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Class 9 Hindi Elective Chapter 7 Question Answer | अपराजिता | ASSEB

असम बोर्ड (ASSEB) की कक्षा 9 की हिंदी ऐच्छिक पाठ्यपुस्तक आलोक भाग-1 का सातवाँ पाठ “अपराजिता” हिंदी की सुप्रसिद्ध लेखिका शिवानी द्वारा लिखा गया एक प्रेरणादायक जीवनी-परक निबंध है। यह पाठ डॉ. चंद्रा के असाधारण जीवन-संघर्ष की कथा है — एक ऐसी महिला वैज्ञानिक की, जो बचपन से शारीरिक रूप से अक्षम होने के बावजूद अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति और अदम्य साहस के बल पर जीवन में उच्चतम शिखर तक पहुँची। यहाँ इस पाठ के पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर और अतिरिक्त महत्वपूर्ण प्रश्न दिए गए हैं।


पाठ-परिचय (Summary)

“अपराजिता” शिवानी द्वारा लिखित एक मार्मिक एवं प्रेरणाप्रद जीवनी-परक रचना है। इस पाठ में लेखिका ने अपनी एक वास्तविक भेंट का वर्णन किया है — डॉ. चंद्रा से, जो आई.आई.टी., मद्रास से जुड़ी हुई एक सूक्ष्म जीव-विज्ञान की विशेषज्ञ हैं। डेढ़ वर्ष की अवस्था में पोलियो हो जाने के कारण डॉ. चंद्रा के पूरे शरीर का निचला भाग निर्जीव हो गया था। परंतु उनकी माँ श्रीमती शारदा सुब्रह्मण्यम ने उन्हें कभी हार नहीं मानने दी और स्वयं घर पर शिक्षा देकर उन्हें बंगलौर के माउंट कारमेल स्कूल में प्रवेश दिलाया। डॉ. चंद्रा ने अपनी माँ और अपनी जिजीविषा के बल पर एम.एस.सी. में प्रथम स्थान प्राप्त किया और बंगलौर के प्रख्यात “इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस” में प्रोफेसर सेठना के निर्देशन में पाँच वर्ष शोध करके माइक्रोबायोलॉजी में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की।

डॉ. चंद्रा की उपलब्धियाँ शैक्षणिक क्षेत्र तक ही सीमित नहीं थीं। उन्होंने मैक्स म्यूलर भवन से जर्मन भाषा की परीक्षा उत्तीर्ण की, भारतीय और पाश्चात्य संगीत में दक्षता प्राप्त की, कविताएँ लिखीं, कढ़ाई-बुनाई में हस्तकला की प्रतिभा दिखाई और गर्ल गाइड में राष्ट्रपति का स्वर्ण कार्ड पाने वाली पहली अक्षम लड़की बनीं। उन्होंने एक विशेष कार का डिजाइन तैयार करवाया ताकि वे बिना किसी की सहायता के स्वयं गाड़ी चला सकें। लेखिका जब पहली बार उन्हें कार से उतरते देखती हैं तो आश्चर्यचकित रह जाती हैं — एक शारीरिक रूप से अक्षम महिला, जो बिना किसी सहारे के बैसाखियों की सहायता से व्हीलचेयर तक पहुँचती है और खुद उसे चलाती है।

पाठ में लेखिका ने एक विरोधाभासी चरित्र का भी उल्लेख किया है — लखनऊ का एक प्रतिभाशाली युवक, जो आई.ए.एस. परीक्षा देने जाते समय ट्रेन दुर्घटना में एक हाथ खो देता है और फिर निराशा में डूबकर मादक पदार्थों का सेवन करने लगता है। लेखिका चाहती हैं कि वह युवक डॉ. चंद्रा की जीवन-गाथा पढ़े और प्रेरणा ले। पाठ का संदेश स्पष्ट है — शारीरिक अक्षमता मानसिक और बौद्धिक विकास की बाधा नहीं बन सकती। दृढ़ इच्छाशक्ति, अथक परिश्रम और सकारात्मक दृष्टिकोण से जीवन की हर कठिनाई पर विजय पाई जा सकती है। इसीलिए इस पाठ का शीर्षक “अपराजिता” — अर्थात् जिसे पराजित न किया जा सके — पूर्णतः सार्थक है।

