“मेरा नया बचपन” सुप्रसिद्ध हिंदी कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान द्वारा रचित एक भावपूर्ण कविता है, जो ASSEB (Assam State Board of Secondary Education) कक्षा 8 की हिंदी पाठ्यपुस्तक पल्लव भाग-3 के अध्याय 13 में संकलित है। इस कविता में कवयित्री ने बचपन की मधुर स्मृतियों को याद करते हुए अपनी पुत्री के रूप में उसे फिर से प्राप्त करने की सुंदर अनुभूति व्यक्त की है। यह कविता मातृत्व, निश्छलता और बचपन की पवित्रता का अद्भुत चित्रण करती है।
कविता (Poem Text)
बार-बार आती है मुझको मधुर याद बचपन तेरी।
गया, ले गया तू जीवन की सबसे मस्त खुशी मेरी॥
चिंता-रहित खेलना-खाना, वह फिरना निर्भय स्वच्छंद।
कैसे भूला जा सकता है बचपन का अतुलित आनंद॥
रोना और मचल जाना भी, क्या आनंद दिखाते थे।
बड़े-बड़े मोती-से आँसू जयमाला पहनाते थे॥
मैं रोई, माँ काम छोड़कर, आई मुझको उठा लिया।
झाड़-पोंछकर चूम-चूमकर गीले गालों को सुखा दिया॥
आ-जा बचपन! एक बार फिर दे-दे अपनी निर्मल शांति।
व्याकुल व्यथा मिटाने वाली वह अपनी प्राकृत विश्रांति॥
वह भोली-सी मधुर सरलता, वह प्यारा जीवन निष्पाप।
क्या फिर आकर मिटा सकेगा तू मेरे मन का संताप?॥
मैं बचपन को बुला रही थी, बोल उठी बिटिया मेरी।
नंदन-वन-सी फूल उठी यह छोटी-सी कुटिया मेरी॥
‘माँ ओ!’ कहकर बुला रही थी, मिट्टी खाकर आई थी।
कुछ मुँह में, कुछ लिए हाथ में, मुझे खिलाने लाई थी॥
मैंने पूछा—यह क्या लाई? बोल उठी वह—’माँ काओ’।
हुआ प्रफुल्लित हृदय खुशी से, मैंने कहा—’तुम ही खाओ’॥
पाया मैंने बचपन फिर से, बचपन बेटी बन आया।
उसकी मंजुल मूर्ति देखकर मुझमें नवजीवन आया॥
मैं भी उसके साथ खेलती, खाती हूँ, तुतलाती हूँ।
मिलकर उसके साथ स्वयं भी मैं बच्ची बन जाती हूँ॥
जिसे खोजती थी बरसों से, अब जाकर उसको पाया।
भाग गया था मुझे छोड़कर, वह बचपन फिर से आया॥
पाठ-परिचय / व्याख्या (Explanation)
प्रथम पद की व्याख्या: कवयित्री कहती हैं कि उन्हें बचपन की मधुर यादें बार-बार आती हैं। उनका बचपन उनके जीवन की सबसे बड़ी खुशी लेकर चला गया। बचपन का वह समय था जब कोई चिंता नहीं होती थी, बेफिक्री से खेलते-खाते थे और निर्भय होकर घूमते थे। उस अतुलनीय आनंद को कैसे भुलाया जा सकता है?
द्वितीय एवं तृतीय पद की व्याख्या: बचपन में रोना और मचलना भी एक सुखद अनुभव था। उस समय आँखों से बड़े-बड़े मोती जैसे आँसू बहते थे जो मानो जयमाला पहनाते थे। जब भी कवयित्री रोती थीं, माँ अपना सारा काम छोड़कर दौड़ी चली आती थीं, उन्हें गोद में उठा लेती थीं और चूम-चूमकर उनके गीले गालों को सुखा देती थीं।
चतुर्थ एवं पंचम पद की व्याख्या: कवयित्री बचपन को पुकारती हैं कि वह एक बार फिर आए और अपनी निर्मल शांति दे। वह प्राकृतिक विश्राम जो मन की व्याकुलता और पीड़ा को दूर कर देता था, उसे फिर से पाना चाहती हैं। वह भोली-सी सरलता और पापरहित जीवन—क्या वह फिर आकर उनके मन का संताप मिटा सकेगा?
