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अमृत वाणी – Class 7 Hindi Elective Question Answer | ASSEB | पल्लव भाग-2

ASSEB (असम राज्य माध्यमिक शिक्षा बोर्ड) कक्षा 7 हिन्दी ऐच्छिक (Hindi Elective) पाठ्यपुस्तक पल्लव भाग-2 के पद्य खंड के पाठ 16 ‘अमृत वाणी’ में संत कबीरदास और कवि रहीम के चुने हुए दोहों का संकलन है। ये दोहे जीवन के विभिन्न पक्षों — मधुर वचन, गुरु की महिमा, ज्ञान, निंदक का महत्व, सच्ची मित्रता, विपत्ति में सहायता तथा छोटे-बड़े के तालमेल — पर सुंदर शिक्षा देते हैं। इस लेख में पाठ-परिचय, मूल दोहे, शब्दार्थ तालिका और पाठ्यपुस्तक के सभी अभ्यास प्रश्नों के विस्तृत उत्तर प्रस्तुत हैं ताकि छात्र HSLC पूर्व परीक्षा की तैयारी सरलता से कर सकें।

पाठ-परिचय (Summary)

‘अमृत वाणी’ पद्य पाठ संत कबीरदास और कवि रहीम के दोहों का चयनित संकलन है। संत कबीरदास (1398–1518 ई.) निर्गुण-निराकार राम के भक्त, समाज-सुधारक और भक्तिकाल के प्रमुख कवि थे। उन्होंने सामाजिक कुरीतियों, बाह्य आडंबरों और जातिवाद की कड़ी निंदा की और सरल भाषा में मनुष्यता का संदेश दिया। उनके दोहों को ‘साखी’ (साक्षी) कहा जाता है। कवि रहीम का पूरा नाम अब्दुर्रहीम खानखाना (1556–1638 ई.) था; वे सम्राट अकबर के मंत्री बैरम खाँ के पुत्र, बड़े दानी, विद्वान और गोस्वामी तुलसीदास के मित्र थे।

इन दोहों में कवियों ने बताया है कि मधुर वचन औषधि के समान शीतलता देते हैं और कटु वचन तीर की भाँति हृदय को बेधते हैं। निंदा करने वाले व्यक्ति को पास रखने से अपना स्वभाव शुद्ध होता है। गुरु शिष्य को घड़े के समान भीतर से सहारा देकर बाहर से प्रहार करते हुए सुघड़ बनाता है। साधु की जाति नहीं, ज्ञान देखना चाहिए। विपत्ति में अपना साधन ही काम आता है — बिना जल के कमल की रक्षा सूरज भी नहीं कर सकता। बड़े को देखकर छोटे की उपेक्षा कभी न करें — जहाँ सुई काम आती है, वहाँ तलवार व्यर्थ है। मन की व्यथा को छिपाकर रखें, क्योंकि दूसरे केवल नखरे करते हैं, दुःख नहीं बाँटते। श्रीकृष्ण और गरीब ब्राह्मण सुदामा की मित्रता सच्ची मित्रता का आदर्श उदाहरण है।


दोहे (मूल पाठ)

संत कबीरदास के दोहे

मधुर बचन है औषधी, कटुक बचन है तीर।
स्रवन द्वार ह्वै संचरै, सालै सकल सरीर॥

निंदक नियरे राखिये, आँगन कुटी छवाय।
बिन पानी, साबुन बिना, निरमल करै सुभाय॥

गुरु कुम्हार सिष कुंभ है, गढ़ि-गढ़ि काढ़ै खोट।
अंतर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट॥

जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान।
मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान॥

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय॥

कवि रहीम के दोहे

रहिमन निज मन की बिथा, मन ही राखो गोय।
सुनि इठिलैंहै लोग सब, बाँटि न लैहै कोय॥

रहिमन विपदा हू भली, जो थोरे दिन होय।
हित-अनहित या जगत में, जानि परत सब कोय॥

रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून।
पानी गए न ऊबरै, मोती मानुस चून॥

रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिये डारि।
जहाँ काम आवै सुई, कहा करै तरवारि॥

जे गरीब पर हित करैं, ते रहीम बड़ लोग।
कहाँ सुदामा बापुरो, कृष्ण मिताई जोग॥


शब्दार्थ (Word Meanings)