Summary in English: “Aparajita” (The Unconquered) is an inspiring biographical essay by Shivani. The author narrates her meeting with Dr. Chandra, a microbiologist associated with IIT Madras, who has been physically disabled since childhood due to polio. Despite being paralysed from the waist down, Dr. Chandra achieved outstanding academic success — she topped her M.Sc. examinations, earned a Ph.D. from the prestigious Institute of Science in Bangalore under Professor Sethna, passed German language examinations from Max Müller Bhavan, mastered both Indian and Western classical music, wrote poetry, excelled in embroidery, and became the first disabled girl to receive the President’s Gold Card in Girl Guides. She also designed a special car so she could drive independently without any assistance. Her mother, Mrs. Sharda Subrahmanyam, was awarded the “Veer Janani” (Brave Mother) award for her unwavering support in nurturing her daughter’s extraordinary potential. The essay contrasts Dr. Chandra with a talented young man from Lucknow who lost an arm in a train accident and surrendered to despair. The central message is that physical disability cannot prevent intellectual and personal triumph — determination and willpower are the true measures of a person’s capability.


लेखिका-परिचय (About the Author)

शिवानी का वास्तविक नाम गौरा पंत था। उनका जन्म 17 अक्टूबर, 1923 को विजयादशमी के शुभ दिन गुजरात के राजकोट में हुआ था। उनके पिता अश्विनी कुमार पांडेय राजकुमार कॉलेज, राजकोट के प्रतिष्ठित प्राचार्य थे। शिवानी जी ने अपनी उच्च शिक्षा पश्चिम बंगाल के विश्वप्रसिद्ध शांतिनिकेतन में प्राप्त की, जहाँ उनका सम्पर्क रवींद्रनाथ ठाकुर से हुआ। ठाकुर जी उन्हें प्यार से “गोरा” कहकर बुलाते थे। उन्होंने हिंदी, संस्कृत, गुजराती, बंगाली, उर्दू और अंग्रेजी — छह भाषाओं में दक्षता प्राप्त की।

शिवानी जी ने लेखन कार्य बारह वर्ष की आयु में ही आरंभ कर दिया था। सन् 1951 में उनकी लघुकथा “मैं एक मुर्गी हूँ” “शिवानी” उपनाम से धर्मयुग में प्रकाशित हुई, जिसने उन्हें हिंदी साहित्य जगत में प्रतिष्ठित किया। उन्होंने लखनऊ के “स्वतंत्र भारत” समाचार-पत्र में “वातायन” नामक स्तंभ भी लिखा। उनकी प्रमुख रचनाओं में कृष्णकली, कालिंदी, चौदह फेरे, लाल हवेली, भैरवी, विषकन्या, श्मशान चंपा (उपन्यास) तथा चरैवेति और यात्रिकी (यात्रावृत्त) और स्मृति कलश (संस्मरण) प्रमुख हैं। उनकी ग्रंथ-सूची में 40 से अधिक उपन्यास, अनेक कहानियाँ, सैकड़ों निबंध और लेख सम्मिलित हैं। उनके नारी पात्र विशेष रूप से जीवंत और यादगार हैं। सन् 1982 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया। 21 मार्च, 2003 को दिल्ली में उनका निधन हो गया। हिंदी साहित्य में उनका स्थान सदा अमर रहेगा।


पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर (Textbook Questions and Answers)

बोध एवं विचार

1. सही विकल्प का चयन करो

(क) हम अपनी विपत्ति के लिए हमेशा किसे दोषी ठहराते हैं?

उत्तरः (iii) विधाता को

(ख) लेखिका की भेंट के समय डॉ. चंद्रा किस संस्थान से जुड़ी थीं?

उत्तरः (ii) आई.आई.टी., मद्रास

(ग) कार से उतरती डॉ. चंद्रा को देखकर लेखिका आश्चर्यचकित क्यों रह गईं?

उत्तरः (iii) शारीरिक रूप से अक्षम होने के बावजूद वे बिना किसी सहायता के स्वयं कार चलाकर आई थीं और बैसाखियों से व्हीलचेयर तक पहुँची थीं।

(घ) डॉ. चंद्रा ने नई कार का विशेष डिजाइन क्यों बनवाया?

