HSLC Guru में आपका स्वागत है। इस लेख में हम ASSEB (असम राज्य माध्यमिक शिक्षा बोर्ड) Class 8 Hindi Elective (पल्लव भाग-3) के पाठ 10 – “गोकुल लीला” के सम्पूर्ण प्रश्नोत्तर प्रस्तुत कर रहे हैं। यह पाठ भक्तिकाल के महान कवि सूरदास द्वारा रचित दो सुंदर पदों पर आधारित है, जिनमें बालक श्रीकृष्ण की मनोहारी बाल-लीलाओं का हृदयस्पर्शी वर्णन किया गया है। यहाँ आपको पद-पाठ, पाठ-परिचय, व्याख्या, कवि-परिचय, शब्दार्थ, पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर तथा अतिरिक्त महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर सभी एक साथ मिलेंगे। यह सामग्री ASSEB परीक्षा की तैयारी के लिए अत्यंत उपयोगी है।
पद/कविता (Poem Text)
पद – 1
किलकत कान्ह घुटुरुवनि आवत।
मनिमय कनक नंद कैं आँगन, बिंब पकरिबैं धावत॥
कबहुँ निरखि हरि आपु छाँह कौं, कर सौं पकरन चाहत।
किलकि हँसत राजत द्वै दतियाँ, पुनि-पुनि तिहिं अवगाहत॥
कनक-भूमि पद कर-पग-छाया, यह उपमा इक राजति।
करि-करि प्रतिपद प्रति मनि बसुधा, कमल बैठकी साजति॥
बाल-दसा-सुख निरखि जसोदा, पुनि-पुनि नंद बुलावति।
अँचरा तर लै ढाँकि, सूर के प्रभु कौं दूध पियावति॥
पद – 2
मैया मैं नहीं माखन खायौ।
ख्याल परै ये सखा सबै मिलि, मेरैं मुख लपटायौ॥
देखि तुही सींके पर भाजन, ऊँचैं धरि लटकायौ।
हौं जु कहत नान्हे कर अपनैं, मैं कैसैं करि पायौ॥
मुख दधि पोंछि, बुद्धि इक कीन्हीं, दोना पीठि दुरायौ।
डारि साँटि, मुसुकाइ जसोदा, स्यामहि कंठ लगायौ॥
बाल-बिनोद-मोद मन मोह्यौ, भक्ति-प्रताप दिखायौ।
सूरदास जसुमति कौ यह सुख, सिव बिरंचि नहिं पायौ॥
पाठ-परिचय / व्याख्या (Explanation)
पद – 1 की व्याख्या
इस पद में सूरदास जी ने बालक श्रीकृष्ण की घुटनों के बल चलने की मनोहारी छवि का वर्णन किया है। कृष्ण किलकारी मारते हुए घुटनों के बल नंद बाबा के आँगन में चल रहे हैं। नंद का आँगन मणियों और सोने से सुसज्जित है, जिसमें बालक कृष्ण अपने प्रतिबिंब को देखकर उसे पकड़ने के लिए दौड़ते हैं। कभी वे अपनी परछाई को निहारते हैं और उसे अपने हाथों से पकड़ना चाहते हैं। जब वे किलकारी मारते हुए हँसते हैं तो उनके मुँह में उगे दो नन्हे दूध के दाँत चमक उठते हैं — यह दृश्य अत्यंत मनमोहक लगता है।
सोने की भूमि पर कृष्ण के हाथों और पैरों की परछाई एक अद्भुत दृश्य उत्पन्न करती है — मानो धरती पर हर कदम पर मणियों की कमल-आसनी सज रही हो। यह उपमा कवि की अद्वितीय कल्पना-शक्ति का परिचय देती है। माता यशोदा अपने लाल की इन बाल-क्रीड़ाओं को देख-देखकर आनंदित होती हैं और बार-बार नंद बाबा को बुलाती हैं कि वे भी इस अद्भुत दृश्य का आनंद लें। अंत में यशोदा कृष्ण को अपने अंचल की छाँव में ढककर दूध पिलाती हैं।
पद – 2 की व्याख्या
इस पद में सूरदास जी ने बालक कृष्ण की नटखट और चतुर लीला का अत्यंत रोचक वर्णन किया है। गोपियाँ यशोदा से शिकायत करती हैं कि कृष्ण ने उनका माखन (मक्खन) चुराकर खाया है। किंतु जब यशोदा कृष्ण से पूछती हैं, तो कृष्ण बड़ी चतुराई से कहते हैं — “मैया! मैंने माखन नहीं खाया। ये सभी सखा मुझे पकड़कर मेरे मुँह पर माखन लपेट गए।”
