यहाँ ASSEB (Assam State Board of Secondary Education) कक्षा 6 के हिंदी (ऐच्छिक/तृतीय भाषा) की पाठ्यपुस्तक पल्लव भाग-1 के पाठ 12 – अभ्यास की महिमा के सभी प्रश्नों के उत्तर सरल भाषा में दिए गए हैं। यह पाठ अभ्यास के महत्व पर आधारित है, जिसमें यह बताया गया है कि निरंतर अभ्यास से कठिन से कठिन काम भी सरल हो जाता है। इस पाठ में महान कवि कालिदास के जीवन की प्रसिद्ध कथा के माध्यम से यह शिक्षा दी गई है कि बुद्धि, विद्या और कला — सब कुछ अभ्यास से ही प्राप्त होते हैं। बिना अभ्यास के किसी भी क्षेत्र में सफलता संभव नहीं है।
पाठ-परिचय (Summary)
संसार में जो भी महान व्यक्ति हुए हैं, वे जन्म से महान नहीं थे। वे निरंतर अभ्यास और परिश्रम के बल पर ही महान बने। अभ्यास में बड़ी शक्ति होती है। अभ्यास से मूर्ख भी विद्वान बन जाता है, कमज़ोर भी बलवान हो जाता है और साधारण व्यक्ति भी असाधारण कार्य कर दिखाता है। बिना अभ्यास के बुद्धि, विद्या और कला कुछ भी नहीं टिकते। इसलिए जीवन में सफलता पाने के लिए निरंतर अभ्यास आवश्यक है।
इस पाठ में महाकवि कालिदास का उदाहरण दिया गया है। बचपन में कालिदास बहुत मूर्ख थे। एक बार वे एक पेड़ की उसी डाल को काट रहे थे जिस पर वे स्वयं बैठे थे। उनकी मूर्खता पर लोग हँसते थे। परंतु बाद में उन्होंने माँ सरस्वती की कृपा और अपने अथक अभ्यास से विद्या प्राप्त की और संस्कृत साहित्य के सबसे महान कवि बन गए। उनकी रचनाएँ — ‘अभिज्ञानशाकुंतलम्’, ‘मेघदूत’, ‘रघुवंश’ आदि — आज भी संसार-भर में प्रसिद्ध हैं। यह सब उनके निरंतर अभ्यास का ही फल था।
इसी प्रकार वरदराज नामक एक मंदबुद्धि बालक की कथा भी प्रसिद्ध है। वह पढ़ाई में बहुत कमज़ोर था। एक दिन गुरुजी ने उसे पढ़ाई छोड़ने को कह दिया। निराश होकर वह जंगल की ओर चल पड़ा। रास्ते में उसने एक कुएँ के पास रस्सी से पत्थर पर पड़े गहरे निशान देखे। उसने सोचा — जब रस्सी जैसी मुलायम वस्तु बार-बार रगड़ने से कठोर पत्थर पर निशान डाल सकती है, तो निरंतर अभ्यास से मेरा मन भी विद्या ग्रहण कर सकता है। यह सोचकर वह वापस लौटा और मन लगाकर पढ़ने लगा। आगे चलकर वही वरदराज महान विद्वान बना और ‘लघुसिद्धान्तकौमुदी’ जैसे प्रसिद्ध संस्कृत व्याकरण-ग्रंथ की रचना की। इस प्रकार यह पाठ हमें यह शिक्षा देता है कि अभ्यास से ही मनुष्य महान बनता है।
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| अभ्यास | बार-बार किया जाने वाला कार्य, रियाज़ |
| महिमा | महत्व, गौरव, बड़प्पन |
| निरंतर | लगातार, बिना रुके |
| परिश्रम | मेहनत |
| विद्वान | पढ़ा-लिखा, ज्ञानी व्यक्ति |
| मूर्ख | बुद्धिहीन, नासमझ |
| मंदबुद्धि | कम बुद्धि वाला |
| निराश | हताश, उम्मीद खोया हुआ |
| कुआँ | पानी निकालने का गहरा गड्ढा |
| रस्सी | डोरी |
| निशान | चिह्न, दाग |
| कठोर | सख़्त, कड़ा |
| मुलायम | नरम |
| रगड़ना | घिसना |
| ग्रहण करना | स्वीकार करना, सीख लेना |
| महाकवि | बहुत बड़ा कवि |
| रचना | लिखी हुई कृति |
| प्रसिद्ध | मशहूर, ख्यात |
| कृपा | दया, अनुग्रह |
| साधारण | आम, सामान्य |
| असाधारण | विशेष, अद्भुत |
| बलवान | शक्तिशाली |
| कमज़ोर | दुर्बल |
| सफलता | कामयाबी |
| शिक्षा | सीख, उपदेश |
अभ्यास (Question Answers)
बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQ)
प्रश्न 1: इस पाठ का नाम क्या है?