उत्तरः (ii) ताकि वे किसी की भी सहायता के बिना स्वयं कार चला सकें और पूर्णतः आत्मनिर्भर रह सकें।

(ङ) एलबम के अंतिम पृष्ठ पर कौन-सा चित्र था?

उत्तरः (ii) डॉ. चंद्रा की माता श्रीमती शारदा सुब्रह्मण्यम को जे.सी., बंगलौर द्वारा “वीर जननी” पुरस्कार प्रदान करने का चित्र।


2. पूर्ण वाक्य में उत्तर दो

(क) जीवन की रिक्तता कब तुच्छ लगने लगती है?

उत्तरः जब अचानक विधाता की कृपा से किसी ऐसे विलक्षण व्यक्तित्व से भेंट हो जाए, जिसे देखकर स्वयं के जीवन की रिक्तता तुच्छ और छोटी लगने लगे।

(ख) डॉ. चंद्रा के अध्ययन का विषय क्या था?

उत्तरः डॉ. चंद्रा के अध्ययन का विषय माइक्रोबायोलॉजी (सूक्ष्म जीव-विज्ञान) था।

(ग) लेखिका से किस बात का अनुरोध किया गया?

उत्तरः लेखिका से अनुरोध किया गया कि वे हवाई के ईस्ट-वेस्ट सेंटर में फैलोशिप की संभावना के बारे में पूछताछ करें।

(घ) डॉ. चंद्रा की शिक्षा किस स्तर तक हुई?

उत्तरः डॉ. चंद्रा ने एम.एस.सी. तक की शिक्षा प्राप्त की और उसके बाद डॉक्टरेट (पी.एच.डी.) की उपाधि हासिल की।

(ङ) डॉ. चंद्रा ने डॉक्टरेट की उपाधि कहाँ से प्राप्त की?

उत्तरः डॉ. चंद्रा ने बंगलौर के प्रख्यात “इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस” से डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की।


3. संक्षेप में उत्तर दो (लगभग 25 शब्दों में)

(क) पहली बार कार से उतरती डॉ. चंद्रा को देखकर लेखिका के मन में कैसा भाव उत्पन्न हुआ?

उत्तरः लेखिका आश्चर्यचकित और अभिभूत हो गईं। एक शारीरिक रूप से अक्षम महिला बिना किसी सहारे के स्वयं कार चलाकर आई और बैसाखियों से व्हीलचेयर तक पहुँची। यह दृश्य लेखिका को गहरे तक छू गया और उन्हें लगा कि डॉ. चंद्रा किसी देवांगना से कम नहीं हैं।

(ख) लेखिका लखनऊ के युवक को डॉ. चंद्रा की जीवन-गाथा क्यों पढ़ाना चाहती हैं?

उत्तरः लखनऊ के युवक ने एक हाथ खोने के बाद जीवन से हार मान ली और मादक पदार्थों की शरण ली। जबकि डॉ. चंद्रा बचपन से ही पूरे शरीर के निचले भाग से अक्षम हैं, फिर भी वे सफलता के शिखर पर हैं। लेखिका चाहती हैं कि यह तुलना उस युवक को प्रेरणा दे।

(ग) “अभिशप्त काया” से पाठ में क्या आशय है?

उत्तरः “अभिशप्त काया” से आशय है — वह शरीर जो किसी अभिशाप या दुर्भाग्य के कारण रोगग्रस्त या अक्षम हो। डॉ. चंद्रा का शरीर पोलियो के कारण अक्षम हो गया था, किंतु इस “अभिशप्त काया” के बावजूद उनकी मेधा, साहस और जिजीविषा ने उन्हें असाधारण बना दिया।

(घ) डॉ. चंद्रा की कविताएँ पढ़कर लेखिका की आँखें क्यों भर आईं?

उत्तरः डॉ. चंद्रा बाहर से सदा प्रसन्न और उत्साहित दिखती थीं, किंतु उनकी कविताओं में एक गहरी पीड़ा, एकांत और विषाद की छाया थी। यह भीतरी दर्द पढ़कर लेखिका का हृदय द्रवित हो गया और उनकी आँखें भर आईं।

(ङ) डॉ. चंद्रा ने शिक्षा के क्षेत्र में कौन-कौन-सी उपलब्धियाँ हासिल कीं?

