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एक तेजस्वी और दयावान बालक – Class 7 Hindi Elective Question Answer | ASSEB | पल्लव भाग-2

ASSEB (असम राज्य माध्यमिक शिक्षा बोर्ड) कक्षा 7 हिन्दी ऐच्छिक विषय पाठ्यपुस्तक पल्लव भाग-2 के पाठ 3 “एक तेजस्वी और दयावान बालक” का यह पूर्ण प्रश्नोत्तर समाधान HSLC Guru द्वारा तैयार किया गया है। यह पाठ स्वामी विवेकानन्द (बाल्यनाम — नरेन्द्रनाथ दत्त) के बाल-जीवन, उनकी निर्भीकता, दया-भाव, गुरु रामकृष्ण परमहंस से भेंट, संन्यास-ग्रहण, 1893 के शिकागो विश्व-धर्म-सम्मेलन में दिये गये ऐतिहासिक भाषण तथा रामकृष्ण मिशन की स्थापना — इन सब प्रसंगों को सजीव रूप से प्रस्तुत करता है। नीचे पाठ-परिचय, शब्दार्थ तथा पाठ्यपुस्तक के सभी अभ्यास-प्रश्नों के उत्तर क्रमवार दिये गये हैं।

पाठ-परिचय (Summary)

‘एक तेजस्वी और दयावान बालक’ पाठ भारत के महान संन्यासी, दार्शनिक तथा युवाओं के प्रेरणास्रोत स्वामी विवेकानन्द जी के बचपन से जुड़ी कुछ रोचक एवं प्रेरणाप्रद घटनाओं पर आधारित है। उनका वास्तविक नाम नरेन्द्रनाथ दत्त था और उनका जन्म 12 जनवरी 1863 को कलकत्ता (अब कोलकाता) के एक संपन्न बंगाली परिवार में हुआ। पिता विश्वनाथ दत्त उच्च न्यायालय के प्रसिद्ध अधिवक्ता तथा माता भुवनेश्वरी देवी एक धर्मपरायण महिला थीं। बचपन से ही नरेन्द्र अत्यन्त बुद्धिमान, साहसी, स्वाभिमानी और दूसरों के दुःख से शीघ्र द्रवित हो जाने वाले बालक थे।

पाठ में बताया गया है कि किस प्रकार बालक नरेन्द्र (पाठ में ‘वीरेश्वर’ नाम से सम्बोधित) ने एक दिन घोड़ागाड़ी के नीचे आ गये एक छोटे बच्चे को अपनी जान की परवाह किये बिना खींचकर बाहर निकाला और उसके प्राणों की रक्षा की। यह घटना उनके अदम्य साहस तथा करुणाशील हृदय का प्रत्यक्ष प्रमाण है। बड़े होकर अपने मन में उठने वाले आध्यात्मिक प्रश्नों के उत्तर ढूँढ़ते हुए वे दक्षिणेश्वर के काली-मन्दिर में श्री रामकृष्ण परमहंस के पास पहुँचे और उन्हें अपना गुरु बनाया। गुरुजी की प्रेरणा से नरेन्द्रनाथ ने संन्यास ग्रहण किया तथा ‘स्वामी विवेकानन्द’ के नाम से प्रसिद्ध हुए।

संन्यास के बाद उन्होंने सम्पूर्ण भारत का पैदल भ्रमण किया, गरीबी, अज्ञान और अन्धविश्वास की भयावह स्थिति को निकट से देखा और एक सशक्त, स्वावलम्बी भारत का स्वप्न देखा। 1893 ई. में अमेरिका के शिकागो शहर में आयोजित विश्व-धर्म-सम्मेलन में उन्होंने अपने ऐतिहासिक भाषण से सम्पूर्ण विश्व को भारत की आध्यात्मिक महानता से परिचित करवाया और ‘साइक्लोनिक हिन्दू’ के नाम से विख्यात हुए। भारत लौटकर उन्होंने दीन-दुखियों, असहायों एवं पीड़ित मानवता की सेवा हेतु ‘रामकृष्ण मिशन’ की स्थापना की। उनका जीवन भारतीय युवाओं को साहस, सेवा, त्याग एवं देशभक्ति की सीख देता है।