(क) विद्या की महिमा (ख) अभ्यास की महिमा (ग) परिश्रम का फल (घ) कालिदास की कथा
उत्तरः (ख) अभ्यास की महिमा।
प्रश्न 2: अभ्यास से क्या होता है?
(क) समय बर्बाद होता है (ख) कठिन काम सरल हो जाता है (ग) थकान बढ़ती है (घ) कुछ नहीं होता
उत्तरः (ख) कठिन काम सरल हो जाता है।
प्रश्न 3: कालिदास बचपन में कैसे थे?
(क) बहुत बुद्धिमान (ख) बहुत मूर्ख (ग) बहुत अमीर (घ) बहुत बीमार
उत्तरः (ख) बहुत मूर्ख।
प्रश्न 4: कालिदास किस भाषा के महान कवि थे?
(क) हिंदी (ख) अंग्रेज़ी (ग) संस्कृत (घ) असमिया
उत्तरः (ग) संस्कृत।
प्रश्न 5: वरदराज ने कुएँ के पास क्या देखा?
(क) पानी (ख) रस्सी से पत्थर पर पड़े निशान (ग) फूल (घ) पक्षी
उत्तरः (ख) रस्सी से पत्थर पर पड़े निशान।
प्रश्न 6: ‘अभिज्ञानशाकुंतलम्’ किसकी रचना है?
(क) तुलसीदास (ख) कबीरदास (ग) कालिदास (घ) वरदराज
उत्तरः (ग) कालिदास।
प्रश्न 7: इस पाठ से हमें क्या शिक्षा मिलती है?
(क) आलस्य अच्छा है (ख) निरंतर अभ्यास से सब कुछ संभव है (ग) पढ़ाई व्यर्थ है (घ) भाग्य ही सब कुछ है
उत्तरः (ख) निरंतर अभ्यास से सब कुछ संभव है।
अति लघु प्रश्नोत्तर (Very Short Answers)
प्रश्न 1: ‘अभ्यास’ का क्या अर्थ है?
उत्तरः ‘अभ्यास’ का अर्थ है किसी कार्य को बार-बार करना अर्थात् निरंतर रियाज़ करना।
प्रश्न 2: अभ्यास से क्या लाभ होता है?
उत्तरः अभ्यास से कठिन कार्य भी सरल हो जाता है और मनुष्य अपने क्षेत्र में सफलता प्राप्त करता है।
प्रश्न 3: कालिदास कौन थे?
उत्तरः कालिदास संस्कृत भाषा के महान कवि थे।
प्रश्न 4: कालिदास की दो प्रमुख रचनाओं के नाम लिखो।
उत्तरः कालिदास की दो प्रमुख रचनाएँ हैं — ‘अभिज्ञानशाकुंतलम्’ और ‘मेघदूत’।
प्रश्न 5: वरदराज कौन थे?
उत्तरः वरदराज एक मंदबुद्धि बालक थे, जो आगे चलकर अभ्यास के बल पर महान विद्वान बने।
प्रश्न 6: वरदराज ने कुएँ के पास क्या देखा?
