का वर्णन किया है — धन की मादकता धतूरे से भी सौ गुनी अधिक है। नौवें दोहे में नीति का उपदेश है कि मित्र और दुर्दशाग्रस्त की सहायता करने के बाद जो बचे, वही संचय करना चाहिए। दसवें दोहे में कवि की यह नीति स्पष्ट है कि नीच व्यक्ति कभी बड़े नहीं हो सकते — जैसे आँखें फाड़कर देखने पर भी आसमान बड़ा नहीं होता, वैसे ही ओछे स्वभाव की सीमा होती है। इस प्रकार इन दस दोहों में भक्ति, नीति और जीवन-दर्शन का अनुपम संगम है।


Summary (English)

“Doha Dashak” (Ten Couplets) is a collection of ten selected dohas (couplets) by the renowned Reetikaal poet Biharilal, taken from his celebrated work Bihari Satsai. These dohas span the themes of devotion, moral wisdom, and an understanding of human nature. In the opening dohas, Biharilal offers devotional verses in praise of Lord Krishna, expressing his desire that the charming image of Krishna — wearing a crown, holding a flute, adorned with a garland — should forever dwell in his heart. He also conveys that Krishna alone is the true eternal wealth, for he destroys all adversities. One particularly insightful doha describes the paradox of a devoted heart — the deeper one is immersed in Krishna’s dark (Shyam) colour, the more radiant one becomes. Biharilal also warns against the hollow rituals of religion, stating that only a sincere (sachcha) heart can please God, not outward displays of rosary beads, marks, and tilak.

The moral couplets in the collection are equally profound. Biharilal describes the steadfast love of a noble person (sajjan) as being like the colour of manjistha — it never fades even if the cloth itself wears out — and warns that wicked people (durjan) are like thorns that pierce deeper in times of difficulty. His most celebrated couplet uses the wordplay of “kanak” (meaning both gold and the datura plant) to illustrate that the intoxication of wealth is a hundred times greater than that of any narcotic. The final dohas convey practical wisdom: earn and spend generously, then save; and recognize that a lowly person can never truly become great — just as the sky cannot be expanded no matter how wide you stretch your eyes. Together, these ten dohas represent the finest expression of Biharilal’s literary genius — a treasury of devotion, ethics, and life-philosophy condensed into the brevity of the doha form.


कवि-परिचय (About the Poet)

बिहारीलाल का जन्म सन् 1595 ई. के लगभग ग्वालियर के निकट बसुवा गोविन्दपुर में हुआ था। उनके पिता का नाम केशवराय था। उनका बचपन मथुरा में और कुछ समय ससुराल में बीता जहाँ उन्होंने उत्तम शिक्षा प्राप्त की। कहा जाता है कि बिहारी के ससुर के घर पर आचार्य नरहरि ने उन्हें काव्य-विद्या की शिक्षा दी। बिहारी मुगल सम्राट शाहजहाँ के कृपापात्र थे और उनकी प्रतिभा की चर्चा दरबार में थी। सन् 1645 ई. के आस-पास वे जयपुर पहुँचे जहाँ महाराज जयसिंह और उनकी नई चौहानी रानी के आग्रह पर वहीं रुक गए। महाराज जयसिंह के दरबार में उन्होंने प्रत्येक दोहे के बदले एक अशर्फी पाने की शर्त पर अपनी अमर कृति बिहारी सतसई की रचना की। सन् 1663 ई. में उनका देहावसान हुआ।

बिहारी हिंदी साहित्य के रीतिकाल के सर्वश्रेष्ठ कवि माने जाते हैं। उनकी एकमात्र प्रामाणिक रचना बिहारी सतसई है जिसमें लगभग 700 दोहे संकलित हैं। इन दोहों के विषय हैं — प्रेम, श्रृंगार, भक्ति और नीति। हिंदी के समस्त कवियों में बिहारी अग्रिम पंक्ति के अधिकारी हैं। उनके दोहों की विशेषता यह है कि अत्यंत कम शब्दों में बहुत गहरी और सारगर्भित बात कह दी जाती है — “गागर में सागर” वाली उक्ति उन पर पूरी तरह सार्थक होती है। उन्होंने संस्कृत और प्राकृत काव्य-ग्रंथों का भी गहन अध्ययन किया था। उनकी काव्य-भाषा साहित्यिक ब्रज है और छंद के रूप में उन्होंने मुख्यतः दोहा का प्रयोग किया। आचार्यों ने उनकी कविता के बारे में कहा है — “सतसैया के दोहरे, ज्यों नाविक के तीर। देखन में छोटे लगें, घाव करें गंभीर।”


दोहों का सप्रसंग व्याख्या (Explanation of the Dohas)

दोहा १ —

सीस मुकुट, कटि काछनी, कर मुरली उर माल।
यहि बानक मो मन बसौ, सदा बिहारीलाल।।

प्रसंग: यह दोहा रीतिकाल के महाकवि बिहारीलाल की कृति बिहारी सतसई से ‘दोहा दशक’ पाठ में संकलित है। इसमें कवि अपने आराध्य श्रीकृष्ण के मनोहर रूप का वर्णन करते हुए उनसे प्रार्थना करते हैं।