षष्ठ से अष्टम पद की व्याख्या: जब कवयित्री बचपन को बुला रही थीं, तभी उनकी बिटिया बोल उठी। उनकी छोटी-सी कुटिया नंदनवन की तरह खिल उठी। बेटी ‘माँ ओ!’ पुकारते हुए मिट्टी खाकर आई थी—कुछ मुँह में थी, कुछ हाथ में लेकर माँ को खिलाने आई थी। जब कवयित्री ने पूछा ‘यह क्या लाई?’ तो बेटी ने बड़े भोलेपन से कहा ‘माँ काओ।’ इस बाल-सुलभ व्यवहार से कवयित्री का हृदय प्रफुल्लित हो उठा।
नवम से द्वादश पद की व्याख्या: कवयित्री को अनुभव होता है कि उनका बचपन उनकी बेटी बनकर आ गया है। बेटी की मंजुल (सुंदर) मूर्ति देखकर उनमें नया जीवन आ गया। अब वह भी उसके साथ खेलती हैं, खाती हैं, तुतलाती हैं और बच्ची बन जाती हैं। जिस बचपन को वे बरसों से खोज रही थीं, जो उन्हें छोड़कर चला गया था, वही बचपन उनकी बेटी के रूप में फिर से आ गया।
कवयित्री-परिचय (About the Poet)
सुभद्रा कुमारी चौहान (1904–1948) हिंदी साहित्य की प्रमुख कवयित्रियों में से एक हैं। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद (प्रयागराज) के निकट निहालपुर गाँव में हुआ था। वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की सक्रिय सेनानी भी थीं। उनकी कविता “झाँसी की रानी” हिंदी साहित्य की सर्वाधिक लोकप्रिय वीर रस की कविताओं में से एक है। उनकी रचनाओं में देशभक्ति, वात्सल्य और नारी-चेतना का सुंदर समन्वय देखने को मिलता है। “मेरा नया बचपन”, “मुकुल” और “त्रिधारा” उनके प्रसिद्ध काव्य-संग्रह हैं। सन् 1948 में एक सड़क दुर्घटना में उनका आकस्मिक निधन हो गया।
शब्दार्थ (Word Meanings)
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| मधुर | मीठी, प्रिय |
| अतुलित | जिसकी तुलना न हो सके, अतुलनीय |
| निर्भय | निडर, बिना डर के |
| स्वच्छंद | स्वतंत्र, मनमाना |
| मचलना | जिद करना, अड़ना |
| जयमाला | विजय की माला, स्वागत-माला |
| निर्मल | स्वच्छ, पवित्र |
| व्याकुल | बेचैन, विकल |
| व्यथा | पीड़ा, दुख |
| प्राकृत | प्राकृतिक, स्वाभाविक |
| विश्रांति | विश्राम, आराम |
| निष्पाप | पाप रहित, निर्दोष |
| संताप | मन की जलन, दुख-पीड़ा |
| नंदन-वन | स्वर्ग का बगीचा, देवताओं का उद्यान |
| कुटिया | छोटी झोंपड़ी या घर |
| प्रफुल्लित | प्रसन्न, खिला हुआ |
| मंजुल | सुंदर, मनोहर |
| नवजीवन | नया जीवन, नई ऊर्जा |
| तुतलाना | बच्चों की तरह अस्पष्ट बोलना |
| माँ काओ | बच्चे की भाषा में “माँ, खाओ” |
पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर (Textbook Questions and Answers)
बोध एवं विचार
प्रश्न 1. बचपन की कौन-सी विशेषता कवयित्री को बार-बार याद आती है?