उत्तरः वरदराज ने कुएँ के पास पत्थर पर रस्सी से बार-बार रगड़ खाने के कारण पड़े गहरे निशान देखे।
प्रश्न 7: रस्सी के निशान देखकर वरदराज ने क्या सोचा?
उत्तरः वरदराज ने सोचा कि जब रस्सी जैसी मुलायम वस्तु बार-बार रगड़ने से पत्थर पर निशान डाल सकती है, तो निरंतर अभ्यास से मेरा मन भी विद्या ग्रहण कर सकता है।
प्रश्न 8: इस पाठ से हमें क्या शिक्षा मिलती है?
उत्तरः इस पाठ से हमें यह शिक्षा मिलती है कि निरंतर अभ्यास से ही मनुष्य महान बनता है और जीवन में सफलता प्राप्त करता है।
रिक्त स्थान भरो
- अभ्यास से मूर्ख भी विद्वान बन जाता है।
- कालिदास संस्कृत के महान कवि थे।
- वरदराज ने कुएँ के पास पत्थर पर रस्सी के निशान देखे।
- रस्सी मुलायम और पत्थर कठोर होता है।
- निरंतर अभ्यास से ही सफलता मिलती है।
- ‘अभिज्ञानशाकुंतलम्’ कालिदास की रचना है।
लघु प्रश्नोत्तर (Short Answer Questions)
प्रश्न 1: अभ्यास की महिमा क्या है?
उत्तरः अभ्यास की महिमा बहुत बड़ी है। अभ्यास से कठिन से कठिन कार्य भी सरल हो जाता है। निरंतर अभ्यास से मूर्ख विद्वान बन जाता है, कमज़ोर बलवान बन जाता है और साधारण व्यक्ति भी असाधारण काम करके दिखाता है। संसार के सभी महान व्यक्ति निरंतर अभ्यास के बल पर ही महान बने हैं।
प्रश्न 2: कालिदास के बचपन के बारे में लिखो।
उत्तरः कालिदास बचपन में बहुत मूर्ख थे। उन्हें कुछ भी समझ नहीं आता था। एक बार वे एक पेड़ की उसी डाल को काट रहे थे जिस पर वे स्वयं बैठे थे। उनकी इस मूर्खता पर लोग बहुत हँसते थे। परंतु बाद में माँ सरस्वती की कृपा और अपने अथक अभ्यास से वे संस्कृत के सबसे महान कवि बन गए।
प्रश्न 3: वरदराज की कथा संक्षेप में लिखो।
उत्तरः वरदराज एक मंदबुद्धि बालक थे। वे पढ़ाई में बहुत कमज़ोर थे, इसलिए एक दिन गुरुजी ने उन्हें पढ़ाई छोड़ने को कह दिया। निराश होकर वे जंगल की ओर चल पड़े। रास्ते में उन्होंने कुएँ के पास पत्थर पर रस्सी के घिसने से पड़े गहरे निशान देखे। उन्होंने सोचा कि जब मुलायम रस्सी कठोर पत्थर पर निशान डाल सकती है, तो अभ्यास से मेरा मन भी विद्या ग्रहण कर सकता है। यह सोचकर वे वापस लौटे, मन लगाकर पढ़े और आगे चलकर महान विद्वान बने।
प्रश्न 4: रस्सी और पत्थर के उदाहरण से वरदराज ने क्या सीख ली?
उत्तरः वरदराज ने यह सीख ली कि जब रस्सी जैसी मुलायम वस्तु भी बार-बार रगड़ने से कठोर पत्थर पर गहरे निशान डाल सकती है, तो निरंतर अभ्यास से मनुष्य का मन भी विद्या ग्रहण कर सकता है। उन्हें विश्वास हो गया कि अभ्यास से कोई भी काम असंभव नहीं है।
प्रश्न 5: इस पाठ से क्या शिक्षा मिलती है?