कृष्ण अपना बचाव करते हुए और भी तर्क देते हैं — “माखन के बर्तन तो तुमने ऊँचे छींके पर लटकाए हुए हैं। मेरे हाथ इतने छोटे हैं, मैं कैसे वहाँ तक पहुँच सकता हूँ?” किंतु कृष्ण का झूठ तब पकड़ा जाता है जब यशोदा देखती हैं कि उन्होंने मुँह पर लगी दही पोंछ दी है और माखन का दोना अपनी पीठ के पीछे छुपा लिया है। यशोदा का क्रोध क्षण भर के लिए जाग उठता है, किंतु कृष्ण की मासूमियत और भोलेपन को देखकर वे हाथ की छड़ी फेंक देती हैं, मुस्कुरा उठती हैं और अपने लाल श्याम को कंठ से लगा लेती हैं। सूरदास कहते हैं कि यशोदा के इस सुख को तो शिव और ब्रह्मा भी प्राप्त नहीं कर सके।
कवि-परिचय (About the Poet)
सूरदास हिंदी साहित्य के भक्तिकाल के सर्वश्रेष्ठ कवियों में से एक हैं। उनका जन्म सन् 1487 ई. में हुआ था और निधन सन् 1583 ई. में हुआ। वे जन्म से नेत्रहीन थे, फिर भी उनकी कविताओं में बालक कृष्ण की लीलाओं का जो सजीव और मनोरम चित्रण है, वह अद्वितीय है। महान वैष्णव आचार्य श्री वल्लभाचार्य ने सूरदास को अपना शिष्य बनाया और उन्हें कृष्णभक्ति के मार्ग पर प्रेरित किया।
सूरदास ने ब्रजभाषा में लगभग दस हजार पदों की रचना की। उनके तीन प्रमुख ग्रंथ हैं — सूरसागर, सूर-सारावली और साहित्य-लहरी। इनमें सूरसागर सबसे प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण है। सूरसागर में भगवान कृष्ण की बाल-लीलाओं, यशोदा के वात्सल्य, गोपियों के प्रेम और विरह का अत्यंत भावपूर्ण वर्णन है। सूरदास को हिंदी साहित्य में “वात्सल्य रस के सम्राट” कहा जाता है।
शब्दार्थ (Word Meanings)
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| किलकत | किलकारी मारते हुए, खुशी से चिल्लाते हुए |
| कान्ह / कान्हा | कृष्ण का लाडला नाम |
| घुटुरुवनि | घुटनों के बल (चलना) |
| मनिमय | मणियों से जड़ित, रत्नजड़ित |
| कनक | सोना |
| बिंब | प्रतिबिंब, छाया, प्रतिमा |
| धावत | दौड़ते हुए, भागते हुए |
| निरखि | देखकर, निहारकर |
| छाँह / छाहँ | परछाई, छाया |
| कर | हाथ |
| किलकि | किलकारी मारकर |
| दतियाँ | छोटे-छोटे दाँत (बच्चे के दूध के दाँत) |
| राजत | शोभित होना, चमकना |
| पुनि-पुनि | बार-बार |
| अवगाहत | डुबकी लगाना, लीन होना, बार-बार देखना |
| प्रतिपद | प्रत्येक कदम पर |
| बसुधा | पृथ्वी, धरती |
| बैठकी | आसन, बैठने का स्थान |
| जसोदा | यशोदा (कृष्ण की माँ) |
| अँचरा | साड़ी का पल्लू, दुपट्टे का कोना |
| माखन / नवनीत | मक्खन |
| सखा | मित्र, साथी |
| लपटायौ | लगाया, पोता |
| सींका / सींके | रस्सी या तार से बना छींका (जिस पर बर्तन टाँगते हैं) |
| भाजन | बर्तन, पात्र |
| नान्हे | छोटे |
| दधि | दही |
| दोना | पत्तों से बना छोटा कटोरा |
| दुरायौ | छुपाया |
| साँटि / साँट | छड़ी, डंडी |
| डारि | फेंककर |
| मुसुकाइ | मुस्कुराकर |
| स्याम / श्याम | कृष्ण (साँवले रंग के कारण यह नाम) |
| कंठ | गला, गले से |
| सिव | शिव |
| बिरंचि | ब्रह्मा |
पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर (Textbook Questions and Answers)
अभ्यास-माला
1. तुम्हें कौन-सा पद अधिक अच्छा लगा और क्यों?