उत्तरः डॉ. चंद्रा ने प्रत्येक परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया, एम.एस.सी. में प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण हुईं, “इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस” में विशेष सीट प्राप्त की, प्रोफेसर सेठना के निर्देशन में पाँच वर्ष शोध किया और माइक्रोबायोलॉजी में पी.एच.डी. की उपाधि प्राप्त की।

(च) विज्ञान के अतिरिक्त डॉ. चंद्रा की अन्य प्रतिभाएँ क्या थीं?

उत्तरः विज्ञान के अतिरिक्त डॉ. चंद्रा ने कविता-लेखन, भारतीय और पाश्चात्य शास्त्रीय संगीत, कढ़ाई-बुनाई और मैक्स म्यूलर भवन से जर्मन भाषा की परीक्षा में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। गर्ल गाइड में वे राष्ट्रपति का स्वर्ण कार्ड पाने वाली पहली अक्षम लड़की बनीं।

(छ) डॉ. चंद्रा की माँ को “वीर जननी” पुरस्कार क्यों दिया गया?

उत्तरः डॉ. चंद्रा की माँ श्रीमती शारदा सुब्रह्मण्यम ने अपनी अक्षम पुत्री को घर पर शिक्षित किया, स्कूल-कॉलेज में पहुँचाया, उनका हौसला बनाए रखा और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने में जीवन लगा दिया। इस असाधारण मातृत्व और समर्पण के सम्मान में उन्हें “वीर जननी” पुरस्कार से नवाजा गया।

(ज) “चिकित्सा ने जो खोया, विज्ञान ने पाया” — यह किसने और किस संदर्भ में कहा?

उत्तरः यह प्रोफेसर सेठना ने कहा था। जब डॉ. चंद्रा को शारीरिक अक्षमता के कारण मेडिकल कॉलेज में प्रवेश नहीं मिला और वे विज्ञान की ओर मुड़ीं, तब प्रोफेसर सेठना ने उनकी प्रतिभा देखकर कहा कि चिकित्सा जगत को जो मिल सकती थी उसे विज्ञान ने पा लिया।


4. दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (लगभग 50 शब्दों में)

(क) डॉ. चंद्रा के जीवन-संघर्ष का संक्षिप्त वर्णन करो।

उत्तरः डॉ. चंद्रा डेढ़ वर्ष की उम्र में पोलियो के शिकार हो गई थीं जिससे उनके शरीर का निचला भाग पूरी तरह निर्जीव हो गया। माँ ने घर पर पढ़ाया और बंगलौर के माउंट कारमेल स्कूल में प्रवेश दिलाया। व्हीलचेयर पर बैठकर माँ के साथ रोज़ स्कूल जाती रहीं। एम.एस.सी. में प्रथम स्थान प्राप्त किया। मेडिकल कॉलेज ने प्रवेश देने से इनकार किया तो “इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस” में शोध किया और पी.एच.डी. की उपाधि हासिल की। उन्होंने कभी परिस्थितियों के सामने घुटने नहीं टेके — अपनी अभिशप्त काया को अपनी असीम इच्छाशक्ति से परास्त किया। वे आई.आई.टी., मद्रास जैसी प्रतिष्ठित संस्था से जुड़ीं और अपना जीवन विज्ञान को समर्पित कर दिया।

(ख) पाठ में लेखिका ने किन दो विपरीत पात्रों का चित्रण किया है? उनकी तुलना करो।

उत्तरः पाठ में लेखिका ने दो बिल्कुल विपरीत पात्रों का चित्रण किया है — डॉ. चंद्रा और लखनऊ का एक युवक। डॉ. चंद्रा बचपन से ही शारीरिक रूप से अक्षम हैं — उनका पूरा निचला शरीर निर्जीव है। फिर भी उन्होंने अपनी जिजीविषा और दृढ़ संकल्प के बल पर शिक्षा, विज्ञान, संगीत, कला — हर क्षेत्र में उत्कृष्टता प्राप्त की। दूसरी ओर, लखनऊ का वह युवक एक सुशिक्षित और प्रतिभाशाली व्यक्ति था जो ट्रेन दुर्घटना में एक हाथ खो देने के बाद मानसिक रूप से टूट गया और मादक पदार्थों का सहारा लेने लगा। वह एक अस्थायी शारीरिक क्षति से नहीं उबर पाया। इस तुलना से लेखिका यह सिद्ध करती हैं कि संकट में व्यक्ति का दृष्टिकोण और इच्छाशक्ति ही उसकी असली ताकत होती है, न कि उसका शरीर।

(ग) डॉ. चंद्रा की सफलता में उनकी माँ का क्या योगदान था?

