ASSEB Class 9 Hindi Elective (आलोक भाग-1) के पद्य खंड का पहला पाठ कृष्ण महिमा है, जिसके रचयिता कृष्णभक्त कवि रसखान हैं। इस अध्याय में रसखान के चुनिंदा सवैये संकलित हैं जो कृष्ण-भक्ति, ब्रजभूमि के प्रति अनुराग और गोपी-प्रेम को अत्यंत भावपूर्ण ब्रज भाषा में व्यक्त करते हैं। यहाँ ASSEB पाठ्यक्रम के अनुसार सभी प्रश्नों के उत्तर, सप्रसंग व्याख्याएँ और शब्दार्थ दिए गए हैं।
कवि-परिचय
रसखान का जन्म लगभग सन् 1533 ई. में हुआ था और उनकी मृत्यु लगभग 1618 ई. में हुई। उनका मूल नाम सैयद इब्राहिम था। वे दिल्ली के एक प्रतिष्ठित पठान परिवार से थे और मुगल राजवंश से संबंधित थे। बाद में कृष्णभक्ति की ओर आकर्षित होकर उन्होंने ब्रजभूमि में निवास किया। उन्होंने गोस्वामी विट्ठलनाथ जी से भक्ति की दीक्षा ग्रहण की। गोस्वामी तुलसीदास ने उन्हें रामचरितमानस की कथा भी सुनाई थी।
रसखान की प्रामाणिक रचनाएँ चार मानी जाती हैं — सुजान-रसखान (कवित्त और सवैये), प्रेमवाटिका (प्रेम-विषयक दोहे), दानलीला और अष्टयाम। उनकी काव्य-भाषा साहित्यिक ब्रज है जिसमें सहजता, सरलता और मधुरता है। दोहा, कवित्त और सवैया — तीनों छंदों पर उन्हें पूर्ण अधिकार था। उनके काव्य में कृष्ण का रूप-सौंदर्य, वेशभूषा, मुरली और बाल-क्रीड़ाएँ केंद्रीय विषय हैं। उनका नाम “रसखान” अर्थात् रस की खान पूर्णतः सार्थक है क्योंकि उनकी रचनाओं में भक्ति-रस, प्रेम-रस और काव्य-रस तीनों भरपूर मिलते हैं।
कविता का सारांश
प्रथम सवैये में रसखान अपनी कृष्ण-भक्ति की गहराई व्यक्त करते हुए कहते हैं कि यदि मनुष्य जन्म मिले तो वे गोकुल के ग्वालों के बीच बसना चाहेंगे; यदि पशु-जन्म मिले तो नंद की गायों के बीच चरना चाहेंगे; यदि पत्थर बनें तो उस गोवर्धन पर्वत का हिस्सा बनना चाहेंगे जिसे कृष्ण ने इंद्र के प्रकोप से ब्रजवासियों की रक्षा के लिए उठाया था; और यदि पक्षी हों तो यमुना के किनारे कदम्ब की डाली पर बसेरा करना चाहेंगे। दूसरे सवैये में वे कहते हैं कि श्रीकृष्ण की लकुटी और कामरिया (कंबल) के लिए तीनों लोकों का राज छोड़ने को तैयार हैं, नंद की गाएँ चराने के लिए आठों सिद्धियाँ और नवों निधियाँ भुला सकते हैं, और ब्रज के वन-बगीचों को देखने के लिए करोड़ों सोने के महल न्योछावर कर सकते हैं।
तीसरे सवैये में एक गोपी अपनी सखी के कहने पर कृष्ण का पूरा रूप धारण करने को तैयार है — मोर-मुकुट, गुंज की माला, पीताम्बर और लाठी लेकर गाएँ चराने जाएगी — किंतु कृष्ण की मुरली को अपने अधरों पर नहीं रखेगी क्योंकि वह मुरली उसकी प्रतिद्वंद्वी (सौतन) है। चौथे सवैये में गोपी कृष्ण की मुरली की धुन से अपने को बचाने के लिए कानों में अँगुली डालना चाहती है, पर अंत में स्वीकार करती है कि कृष्ण के मुख की मुस्कान इतनी अलौकिक है कि उसे सँभाला नहीं जा सकता। पाँचवें सवैये में बालक कृष्ण की धूल-सनी मनोहर छवि का चित्रण है — पीली कछोटी, रुनझुनाती पैंजनी, सिर पर सुंदर चोटी। इस छवि पर करोड़ों कामदेवों और चाँदों को न्योछावर किया जा सकता है। इसी सवैये में कागे के भाग्य की सराहना की गई है जो कृष्ण के हाथ से माखन-रोटी लेकर भाग गया।
Summary (English)
The chapter “Krishna Mahima” from ASSEB Class 9 Hindi Elective (Aalok Bhag-1) presents selected Savaiyas (verses) by the renowned Krishna-devotee poet Raskhan, written in melodious Braj language. In the first Savaiya, Raskhan expresses his longing to be born in any form — human, animal, stone, or bird — as long as he can stay close to Krishna’s sacred land of Braj. In the second, he declares his readiness to abandon kingdoms, supernatural powers, and golden palaces for Krishna’s humble staff, blanket, and the simple joy of grazing Nanda’s cattle. The third and fourth Savaiyas present the voice of a Gopi who is willing to dress like Krishna in every way, but refuses to touch his flute to her lips, viewing it as a rival for his affections. In the fifth Savaiya, the poet paints a beautiful picture of baby Krishna — dusty, playing in the courtyard, wearing yellow garments with jingling anklets — a vision worth more than millions of moons and Cupids. Even the crow is envied for having snatched Krishna’s butter-bread from his hand. The chapter beautifully exemplifies Hindu-Muslim unity through devotion, as Raskhan, born a Muslim, became one of the greatest singers of Krishna’s glory.