उत्तरः मुझे पहला पद अधिक अच्छा लगा। इस पद में बालक कृष्ण के घुटनों के बल चलने, अपने प्रतिबिंब को पकड़ने की कोशिश करने और दूध के दाँतों की चमक का जो सजीव और कोमल चित्रण किया गया है, वह मन को बहुत भाता है। माता यशोदा का बार-बार नंद को बुलाना और अंचल की छाँव में कृष्ण को दूध पिलाना — यह वात्सल्य का बहुत ही मार्मिक दृश्य है। दूसरा पद भी रोचक है, किंतु पहले पद की कोमलता और सौंदर्य अतुलनीय है।
2. दूसरे पद के आधार पर कृष्ण की अनुमानित आयु क्या होगी?
उत्तरः दूसरे पद के आधार पर कृष्ण की आयु लगभग 3 से 5 वर्ष के बीच अनुमानित होती है। इस उम्र में बच्चे बोलने और अपनी बात समझाने में सक्षम होते हैं — कृष्ण भी माँ को तर्क देकर अपना बचाव करते हैं। साथ ही वे माखन खाने की चाहत रखते हैं और झूठ बोलने की चालाकी भी जानते हैं, जो इस छोटी आयु के बच्चे की स्वाभाविक चेष्टाएँ हैं।
3. पहले पद में नंद के आँगन में घुटनों के बल चलते कृष्ण का वर्णन अपने शब्दों में करो।
उत्तरः पहले पद में नंद के आँगन में बालक कृष्ण किलकारी मारते हुए घुटनों के बल चल रहे हैं। नंद का आँगन मणियों और सोने से जड़ित है, जिसमें कृष्ण का प्रतिबिंब चमकता है। कृष्ण उस प्रतिबिंब को पकड़ने के लिए दौड़ते हैं। कभी वे अपनी परछाई को ध्यान से देखते हैं और अपने हाथों से उसे पकड़ना चाहते हैं। जब वे खुशी से किलकारी मारकर हँसते हैं, तो उनके मुँह के दो नन्हे दूध के दाँत दिखाई देते हैं, जो अत्यंत सुंदर लगते हैं। सोने की भूमि पर उनके हाथों और पैरों की छाया मानो कमल के आसन बना रही है। माता यशोदा यह सब देखकर बार-बार नंद बाबा को बुलाती हैं।
4. दूसरे पद में माखन चुराने के संदर्भ में कृष्ण की चतुराई का वर्णन करो।
उत्तरः दूसरे पद में कृष्ण की चतुराई बहुत स्पष्ट दिखाई देती है। जब माँ यशोदा माखन खाने के बारे में पूछती हैं, तो कृष्ण तुरंत इनकार करते हैं और कहते हैं कि उनके सभी सखाओं ने मिलकर उनके मुँह पर माखन लपेट दिया। फिर वे यह तर्क देते हैं कि माखन के बर्तन तो ऊँचे छींके पर लटके हुए हैं और उनके हाथ इतने छोटे हैं कि वे वहाँ तक पहुँच ही नहीं सकते। इस तरह वे अपना बचाव करते हैं। साथ ही वे अपने मुँह पर लगी दही पोंछ देते हैं और माखन का दोना चुपचाप पीठ के पीछे छुपा लेते हैं। यह उनकी बाल-बुद्धि की चतुराई का उत्कृष्ट उदाहरण है।
5. सही उत्तर में ✓ का निशान लगाओ —
क) कृष्ण नंद के आँगन में घुटनों के बल चलते हुए क्या कर रहे थे?