व्याख्या: कवि बिहारी कहते हैं — “हे बिहारीलाल! (श्रीकृष्ण!) जिनके सिर पर मुकुट शोभित है, कमर पर पीले रंग की काछनी (घुटनों तक की धोती/पीतांबर) है, हाथ में मुरली (बाँसुरी) है और वक्षस्थल पर माला (वैजंती माला) है — इसी मनोहर स्वरूप में आप मेरे मन में सदा बसे रहें।” इस दोहे में कवि ने श्रीकृष्ण के रूप के चार प्रमुख अंगों — सिर, कमर, हाथ और छाती — का संक्षिप्त किंतु अत्यंत सुंदर चित्रण किया है। यह एक भक्तिपरक दोहा है जिसमें मूर्तिध्यान की परंपरा का अनुसरण है।

दोहा २ —

कोऊ कोरीक संग्रहो, करहु न मो मन त्रास।
यदुपति सदा संपति, बिपती बिदारनहार।।

प्रसंग: यह दोहा ‘दोहा दशक’ पाठ से लिया गया है। इसमें कवि संपत्ति की वास्तविक परिभाषा बताते हुए कृष्ण-भक्ति की सर्वोच्चता प्रतिपादित करते हैं।

व्याख्या: कवि कहते हैं — “कोई करोड़ों की संपत्ति क्यों न इकट्ठा कर ले, (किंतु) मेरे मन को कोई भय मत करा — (क्योंकि) यदुपति (यदुवंशियों के स्वामी श्रीकृष्ण) ही सदा साथ रहने वाली सच्ची संपत्ति हैं और वे विपत्तियों का नाश करने वाले हैं।” इस दोहे में संदेश है कि सांसारिक धन-संपत्ति विपत्ति में काम नहीं आती; केवल ईश्वर-भक्ति ही वह संपत्ति है जो हर परिस्थिति में सहायक होती है और संकट का नाश करती है।

दोहा ३ —

या अनुरागी चित्त की, गति समुझे नहिं कोय।
ज्यों-ज्यों बूड़े स्याम रंग, त्यों-त्यों उज्जलु होय।।

प्रसंग: यह दोहा ‘दोहा दशक’ पाठ से संकलित है। इसमें कवि ने अनुरागी (कृष्ण-प्रेमी) के मन की अद्भुत गति का वर्णन किया है।

व्याख्या: कवि कहते हैं — “इस अनुरागी (प्रेमी भक्त के) चित्त की गति को कोई नहीं समझ सकता। (यह एक विचित्र रहस्य है कि) जैसे-जैसे यह कृष्ण के श्याम रंग (काले रंग) में डूबता जाता है, वैसे-वैसे यह और अधिक उज्ज्वल (पवित्र और निर्मल) होता जाता है।” सामान्यतः काले रंग में डूबने से वस्तु काली होती है, किंतु कृष्ण-भक्ति का रहस्य विपरीत है — जितना अधिक कृष्ण में लीन होओ, उतना अधिक आत्मा पवित्र होती है। यहाँ ‘स्याम रंग’ का अर्थ है कृष्ण का प्रेम और भक्ति।

दोहा ४ —

जप माला, छापैं, तिलक, सरै न एकौ काम।
मन काँचे नाचे वृथा, साँचे राँचे राम।।

प्रसंग: यह दोहा ‘दोहा दशक’ पाठ से लिया गया है। इसमें कवि ने सच्ची भक्ति और बाह्य आडंबर के अंतर को स्पष्ट किया है।

व्याख्या: कवि कहते हैं — “जप-माला (मनका), छापे (धार्मिक चिह्न/मुद्राएँ), तिलक — इन सबसे कोई काम नहीं सरता (सिद्ध होता)। (क्योंकि) मन कच्चा (चंचल और अस्थिर) हो तो (बाहरी आडंबर में) व्यर्थ नाचता रहता है; (परंतु जो) सच्चे (दृढ़, स्थिर और शुद्ध) मन से (भक्ति करे) उससे राम प्रसन्न होते हैं।” इस दोहे में कबीर की परंपरा का अनुसरण दिखता है। बिहारी का स्पष्ट मत है कि केवल बाहरी धार्मिक दिखावे से ईश्वर प्राप्त नहीं होते; मन की सच्चाई और दृढ़ता से ही भगवान का सान्निध्य मिलता है।

दोहा ५ —

गोपीनाथ कीजै कृपा, चित मोहि करहु सदाइ।
जिहि पतितनु तरायो तुम, तेहि पहँचाइ पहुँचाइ।।

प्रसंग: यह दोहा ‘दोहा दशक’ पाठ से संकलित है। इसमें कवि ने श्रीकृष्ण (गोपीनाथ) से अपने उद्धार के लिए प्रार्थना की है।

व्याख्या: कवि कहते हैं — “हे गोपीनाथ (गोपियों के स्वामी कृष्ण)! कृपा करें और मेरे चित्त को सदा अपने चरणों में लगाए रखें। जिन पतितों (पापियों) का आपने उद्धार किया, उनके पास पहुँच-पहुँचकर (मेरे तक भी पहुँचें और मेरा भी उद्धार करें)।” इस दोहे में भक्त कवि की आर्त प्रार्थना है। वे कृष्ण के करुणामय स्वभाव का उल्लेख करते हुए अपने लिए भी वैसी ही कृपा की याचना करते हैं।