शब्दअर्थ
औषधीदवा, औषधि
तीरवाण, बाण
स्रवनश्रवण, कान
सालैदुःख पहुँचाता है, पीड़ा देता है
संचरैप्रवेश करता है
सकलसम्पूर्ण, सारा
नियरेपास, निकट
छवायछवाकर, बनवाकर
सुभायस्वभाव
सिषशिष्य
कुंभघड़ा
गढ़िगढ़कर, बनाकर
खोटदोष, कमी
बाहैचलाते हैं, मारते हैं
चोटप्रहार
म्यानतलवार रखने का खोल
कोयकोई
बिथाव्यथा, दुःख, पीड़ा
गोयछिपाकर
इठिलैंहैनखरे करेंगे, मजाक उड़ाएँगे
विपदाविपत्ति, कष्ट
थोरेथोड़े, कम
हित-अनहितभला-बुरा चाहने वाले
सूनसूना, खाली, व्यर्थ
ऊबरैबच पाता है
चूनचूना, आटा
लघुछोटा
डारिछोड़कर, फेंककर
जलजकमल, पंकज
बापुरोबेचारा, निर्धन
मिताईमित्रता
जोगयोग्य, उचित
सुजानज्ञानी व्यक्ति
निर्गुणजिनके गुणों की गणना न हो सके
देहावसानमृत्यु, शरीर का त्याग
साखीसंत कबीर के दोहे (साक्षी)
दोहाहिंदी का लोकप्रिय छंद

अभ्यास (Question Answers)

1. सही कथन के आगे (√) और गलत कथन के आगे (X) निशान लगाओ:

(क) मधुर वचन औषधि के समान आरामदायक होता है।
उत्तरः (√) सही

(ख) निंदा करने वाले व्यक्ति से हमें दूर रहना चाहिए।
उत्तरः (X) गलत

(ग) ज्ञानी व्यक्ति अपने लिए धन का संचय करते हैं।
उत्तरः (X) गलत

(घ) हमें अपना दुःख अपने मन में ही छिपाकर रखना चाहिए।
उत्तरः (√) सही

(ङ) सुई का काम तलवार कर सकती है।
उत्तरः (X) गलत

(च) गरीबों की मदद करने वाले ही सच्चे अर्थ में बड़े व्यक्ति होते हैं।
उत्तरः (√) सही

2. पूर्ण वाक्य में उत्तर दो:

(क) संत कबीरदास के आराध्य कौन थे?
उत्तरः संत कबीरदास के आराध्य निर्गुण-निराकार राम थे। वे किसी मूर्ति या आकार-रूप में विश्वास नहीं रखते थे, बल्कि निराकार ब्रह्म की उपासना करते थे।

(ख) ‘कबीर’ शब्द का अर्थ क्या है?
उत्तरः ‘कबीर’ शब्द का अर्थ है — बड़ा, श्रेष्ठ, महान।

(ग) कवि के अनुसार क्या करने पर जीवन में दुःख नहीं आएगा?
उत्तरः कवि के अनुसार सुख की अवस्था में भी अपने आराध्य का स्मरण करते रहने पर जीवन में दुःख नहीं आएगा।

(घ) कवि रहीम का पूरा नाम क्या था?
उत्तरः कवि रहीम का पूरा नाम ‘अब्दुर्रहीम खानखाना’ था।

(ङ) किनके साथ कवि रहीम की गहरी मित्रता थी?
उत्तरः कवि रहीम की गहरी मित्रता गोस्वामी तुलसीदास के साथ थी।

(च) श्रीकृष्ण ने किसके साथ बचपन की मित्रता निभायी थी?
उत्तरः श्रीकृष्ण ने गरीब ब्राह्मण सुदामा के साथ बचपन की मित्रता निभायी थी।

3. संक्षेप में उत्तर दो:

(क) बुरे व्यक्ति की खोज में निकलने पर कवि को क्या अनुभव हुआ?
उत्तरः बुरे व्यक्ति की खोज में निकलने पर कवि को कोई बुरा व्यक्ति नहीं मिला। जब कवि ने अपने ही मन को टटोला तो उसे लगा कि अपने से बुरा संसार में कोई नहीं है। तात्पर्य यह है कि दूसरों में दोष ढूँढ़ने से पहले अपने भीतर झाँकना चाहिए।