- रो रहे थे
- ✓ किलकारी मार रहे थे
- सो रहे थे
ख) कृष्ण अपने प्रतिबिंब को देखकर क्या करना चाहते थे?
- उससे खेलना चाहते थे
- ✓ उसे हाथ से पकड़ना चाहते थे
- उसे डराना चाहते थे
ग) माखन चुराने पर कृष्ण ने माँ से क्या कहा?
- मुझे माखन बहुत पसंद है
- सखाओं ने खाया था
- ✓ मैंने माखन नहीं खाया, सखाओं ने मेरे मुँह पर लपेट दिया
6. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दो —
क) सूरदास का जन्म कब हुआ था?
उत्तरः सूरदास का जन्म सन् 1487 ई. में हुआ था।
ख) नंद का आँगन किससे सजा हुआ था?
उत्तरः नंद का आँगन मणियों और सोने (कनक) से जड़ित था।
ग) कृष्ण के हँसने पर क्या दिखाई देता था?
उत्तरः कृष्ण के किलकारी मारते हुए हँसने पर उनके मुँह में उगे दो नन्हे दूध के दाँत दिखाई देते थे।
घ) यशोदा ने कृष्ण के भोलेपन को देखकर क्या किया?
उत्तरः यशोदा ने कृष्ण के भोलेपन को देखकर हाथ की छड़ी फेंक दी, मुस्कुराईं और श्याम को गले से लगा लिया।
ङ) किसने सूरदास को अपना शिष्य बनाया?
उत्तरः श्री वल्लभाचार्य ने सूरदास को अपना शिष्य बनाया।
च) सूरदास का सबसे प्रमुख ग्रंथ कौन-सा है?
उत्तरः सूरदास का सबसे प्रमुख ग्रंथ सूरसागर है।
छ) सूरसागर किस भाषा में लिखा गया है?
उत्तरः सूरसागर ब्रजभाषा में लिखा गया है।
ज) सूरदास ने कितने पद लिखे थे?
उत्तरः सूरदास ने लगभग दस हजार पद लिखे थे।
झ) दूसरे पद में यशोदा माखन के बर्तन कहाँ रखती थीं?
उत्तरः यशोदा माखन के बर्तन ऊँचे छींके (रस्सी से बने झूलते हुए रैक) पर रखती थीं, ताकि कृष्ण उन तक न पहुँच सकें।
ञ) यशोदा के सुख को शिव और ब्रह्मा भी क्यों नहीं पा सके?
उत्तरः सूरदास के अनुसार, भगवान कृष्ण को माँ के रूप में पाना और उनकी बाल-लीलाओं को प्रत्यक्ष रूप से देखना अत्यंत दुर्लभ भाग्य है। यह सुख माता यशोदा को ही प्राप्त हुआ था जो कृष्ण को अपना पुत्र मानकर उनसे अनन्य प्रेम करती थीं। शिव और ब्रह्मा जैसे देवता भी इस वात्सल्य सुख को नहीं पा सके, इसलिए यशोदा का यह प्रेम सबसे उच्चतम माना गया है।
7. भाषा-अध्ययन — निम्नलिखित शब्द-युग्मों का अर्थ लिखो और वाक्यों में प्रयोग करो —
| शब्द-युग्म | अर्थ | वाक्य |
|---|---|---|
| पुनि-पुनि | बार-बार | यशोदा पुनि-पुनि नंद को बुलावती थीं। |
| करि-करि | करते-करते, बार-बार करके | वह करि-करि थक गया। |
| ढूँढि-ढँढोरि | खोज-खोजकर | कृष्ण माखन ढूँढि-ढँढोरि खा जाते थे। |
8. कृष्ण के पर्यायवाची (synonyms) नाम लिखो।
उत्तरः कृष्ण के पर्यायवाची नाम — माधव, मुरारि, मुरलीधर, गोविंद, गोपाल, केशव, श्याम, कान्हा, नंदलाल, मोहन, द्वारिकाधीश, वासुदेव, हरि, यादव।
9. पाठ के आस-पास — माधवदेव का बरगीत पढ़ो और कक्षा में सुनाओ।
उत्तरः असम के महान वैष्णव संत-कवि माधवदेव ने भी बालक कृष्ण की लीलाओं पर अनेक सुंदर बरगीत (भक्ति-गीत) लिखे हैं। उनका एक प्रसिद्ध बरगीत इस प्रकार है —
धु्रव (refrain):
गोविन्द दुग्ध पिउ दुग्ध पिउ बोलेरे यशोवा।
दुग्ध नाखाया हरि कान्दे उवा-उवा॥
पद:
अरुण अधर मुरि कान्दे यदुमणि।
चान्द मुखेर बालाई लओं बोलेरे जननी॥
इस बरगीत में माधवदेव ने बालक कृष्ण को दूध पिलाने का सुंदर दृश्य चित्रित किया है। जैसे सूरदास ने हिंदी में कृष्ण की बाल-लीलाओं का वर्णन किया, उसी प्रकार माधवदेव ने असमिया में कृष्ण के बचपन के मनोहारी दृश्यों को अपनी कविताओं में उकेरा। दोनों कवि भक्तिकाल के महान साधक थे और दोनों ने अपनी-अपनी भाषाओं में कृष्ण के प्रति अपार भक्ति व्यक्त की।
अतिरिक्त प्रश्नोत्तर (Additional Questions)
1. “गोकुल लीला” पाठ किस प्रकार के रस से भरपूर है?