दोहा ६ —

चटकन न छाँड़त घटक हु, सजन नेह गंभीर।
बरु घटि घटि जाइ चोल, रंग्यौ न रंगु मजीर।।

प्रसंग: यह दोहा ‘दोहा दशक’ पाठ से संकलित है। इसमें कवि ने सज्जन के गहरे और स्थायी प्रेम का सुंदर वर्णन किया है।

व्याख्या: कवि कहते हैं — “सज्जन का स्नेह अत्यंत गंभीर (गहरा और दृढ़) होता है जो किसी भी परिस्थिति में अपनी चमक नहीं छोड़ता। जैसे मंजीठ (एक लाल रंग उत्पन्न करने वाली जड़ी-बूटी) से रंगे हुए वस्त्र का रंग कभी नहीं जाता — वस्त्र भले ही घिस-घिसकर बिल्कुल पतला हो जाए — वैसे ही सज्जन का प्रेम कभी फीका नहीं पड़ता।” यहाँ मंजीठ के पक्के रंग की उपमा से सज्जन के अटूट स्नेह को समझाया गया है — यह एक अत्यंत सुंदर और मार्मिक उपमा है।

दोहा ७ —

न ए बिससिए लखि नए, दुर्जन दुसह सुभाय।
आँटे पर प्रानन हरैं, काँटे लौं लगि पाय।।

प्रसंग: यह दोहा ‘दोहा दशक’ पाठ से लिया गया है। इसमें कवि ने दुर्जन व्यक्ति की दुःसह प्रकृति के विषय में सावधान किया है।

व्याख्या: कवि कहते हैं — “दुर्जन (दुष्ट व्यक्ति) का स्वभाव सहने योग्य नहीं होता — भले ही वे कुछ नए (भले) लगें, उन पर विश्वास मत करो। (क्योंकि) ये संकट (आँटे) आने पर, पैर में काँटा लग जाने की तरह, प्राण ले लेते हैं।” जैसे पैर में काँटा चुभने पर चलना दूभर हो जाता है और असहनीय पीड़ा होती है, उसी प्रकार दुर्जन लोग विपत्ति के समय और अधिक कष्ट देते हैं। यह एक नीति-परक दोहा है जो सावधानी से मित्र चुनने की शिक्षा देता है।

दोहा ८ —

कनक कनक तैं सौ गुनी, मादकता अधिकाय।
उहि खाए बौराय जग, इहि पाए बौराय।।

प्रसंग: यह दोहा ‘दोहा दशक’ पाठ का सर्वाधिक प्रसिद्ध दोहा है। इसमें कवि ने धन की मादकता का चमत्कारिक ढंग से वर्णन किया है।

व्याख्या: कवि कहते हैं — “कनक (सोना/धन) में कनक (धतूरे) से सौ गुनी अधिक मादकता होती है। उस (धतूरे) को खाने पर (तो) संसार पागल होता है, परंतु इस (सोने/धन) को पाने मात्र से (ही) संसार पागल हो जाता है।” इस दोहे में ‘कनक’ शब्द का यमक अलंकार के रूप में अद्भुत प्रयोग है। धतूरे का नशा तो खाने के बाद होता है, किंतु धन का नशा तो पाने की उम्मीद मात्र से चढ़ जाता है। यह दोहा धन-लोलुपता पर गहरा व्यंग्य है।

दोहा ९ —

मीत न नीत गलीत हवै, धन जोरि कहत अघाय।
खाए खरचे जो जुरै, तौ जोरिए करोरि।।

प्रसंग: यह दोहा ‘दोहा दशक’ पाठ से लिया गया है। इसमें कवि ने धन-संचय के विषय में सही नीति बताई है।

व्याख्या: कवि कहते हैं — “मित्र और दुर्दशाग्रस्त (असहाय व्यक्ति) की सहायता किए बिना धन जोड़ते (संचित करते) रहना न तो नीति है, न मित्रता। (असली सलाह यह है कि) खाने-पीने और खर्च करने के बाद भी जो बचे, तभी उसे करोड़ों में जोड़ो।” इस दोहे में बिहारी ने धन-संचय की उचित प्रक्रिया बताई है — पहले जरूरतमंदों की सहायता करो, अपनी आवश्यकताएँ पूरी करो, और उसके बाद जो बचे उसे संचित करो। केवल संग्रह के लिए संग्रह करना न नीति है, न सद्गुण।

दोहा १० —

ओछे बड़े न ह्वै सकैं, लगौ सतरु ह्वै गैन।
बारु घटि घटि जाहि नहिं, फारि निहारै नैन।।

प्रसंग: यह दोहा ‘दोहा दशक’ पाठ का अंतिम दोहा है। इसमें कवि ने नीच स्वभाव के व्यक्ति की सीमाओं को एक सुंदर उपमा के माध्यम से स्पष्ट किया है।

व्याख्या: कवि कहते हैं — “ओछे (नीच स्वभाव वाले) व्यक्ति कभी बड़े नहीं हो सकते — चाहे उन्हें (बड़ों का) संग-साथ (सतरु/संग) मिल जाए। (यह वैसे ही असंभव है जैसे) आकाश (बारु) का विस्तार घट-घटकर नहीं होता — चाहे आँखें फाड़-फाड़कर देखते रहो।” यहाँ ‘आँखें फाड़कर देखना’ का अर्थ है — चाहे कितना भी प्रयत्न करो, आकाश का आकार नहीं बदलता। उसी प्रकार नीच व्यक्ति का स्वभाव नहीं बदलता, वह कभी महान नहीं बन सकता।


पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर (Textbook Questions and Answers)

बोध एवं विचार

१. बहुविकल्पीय प्रश्न — सही उत्तर चुनो:

(क) बिहारीलाल किस काल के सर्वश्रेष्ठ कवि हैं?
(i) भक्तिकाल    (ii) रीतिकाल    (iii) आदिकाल    (iv) आधुनिककाल

उत्तरः (ii) रीतिकाल

(ख) बिहारी किस मुगल सम्राट के कृपापात्र थे?
(i) अकबर    (ii) औरंगज़ेब    (iii) शाहजहाँ    (iv) बाबर

उत्तरः (iii) शाहजहाँ

(ग) बिहारी का देहावसान किस वर्ष हुआ?
(i) 1595 ई.    (ii) 1645 ई.    (iii) 1663 ई.    (iv) 1700 ई.

उत्तरः (iii) 1663 ई.

(घ) श्रीकृष्ण के सिर पर क्या शोभित है?
(i) पुष्पमाला    (ii) मुकुट    (iii) पीतांबर    (iv) मुरली

उत्तरः (ii) मुकुट

(ङ) बिहारी ने किन्हें सदा साथ रहने वाली संपत्ति माना है?
(i) सोने-चाँदी को    (ii) ज्ञान को    (iii) यदुपति कृष्ण को    (iv) भूमि-जमीन को

उत्तरः (iii) यदुपति कृष्ण को

२. सही (✓) या गलत (✗) बताओ:

(क) हिंदी के समस्त कवियों में बिहारीलाल अग्रिम पंक्ति के अधिकारी हैं।

उत्तरः ✓ (सही)

(ख) बिहारी की मुख्य रचना का नाम ‘प्रेमवाटिका’ है।

उत्तरः ✗ (गलत — उनकी मुख्य रचना ‘बिहारी सतसई’ है)

(ग) 1645 ई. के आस-पास बिहारी जयपुर पहुँचे।

उत्तरः ✓ (सही)

(घ) ओछे व्यक्ति भी संग पाकर बड़े बन सकते हैं।

उत्तरः ✗ (गलत — ओछे व्यक्ति कभी बड़े नहीं हो सकते)

(ङ) धन की मादकता धतूरे से सौ गुनी अधिक होती है।

उत्तरः ✓ (सही)

३. पूर्ण वाक्य में उत्तर दो:

(क) बिहारी ने किस विषय के दोहे रचे?

उत्तरः कवि बिहारी ने मुख्यतः प्रेम, श्रृंगार, भक्ति और नीति विषयक दोहों की रचना की।

(ख) बिहारी किस महाराज के दरबार में गए और वहाँ उन्हें क्या मिलता था?

उत्तरः बिहारी जयपुर के महाराज जयसिंह के दरबार में गए और उन्हें प्रत्येक दोहे के लिए एक अशर्फी मिलती थी।

(ग) बिहारी की ख्याति का आधार-ग्रंथ कौन-सा है?

उत्तरः बिहारी सतसई उनकी ख्याति का एकमात्र आधार-ग्रंथ है।

(घ) ‘कनक कनक’ दोहे में किसमें अधिक मादकता बताई गई है?

उत्तरः कनक (सोने/धन) में कनक (धतूरे) से सौ गुनी अधिक मादकता बताई गई है।

(ङ) सज्जन के स्नेह की तुलना किससे की गई है?

उत्तरः सज्जन के स्नेह की तुलना मंजीठ के पक्के रंग से की गई है जो कभी नहीं उतरता।

४. अति संक्षिप्त उत्तर दो (लगभग 25 शब्द):

(क) ‘यहि बानक मो मन बसौ’ — इस पंक्ति का भाव क्या है?

उत्तरः कवि श्रीकृष्ण से प्रार्थना करते हैं कि उनका मनोहर रूप — सिर पर मुकुट, हाथ में मुरली, वक्षस्थल पर माला — इसी सुंदर स्वरूप में उनके मन में सदा बसे रहें।

(ख) ‘ज्यों-ज्यों बूड़े स्याम रंग’ — इस पंक्ति का क्या आशय है?

उत्तरः अनुरागी भक्त का चित्त जितना अधिक कृष्ण के श्याम रंग (भक्ति-प्रेम) में डूबता है, वह उतना ही उज्ज्वल और पवित्र होता जाता है — यह भक्ति का अद्भुत रहस्य है।

(ग) ‘मन काँचे नाचे वृथा’ — इस पंक्ति का तात्पर्य क्या है?

उत्तरः यदि मन कच्चा (चंचल, अस्थिर) हो तो जप-माला, तिलक, छापे जैसे बाहरी धार्मिक आडंबर करना व्यर्थ है। सच्चे और स्थिर मन से की गई भक्ति ही ईश्वर को प्रसन्न करती है।

(घ) ‘आँटे पर प्रानन हरैं’ — इस पंक्ति का तात्पर्य क्या है?