(ख) गुरु अपने शिष्य को किस प्रकार गढ़ता है?
उत्तरः गुरु एक कुम्हार के समान है और शिष्य घड़े के समान। जिस प्रकार कुम्हार घड़े को भीतर से हाथ का सहारा देता है और बाहर से प्रहार करते हुए उसकी कमियाँ निकालकर सुंदर रूप देता है, उसी प्रकार गुरु भी शिष्य को भीतर से प्रेम-सहारा देकर बाहर से अनुशासन के प्रहार करते हुए उसके दोष दूर करता है और उसका जीवन सँवारता है।

(ग) साधु से क्या नहीं पूछना चाहिए और क्या पूछना चाहिए?
उत्तरः साधु की जाति नहीं पूछनी चाहिए, बल्कि उसका ज्ञान पूछना चाहिए। जिस प्रकार तलवार खरीदते समय उसके म्यान का मोल नहीं किया जाता, उसी प्रकार साधु के बाहरी रूप या जाति को नहीं, उसके ज्ञान और गुणों को महत्व देना चाहिए।

(घ) रहीम के अनुसार थोड़े दिनों की विपत्ति क्यों अच्छी है?
उत्तरः रहीम के अनुसार थोड़े दिनों की विपत्ति इसलिए अच्छी है क्योंकि विपत्ति आने पर ही यह पता चलता है कि संसार में कौन हमारा हित चाहता है और कौन अहित। सुख के समय तो सब अपने बनते हैं, परंतु विपत्ति में सच्चे और झूठे मित्रों की पहचान हो जाती है।

(ङ) मन की व्यथा को क्यों छिपाकर रखना चाहिए?
उत्तरः मन की व्यथा को इसलिए छिपाकर रखना चाहिए क्योंकि लोग सुनकर सहानुभूति देने या दुःख बाँटने के बजाय नखरे करते हैं और मजाक उड़ाते हैं। कोई भी व्यक्ति हमारा दुःख वास्तव में नहीं बाँटता; अतः अपनी व्यथा अपने मन में ही रखनी चाहिए।

4. लघु उत्तर दो:

(क) संत कबीरदास का संक्षिप्त परिचय दो।
उत्तरः संत कबीरदास भक्तिकाल के निर्गुण-संत-कवियों में अग्रगण्य हैं। उनका जन्म सन् 1398 ई. के आसपास काशी (वाराणसी) में हुआ था। वे जुलाहा परिवार में पले-बढ़े और स्वामी रामानन्द को अपना गुरु माना। कबीर निर्गुण-निराकार राम के भक्त थे और मूर्तिपूजा, बाह्य आडंबर तथा जाति-भेद का कड़ा विरोध करते थे। उनकी सरल, फक्कड़ और बेबाक भाषा में हिंदू-मुसलमान दोनों समाजों की कुरीतियों पर प्रहार है। उनकी रचनाएँ ‘बीजक’, ‘साखी’, ‘सबद’ और ‘रमैनी’ के रूप में संकलित हैं। सन् 1518 ई. में मगहर में उनका देहावसान हुआ।

(ख) कवि रहीम का परिचय दो।
उत्तरः कवि रहीम का पूरा नाम अब्दुर्रहीम खानखाना था। उनका जन्म सन् 1556 ई. में हुआ। वे सम्राट अकबर के प्रधान मंत्री बैरम खाँ के पुत्र और स्वयं अकबर के दरबार के नवरत्नों में से एक थे। रहीम संस्कृत, अरबी, फारसी और हिंदी के विद्वान, कुशल योद्धा एवं उदार दानी थे। गोस्वामी तुलसीदास से उनकी गहरी मित्रता थी। उनकी प्रसिद्ध रचनाएँ ‘रहीम सतसई’, ‘दोहावली’, ‘बरवै नायिका भेद’, ‘नगर-शोभा’ और ‘श्रृंगार-सोरठा’ हैं। सन् 1638 ई. में उनका निधन हुआ।

(ग) “मधुर बचन है औषधी, कटुक बचन है तीर” — साखी का सरल अर्थ लिखो।
उत्तरः इस साखी में संत कबीर कहते हैं कि मधुर वचन औषधि के समान होते हैं जो हृदय और मन को शीतलता तथा शांति देते हैं। इसके विपरीत कटु (कड़वे) वचन तीर के समान होते हैं जो कान के द्वार से प्रवेश करके पूरे शरीर को पीड़ा पहुँचाते हैं। इसलिए हमें सदा मधुर वाणी बोलनी चाहिए।