शब्दार्थ (Word Meanings)

शब्दअर्थ
तेजस्वीतेजवान, प्रतिभावान, ओजपूर्ण
दयावानदयालु, करुणावान
बालकबच्चा, लड़का
निर्भीकनिडर, साहसी
स्वाभिमानीआत्मसम्मान रखने वाला
घोड़ागाड़ीघोड़े से चलने वाली गाड़ी (टमटम)
लाचारविवश, असहाय, बेसहारा
संन्याससांसारिक मोह-माया का त्याग
संन्यासीसंन्यास लेने वाला, साधु
गुरुशिक्षा-दीक्षा देने वाले आचार्य
परमहंसअत्यन्त उच्च कोटि के संन्यासी की उपाधि
दक्षिणेश्वरकोलकाता के समीप स्थित प्रसिद्ध काली-मन्दिर का स्थान
आध्यात्मिकआत्मा-परमात्मा से सम्बन्धित
अन्धविश्वासबिना सोचे-समझे की गयी मान्यता
दरिद्रतागरीबी, निर्धनता
असहायजिसका कोई सहारा न हो
दीन-दुखीगरीब और दुःखी लोग
सेवासहायता करना, सुश्रूषा
स्थापनानींव डालना, संस्थापित करना
मिशनउद्देश्य, लक्ष्य; एक प्रकार की संस्था
सम्मेलनसभा, मीटिंग, गोष्ठी
विश्व-धर्म-सम्मेलनसंसार के विभिन्न धर्मों का सम्मेलन
विख्यातप्रसिद्ध, मशहूर
स्वावलम्बीअपने पैरों पर खड़ा रहने वाला
प्रेरणाउत्साह, प्रोत्साहन
उपदेशशिक्षा, सीख
देशभक्तिदेश के प्रति प्रेम और निष्ठा

अभ्यास (Question Answers)

1. सही उत्तर चुनकर लिखो :

(क) नरेन्द्रनाथ का जन्म कब हुआ था?
(i) 12 जनवरी 1863 ई.
(ii) 15 अगस्त 1863 ई.
(iii) 26 जनवरी 1863 ई.
उत्तरः (i) 12 जनवरी 1863 ई.

(ख) नरेन्द्रनाथ के पिता का नाम क्या था?
(i) रामकृष्ण दत्त
(ii) विश्वनाथ दत्त
(iii) भुवनेश्वर दत्त
उत्तरः (ii) विश्वनाथ दत्त।

(ग) नरेन्द्रनाथ की माता का नाम क्या था?
(i) शारदा देवी
(ii) सरस्वती देवी
(iii) भुवनेश्वरी देवी
उत्तरः (iii) भुवनेश्वरी देवी।

(घ) नरेन्द्रनाथ के गुरु कौन थे?
(i) स्वामी दयानन्द
(ii) रामकृष्ण परमहंस
(iii) महर्षि अरविन्द
उत्तरः (ii) रामकृष्ण परमहंस।

(ङ) विश्व-धर्म-सम्मेलन कहाँ हुआ था?
(i) न्यूयॉर्क में
(ii) लन्दन में
(iii) शिकागो में
उत्तरः (iii) शिकागो में।

2. रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए :

(क) नरेन्द्रनाथ का जन्म ________ नगर में हुआ था।
उत्तरः कलकत्ता (कोलकाता)।

(ख) बालक नरेन्द्र ने ________ के नीचे आ गये बच्चे को बचाया।
उत्तरः घोड़ागाड़ी।

(ग) नरेन्द्रनाथ की भेंट अपने गुरु से ________ के काली-मन्दिर में हुई थी।
उत्तरः दक्षिणेश्वर।

(घ) संन्यास लेने के बाद नरेन्द्रनाथ ________ के नाम से प्रसिद्ध हुए।
उत्तरः स्वामी विवेकानन्द।