मूल कविता (सवैये)
सवैया 1
मानुष हौं तो वही रसखानि, बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन।
जौ पसु हौं तो कहा बस मेरो, चरौं नित नंद की धेनु मँझारन।
पाहन हौं तो वही गिरि को, जो कियो हरिछत्र पुरंदर धारन।
जो खग हौं तो बसेरो करौं, मिलि कालिंदी कूल कदंब की डारन॥
सवैया 2
या लकुटी अरु कामरिया पर, राज तिहूँ पुर को तजि डारौं।
आठहुँ सिद्धि नवौ निधि के सुख, नंद की गाइ चराइ बिसारौं।
रसखान कबौं इन आँखिन सौं, ब्रज के बन बाग तड़ाग निहारौं।
कोटिक ए कलधौत के धाम, करील के कुंजन ऊपर वारौं॥
सवैया 3
मोरपखा सिर ऊपर राखिहौं, गुंज की माल गरें पहिरौंगी।
ओढ़ि पितंबर लै लकुटी, बन गोधन ग्वारिन संग फिरौंगी।
भावतो वोहि मेरो रसखानि सो, तेरे कहे सब स्वांग करौंगी।
या मुरली मुरलीधर की, अधरान धरी अधरा न धरौंगी॥
सवैया 4
काननि दै अँगुरी रहिबो, जबहीं मुरली धुनि मंद बजै है।
मोहनी तानन सों रसखानि, अटा चढ़ि गोधन गैहै तो गैहै।
टेरि कहौं सिगरे ब्रज लोगनि, काल्हि कोऊ कितनो समुझे है।
माइ री वा मुख की मुसकानि, सम्हारी न जैहै, न जैहै, न जैहै॥
सवैया 5
धूरि भरे अति सोभित श्यामजू, तैसी बनी सिर सुंदर चोटी।
खेलत खात फिरैं अँगना, पग पैंजनी बाजति, पीरी कछोटी।
वा छबि को रसखानि बिलोकत, वारत काम कला निधि कोटी।
काग के भाग बड़े सजनी, हरि-हाथ सों लै गयो माखन-रोटी॥
बोध एवं विचार (प्रश्नोत्तर)
1. सही विकल्प का चयन करो
(क) रसखान कैसे कवि थे?
उत्तरः (i) कृष्णभक्त
(ख) कवि रसखान की प्रामाणिक रचनाओं की संख्या है:
उत्तरः (iii) चार
(ग) पत्थर बनकर कवि रसखान कहाँ रहना चाहते हैं?
उत्तरः (ii) गोवर्धन पर्वत पर
(घ) बालक कृष्ण के हाथ से कौआ क्या लेकर भागा?
उत्तरः (iv) माखन-रोटी
2. एक शब्द में उत्तर दो
(क) रसखान ने किनसे भक्ति की दीक्षा ग्रहण की थी?
उत्तरः विट्ठलनाथ जी से।
(ख) ‘प्रेमवाटिका’ के रचयिता कौन हैं?
उत्तरः रसखान।
(ग) रसखान की काव्य-भाषा क्या है?
उत्तरः ब्रज।
(घ) आराध्य कृष्ण का वेष धारण करते हुए गोपी अधरों पर क्या धारण करना नहीं चाहती?
उत्तरः मुरली।
(ङ) किनकी गाय चराकर कवि रसखान सब प्रकार के सुख भुलाना चाहते हैं?