उत्तरः बचपन की निश्चिंतता और निर्भयता कवयित्री को बार-बार याद आती है। बचपन में कोई चिंता नहीं होती, बच्चे खेलते-खाते और निर्भय होकर स्वच्छंद घूमते हैं। उनमें किसी प्रकार का स्वार्थ नहीं होता और वे बिना किसी भय के अपना जीवन जीते हैं। यही अतुलित आनंद और निर्भय स्वच्छंदता कवयित्री को बार-बार याद आती है।
प्रश्न 2. कवयित्री अपने जीवन को बचपन में लौटाना क्यों चाहती हैं?
उत्तरः कवयित्री अपने जीवन को बचपन में इसलिए लौटाना चाहती हैं क्योंकि बचपन में जीवन निष्पाप और सरल था। उस समय आँगन में निर्भय होकर घूमना, माँ का ममतामयी स्पर्श और बिना किसी छल-कपट के प्रेम पाना—ये सब उनके मन को शांति देते थे। वयस्क जीवन की व्याकुलता और संताप से मुक्ति पाने के लिए वे बचपन की निर्मल शांति और प्राकृत विश्रांति को फिर से पाना चाहती हैं।
प्रश्न 3. ‘वह प्यारा जीवन निष्पाप’ से कवयित्री का क्या तात्पर्य है?
उत्तरः ‘वह प्यारा जीवन निष्पाप’ से कवयित्री का तात्पर्य है कि बचपन का जीवन हर प्रकार के पाप, स्वार्थ, छल और कपट से मुक्त होता है। बच्चों का हृदय कोमल और निर्मल होता है। उनके मन में किसी के प्रति द्वेष, ईर्ष्या या स्वार्थ नहीं होता। बच्चे सच्चे और सरल मन से जीते हैं। माँ का प्यार भी उस समय पवित्र और निःस्वार्थ होता है। यही निष्पाप जीवन कवयित्री को पुनः प्राप्त करना है।
प्रश्न 4. कवयित्री को बचपन की कौन-सी याद आती है जब वह रोती थीं?
उत्तरः कवयित्री को याद आता है कि जब वे बचपन में रोती थीं, तो उनकी माँ अपना सारा काम छोड़कर दौड़ी चली आती थीं। माँ उन्हें उठाकर झाड़-पोंछकर चूम-चूमकर उनके गीले गालों को सुखा देती थीं। बचपन में रोना और मचलना भी एक अजीब आनंद देता था। उस समय आँसू मोती जैसे लगते थे और माँ का वह ममतामय स्पर्श अवर्णनीय सुख देता था।
प्रश्न 5. कवयित्री को अपना बचपन फिर से कैसे मिला?
उत्तरः कवयित्री बचपन को बुला रही थीं, तभी उनकी बिटिया बोल उठी। बेटी मिट्टी खाकर आई थी—कुछ मुँह में थी, कुछ हाथ में लेकर माँ को खिलाने लाई थी। जब कवयित्री ने पूछा ‘यह क्या लाई?’ तो बेटी बोली ‘माँ काओ।’ इस भोली-सी बात से कवयित्री का हृदय प्रफुल्लित हो गया। बेटी की इस मंजुल मूर्ति को देखकर कवयित्री को लगा कि उनका बचपन उनकी बेटी बनकर आ गया है। अब वे भी उसके साथ खेलती हैं, खाती हैं और बच्ची बन जाती हैं—इस प्रकार उन्हें अपना बचपन फिर मिल गया।
प्रश्न 6. ‘नंदन-वन-सी फूल उठी यह छोटी-सी कुटिया मेरी’—इस पंक्ति का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तरः इस पंक्ति में कवयित्री कहती हैं कि जब उनकी बिटिया बोल उठी, तो उनका छोटा-सा घर नंदनवन की तरह खिल उठा। नंदनवन देवताओं का बगीचा होता है जो सदा हरा-भरा और आनंदमय रहता है। अर्थात् बेटी की उपस्थिति और उसकी भोली-भाली बातों से कवयित्री का साधारण घर स्वर्ग के समान सुंदर और आनंदपूर्ण हो गया। इस पंक्ति में उपमा अलंकार का सुंदर प्रयोग है।
प्रश्न 7. कविता का केंद्रीय भाव क्या है?