(ङ) स्वामी विवेकानन्द ने ________ की स्थापना की।
उत्तरः रामकृष्ण मिशन।

(च) विश्व-धर्म-सम्मेलन सन् ________ ई. में हुआ था।
उत्तरः 1893।

3. एक-एक वाक्य में उत्तर दीजिए :

(क) इस पाठ में किस तेजस्वी और दयावान बालक की कथा कही गयी है?
उत्तरः इस पाठ में बालक नरेन्द्रनाथ दत्त (अर्थात् बाद के स्वामी विवेकानन्द) की कथा कही गयी है।

(ख) नरेन्द्रनाथ का जन्म कहाँ और कब हुआ था?
उत्तरः नरेन्द्रनाथ का जन्म 12 जनवरी 1863 ई. को कलकत्ता (कोलकाता) नगर में हुआ था।

(ग) बालक नरेन्द्र ने किसकी जान बचायी?
उत्तरः बालक नरेन्द्र ने घोड़ागाड़ी के नीचे आ गये एक छोटे बच्चे की जान बचायी।

(घ) नरेन्द्रनाथ ने किसे अपना गुरु बनाया?
उत्तरः नरेन्द्रनाथ ने श्री रामकृष्ण परमहंस को अपना गुरु बनाया।

(ङ) स्वामी विवेकानन्द ने किस संस्था की स्थापना की?
उत्तरः स्वामी विवेकानन्द ने ‘रामकृष्ण मिशन’ नामक संस्था की स्थापना की।

(च) विश्व-धर्म-सम्मेलन कहाँ और कब आयोजित हुआ था?
उत्तरः विश्व-धर्म-सम्मेलन सन् 1893 ई. में अमेरिका के शिकागो शहर में आयोजित हुआ था।

4. संक्षेप में उत्तर दीजिए :

(क) बालक नरेन्द्र ने अपना साहस किस प्रकार दिखाया?
उत्तरः एक दिन सड़क पर अचानक एक तेज दौड़ती घोड़ागाड़ी के नीचे एक छोटा बच्चा आ गया। उस समय नरेन्द्र अपनी ही धुन में सड़क के किनारे खड़े थे। जैसे ही उन्होंने यह दृश्य देखा, अपनी जान की चिन्ता किये बिना वे क्षण-भर में आगे बढ़े और बड़ी फुर्ती से उस बच्चे को घोड़ागाड़ी के नीचे से बाहर खींच लाये। इस प्रकार उन्होंने एक मासूम बच्चे की जान बचायी। उपस्थित सब लोगों ने उनके इस अदम्य साहस तथा दयालु स्वभाव की भूरि-भूरि प्रशंसा की।

(ख) नरेन्द्रनाथ की भेंट अपने गुरु से किस प्रकार हुई?
उत्तरः बड़े होते-होते नरेन्द्रनाथ के मन में ईश्वर, आत्मा, सत्य आदि के विषय में अनेक प्रश्न उठने लगे। वे जिससे भी अपने प्रश्न पूछते, उत्तर से सन्तुष्ट नहीं होते। एक दिन उन्होंने सुना कि दक्षिणेश्वर के काली-मन्दिर में श्री रामकृष्ण परमहंस नामक एक महान् सिद्ध-संन्यासी रहते हैं, जो ईश्वर के साक्षात् दर्शन कर चुके हैं। नरेन्द्र उनके पास पहुँचे और उनसे प्रश्न किया — “क्या आपने ईश्वर को देखा है?” रामकृष्ण परमहंस ने अत्यन्त दृढ़तापूर्वक उत्तर दिया — “हाँ, मैंने ईश्वर को उतनी ही स्पष्टता से देखा है, जितनी स्पष्टता से तुम्हें देख रहा हूँ।” इस उत्तर से नरेन्द्र अत्यन्त प्रभावित हुए और उन्होंने रामकृष्ण परमहंस को अपना गुरु स्वीकार कर लिया।

