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पहली बूँद – Class 8 Hindi Elective Question Answer | ASSEB | पल्लव भाग-3

पहली बूँद कविता ASSEB (Assam State Board of Secondary Education) Class 8 Hindi Elective की पाठ्यपुस्तक पल्लव भाग-3 का सातवाँ पाठ है। यह एक प्रकृति-कविता है जिसे सुप्रसिद्ध कवि गोपाल कृष्ण कौल ने लिखा है। इस कविता में कवि ने वर्षा ऋतु के पहले दिन धरती पर पड़ने वाली पहली बूँद का अत्यंत सजीव और भावपूर्ण चित्रण किया है। पहली बूँद को कवि ने अमृत के समान बताया है, जो गर्मी से सूखी और व्याकुल धरती को नया जीवन प्रदान करती है। मानवीकरण अलंकार के प्रयोग से प्रकृति के विभिन्न अंगों — धरती, बादल, आकाश, घास — को जीवंत रूप में प्रस्तुत किया गया है।


पाठ-परिचय एवं सारांश (Summary)

कविता-पाठ (Poem Text)

वह पावस का प्रथम दिवस जब,
पहली बूँद धरा पर आई।
अंकुर फूट पड़ा धरती से,
नव-जीवन की ले अँगड़ाई।

धरती के सूखे अधरों पर,
गिरी बूँद अमृत-सी आकर।
वसुंधरा की रोमावलि-सी,
हरी दूब पुलकी-मुसकाई।
पहली बूँद धरा पर आई।

आसमान में उड़ता सागर,
लगा बिजलियों के स्वर्णिम पर।
बजा नगाड़े जगा रहे हैं,
बादल धरती की तरुणाई।
पहली बूँद धरा पर आई।

नीले नयनों-सा यह अंबर,
काली पुतली-से ये जलधर।
करुणा-विगलित अश्रु बहाकर,
धरती की चिर-प्यास बुझाई।
बूढ़ी धरती शस्य-श्यामला बनने को फिर से ललचाई।
पहली बूँद धरा पर आई।

कविता का सारांश

इस कविता में कवि गोपाल कृष्ण कौल ने वर्षा ऋतु के प्रथम दिन पड़ने वाली पहली बूँद का मनोरम चित्रण किया है। कविता चार पदों (stanzas) में विभाजित है।

प्रथम पद: कवि बताते हैं कि जब वर्षा ऋतु (पावस) का पहला दिन आया और पहली बूँद धरती पर पड़ी, तो धरती से अंकुर फूट पड़े। ऐसा लगा जैसे नई जिंदगी ने अँगड़ाई ली हो। धरती में छिपे बीज जाग उठे और उनसे हरे-भरे कोमल अंकुर निकल आए।

द्वितीय पद: गर्मी की तपन से सूखे धरती के होंठों (अधरों) पर वर्षा की बूँद अमृत की तरह गिरी। जिस प्रकार मनुष्य के शरीर पर रोमावलि (रोएँ) होती है, उसी प्रकार धरती की रोमावलि के समान हरी दूब (घास) खुशी से पुलकित होकर मुसकाने लगी।

तृतीय पद: आकाश में बादल इस प्रकार उड़ रहे हैं जैसे पानी से भरा सागर आसमान में उड़ रहा हो। बादलों में बिजलियाँ सोने के पंखों की तरह चमक रही हैं। बादल नगाड़े बजाकर (गरज-गरजकर) धरती की जवानी को जगा रहे हैं।

चतुर्थ पद: आकाश नीली आँखों की तरह दिखाई दे रहा है और काले बादल उस आँख की काली पुतली के समान लग रहे हैं। करुणा से भरे बादल अपने आँसू (वर्षा) बहाकर धरती की चिर-प्यास बुझाते हैं। बूढ़ी और सूखी धरती फिर से हरी-भरी (शस्य-श्यामला) बनने के लिए लालायित हो उठती है।

कविता का केंद्रीय भाव: यह कविता प्रकृति के नवीकरण और जीवन-शक्ति का गुणगान करती है। वर्षा की पहली बूँद जीवन की प्रतीक है जो मृतप्राय धरती में नई ऊर्जा का संचार करती है। कवि यह संदेश देते हैं कि जिस प्रकार एक छोटी-सी बूँद सूखी धरती को हरा-भरा बना देती है, उसी प्रकार जीवन में छोटी-सी आशा भी बड़े परिवर्तन ला सकती है।


कवि-परिचय (About the Poet)

इस कविता के रचयिता गोपाल कृष्ण कौल हैं। उनका जन्म 9 मई, 1866 को हुआ था और निधन 19 फरवरी, 1915 को हुआ। वे हिंदी के प्रकृति-प्रेमी कवि थे जिन्होंने वर्षा, ऋतु-परिवर्तन और प्रकृति की सुंदरता को अपनी कविताओं का विषय बनाया। उनकी कविताओं में मानवीकरण (Personification) का सुंदर प्रयोग मिलता है, जिससे निर्जीव प्रकृति भी सजीव और भावनाशील प्रतीत होती है।