उत्तरः दुर्जन व्यक्ति सामान्य दिनों में भले लग सकते हैं किंतु विपत्ति (आँटे = संकट) आने पर वे पैर में चुभे काँटे की तरह असहनीय पीड़ा देते हैं और प्राण तक ले सकते हैं।

(ङ) ‘कनक कनक’ दोहे में यमक अलंकार को स्पष्ट कीजिए।

उत्तरः इस दोहे में ‘कनक’ शब्द दो बार आया है — पहला ‘कनक’ का अर्थ है ‘सोना/धन’ और दूसरे ‘कनक’ का अर्थ है ‘धतूरा’। एक ही शब्द के दो भिन्न अर्थ होने से यहाँ यमक अलंकार है।

५. संक्षिप्त उत्तर दो (लगभग 50 शब्द):

(क) कवि बिहारी ने सज्जन के स्नेह का वर्णन कैसे किया है?

उत्तरः कवि बिहारी कहते हैं कि सज्जन का स्नेह अत्यंत गंभीर और स्थायी होता है — वह किसी भी परिस्थिति में अपनी चमक और गहराई नहीं खोता। जिस प्रकार मंजीठ (एक वनस्पति) से रंगे वस्त्र का रंग कभी नहीं उतरता — चाहे वस्त्र घिस-घिसकर नष्ट ही क्यों न हो जाए — उसी प्रकार सज्जन का प्रेम चाहे कितना भी समय बीत जाए, कभी फीका नहीं पड़ता। यह एक अत्यंत मार्मिक और काव्यात्मक उपमा है।

(ख) कवि बिहारी ने धन-संचय के बारे में क्या उपदेश दिया है?

उत्तरः कवि बिहारी के अनुसार धन-संचय तभी उचित है जब पहले मित्रों और दुर्दशाग्रस्त लोगों की सहायता की जाए और अपनी आवश्यकताएँ (खाना-पीना, खर्च) पूरी की जाएँ। उसके बाद जो धन बचे, उसे संचित करना नीतिसंगत है। यदि इन कर्तव्यों को छोड़कर केवल धन जोड़ा जाए तो वह न नीति है, न मित्रता। संचय का उद्देश्य दूसरों की सेवा होनी चाहिए।

(ग) ‘ओछे बड़े न ह्वै सकैं’ — इस दोहे का भाव समझाइए।

उत्तरः कवि बिहारी इस दोहे में नीति की एक महत्वपूर्ण बात कहते हैं कि नीच (ओछे) स्वभाव के व्यक्ति कभी महान नहीं बन सकते — चाहे उन्हें कितना ही अच्छा संग-साथ मिल जाए। इस सत्य को सिद्ध करने के लिए कवि ने आकाश का उदाहरण दिया है — आँखें फाड़-फाड़कर देखने पर भी आसमान का आकार नहीं बढ़ता। व्यक्ति का मूल स्वभाव उसकी सीमा तय करता है।

(घ) कवि बिहारी किस रूप में कृष्ण से उद्धार की प्रार्थना करते हैं?

उत्तरः कवि बिहारी गोपीनाथ कृष्ण से प्रार्थना करते हैं कि वे उनके चित्त को सदा अपने चरणों से जोड़े रखें और उनका उद्धार करें। वे कृष्ण के करुणामय स्वभाव का स्मरण कराते हैं — कि उन्होंने न जाने कितने पतितों (पापियों) का उद्धार किया है। उसी करुणा के आधार पर कवि अपने लिए भी वैसी ही कृपा की विनम्र याचना करते हैं।

६. विस्तृत उत्तर दो (लगभग 100 शब्द):

(क) कवि बिहारीलाल का साहित्यिक परिचय प्रस्तुत करो।

उत्तरः बिहारीलाल का जन्म सन् 1595 ई. के लगभग ग्वालियर के निकट बसुवा गोविन्दपुर में हुआ था। उनका देहावसान 1663 ई. में हुआ। वे मुगल सम्राट शाहजहाँ के कृपापात्र थे। 1645 ई. के लगभग वे जयपुर पहुँचे जहाँ महाराज जयसिंह के आग्रह पर रुक गए। वहाँ उन्होंने प्रत्येक दोहे के बदले एक अशर्फी पाने की शर्त पर बिहारी सतसई की रचना की — यही उनकी एकमात्र प्रामाणिक और प्रसिद्ध रचना है जिसमें लगभग 700 दोहे हैं। बिहारी हिंदी साहित्य के रीतिकाल के सर्वश्रेष्ठ कवि माने जाते हैं। उन्होंने संस्कृत और प्राकृत काव्य-ग्रंथों का भी अध्ययन किया था। उनके दोहों के विषय हैं — प्रेम, श्रृंगार, भक्ति और नीति। उनकी काव्य-भाषा साहित्यिक ब्रज है। उनके दोहों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि ‘गागर में सागर’ — अर्थात् बहुत कम शब्दों में अत्यंत गहरी और सारगर्भित बात कह दी जाती है। आचार्यों ने उन्हें ‘सतसैया के दोहरे, ज्यों नाविक के तीर / देखन में छोटे लगें, घाव करें गंभीर’ कहकर सम्मानित किया है।