उत्तरः “गोकुल लीला” पाठ मुख्य रूप से वात्सल्य रस से भरपूर है। माता यशोदा का बालक कृष्ण के प्रति अपार प्रेम, उनकी बाल-चेष्टाओं को देखकर आनंदित होना, और कृष्ण को कंठ से लगाना — ये सभी वात्सल्य रस के सुंदर उदाहरण हैं। इसके साथ-साथ कृष्ण की नटखट लीलाओं में हास्य रस का भी सुंदर पुट है।
2. सूरदास की भाषा-शैली की क्या विशेषता है?
उत्तरः सूरदास ने अपनी कविताओं में ब्रजभाषा का प्रयोग किया है। उनकी भाषा-शैली की प्रमुख विशेषताएँ हैं — (1) सरल और मधुर शब्दों का प्रयोग जो सुनने में बहुत कर्णप्रिय लगते हैं, (2) बालक कृष्ण के व्यवहार और माँ के वात्सल्य का इतना सजीव वर्णन कि पाठक के मन में दृश्य स्वतः उभर आता है, (3) उपमाओं का सुंदर प्रयोग — जैसे मणिमय आँगन में कमल-आसन की उपमा, (4) पदों में संगीतात्मकता और लय का समावेश।
3. कृष्ण ने माखन खाने के बाद अपना झूठ छुपाने के लिए क्या-क्या किया?
उत्तरः कृष्ण ने माखन खाने के बाद अपना झूठ छुपाने के लिए निम्नलिखित काम किए — (1) माँ के पूछने पर दृढ़ता से कह दिया कि “मैंने माखन नहीं खाया,” (2) सारा दोष अपने सखाओं पर डाल दिया कि उन्होंने उनके मुँह पर माखन लपेट दिया, (3) यह तर्क दिया कि बर्तन तो ऊँचे छींके पर हैं और उनके हाथ बहुत छोटे हैं, इसलिए वे वहाँ तक पहुँच ही नहीं सकते, (4) मुँह पर लगी दही चुपचाप पोंछ दी, (5) माखन का दोना पीठ के पीछे छुपा लिया।
4. पहले पद में “कमल बैठकी साजति” से कवि का क्या तात्पर्य है?
उत्तरः पहले पद में कवि सूरदास कहते हैं कि नंद के मणिजड़ित सोने के आँगन में जब कृष्ण घुटनों के बल चलते हैं, तो उनके हाथों और पैरों की छाया उस चमकती भूमि पर पड़ती है। यह दृश्य ऐसा लगता है मानो हर कदम पर पृथ्वी स्वयं मणियों से कमल का आसन (बैठकी) बना रही हो। यह कवि की अत्यंत सुंदर और कल्पनाशील उपमा है जो कृष्ण की दिव्यता को व्यक्त करती है — मानो भगवान विष्णु का अवतार इस धरती को पुनीत कर रहा हो।
5. “सूर के प्रभु कौं दूध पियावति” — इस पंक्ति में सूरदास ने क्या भाव व्यक्त किया है?