उत्तरः डॉ. चंद्रा की सफलता में उनकी माँ श्रीमती शारदा सुब्रह्मण्यम का अत्यंत महत्वपूर्ण और निर्णायक योगदान था। जब पाँच वर्ष की चंद्रा स्कूल जाने योग्य हुईं तो किसी ने उन्हें सहर्ष प्रवेश देने से इनकार किया। माँ ने हार नहीं मानी — पहले घर पर स्वयं पढ़ाया, फिर बंगलौर के माउंट कारमेल स्कूल में प्रवेश दिलाया। प्रतिदिन व्हीलचेयर लेकर उनके साथ स्कूल जाती रहीं। जब चंद्रा के मन में निराशा आती, तो माँ कहती — “ईश्वर सब द्वार एक साथ बंद नहीं करता।” इस अटूट प्रेम और समर्पण के कारण ही चंद्रा आगे बढ़ सकीं। माँ का यह त्याग और साहस इतना असाधारण था कि उन्हें “वीर जननी” पुरस्कार से सम्मानित किया गया।


5. सप्रसंग व्याख्या करो

(क) “नियति के प्रत्येक कठोर आघात को अति अमानवीय धैर्य से झेलती वह बित्ते भर की लड़की मुझे किसी देवांगना से कम नहीं लगी।”

उत्तरः प्रसंग: यह पंक्ति “अपराजिता” पाठ से ली गई है जिसकी लेखिका शिवानी हैं। यहाँ लेखिका डॉ. चंद्रा के साथ अपनी प्रथम भेंट का वर्णन करती हैं।

व्याख्या: लेखिका कहती हैं कि भाग्य और नियति ने डॉ. चंद्रा पर एक-के-बाद-एक कठोर प्रहार किए — बचपन में पोलियो, फिर विद्यालय में प्रवेश की कठिनाई, फिर मेडिकल कॉलेज का अस्वीकार। परंतु उस छोटे कद की लड़की ने इन सभी आघातों को असाधारण धैर्य से स्वीकार किया और कभी टूटी नहीं। वह इतनी छोटी काया में इतनी विशाल आत्मशक्ति को देखकर लेखिका को लगा कि वह कोई साधारण स्त्री नहीं, बल्कि देवलोक की अंशना (देवांगना) है जो धरती पर उतरी है। भाव: इस पंक्ति में शारीरिक दुर्बलता के बावजूद आत्मिक बल की महत्ता को रेखांकित किया गया है। सच्चा साहस और धैर्य मनुष्य को देवतुल्य बना देते हैं।

(ख) “ईश्वर सब द्वार एक साथ बंद नहीं करता। यदि एक द्वार बंद करता भी है, तो दूसरा द्वार खोल भी देता है।”

उत्तरः प्रसंग: यह कथन “अपराजिता” पाठ में डॉ. चंद्रा की माता श्रीमती शारदा सुब्रह्मण्यम का है। जब चंद्रा को मेडिकल कॉलेज में प्रवेश नहीं मिला, तो निराश बेटी को माँ ने यह बात कही।

व्याख्या: माँ का आशय है कि ईश्वर किसी के भी जीवन में सभी रास्ते एक साथ बंद नहीं करता। चंद्रा का स्वास्थ्य का द्वार बंद हुआ, किंतु ज्ञान, विज्ञान, संगीत, कला के द्वार खुले रहे। मेडिकल कॉलेज का द्वार बंद हुआ तो विज्ञान संस्थान का द्वार खुला जहाँ प्रोफेसर सेठना ने कहा — “चिकित्सा ने जो खोया, विज्ञान ने पाया।” भाव: यह जीवन-दर्शन अत्यंत प्रेरणाप्रद है। हर बाधा के पीछे एक नई संभावना छिपी होती है। निराशा में न डूबकर नए अवसरों की तलाश करनी चाहिए।