(ख) ‘दोहा दशक’ के आधार पर बिहारी के भक्ति-भाव का वर्णन कीजिए।

उत्तरः बिहारी के ‘दोहा दशक’ में भक्ति-भाव अत्यंत उत्कट और हृदयस्पर्शी रूप में प्रकट हुआ है। पहले दोहे में कवि श्रीकृष्ण के मनोहर स्वरूप — मुकुट, काछनी, मुरली और माला — का ध्यान करते हुए प्रार्थना करते हैं कि यह छवि उनके मन में सदा बसी रहे। यह मूर्तिध्यान की परंपरा का सुंदर उदाहरण है। दूसरे दोहे में वे कृष्ण को ही सच्ची संपत्ति मानते हैं जो विपत्ति का नाश करते हैं। तीसरे दोहे में वे भक्ति का रहस्य बताते हैं — कृष्ण के प्रेम में डूबने से आत्मा उज्ज्वल होती है। चौथे दोहे में बाह्य आडंबर की निंदा कर सच्ची (साँचे) भक्ति का महत्व बताया गया है। पाँचवें दोहे में वे पतित-पावन कृष्ण से करुण प्रार्थना करते हैं। इस प्रकार बिहारी की भक्ति में रूप-ध्यान, शरणागति, ज्ञान-विवेक और आत्म-समर्पण — सभी तत्व समाहित हैं।

(ग) ‘दोहा दशक’ के आधार पर बिहारी की नीति-संबंधी विचारों का वर्णन कीजिए।

उत्तरः बिहारी के ‘दोहा दशक’ में नीति-संबंधी दोहे अत्यंत व्यावहारिक और जीवनोपयोगी हैं। छठे दोहे में सज्जन और दुर्जन के स्वभाव का सूक्ष्म विश्लेषण है — सज्जन का प्रेम मंजीठ के रंग जैसा अमिट होता है, जबकि दुर्जन काँटे की तरह विपत्ति में चुभता है। आठवाँ दोहा सर्वाधिक प्रसिद्ध है — धन की मादकता धतूरे से सौ गुनी अधिक बताकर धन-लोलुपता पर गहरा व्यंग्य किया गया है। नौवाँ दोहा धन-संचय की सही नीति बताता है — पहले मित्रों और जरूरतमंदों की सहायता करो, फिर बचे धन का संग्रह करो। दसवाँ दोहा यह स्पष्ट करता है कि नीच स्वभाव के व्यक्ति की एक सीमा होती है और वे कभी बड़े नहीं बन सकते। इस प्रकार बिहारी की नीति-संबंधी दोहे आज भी उतने ही प्रासंगिक और उपयोगी हैं।


अतिरिक्त महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (Additional Important Questions)

लघु-उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Questions)

१. बिहारी का जन्म कहाँ और कब हुआ था?

उत्तरः बिहारीलाल का जन्म सन् 1595 ई. के लगभग ग्वालियर के निकट बसुवा गोविन्दपुर में हुआ था। उनका देहावसान 1663 ई. में हुआ। वे रीतिकाल के सर्वश्रेष्ठ कवि माने जाते हैं।

२. बिहारी सतसई की क्या विशेषता है?

उत्तरः बिहारी सतसई बिहारीलाल की एकमात्र प्रामाणिक रचना है जिसमें लगभग 700 दोहे संकलित हैं। इसमें प्रेम, श्रृंगार, भक्ति और नीति के दोहे हैं। इन दोहों की विशेषता है ‘गागर में सागर’ — बहुत कम शब्दों में गहरी बात। इन्हें ‘सतसैया के दोहरे, ज्यों नाविक के तीर’ कहा जाता है।

३. ‘दोहा’ छंद के क्या लक्षण हैं?

उत्तरः दोहा एक मात्रिक छंद है जिसमें दो चरण होते हैं। पहले (विषम) चरण में 13 मात्राएँ और दूसरे (सम) चरण में 11 मात्राएँ होती हैं — कुल प्रत्येक पंक्ति में 24 मात्राएँ। दूसरे और चौथे चरण के अंत में समान तुक (अंत्यानुप्रास) होती है। दोहे में संक्षिप्तता और गहराई दोनों एक साथ होती हैं।

४. बिहारी के अनुसार सच्ची भक्ति क्या है?

उत्तरः बिहारी के अनुसार सच्ची भक्ति बाहरी आडंबर — जप-माला, तिलक, छापे — में नहीं होती। मन यदि कच्चा (चंचल) हो तो ये सब व्यर्थ हैं। सच्ची (साँचे) भक्ति वह है जो पूरे मन और आत्मा से की जाए। सच्चे और स्थिर मन से ही राम प्रसन्न होते हैं।

५. दुर्जन पर विश्वास क्यों नहीं करना चाहिए?

उत्तरः बिहारी के अनुसार दुर्जन का स्वभाव सहन करने योग्य नहीं होता। भले ही वे किसी समय भले और नए लगें, उन पर विश्वास नहीं करना चाहिए। क्योंकि संकट (विपत्ति) के समय वे पैर में चुभे काँटे की तरह असहनीय पीड़ा देते हैं और प्राण तक ले सकते हैं। इसलिए मित्र चुनते समय सावधानी आवश्यक है।

६. ‘यदुपति’ शब्द का क्या अर्थ है और कवि ने उनकी क्या विशेषता बताई है?