उत्तरः इस पंक्ति में सूरदास जी ने भक्ति का एक अत्यंत कोमल और मार्मिक भाव व्यक्त किया है। वे कहते हैं कि यशोदा माँ अपने अंचल की छाँव में ढककर “सूर के प्रभु” अर्थात् भगवान कृष्ण को दूध पिलाती हैं। यहाँ “सूर के प्रभु” से सूरदास का तात्पर्य है कि जो कृष्ण मेरे (सूर के) आराध्य प्रभु हैं — वही सर्वशक्तिमान ईश्वर माँ की गोद में एक साधारण शिशु की तरह दूध पी रहे हैं। यह भगवान की भक्तवत्सलता और माया-लीला का सुंदर चित्रण है।
6. सूरदास और माधवदेव — दोनों कवियों में क्या समानता है?
उत्तरः सूरदास और माधवदेव दोनों में निम्नलिखित समानताएँ हैं — (1) दोनों भक्तिकाल के महान कवि थे, (2) दोनों ने बालक कृष्ण की लीलाओं का मनोहारी वर्णन किया, (3) दोनों किसी महान वैष्णव आचार्य के शिष्य थे — सूरदास वल्लभाचार्य के और माधवदेव शंकरदेव के, (4) दोनों ने अपनी-अपनी भाषाओं में (सूरदास ने ब्रजभाषा में, माधवदेव ने असमिया में) भक्ति-काव्य की रचना की, (5) दोनों की कविताएँ आज भी लोगों के मन में भक्ति और आनंद का संचार करती हैं।
7. “डारि साँटि, मुसुकाइ जसोदा, स्यामहि कंठ लगायौ” — इस पंक्ति का भाव स्पष्ट करो।
उत्तरः इस पंक्ति में माता यशोदा की वात्सल्य-भावना का सुंदर चित्रण है। जब यशोदा को पता चला कि कृष्ण ने वास्तव में माखन खाया था और अपना झूठ छुपाने के लिए मुँह पोंछकर दोना पीठ के पीछे छुपा लिया, तो एक पल के लिए उन्हें गुस्सा आया। किंतु अगले ही पल कृष्ण की मासूमियत और नटखटपन को देखकर उनका सारा क्रोध प्रेम में बदल गया। उन्होंने हाथ की छड़ी फेंक दी, मुस्कुरा उठीं और अपने लाल श्याम को प्यार से गले से लगा लिया। यह पंक्ति माँ के हृदय की कोमलता और असीम प्रेम को बड़े सुंदर ढंग से व्यक्त करती है।
8. इस पाठ से हमें क्या शिक्षा मिलती है?
उत्तरः “गोकुल लीला” पाठ से हमें निम्नलिखित शिक्षाएँ मिलती हैं — (1) माँ का प्रेम संसार में सबसे पवित्र और निःस्वार्थ होता है — चाहे बच्चा कितनी ही शरारत करे, माँ का प्यार कभी कम नहीं होता। (2) बचपन की लीलाएँ और चेष्टाएँ ईश्वर की सबसे सुंदर देन हैं — उन्हें सहेजकर रखना चाहिए। (3) भक्ति-कविता हमें ईश्वर के साथ एक आत्मीय संबंध स्थापित करना सिखाती है। (4) भाषा चाहे कोई भी हो — प्रेम और भक्ति की भावना सार्वभौमिक होती है, जैसा सूरदास और माधवदेव दोनों ने अपनी-अपनी भाषाओं में व्यक्त किया।
Summary: This article covers ASSEB Class 8 Hindi Elective (Pallav Bhag-3) Chapter 10 – “Gokul Leela” by the medieval poet Surdas. The chapter contains two devotional pads depicting the childhood pastimes (leela) of Lord Krishna. The first pad describes baby Krishna crawling on his knees in Nanda’s gem-studded golden courtyard, chasing his own reflection, while mother Yashoda watches with boundless maternal love (vatsalya). The second pad humorously depicts Krishna denying that he ate the butter, blaming his friends, before Yashoda discovers the truth and lovingly embraces him. The article includes the complete poem text, detailed explanation, poet’s biography, word meanings (shabdartha), all textbook exercise questions with answers, and eight additional questions — ideal for ASSEB examination preparation.