(घ) “रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिये डारि” — दोहे का गद्य-रूप लिखो।
उत्तरः रहीम कहते हैं कि बड़ी वस्तु को देखकर छोटी वस्तु को कभी नहीं छोड़ना चाहिए, क्योंकि प्रत्येक वस्तु का अपना महत्व और उपयोग है। जहाँ छोटी-सी सुई का काम होता है, वहाँ बड़ी तलवार किसी काम की नहीं होती। अतः किसी को छोटा या तुच्छ समझकर ठुकराना उचित नहीं।

5. निम्नलिखित दोहों के भावार्थ लिखो:

(क) निंदक नियरे राखिये, आँगन कुटी छवाय।
बिन पानी, साबुन बिना, निरमल करै सुभाय॥

उत्तरः भावार्थ — इस दोहे में संत कबीर कहते हैं कि निंदा करने वाले व्यक्ति को अपने पास ही रखना चाहिए, चाहे आँगन में कुटिया बनवाकर ही क्यों न रखना पड़े। निंदक हमारे दोषों को बार-बार बताकर हमें सुधरने का अवसर देता है। वह बिना पानी और साबुन के ही हमारे स्वभाव को निर्मल और शुद्ध बना देता है। इसलिए निंदक से क्रोध न करके उसका आभार मानना चाहिए, क्योंकि वह हमारा सबसे बड़ा हितैषी है।

(ख) रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून।
पानी गए न ऊबरै, मोती मानुस चून॥

उत्तरः भावार्थ — रहीम कहते हैं कि जीवन में ‘पानी’ अर्थात् मान-मर्यादा, स्वाभिमान और चमक को सदा बनाए रखना चाहिए, क्योंकि पानी के बिना सब कुछ सूना और व्यर्थ हो जाता है। पानी (चमक) चले जाने पर मोती की कोई कीमत नहीं रहती, मनुष्य की मान-प्रतिष्ठा (पानी = इज्जत) चले जाने पर वह समाज में सम्मान नहीं पाता और चूना (पानी = तरलता) के बिना उपयोगहीन हो जाता है। अतः जीवन में अपनी मर्यादा की रक्षा अवश्य करनी चाहिए।


सारांश (Summary in Hindi)

‘अमृत वाणी’ पाठ संत कबीरदास और कवि रहीम के दोहों का मनोहारी संकलन है। कबीर अपने दोहों के माध्यम से समझाते हैं कि मधुर वचन औषधि-समान हैं और कटु वचन तीर के समान घातक। निंदक को निकट रखकर अपना स्वभाव शुद्ध करना चाहिए। गुरु शिष्य के दोषों को कुम्हार की तरह सँवारता है। साधु की पहचान उसकी जाति से नहीं, ज्ञान से होती है। बुराई की खोज में निकले तो स्वयं ही सबसे बड़े दोषी सिद्ध होते हैं। रहीम सिखाते हैं कि अपनी व्यथा छिपाकर रखो, थोड़ी-सी विपत्ति हित-अहित की पहचान कराती है, मान-मर्यादा (पानी) की रक्षा करो, छोटे को तुच्छ न समझो और सच्चा बड़ा वही है जो गरीबों का सहारा बने — जैसे श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपनाया।

Summary (English)

This ASSEB Class 7 Hindi Pallav Bhag-2 lesson 16, ‘Amrit Vani’, is a curated collection of दोहे (couplets) by Sant Kabirdas (1398–1518 AD) and Kavi Rahim / Abdurrahim Khankhana (1556–1638 AD). Through these verses the poets teach timeless lessons: sweet words heal like medicine while harsh words pierce like arrows; keep your critic close because he polishes your nature without water or soap; the guru shapes his disciple as a potter shapes a pot — supporting from within while striking from outside. Do not ask a saint his caste, ask his wisdom. When seeking evil one finds none worse than oneself. Rahim advises hiding personal sorrow, valuing brief adversity that reveals true and false friends, preserving honour (‘pani’), respecting the small (a needle works where a sword cannot), and helping the poor — Krishna’s friendship with the destitute Sudama being the highest example of true greatness.

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