उत्तरः ‘यदुपति’ का अर्थ है यदुवंश के स्वामी — अर्थात् श्रीकृष्ण। कवि ने उनकी यह विशेषता बताई है कि वे सदा साथ रहने वाली सच्ची संपत्ति हैं। करोड़ों की सांसारिक संपत्ति संकट में काम नहीं आती, किंतु कृष्ण सदा साथ रहते हैं और सभी विपत्तियों का नाश करते हैं।

दीर्घ-उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Questions)

१. बिहारीलाल के जीवन और रचना पर एक संक्षिप्त निबंध लिखिए।

उत्तरः बिहारीलाल हिंदी साहित्य के रीतिकाल के सर्वाधिक प्रतिभाशाली कवि हैं। उनका जन्म सन् 1595 ई. के लगभग ग्वालियर के निकट बसुवा गोविन्दपुर में हुआ था। उनके पिता का नाम केशवराय था। उनका बचपन मथुरा में बीता और शिक्षा ससुराल के शहर में हुई जहाँ आचार्य नरहरि ने उन्हें काव्य-विद्या सिखाई। बिहारी की प्रतिभा ने उन्हें मुगल दरबार में पहचान दिलाई — वे सम्राट शाहजहाँ के कृपापात्र बने।

1645 ई. के लगभग बिहारी जयपुर पहुँचे। महाराज जयसिंह और उनकी नई चौहानी रानी के आग्रह पर वहीं रुक गए। एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार महाराज जयसिंह नई रानी के प्रेम में डूबे हुए राजकाज की ओर ध्यान नहीं दे रहे थे। तब बिहारी ने एक दोहा लिखकर भेजा। उस एक दोहे के प्रभाव से महाराज सचेत हो गए। इससे प्रसन्न होकर महाराज ने बिहारी से अनुरोध किया कि वे जयपुर में रहें और प्रत्येक दोहे के बदले एक अशर्फी पाने की शर्त पर काव्य-रचना जारी रखें। इस प्रकार बिहारी सतसई का निर्माण हुआ जिसमें लगभग 700 दोहे हैं। यह उनकी एकमात्र प्रामाणिक और प्रसिद्ध रचना है। 1663 ई. में उनका देहावसान हुआ। उनकी काव्य-भाषा साहित्यिक ब्रज है। उनके दोहे प्रेम, श्रृंगार, भक्ति और नीति के अनुपम उदाहरण हैं।

२. ‘कनक कनक तैं सौ गुनी’ दोहे की सप्रसंग व्याख्या कीजिए और इसका काव्य-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।

उत्तरः दोहा: कनक कनक तैं सौ गुनी, मादकता अधिकाय। / उहि खाए बौराय जग, इहि पाए बौराय।।

प्रसंग: यह दोहा रीतिकाल के महाकवि बिहारीलाल की ‘बिहारी सतसई’ से ‘दोहा दशक’ पाठ में संकलित है। इसमें कवि धन की मादकता पर गहरा व्यंग्य करते हैं।

व्याख्या: इस दोहे में ‘कनक’ शब्द दो अलग-अलग अर्थों में प्रयुक्त हुआ है। पहला ‘कनक’ का अर्थ है धन/सोना और दूसरे ‘कनक’ का अर्थ है धतूरा (एक विषैला और नशीला पौधा)। कवि कहते हैं — धन (सोने) में धतूरे से सौ गुनी अधिक मादकता (नशा) होती है। उस (धतूरे) को खाने पर दुनिया पागल होती है, जबकि इस (धन) को पाने (मिलने) मात्र से ही दुनिया पागल हो जाती है। अर्थात् धतूरे का नशा खाने के बाद चढ़ता है, किंतु धन का नशा तो मिलने की उम्मीद मात्र से ही चढ़ जाता है — यह कितनी अधिक मादकता है!

काव्य-सौंदर्य: (१) इस दोहे में यमक अलंकार का अत्यंत सुंदर और चमत्कारिक प्रयोग है — ‘कनक’ एक ही ध्वनि के दो बिल्कुल अलग अर्थ देती है। (२) व्यंजना शक्ति — सतह पर यह धतूरे और सोने की तुलना है, किंतु गहरे अर्थ में यह धन-लोलुपता पर करारा व्यंग्य है। (३) साहित्यिक ब्रज भाषा में अत्यंत सहज और प्रवाहमय भाषा है। (४) यह दोहा ‘गागर में सागर’ की प्रवृत्ति का उत्कृष्ट उदाहरण है।


भाव-सौंदर्य (Poetic Beauty and Literary Devices)

बिहारी के ‘दोहा दशक’ में काव्य-सौंदर्य के अनेक तत्व देखने को मिलते हैं:

१. यमक अलंकार: ‘कनक कनक तैं सौ गुनी’ — ‘कनक’ शब्द दो बार, दो भिन्न अर्थों में प्रयुक्त हुआ है (सोना और धतूरा)। यह बिहारी का सर्वाधिक प्रसिद्ध और चमत्कारिक यमक है।

२. उपमा अलंकार: ‘चटकन न छाँड़त घटक हु…रंग्यौ न रंगु मजीर’ — सज्जन के स्नेह की तुलना मंजीठ के अमिट रंग से की गई है। ‘काँटे लौं लगि पाय’ — दुर्जन की तुलना पाँव में चुभे काँटे से की गई है।

३. विरोधाभास अलंकार (Paradox): ‘ज्यों-ज्यों बूड़े स्याम रंग, त्यों-त्यों उज्जलु होय’ — श्याम (काले) रंग में डूबने से उज्ज्वल (सफेद) होना — यह विरोधाभास भक्ति के रहस्य को अभिव्यक्त करता है।