उत्तरः नंद की गाय।
3. संक्षिप्त उत्तर दो (लगभग 25 शब्दों में)
(क) कवि का नाम ‘रसखान’ किस प्रकार पूर्णतः सार्थक बन पड़ा है?
उत्तरः कवि की रचनाओं में भक्ति-रस, प्रेम-रस और काव्य-रस तीनों भरपूर विद्यमान हैं। “रसखान” अर्थात् रस की खान — यह नाम उनके काव्य के संदर्भ में पूर्णतः सार्थक बन पड़ा है।
(ख) ‘जो खग हौं तो बसेरो करौं, मिलि कालिंदी-कूल-कदंब की डारन’ का आशय क्या है?
उत्तरः कवि कहते हैं कि यदि दूसरे जन्म में उन्हें पक्षी का जन्म मिले तो वे यमुना नदी के तट पर स्थित कदम्ब के वृक्षों की डालियों पर अपना घोंसला बनाकर रहेंगे।
4. संक्षेप में उत्तर दो (लगभग 50 शब्दों में)
(क) कवि रसखान अपने आराध्य का सान्निध्य किन-किन रूपों में प्राप्त करना चाहते हैं?
उत्तरः रसखान कृष्ण के उपासक होने के कारण हर जन्म में कृष्ण के समीप रहना चाहते हैं। मनुष्य रूप में वे गोकुल के गाँव में ग्वालों के बीच बसना चाहते हैं। पशु रूप में नंद की गायों के बीच चरना चाहते हैं। पत्थर बनें तो उस गोवर्धन पर्वत का अंग बनना चाहते हैं जिसे कृष्ण ने धारण किया था। पक्षी बनें तो यमुना-तट पर कदम्ब की डाल पर बसेरा करना चाहते हैं।
(ख) अपने उपास्य से जुड़े किन उपकरणों पर क्या-क्या न्योछावर करने की बात कवि ने की है?
उत्तरः कवि रसखान श्रीकृष्ण की साधारण लकुटी (लाठी) और कामरिया (कंबल) के लिए तीनों लोकों का राज त्यागने को तैयार हैं। नंद की गायों को चराने का सुख पाने के लिए वे आठों सिद्धियों और नवों निधियों का भोग भूलना चाहते हैं। ब्रज के वन, बाग और तालाबों की एक झलक पाने के लिए वे करोड़ों सोने-चाँदी के महल न्योछावर करने को उत्सुक हैं।
5. सम्यक् उत्तर दो (लगभग 100 शब्दों में)
(क) कवि रसखान का साहित्यिक परिचय प्रस्तुत करो।
उत्तरः रसखान का जन्म लगभग 1533 ई. और मृत्यु लगभग 1618 ई. में हुई। उनका मूल नाम सैयद इब्राहिम था। वे दिल्ली के एक प्रतिष्ठित पठान परिवार से थे। कृष्ण-भक्ति से अभिभूत होकर उन्होंने गोस्वामी विट्ठलनाथ जी से दीक्षा ली और ब्रजभूमि में निवास किया। उनकी चार प्रामाणिक रचनाएँ हैं — सुजान-रसखान, प्रेमवाटिका, दानलीला और अष्टयाम। उनकी काव्य-भाषा साहित्यिक ब्रज है जिसमें सहजता और माधुर्य है। दोहा, कवित्त और सवैया तीनों छंदों पर उनका पूर्ण अधिकार था। उनके काव्य के प्रमुख विषय हैं — कृष्ण का रूप-सौंदर्य, ब्रज की प्रकृति और गोपी-प्रेम। उनका नाम रसखान (रस की खान) अत्यंत सार्थक है।
(ख) कवि रसखान की कृष्ण-भक्ति पर प्रकाश डालो।
उत्तरः रसखान कृष्ण-भक्ति धारा के प्रसिद्ध मुसलमान कवि थे। उनकी कृष्ण-भक्ति इतनी गहरी थी कि वे जन्म-जन्मांतर में ब्रज से जुड़े रहना चाहते थे। वे मनुष्य, पशु, पत्थर या पक्षी — किसी भी रूप में कृष्ण के धाम में रहने को तैयार थे। श्रीकृष्ण की लाठी और कंबल के लिए तीनों लोकों का राज्य छोड़ने को उद्यत थे। नंद की गायें चराकर आठों सिद्धियों और नवों निधियों को भुलाने की बात कहते थे। कृष्ण की बाल-छवि पर करोड़ों कामदेव न्योछावर करने की बात करते थे। उनकी भक्ति हिंदू-मुस्लिम एकता की अद्भुत मिसाल है।