(ग) संन्यास लेने के बाद स्वामी विवेकानन्द ने क्या-क्या किया?
उत्तरः गुरुदेव के देहावसान के बाद नरेन्द्रनाथ ने संन्यास ग्रहण किया और ‘स्वामी विवेकानन्द’ के नाम से विख्यात हुए। उन्होंने सम्पूर्ण भारत का पैदल भ्रमण किया तथा देश की वास्तविक स्थिति को निकट से देखा। गरीबी, अशिक्षा, अन्धविश्वास तथा सामाजिक कुरीतियों ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया। उन्होंने एक सशक्त, स्वावलम्बी, शिक्षित एवं संगठित भारत का स्वप्न देखा। 1893 ई. में अमेरिका के शिकागो में आयोजित विश्व-धर्म-सम्मेलन में उन्होंने भाग लिया और अपने ओजस्वी भाषण से सम्पूर्ण विश्व को भारत की आध्यात्मिक महानता से परिचित कराया। भारत लौटकर उन्होंने दीन-दुखियों की सेवा के लिए ‘रामकृष्ण मिशन’ की स्थापना की।

(घ) रामकृष्ण मिशन की स्थापना का उद्देश्य क्या था?
उत्तरः रामकृष्ण मिशन की स्थापना का मुख्य उद्देश्य संसार के दीन-दुखी, असहाय, गरीब तथा पीड़ित मानवों की निःस्वार्थ सेवा करना था। इसके माध्यम से स्वामी विवेकानन्द शिक्षा, स्वास्थ्य, धर्म-प्रचार, सामाजिक उत्थान तथा मानव-कल्याण के कार्यों को संगठित ढंग से आगे बढ़ाना चाहते थे। उनका दृढ़ विश्वास था कि मानव-सेवा ही सच्ची ईश्वर-सेवा है।

(ङ) स्वामी विवेकानन्द को ‘तेजस्वी और दयावान बालक’ क्यों कहा गया है?
उत्तरः बचपन से ही नरेन्द्रनाथ अत्यन्त मेधावी, साहसी, स्वाभिमानी एवं ओजस्वी बालक थे — इसी कारण उन्हें ‘तेजस्वी’ कहा गया है। साथ ही, वे दूसरों के दुःख से शीघ्र द्रवित हो जाते थे, ज़रूरतमन्दों की तत्परता से सहायता करते थे और घोड़ागाड़ी के नीचे आ गये बच्चे को अपनी जान जोखिम में डालकर बचाने जैसी घटनाओं ने उनके करुणाशील हृदय को उजागर किया — इसी कारण उन्हें ‘दयावान’ कहा गया है। तेज और दया का यह दुर्लभ मेल ही उन्हें ‘तेजस्वी और दयावान बालक’ बनाता है।

5. विस्तारपूर्वक उत्तर दीजिए :

(क) स्वामी विवेकानन्द के जीवन से हमें कौन-कौन सी प्रेरणाएँ मिलती हैं?
उत्तरः स्वामी विवेकानन्द का जीवन भारतीय युवाओं के लिए सर्वथा अनुकरणीय है। उनके जीवन से हमें निम्नलिखित प्रेरणाएँ मिलती हैं —

  • निडरता एवं आत्मविश्वास से जीवन की हर चुनौती का सामना करना चाहिए।
  • दूसरों के प्रति दया, करुणा तथा सहायता का भाव रखना चाहिए।
  • मानव-सेवा ही सच्ची ईश्वर-सेवा है।
  • शिक्षा का उद्देश्य केवल पुस्तकीय ज्ञान नहीं, चरित्र-निर्माण भी है।
  • ‘उठो, जागो और तब तक मत रुको, जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाये।’
  • देश और समाज की उन्नति के लिए युवा-शक्ति को संगठित होकर कार्य करना चाहिए।
  • अपने धर्म, संस्कृति तथा राष्ट्र पर गर्व करना चाहिए।