भाषा एवं व्याकरण ज्ञान

1. निम्नलिखित शब्दों के उच्चारण पर ध्यान दो (अंग्रेजी की ‘ऑ’ ध्वनि)

हिंदी में अंग्रेजी के कुछ शब्द प्रचलित हो गए हैं जिनमें ‘ऑ’ की ध्वनि आती है। इन्हें सही उच्चारण के साथ पढ़ना चाहिए:

शब्दसही उच्चारण
डॉक्टरडॉक्टर (न कि “डाक्टर”)
कॉलेजकॉलेज (न कि “कालेज”)
कॉन्वेंटकॉन्वेंट
ऑफिसऑफिस (न कि “आफिस”)
बॉलबॉल (न कि “बाल”)

2. निम्नलिखित शब्दों के विलोम (विपरीतार्थक) शब्द लिखो

शब्दविलोम
विजयपराजय
आशानिराशा
साहसकायरता
सफलताअसफलता
जीवनमृत्यु
प्रेरणाहतोत्साह
स्वस्थअस्वस्थ / रुग्ण
दृढ़कमज़ोर / अस्थिर

3. निम्नलिखित शब्दों के अर्थ लिखकर वाक्यों में प्रयोग करो

जिजीविषा — अर्थ: जीने की तीव्र इच्छा।

वाक्य: डॉ. चंद्रा की जिजीविषा ने उन्हें शारीरिक अक्षमता के बावजूद जीवन में आगे बढ़ाया।

निष्ठा — अर्थ: दृढ़ समर्पण, लगन।

वाक्य: अध्ययन के प्रति निष्ठा ही छात्र को सफलता की ओर ले जाती है।

विधाता — अर्थ: ईश्वर, भाग्यनिर्माता।

वाक्य: हम अपनी विपत्ति के लिए अक्सर विधाता को दोषी मानते हैं।

उत्फुल्ल — अर्थ: प्रसन्न, खिला हुआ।

वाक्य: परीक्षा में अव्वल आने की खबर सुनकर उनका चेहरा उत्फुल्ल हो गया।

पक्षाघात — अर्थ: लकवा, शरीर के किसी अंग का निष्क्रिय हो जाना।

वाक्य: पक्षाघात के कारण उनके पैर निर्जीव हो गए थे, फिर भी उनका मनोबल ऊँचा रहा।

आभामंडित — अर्थ: प्रकाश या तेज से युक्त।

वाक्य: उनका आभामंडित व्यक्तित्व कमरे में प्रवेश करते ही सबका ध्यान खींच लेता था।

विषाद — अर्थ: गहरी उदासी, दुःख।

वाक्य: उनकी कविताओं में बाहरी उल्लास के पीछे एक गहरा विषाद छिपा था।


4. शब्दार्थ (Word Meanings)

शब्दअर्थ
अपराजिताजिसे पराजित न किया जा सके, अजेय
विलक्षणअद्भुत, असाधारण
अभिशप्तअभिशाप से पीड़ित, श्रापित
कायाशरीर, देह
जिजीविषाजीने की प्रबल इच्छा
पक्षाघातलकवा, शरीर का एक भाग निष्क्रिय होना
निष्ठादृढ़ समर्पण, लगन
उत्फुल्लप्रसन्नचित्त, खिला हुआ
विषादगहरी उदासी, खेद
नियतिभाग्य, प्रारब्ध
आभामंडितआभा या तेज से घिरा हुआ
देवांगनादेवलोक की स्त्री, अप्सरा
माइक्रोबायोलॉजीसूक्ष्म जीव-विज्ञान की शाखा
फैलोशिपउच्च शिक्षा या शोध हेतु वित्तीय सहायता
विधाताईश्वर, ब्रह्मा, भाग्यनिर्माता
रिक्तताखालीपन, शून्यता
जिजीविषुजीने की इच्छा रखने वाला
एलबमफोटोग्राफ संग्रह की पुस्तिका

अतिरिक्त महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (Additional Important Questions)

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1: “अपराजिता” पाठ की लेखिका कौन हैं?

उत्तरः “अपराजिता” पाठ की लेखिका शिवानी (गौरा पंत) हैं।

प्रश्न 2: शिवानी का वास्तविक नाम क्या था?

उत्तरः शिवानी का वास्तविक नाम गौरा पंत था।

प्रश्न 3: डॉ. चंद्रा को किस रोग के कारण शारीरिक अक्षमता हुई?