सप्रसंग व्याख्या
1. “मानुष हौं तो वही रसखानि … नित नंद की धेनु मँझारन।”
संदर्भ: यह पंक्तियाँ आलोक भाग-1 के ‘कृष्ण-महिमा’ पाठ से ली गई हैं। इनके रचयिता कृष्णभक्त कवि रसखान हैं।
प्रसंग: कवि प्रत्येक जन्म में कृष्ण के समीप रहने की कामना व्यक्त कर रहे हैं।
व्याख्या: रसखान कहते हैं कि यदि मुझे मनुष्य जन्म मिले तो मैं गोकुल के गाँव में ग्वालों के बीच बसूँगा जहाँ श्रीकृष्ण का बचपन बीता। यदि पशु-योनि प्राप्त हो तो नंद बाबा की गायों के बीच हर दिन चरूँगा। इन पंक्तियों में कवि की कृष्ण-भक्ति का अनन्य स्वरूप प्रकट होता है — वे किसी भी रूप में, किसी भी जन्म में, सदा कृष्ण के निकट रहना चाहते हैं।
2. “रसखान कबौं इन आँखिन सौं … करील के कुंजन ऊपर वारौं।”
संदर्भ: यह पंक्तियाँ ‘कृष्ण-महिमा’ के द्वितीय सवैये से ली गई हैं।
प्रसंग: कवि ब्रज के वन-उपवनों के दर्शन की उत्कट इच्छा व्यक्त कर रहे हैं।
व्याख्या: रसखान की आँखें ब्रज के वनों, बगीचों और तालाबों को देखने के लिए तरस रही हैं। वे कहते हैं कि ब्रज की कटीली करील की झाड़ियों पर करोड़ों सोने-चाँदी के महल न्योछावर करने को तैयार हैं। यह पंक्तियाँ सिद्ध करती हैं कि भक्त के लिए आराध्य की भूमि का एक तिनका भी संसार के सभी वैभव से बढ़कर होता है।
3. “धूरि भरे अति सोभित श्यामजू … पैंजनी बाजति, पीरी कछोटी।”
संदर्भ: यह पंक्तियाँ ‘कृष्ण-महिमा’ के पंचम सवैये से ली गई हैं।
प्रसंग: कवि बालक कृष्ण की मनोहर छवि का चित्रण कर रहे हैं।
व्याख्या: धूल से सने हुए भी श्यामसुंदर कृष्ण अत्यंत शोभायमान दिखते हैं। सिर पर सुंदर चोटी बनी है। वे आँगन में खेलते-खाते फिर रहे हैं। पैरों में पायजनी रुनझुन बज रही है और पीली कछोटी (धोती) पहने हैं। यह दृश्य करोड़ों कामदेवों की छवि से भी अधिक मनोहर है। इसी दृश्य में एक कौवा भाग्यशाली कहलाया जो कृष्ण के हाथ से माखन-रोटी लेकर उड़ गया।
4. “मोरपखा सिर ऊपर राखिहौं … गोधन ग्वारिन संग फिरौंगी।”
संदर्भ: यह पंक्तियाँ ‘कृष्ण-महिमा’ के तृतीय सवैये से ली गई हैं।
प्रसंग: एक गोपी अपनी सखी के कहने पर कृष्ण का वेश धारण करने की बात कर रही है।
व्याख्या: गोपी कहती है कि मैं सिर पर मोर-मुकुट धारण करूँगी, गले में गुंज की माला पहनूँगी, पीताम्बर ओढ़कर हाथ में लाठी लेकर गोधन (गायों) के साथ ग्वालिनों के बीच वनों में विचरूँगी। यह कृष्ण के प्रति गोपी के प्रेम और उनसे एकात्मकता प्राप्त करने की तीव्र इच्छा का प्रतीक है।
काव्य-सौंदर्य / भाव-सौंदर्य
1. भाषा: रसखान ने साहित्यिक ब्रज भाषा का प्रयोग किया है जिसमें सहजता, सरलता और अपूर्व माधुर्य है। भाषा में झरने जैसा मधुर प्रवाह है।
2. छंद: सवैया छंद का प्रयोग किया गया है जो भक्ति-काव्य के लिए अत्यंत उपयुक्त है।
3. रस: भक्ति-रस प्रधान है। साथ ही श्रृंगार-रस और वात्सल्य-रस का भी सुंदर समन्वय है।