शब्दार्थ (Word Meanings)

शब्दअर्थ
पावसवर्षा ऋतु, बरसात का मौसम
प्रथम दिवसपहला दिन
धराधरती, पृथ्वी
अंकुरबीज से निकलने वाला कोमल पौधा, कोंपल
अँगड़ाईसोकर उठते समय शरीर को तानना, नींद से जागना
अधरहोंठ, ओंठ
अमृतदेवताओं का पेय, अमर बनाने वाला रस; यहाँ — अत्यंत मीठा और जीवनदायी
वसुंधराधरती, पृथ्वी
रोमावलिशरीर के रोएँ, रोमों की पंक्ति
दूबएक प्रकार की हरी घास (Bermuda grass)
पुलकीआनंद से रोमांचित होना, पुलकित होना
मुसकाईमुस्कुराई, हँसी
स्वर्णिमसोने के समान, सुनहरा
नगाड़ेएक प्रकार का बड़ा ढोल, वाद्य-यंत्र
तरुणाईजवानी, युवावस्था
अंबरआकाश, आसमान
जलधरबादल, मेघ (जल को धारण करने वाला)
करुणा-विगलितकरुणा से पिघला हुआ, दया से द्रवित
अश्रुआँसू, आँखों का पानी
चिर-प्यासबहुत पुरानी प्यास, सदा की तृष्णा
शस्य-श्यामलाहरी-भरी फसलों से ढकी, उपजाऊ और हरी-भरी धरती
ललचाईलालसा करना, इच्छा होना

पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर (Textbook Questions and Answers)

बोध-प्रश्न (Comprehension Questions)

प्रश्न 1. कविता में किस ऋतु का वर्णन हुआ है?

उत्तर: इस कविता में वर्षा ऋतु (पावस ऋतु) का वर्णन हुआ है। कवि ने वर्षा के पहले दिन की पहली बूँद के धरती पर पड़ने का सजीव चित्रण किया है।

प्रश्न 2. पहली बूँद को किसके समान बताया गया है?

उत्तर: पहली बूँद को अमृत के समान बताया गया है। जिस प्रकार अमृत पीने से जीवन मिलता है, उसी प्रकार वर्षा की पहली बूँद गर्मी से सूखी और मृतप्राय धरती को नया जीवन प्रदान करती है।

प्रश्न 3. वर्षा की पहली बूँद से धरती की प्रसन्नता किस प्रकार प्रकट होती है?

उत्तर: वर्षा की पहली बूँद गिरते ही धरती चारों ओर हरियाली फैलाकर अपनी प्रसन्नता प्रकट करती है। धरती से अंकुर फूट पड़ते हैं जो नव-जीवन की अँगड़ाई लेते हैं। वसुंधरा की रोमावलि-सी हरी दूब पुलकित होकर मुसकाने लगती है। सूखी धरती फिर से शस्य-श्यामला (हरी-भरी और उपजाऊ) बनने के लिए ललायित हो उठती है।

प्रश्न 4. वर्षा ऋतु में बादल कैसे दिखाई देते हैं?

उत्तर: वर्षा ऋतु में बादल आसमान में उड़ते सागर के समान दिखाई देते हैं — अर्थात् पानी से भरे घने काले बादल आकाश में इस प्रकार फैले होते हैं जैसे सागर ऊपर उड़ रहा हो। उनके बीच बिजलियाँ सोने के पंखों-सी चमकती हैं। वे नगाड़े बजाते हुए (गरज-गरजकर) धरती की तरुणाई को जगाते हैं।

प्रश्न 5. कवि ने आकाश और बादलों की तुलना किससे की है?

उत्तर: कवि ने आकाश (अंबर) की तुलना नीली आँखों से और बादलों (जलधर) की तुलना काली पुतलियों से की है। जिस प्रकार करुणा से भरी आँखें आँसू बहाती हैं, उसी प्रकार करुणा-विगलित बादल वर्षा (अश्रु) बहाकर धरती की चिर-प्यास बुझाते हैं।

प्रश्न 6. ‘वसुंधरा की रोमावलि-सी, हरी दूब पुलकी-मुसकाई’ — इस पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: इस पंक्ति में कवि ने धरती की हरी दूब (घास) की तुलना मनुष्य के शरीर पर उगने वाली रोमावलि (रोएँ) से की है। जब वर्षा की पहली बूँद गिरती है, तब धरती की सतह पर जगह-जगह छोटी-छोटी हरी घास उग आती है, जैसे धरती के शरीर पर रोएँ खड़े हो गए हों। यह घास आनंद और पुलक से मुसकाती (खिलती) है। इस पंक्ति में मानवीकरण अलंकार का सुंदर प्रयोग है।

प्रश्न 7. कवि ने वर्षा की पहली बूँद को अमृत के समान क्यों कहा है?