४. व्यंजना शक्ति: बिहारी के दोहों में शाब्दिक अर्थ के पीछे व्यापक और गहरा अर्थ छिपा होता है। ‘कनक कनक’ दोहे में धन-लोलुपता पर गहरा व्यंग्य है।

५. प्रसाद गुण: बिहारी की भाषा में ‘प्रसाद’ — अर्थात् स्पष्टता और सहजता — का गुण है। उनके दोहे पढ़ते ही अर्थ हृदय में उतर जाता है।

६. गागर में सागर: बिहारी की दोहों की सबसे बड़ी विशेषता है — अत्यंत कम शब्दों में गहरी, सारगर्भित और बहुआयामी बात कहना। एक-एक दोहे में अनेक स्तरों पर अर्थ होते हैं।

७. दृश्य-बिम्ब (Imagery): ‘सीस मुकुट, कटि काछनी, कर मुरली उर माल’ — इस एक पंक्ति में कृष्ण का संपूर्ण रूप-चित्र आँखों के सामने साकार हो जाता है।


भाषा एवं व्याकरण (Language and Grammar)

(क) संधि-विच्छेद:

संधि शब्दविच्छेद
देहावसानदेह + अवसान
उज्जलउत् + ज्वल
सज्जनसत् + जन
दुर्जनदुः + जन
यदुपतियदु + पति
गोपीनाथगोपी + नाथ

(ख) विलोम शब्द:

शब्दविलोम
सज्जनदुर्जन
संपत्तिविपत्ति
उज्जलमलिन
साँचे (सच्चे)काँचे (झूठे)
अनुरागविराग
गंभीरउथला

(ग) ब्रज से खड़ीबोली में रूपांतरण:

ब्रज रूपखड़ीबोली
सीससिर
कटिकमर
करहाथ
उरवक्षस्थल / छाती
बसौबसो
बूड़ेडूबने पर
होयहोता है
सरैसिद्ध होता है
राँचेप्रसन्न होता है
पाएपाने पर
ह्वैहोकर
नैननेत्र / आँखें

(घ) समास-विग्रह:

सामासिक शब्दविग्रहसमास का भेद
यदुपतियदुवंश का पति (स्वामी)तत्पुरुष
गोपीनाथगोपियों का नाथतत्पुरुष
सतसईसात सौ (दोहों का समूह)द्विगु
दुर्जनदुष्ट है जो जनकर्मधारय
सज्जनसत् (अच्छा) है जो जनकर्मधारय

शब्दार्थ (Word Meanings)

शब्दअर्थ
सीससिर
मुकुटताज, सिर पर धारण किया जाने वाला आभूषण
कटिकमर
काछनीघुटनों तक की धोती / पीतांबर (पीला वस्त्र)
करहाथ
मुरलीबाँसुरी
उरछाती / वक्षस्थल
मालमाला (वैजंती माला)
बानकरूप, वेष, सज्जा
बसौबसो, निवास करो
कोरीककरोड़ों
संग्रहोसंग्रह करो, इकट्ठा करो
त्रासभय, डर
यदुपतियदुवंश के स्वामी — श्रीकृष्ण
संपतिसंपत्ति
बिपतीविपत्ति, संकट
बिदारनहारनाश करने वाला, दूर करने वाला
अनुरागीप्रेमी, भक्त
चित्तमन
गतिस्वभाव, चाल, रहस्य
बूड़ेडूबने पर
स्याम रंगकृष्ण का श्याम वर्ण / कृष्ण-भक्ति का रंग
उज्जलुउज्ज्वल, पवित्र, निर्मल
छापैंधार्मिक चिह्न / मुद्राएँ
तिलकमाथे पर लगाया जाने वाला धार्मिक चिह्न
सरैसिद्ध होता है, पूरा होता है
काँचेकच्चे — अस्थिर, चंचल
साँचेसच्चे — दृढ़, स्थिर
राँचेप्रसन्न होते हैं, रुचि रखते हैं
गोपीनाथगोपियों के स्वामी — श्रीकृष्ण
पतितनुपतितों को
तरायोतारा (उद्धार किया)
पहँचाइपहुँचकर
चटकनचमक, दीप्ति
घटक हुघटने पर भी
सजन नेहसज्जन का स्नेह
चोलवस्त्र, कपड़ा
मजीरमंजीठ — एक लाल रंग देने वाली वनस्पति
बिससिएविश्वास कीजिए
दुसहदुःसह — सहन न होने योग्य
सुभायस्वभाव
आँटेसंकट में, कठिनाई में
प्राननप्राण, जीवन
हरैंहर लेते हैं, ले लेते हैं
काँटे लौंकाँटे की तरह
कनकसोना / धन (प्रथम प्रयोग); धतूरा (द्वितीय प्रयोग)
मादकतानशा, नशीलापन
बौरायपागल हो जाता है
उहिउसे (धतूरे को)
इहिइसे (सोने/धन को)
मीतमित्र
नीतनीति
गलीतगलित — दुर्दशाग्रस्त, असहाय
जोरिजोड़कर, संचित करके
अघायसंतृप्त होकर, मग्न होकर
ओछेनीच, छोटे स्वभाव के
सतरु ह्वै गैनसत्संग पाकर भी
बारुआकाश, ऊपरी सीमा
फारि निहारै नैनआँखें फाड़-फाड़कर देखना

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