उत्तरः इस कविता का केंद्रीय भाव यह है कि बचपन जीवन का सर्वाधिक सुंदर और आनंददायक काल होता है। कवयित्री बचपन की मधुर स्मृतियों में खो जाती हैं और उसे फिर से पाना चाहती हैं। अंततः उन्हें अपनी बिटिया के रूप में नया बचपन मिलता है। कविता यह संदेश देती है कि माँ-बच्चे का रिश्ता बहुत पवित्र और आनंददायक होता है। संतान के रूप में माँ को अपना बचपन फिर से जीने का अवसर मिलता है। जीवन में बचपन की निश्छलता और प्रेम ही सच्चा सुख है।
भाषा-अध्ययन
प्रश्न 8. निम्नलिखित शब्दों के विलोम शब्द लिखिए: निर्भय, निष्पाप, मधुर, निर्मल, प्रफुल्लित
| शब्द | विलोम |
|---|---|
| निर्भय | भयभीत / सभय |
| निष्पाप | पापी / सपाप |
| मधुर | कटु / कड़वा |
| निर्मल | मलिन / अपवित्र |
| प्रफुल्लित | उदास / म्लान |
प्रश्न 9. कविता में आए तुकबंदी वाले शब्द-युग्म खोजिए।
उत्तरः कविता में निम्नलिखित तुकबंदी वाले शब्द-युग्म हैं:
- तेरी — मेरी
- स्वच्छंद — आनंद
- थे — थे
- लिया — दिया
- शांति — विश्रांति
- निष्पाप — संताप
- मेरी — मेरी
- थी — थी
- काओ — खाओ
- आया — आया
- हूँ — हूँ
- पाया — आया
प्रश्न 10. ‘माँ काओ’ किस बात का प्रतीक है? इसका क्या महत्त्व है?
उत्तरः ‘माँ काओ’ बच्चों की तुतलाहट और निश्छल प्रेम का प्रतीक है। छोटे बच्चे ‘खाओ’ को ‘काओ’ कहते हैं—यह उनकी बाल-सुलभ भाषा है। इस छोटी-सी बात में बच्चे का निःस्वार्थ प्रेम झलकता है। वह अपनी माँ को खिलाना चाहती है—भले ही वह मिट्टी ही क्यों न हो। यही भोला प्रेम कवयित्री के हृदय को प्रफुल्लित कर देता है और उन्हें लगता है कि उनका खोया बचपन उनकी बेटी के रूप में लौट आया है।
अतिरिक्त प्रश्नोत्तर (Additional Questions)
प्रश्न 1. सुभद्रा कुमारी चौहान कौन थीं? उनकी एक प्रसिद्ध कविता का नाम लिखिए।
उत्तरः सुभद्रा कुमारी चौहान हिंदी की सुप्रसिद्ध कवयित्री और स्वतंत्रता सेनानी थीं। उनका जन्म 1904 में उत्तर प्रदेश में हुआ था। उनकी सर्वाधिक प्रसिद्ध कविता “झाँसी की रानी” है जिसमें रानी लक्ष्मीबाई की वीरता का ओजपूर्ण वर्णन है। उनकी रचनाओं में देशभक्ति और वात्सल्य का सुंदर मेल है।
प्रश्न 2. इस कविता में बचपन का कौन-सा पहलू सबसे अधिक उजागर हुआ है?
उत्तरः इस कविता में बचपन की निश्चिंतता, निर्भयता और माँ का ममतामय प्रेम सबसे अधिक उजागर हुआ है। बचपन में कोई चिंता नहीं होती, कोई भय नहीं होता और माँ का निःस्वार्थ प्रेम हर दुख को दूर कर देता है। यही बचपन की सबसे बड़ी विशेषता है जिसे कवयित्री फिर से पाना चाहती हैं।
प्रश्न 3. कवयित्री के मन में ‘व्याकुल व्यथा’ क्यों है?