उत्तर: कवि ने वर्षा की पहली बूँद को अमृत के समान इसलिए कहा है क्योंकि:

  • जिस प्रकार अमृत पीने से जीव अमर हो जाता है और नया जीवन पाता है, उसी प्रकार वर्षा की बूँद गर्मी से सूखी, तपी और मृतप्राय धरती को नया जीवन देती है।
  • बूँद के गिरते ही धरती में छिपे बीज अंकुरित होते हैं, घास हरी हो जाती है, और चारों ओर हरियाली फैल जाती है।
  • धरती की चिरकालीन प्यास बुझती है और वह फिर से उपजाऊ बन जाती है।

प्रश्न 8. वर्षा ऋतु के आगमन से धरती पर कौन-कौन से परिवर्तन आते हैं?

उत्तर: वर्षा ऋतु के आगमन से धरती पर निम्नलिखित परिवर्तन आते हैं:

  • धरती से अंकुर फूट पड़ते हैं और नया जीवन जागता है।
  • सूखी धरती पर हरी घास उग आती है और पूरी धरती हरी-भरी हो जाती है।
  • पेड़-पौधों में नई शाखाएँ और पत्ते निकलते हैं।
  • सूखी नदियाँ और तालाब फिर से जल से भर जाते हैं।
  • किसान अपने खेतों में बुआई-रोपाई करते हैं।
  • धरती की चिर-प्यास बुझती है और वह शस्य-श्यामला बन जाती है।

भाषा-अभ्यास (Language Exercises)

प्रश्न 9. निम्नलिखित शब्दों के समानार्थी (पर्यायवाची) शब्द लिखिए:

शब्दपर्यायवाची शब्द
धरतीधरा, वसुंधरा, भूमि, पृथ्वी, मही
बादलजलधर, मेघ, घन, अंबुद, नीरद
आकाशअंबर, आसमान, नभ, गगन, व्योम
नयनआँख, लोचन, नेत्र, चक्षु, दृग
दिवसदिन, दिवा, वासर
अमृतसुधा, पीयूष, अमिय, सोम

प्रश्न 10. निम्नलिखित शब्दों के विलोम (विपरीतार्थक) शब्द लिखिए:

शब्दविलोम शब्द
दिवसरात्रि
जीवनमृत्यु
नवपुराना / जीर्ण
सूखागीला / हरा-भरा
तरुणवृद्ध / बूढ़ा
प्रथमअंतिम

प्रश्न 11. कविता में आए मानवीकरण (Personification) के उदाहरण खोजिए और तालिका बनाइए:

प्रकृति का तत्वमानवीय गुण / क्रिया
धरती (अंकुर के रूप में)अँगड़ाई लेना (जागना)
हरी दूब (घास)पुलकी-मुसकाई (प्रसन्न होकर मुस्कुराना)
बादलनगाड़े बजाकर जगाना
आकाश (अंबर)नीले नयन (आँखें)
बादल (जलधर)काली पुतली, करुणा-विगलित अश्रु बहाना
बूढ़ी धरतीललचाना (इच्छा करना)

प्रश्न 12. ‘आसमान में उड़ता सागर’ — यहाँ किसे ‘उड़ता सागर’ कहा गया है और क्यों?

उत्तर: यहाँ जल-भरे बादलों को ‘उड़ता सागर’ कहा गया है। वर्षा ऋतु में आकाश में घने काले बादल छा जाते हैं जो इतने भारी और विशाल होते हैं कि आकाश में एक उड़ते सागर का आभास देते हैं। जिस प्रकार सागर में अपार जल होता है, उसी प्रकार ये बादल भी अपार जल-राशि को अपने भीतर समेटे हुए उड़ते हैं। यहाँ उपमा अलंकार का प्रयोग है।


अतिरिक्त प्रश्नोत्तर (Additional Questions and Answers)

प्रश्न 1. ‘पहली बूँद’ कविता के कवि कौन हैं? उनका संक्षिप्त परिचय दीजिए।

उत्तर: ‘पहली बूँद’ कविता के कवि गोपाल कृष्ण कौल हैं। उनका जन्म 9 मई, 1866 को और निधन 19 फरवरी, 1915 को हुआ। वे हिंदी के प्रकृति-प्रेमी कवि थे जिन्होंने प्रकृति के विविध रूपों को अपनी कविताओं में सजीवता से चित्रित किया। उनकी कविताओं में मानवीकरण अलंकार का विशेष प्रयोग मिलता है, जिससे प्रकृति के निर्जीव तत्व भी जीवंत और भावनाशील प्रतीत होते हैं।

प्रश्न 2. ‘धरती की रोमावलि’ किसे कहा गया है?