4. अलंकार: अनुप्रास अलंकार (“कालिंदी कूल कदंब”), उपमा और रूपक अलंकारों का स्वाभाविक प्रयोग हुआ है।
5. बिम्ब योजना: बालक कृष्ण की धूल-सनी छवि, रुनझुनाती पैंजनी और पीली कछोटी का चित्रण एक जीवंत दृश्य-बिम्ब उत्पन्न करता है।
6. भावपक्ष: कृष्ण के प्रति अनन्य भक्ति, ब्रजभूमि से असीम प्रेम और गोपी-प्रेम की मार्मिक अभिव्यक्ति इन सवैयों की विशेषता है। कवि मुसलमान होते हुए भी कृष्ण-भक्ति में इतने डूबे हुए हैं कि यह हिंदू-मुस्लिम सांस्कृतिक एकता की अनुपम मिसाल बन गई है।
शब्दार्थ
| शब्द (ब्रज) | अर्थ (हिंदी) |
|---|---|
| मानुष / मानुस | मनुष्य |
| ग्वारन | ग्वाल लोग, गाएँ चराने वाले |
| पसु / पासू | पशु |
| बस मेरो | मेरे वश में |
| धेनु | गाय |
| मँझारन | बीच में, मध्य में |
| पाहन | पत्थर |
| गिरि | पर्वत |
| हरिछत्र / धर्यो कर छत्र | जिसे (कृष्ण ने) छाते की तरह हाथ पर धारण किया |
| पुरंदर | इंद्र |
| खग | पक्षी |
| बसेरो | निवास, घोंसला |
| कालिंदी | यमुना नदी |
| कूल | किनारा, तट |
| कदंब | कदम्ब वृक्ष |
| डारन | डालियाँ |
| लकुटी | लाठी, छड़ी |
| कामरिया | कंबल, चादर |
| तिहूँ पुर | तीनों लोक |
| आठहुँ सिद्धि | आठों योग-सिद्धियाँ |
| नवौ निधि | कुबेर की नौ निधियाँ (संपत्ति) |
| तड़ाग | तालाब |
| निहारौं | देखूँ, निहारूँ |
| कोटिक | करोड़ों |
| कलधौत | सोना, स्वर्ण |
| करील | एक काँटेदार झाड़ी (ब्रज में पाई जाती है) |
| मोरपखा | मोर-पंखों का मुकुट |
| गुंज की माल | घुँघची (रत्ती) की माला |
| पितंबर / पितांबर | पीला वस्त्र |
| गोधन | गाएँ; यहाँ लोकगीत भी |
| ग्वारिन | ग्वालिनें |
| स्वांग | वेश धारण करना, नकल |
| अधरान धरी | होठों पर रखी (मुरली) |
| अधरा न धरौंगी | अपने होठों पर नहीं रखूँगी |
| काननि | कानों में |
| धुनि | ध्वनि, सुर |
| मोहनी तानन | मोहित करने वाली तानें |
| अटा | अट्टालिका, महल की छत |
| सिगरे | सभी, सारे |
| सम्हारी न जैहै | सँभाली नहीं जाएगी |
| धूरि भरे | धूल से भरे |
| सोभित / सोहत | शोभायमान, सुंदर दिखते |
| श्यामजू | श्याम जी, कृष्ण |
| अँगना | आँगन |
| पग | पैरों में |
| पैंजनी | पायजनी, पाँव का गहना जो बजता है |
| पीरी कछोटी | पीली धोती / कमर-कपड़ा |
| छबि | छवि, सुंदर रूप |
| वारत | न्योछावर करते हैं |
| काम कला निधि कोटी | करोड़ों कामदेवों की कलाओं के भंडार |
| काग | कौआ |
| भाग | भाग्य |
| माखन-रोटी | मक्खन और रोटी |
व्याकरण ज्ञान
तत्सम-तद्भव रूप
| तद्भव (ब्रज रूप) | तत्सम रूप |
|---|---|
| मानुष | मनुष्य |
| पसु / पासू | पशु |
| पाहन | प्रस्तर / पाषाण |
| धेनु | धेनु (तत्सम ही) |
| खग | खग (तत्सम ही) |
| गिरि | गिरि (तत्सम ही) |
पर्यायवाची शब्द
| शब्द | पर्यायवाची |
|---|---|
| कृष्ण | कान्हा, गोपाल, श्याम, केशव, वासुदेव, मुरलीधर |
| कालिंदी | यमुना, जमुना, रविसुता, श्यामा |
| खग | पक्षी, चिड़िया, विहग, विहंग, पखेरू |
| गिरि | पहाड़, पर्वत, अचल, शैल |
| धेनु | गाय, गो, सुरभि |