उत्तरः डॉ. चंद्रा को डेढ़ वर्ष की आयु में पोलियो रोग हो जाने के कारण शारीरिक अक्षमता हुई।

प्रश्न 4: डॉ. चंद्रा किस संस्थान में कार्यरत थीं?

उत्तरः डॉ. चंद्रा आई.आई.टी., मद्रास (Indian Institute of Technology, Madras) में कार्यरत थीं।

प्रश्न 5: शिवानी को कौन-सा राष्ट्रीय सम्मान मिला था?

उत्तरः शिवानी को सन् 1982 में भारत सरकार द्वारा पद्मश्री सम्मान से विभूषित किया गया था।

प्रश्न 6: “अपराजिता” शब्द का क्या अर्थ है?

उत्तरः “अपराजिता” का अर्थ है — जिसे पराजित न किया जा सके, जो कभी हार न माने, अजेय।

प्रश्न 7: डॉ. चंद्रा के शोध-निर्देशक कौन थे?

उत्तरः डॉ. चंद्रा के शोध-निर्देशक प्रोफेसर सेठना थे जो “इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस”, बंगलौर में कार्यरत थे।

प्रश्न 8: डॉ. चंद्रा की माँ का नाम क्या था?

उत्तरः डॉ. चंद्रा की माँ का नाम श्रीमती शारदा सुब्रह्मण्यम था।

प्रश्न 9: शिवानी जी ने किस विश्वविद्यालय से शिक्षा ग्रहण की?

उत्तरः शिवानी जी ने पश्चिम बंगाल के शांतिनिकेतन से बी.ए. की शिक्षा ग्रहण की।

प्रश्न 10: डॉ. चंद्रा ने गर्ल गाइड में क्या उपलब्धि हासिल की?

उत्तरः डॉ. चंद्रा गर्ल गाइड में राष्ट्रपति का स्वर्ण कार्ड पाने वाली देश की पहली शारीरिक रूप से अक्षम लड़की बनीं।


लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1: “अपराजिता” पाठ का मुख्य संदेश क्या है?

उत्तरः “अपराजिता” पाठ का मुख्य संदेश यह है कि शारीरिक अक्षमता कभी मानसिक और बौद्धिक विकास में बाधा नहीं बन सकती। यदि व्यक्ति के पास दृढ़ इच्छाशक्ति, अटूट जिजीविषा और सकारात्मक दृष्टिकोण हो, तो वह जीवन की हर बाधा पार कर सकता है। डॉ. चंद्रा का जीवन यही सिद्ध करता है कि सच्ची विजय आत्मा की होती है, शरीर की नहीं। परिस्थितियों के सामने हार मान लेना कायरता है, जबकि हर चुनौती का सामना करना ही असली वीरता है।

प्रश्न 2: शिवानी की लेखन-शैली की क्या विशेषताएँ हैं?

उत्तरः शिवानी की लेखन-शैली अत्यंत रोचक, भावपूर्ण और जीवंत है। वे अपने पात्रों का सजीव चित्रण करती हैं। उनकी भाषा में हिंदी के साथ-साथ अंग्रेजी, संस्कृत और क्षेत्रीय शब्दों का सुंदर समन्वय होता है। वे संस्मरण, जीवनी और कहानी की शैलियों को एक साथ साधती हैं। उनके नारी पात्र विशेष रूप से शक्तिशाली और यादगार होते हैं। “अपराजिता” में भी उन्होंने व्यक्तिगत मुलाकात के आधार पर एक प्रेरणाप्रद जीवनी को इस कुशलता से रचा है कि पाठक अभिभूत हो जाता है।

प्रश्न 3: “विधाता ऐसे विलक्षण व्यक्तित्व से भेंट कराता है” — इस वाक्य का आशय स्पष्ट करो।

उत्तरः लेखिका का आशय है कि हम अपने जीवन की तुलनात्मक रिक्तता और शिकायतों में डूबे रहते हैं। किंतु कभी-कभी ईश्वर की कृपा से हमारी मुलाकात किसी ऐसे असाधारण व्यक्ति से हो जाती है — जैसे डॉ. चंद्रा — जिनका जीवन हमारी सभी शिकायतों को तुच्छ सिद्ध कर देता है। ऐसी भेंट से हमें यह बोध होता है कि हमारे पास जो कुछ भी है, वह अनमोल है और हमें उसका सदुपयोग करना चाहिए।


दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1: “अपराजिता” पाठ की कथावस्तु का विस्तारपूर्वक वर्णन करो।

उत्तरः “अपराजिता” शिवानी द्वारा लिखित एक प्रेरणादायक जीवनी-परक निबंध है। पाठ का आरंभ लेखिका की इस भावना से होता है कि जीवन में कभी-कभी विधाता किसी विलक्षण व्यक्तित्व से भेंट कराता है जो हमारी सोच बदल देता है। लेखिका की ऐसी ही एक अविस्मरणीय भेंट डॉ. चंद्रा से होती है — एक महिला वैज्ञानिक जो आई.आई.टी., मद्रास में कार्यरत हैं और जो बचपन से शारीरिक रूप से अक्षम हैं।

डॉ. चंद्रा को डेढ़ वर्ष की अवस्था में पोलियो हो गया था जिससे उनके शरीर का निचला भाग पूरी तरह निर्जीव हो गया। उनकी माँ श्रीमती शारदा सुब्रह्मण्यम ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने पाँच वर्ष की उम्र से ही घर पर पढ़ाना शुरू किया। फिर बंगलौर के माउंट कारमेल स्कूल में प्रवेश दिलाया। माँ प्रतिदिन उन्हें व्हीलचेयर पर लेकर स्कूल जाती थीं। डॉ. चंद्रा ने हर परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया। एम.एस.सी. में भी वे अव्वल रहीं। मेडिकल कॉलेज ने प्रवेश देने से इनकार किया, परंतु “इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस” में उन्हें विशेष सीट मिली जहाँ प्रोफेसर सेठना के निर्देशन में पाँच वर्ष शोध करके उन्होंने माइक्रोबायोलॉजी में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की।

डॉ. चंद्रा की उपलब्धियाँ बहुआयामी हैं — कविता, संगीत, जर्मन भाषा, कढ़ाई, गर्ल गाइड में राष्ट्रपति स्वर्ण कार्ड। उन्होंने एक विशेष कार का डिजाइन तैयार करवाया ताकि बिना सहायता के गाड़ी चला सकें। पाठ में लेखिका ने एक दूसरे चरित्र का भी उल्लेख किया है — लखनऊ का एक युवक जो एक हाथ खोने के बाद जीवन से हार गया। इस विरोधाभास से पाठ का मुख्य संदेश उभरता है — असली विजय इच्छाशक्ति की होती है। डॉ. चंद्रा की माँ को “वीर जननी” पुरस्कार मिलना इस पूरी कथा पर एक भावपूर्ण समापन है।

प्रश्न 2: इस पाठ के आधार पर डॉ. चंद्रा के चरित्र की विशेषताओं का वर्णन करो।

उत्तरः डॉ. चंद्रा का चरित्र अनेक विशेषताओं से संपन्न है। प्रथम, अदम्य साहस और जिजीविषा: बचपन से शारीरिक अक्षमता के बावजूद उन्होंने कभी हार नहीं मानी। द्वितीय, अथक परिश्रम और लगन: प्रत्येक परीक्षा में प्रथम स्थान और डॉक्टरेट की उपलब्धि उनके अदम्य परिश्रम का प्रमाण है। तृतीय, आत्मनिर्भरता: वे व्हीलचेयर पर स्वयं प्रयोगशाला में काम करती थीं और विशेष कार से बिना सहायता के आती-जाती थीं। चतुर्थ, बहुमुखी प्रतिभा: विज्ञान के साथ-साथ कविता, संगीत, जर्मन भाषा, कढ़ाई — सभी में दक्षता। पंचम, भावनात्मक गहराई: बाहर से सदा प्रसन्न रहने वाली चंद्रा की कविताओं में एक गहरा विषाद था — जो उनकी भीतरी संवेदनशीलता का प्रतीक है। षष्ठ, सकारात्मक दृष्टिकोण: वे कभी विधाता को दोष नहीं देती थीं। उनकी माँ के शब्दों में उनका जीवन-दर्शन था — “ईश्वर सब द्वार एक साथ बंद नहीं करता।”

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