उत्तरः वयस्क जीवन में अनेक जिम्मेदारियाँ, चिंताएँ और कठिनाइयाँ होती हैं। समाज के नियमों, रिश्तों और जीवन की जटिलताओं में उलझकर मन व्याकुल हो जाता है। बचपन के उस निर्मल, निश्चिंत और प्रेममय जीवन की याद आने पर मन और भी व्याकुल हो उठता है। इसीलिए कवयित्री बचपन को पुकारती हैं कि वह आए और उनकी इस व्याकुल व्यथा को मिटाए।
प्रश्न 4. बिटिया की तुलना नंदनवन से क्यों की गई है?
उत्तरः नंदनवन स्वर्ग का वह उद्यान है जो सदा प्रसन्नता, सुंदरता और आनंद से भरा रहता है। कवयित्री की बिटिया के बोलते ही उनका साधारण घर भी उसी तरह आनंदमय और जीवंत हो उठा जैसे नंदनवन होता है। बेटी की किलकारी और भोली-भाली बातों ने घर को स्वर्ग जैसा बना दिया। इसीलिए उनकी कुटिया की तुलना नंदनवन से की गई है।
प्रश्न 5. ‘मैं भी बच्ची बन जाती हूँ’—इस पंक्ति का क्या आशय है?
उत्तरः इस पंक्ति का आशय यह है कि कवयित्री अपनी बेटी के साथ खेलते-खाते हुए स्वयं भी बच्ची की तरह निश्छल, सरल और आनंदित हो जाती हैं। वे अपनी सारी चिंताएँ और जिम्मेदारियाँ भूल जाती हैं। माँ और बच्चे के बीच जो निश्छल प्रेम होता है, उसमें माँ स्वयं भी बचपन की मधुरता का अनुभव करती है। यह पंक्ति मातृत्व की उस अनुभूति को व्यक्त करती है जिसमें माँ अपने बच्चे के साथ खुद भी बच्ची बन जाती है।
प्रश्न 6. कविता में माँ-बेटी के रिश्ते को किस प्रकार चित्रित किया गया है?
उत्तरः इस कविता में माँ-बेटी के रिश्ते को अत्यंत भावपूर्ण और हृदयस्पर्शी तरीके से चित्रित किया गया है। कवयित्री को अपनी माँ के ममतामय स्पर्श की याद आती है जो रोने पर दौड़ी आती थीं। दूसरी ओर उनकी अपनी बेटी भी उसी निश्छल प्रेम से मिट्टी खाकर माँ को खिलाने आती है। इस प्रकार कविता में माँ-बेटी का प्रेम एक चक्र की तरह चलता है—एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में।
प्रश्न 7. ‘बचपन बेटी बन आया’—इस पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तरः इस पंक्ति का भाव अत्यंत गहरा और मार्मिक है। कवयित्री वर्षों से अपने खोए हुए बचपन को ढूंढ रही थीं। अंततः उन्हें अहसास हुआ कि उनका बचपन उनकी बेटी के रूप में उनके पास ही है। बेटी की निश्छलता, उसकी तुतलाहट, उसका खेलना-खाना और उसका निःस्वार्थ प्रेम—ये सब बचपन की ही विशेषताएँ हैं। इस पंक्ति में यह संदेश है कि जीवन में बचपन कभी नष्ट नहीं होता, वह अगली पीढ़ी में फिर से जीवित हो उठता है।
प्रश्न 8. इस कविता से हमें क्या सीख मिलती है?
उत्तरः इस कविता से हमें अनेक महत्त्वपूर्ण सीखें मिलती हैं। पहली, बचपन की निश्छलता और सरलता जीवन का सबसे बड़ा सुख है—हमें उसे संजोकर रखना चाहिए। दूसरी, माँ का प्रेम संसार का सबसे पवित्र और निःस्वार्थ प्रेम है। तीसरी, जीवन की व्याकुलता में भी अपने परिवार और बच्चों की निश्छल दुनिया में शांति मिलती है। चौथी, जीवन चक्र चलता रहता है—हम जो प्यार अपनी माँ से पाते हैं, वही हम अपने बच्चों को देते हैं और यही प्रेम हमें नया बचपन देता है।