उत्तर: ‘धरती की रोमावलि’ हरी दूब (घास) के अंकुरों को कहा गया है। जिस प्रकार मनुष्य के शरीर पर रोम (बाल) होते हैं, उसी प्रकार वर्षा की पहली बूँद पड़ते ही धरती की सतह पर छोटी-छोटी हरी घास उग आती है, जो धरती की रोमावलि के समान प्रतीत होती है।

प्रश्न 3. ‘बूढ़ी धरती’ कहने से कवि का क्या आशय है?

उत्तर: कवि ने ग्रीष्म ऋतु की तीव्र गर्मी से सूखी, तपी और बेजान पड़ी धरती को ‘बूढ़ी धरती’ कहा है। जिस प्रकार बुढ़ापे में मनुष्य की शक्ति क्षीण हो जाती है और वह निढाल हो जाता है, उसी प्रकार ग्रीष्म ऋतु में धरती भी गर्मी से सूखकर निर्जीव हो जाती है। वर्षा की बूँद से यही ‘बूढ़ी धरती’ फिर से जवान और हरी-भरी हो जाती है।

प्रश्न 4. ‘शस्य-श्यामला’ का अर्थ क्या है? कविता में इसका प्रयोग किस प्रसंग में हुआ है?

उत्तर: ‘शस्य-श्यामला’ का अर्थ है — हरी-भरी फसलों से ढकी, उपजाऊ और हरी धरती। ‘शस्य’ का अर्थ है अनाज/फसल और ‘श्यामला’ का अर्थ है हरी-काली, सुंदर। कविता में इसका प्रयोग इस प्रसंग में हुआ है कि बूढ़ी और सूखी धरती वर्षा की पहली बूँद से फिर से शस्य-श्यामला — अर्थात् फसलों से भरी और हरी-भरी — बनने के लिए ललायित हो उठती है।

प्रश्न 5. इस कविता में छह ऋतुओं का उल्लेख है या नहीं? वर्षा ऋतु का क्या महत्व है?

उत्तर: इस कविता में केवल वर्षा ऋतु का वर्णन है। भारत में छह ऋतुएँ होती हैं — ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत, शीत और बसंत। वर्षा ऋतु का विशेष महत्व है क्योंकि यही ऋतु ग्रीष्म की तपन से तड़पती धरती को राहत देती है। इसी ऋतु में बीज अंकुरित होते हैं, खेतों में फसल होती है, नदी-तालाब भरते हैं और प्रकृति हरी-भरी होती है। इसलिए इसे जीवनदायिनी ऋतु भी कहते हैं।

प्रश्न 6. कविता में बिजली का वर्णन किस प्रकार किया गया है?

उत्तर: कविता में बिजली का वर्णन ‘स्वर्णिम पर’ (सुनहरे पंख) के रूप में किया गया है। कवि कहते हैं कि आकाश में उड़ते जलधर (बादल) जल-भरे सागर के समान हैं जिन पर बिजलियाँ सोने के पंखों की तरह लगी हैं। यह बिजली की चमक को सुनहरे पंखों से उपमा देना अत्यंत काव्यात्मक और सुंदर है।

प्रश्न 7. ‘करुणा-विगलित अश्रु बहाकर, धरती की चिर-प्यास बुझाई’ — इस पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: इस पंक्ति में कवि ने बादलों को एक करुणामय प्राणी के रूप में चित्रित किया है। जिस प्रकार कोई दयालु व्यक्ति किसी दुखी के कष्ट को देखकर करुणा से रो उठता है, उसी प्रकार बादल (जलधर) धरती की चिरकालीन प्यास और तड़प देखकर करुणा से पिघल जाते हैं और वर्षा रूपी आँसू बहाकर धरती की प्यास बुझाते हैं। यह मानवीकरण अलंकार का अत्यंत भावपूर्ण और सुंदर उदाहरण है।

प्रश्न 8. ‘पहली बूँद’ कविता का मुख्य संदेश क्या है?

उत्तर: ‘पहली बूँद’ कविता का मुख्य संदेश यह है कि जीवन में एक छोटा-सा परिवर्तन या आशा की एक किरण भी बड़े से बड़े संकट को दूर कर सकती है। जिस प्रकार वर्षा की एक छोटी-सी बूँद सूखी और मृतप्राय धरती में नई जीवन-शक्ति का संचार करती है, उसी प्रकार मनुष्य के जीवन में भी एक नई शुरुआत, एक नई उम्मीद, सब कुछ बदल सकती है। इसके अतिरिक्त कविता प्रकृति की महत्ता और सुंदरता का गुणगान करते हुए प्रकृति से प्रेम करने का संदेश भी देती है।

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