(ख) शिकागो में दिये गये भाषण से स्वामी विवेकानन्द ने क्या प्रसिद्धि प्राप्त की?
उत्तरः सन् 1893 ई. में अमेरिका के शिकागो शहर में आयोजित विश्व-धर्म-सम्मेलन में स्वामी विवेकानन्द ने भारत का प्रतिनिधित्व किया। उन्होंने अपने भाषण का आरम्भ ‘अमेरिका के मेरे भाइयों और बहनों’ इन शब्दों से किया, जिसे सुनकर सभा-स्थल कई मिनटों तक तालियों की गड़गड़ाहट से गूँजता रहा। उन्होंने हिन्दू-धर्म की उदारता, सर्वधर्म-समन्वय की भावना तथा भारतीय आध्यात्मिक चिन्तन की महानता को विश्व के सम्मुख प्रस्तुत किया। उनके इस ओजस्वी भाषण के कारण पाश्चात्य जगत् ने उन्हें ‘साइक्लोनिक हिन्दू’ (तूफानी हिन्दू सन्त) के नाम से सम्मानित किया और भारत की आध्यात्मिक गरिमा सम्पूर्ण विश्व में प्रतिष्ठित हुई।

6. वाक्यों में प्रयोग कीजिए :

शब्दवाक्य-प्रयोग
तेजस्वीनरेन्द्रनाथ बचपन से ही एक तेजस्वी बालक थे।
दयावानहमें सदैव दीन-दुखियों के प्रति दयावान बने रहना चाहिए।
संन्यासनरेन्द्रनाथ ने युवावस्था में ही संन्यास ग्रहण कर लिया।
लाचारलाचार लोगों की सहायता करना हमारा परम कर्तव्य है।
प्रेरणास्वामी विवेकानन्द का जीवन हमें महान् प्रेरणा देता है।
देशभक्तिहमें देशभक्ति की भावना से ओत-प्रोत होना चाहिए।

7. विलोम शब्द लिखिए :

शब्दविलोम
तेजस्वीनिस्तेज
दयावाननिर्दय
साहसीकायर
ज्ञानअज्ञान
विश्वासअविश्वास
स्वावलम्बीपरावलम्बी
स्वदेशविदेश
मित्रशत्रु

8. पर्यायवाची शब्द लिखिए :

शब्दपर्यायवाची
बालकबच्चा, शिशु, बाल, कुमार
गुरुशिक्षक, आचार्य, उपाध्याय
ईश्वरपरमात्मा, भगवान, प्रभु
देशराष्ट्र, मुल्क, वतन
सेवाशुश्रूषा, टहल, परिचर्या
संसारजगत्, विश्व, दुनिया

9. लिंग बदलिए :

पुल्लिंगस्त्रीलिंग
बालकबालिका
संन्यासीसंन्यासिनी
गुरुगुरुआइन / गुरु-पत्नी
विद्वानविदुषी
लड़कालड़की
पितामाता

10. वचन बदलिए :

एकवचनबहुवचन
बालकबालक / बालकगण
लड़कालड़के
घोड़ाघोड़े
पुस्तकपुस्तकें
कथाकथाएँ
घटनाघटनाएँ

Summary (English)

Lesson 3 of ASSEB Class 7 Hindi (Pallav Bhag-2), titled “एक तेजस्वी और दयावान बालक” (A Brilliant and Compassionate Child), is a biographical sketch of Swami Vivekananda, originally named Narendranath Dutta. Born on 12 January 1863 in Calcutta to Vishwanath Dutta and Bhuvaneshwari Devi, Narendra was, from his earliest years, an exceptionally bright, fearless and kind-hearted child. The lesson narrates a celebrated incident in which the boy, risking his own life, pulled a small child out from under a fast-moving horse-cart, demonstrating his rare combination of courage and compassion.

Driven by deep spiritual questions, young Narendra met Sri Ramakrishna Paramahamsa at the Dakshineshwar Kali temple and accepted him as his guru. After taking sannyasa, he became known as Swami Vivekananda, travelled across India on foot, and witnessed at first hand the country’s poverty, illiteracy and superstition. At the World Parliament of Religions held in Chicago in 1893, his historic address introduced the world to India’s spiritual greatness and earned him the title of the “Cyclonic Hindu.” On returning to India, he founded the Ramakrishna Mission to serve the poor, the helpless and the suffering. The chapter inspires students to cultivate courage, compassion, self-reliance, service and patriotism in their own lives.

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