उत्तरः इस पाठ से हमें यह शिक्षा मिलती है कि निरंतर अभ्यास से कठिन से कठिन कार्य भी संभव हो जाता है। बुद्धि, विद्या और कला सब अभ्यास से ही प्राप्त होते हैं। इसलिए हमें कभी निराश नहीं होना चाहिए और मन लगाकर अभ्यास करते रहना चाहिए।
दीर्घ प्रश्नोत्तर (Long Answer Questions)
प्रश्न 1: ‘अभ्यास की महिमा’ पाठ का सारांश अपने शब्दों में लिखो।
उत्तरः ‘अभ्यास की महिमा’ पाठ हमें यह सिखाता है कि अभ्यास में बड़ी शक्ति है। संसार में जो भी महान व्यक्ति हुए हैं — कवि, विद्वान, कलाकार, खिलाड़ी — वे जन्म से महान नहीं थे, अपितु निरंतर अभ्यास और परिश्रम से महान बने। इस पाठ में दो उदाहरण दिए गए हैं। पहला उदाहरण महाकवि कालिदास का है, जो बचपन में बहुत मूर्ख थे, परंतु अभ्यास और माँ सरस्वती की कृपा से संस्कृत के महान कवि बने और ‘अभिज्ञानशाकुंतलम्’, ‘मेघदूत’, ‘रघुवंश’ जैसी अमर रचनाएँ रचीं। दूसरा उदाहरण वरदराज का है, जो मंदबुद्धि होने के कारण गुरुजी से डाँट खाकर निराश हो गए थे; पर कुएँ के पास पत्थर पर रस्सी के निशान देखकर उन्हें यह बोध हुआ कि अभ्यास से कुछ भी असंभव नहीं है। इसके बाद उन्होंने मन लगाकर पढ़ाई की और महान विद्वान बने। इस प्रकार यह पाठ हमें बताता है कि अभ्यास से ही मनुष्य अपने जीवन को सफल बना सकता है।
प्रश्न 2: कालिदास और वरदराज की कथाओं से हम क्या सीखते हैं?
उत्तरः कालिदास और वरदराज की कथाओं से हमें ये महत्वपूर्ण शिक्षाएँ मिलती हैं —
- कोई भी जन्म से महान नहीं होता — अभ्यास और परिश्रम से ही महानता प्राप्त होती है।
- मूर्खता कोई स्थायी अवस्था नहीं है — कालिदास जैसे मूर्ख बालक भी अभ्यास से महाकवि बन सकते हैं।
- निराश नहीं होना चाहिए — वरदराज की तरह यदि हम मन लगाकर मेहनत करें, तो कमज़ोर बुद्धि भी तेज़ हो जाती है।
- निरंतरता का महत्व — रस्सी पत्थर पर तब निशान डालती है जब वह बार-बार रगड़ी जाती है।
- विद्या और कला अभ्यास से सिद्ध होती हैं — बिना अभ्यास के ज्ञान भी टिकता नहीं।
- आत्मविश्वास और लगन ही जीवन में सफलता की कुंजी हैं।
प्रश्न 3: ‘अभ्यास से सब कुछ संभव है’ — इस कथन को उदाहरणों से समझाओ।
उत्तरः ‘अभ्यास से सब कुछ संभव है’ यह कथन पूर्णतः सत्य है। प्रकृति में हम देखते हैं कि कुएँ की जगत के पत्थर पर मुलायम रस्सी भी बार-बार रगड़ खाने से गहरे निशान बना देती है। नदी का पानी निरंतर बहने से बड़ी-बड़ी चट्टानों को भी काट देता है। चींटी जैसे छोटे जीव भी निरंतर परिश्रम से बड़े-बड़े दाने अपनी बिल तक पहुँचा देते हैं। मनुष्य के जीवन में भी ऐसा ही है — मूर्ख कालिदास अभ्यास से महाकवि बने, मंदबुद्धि वरदराज महान व्याकरणाचार्य बने, और आज भी संगीतकार, खिलाड़ी, वैज्ञानिक तथा कलाकार निरंतर अभ्यास से ही ऊँचाइयाँ छूते हैं। इसलिए हमें भी अपने जीवन में नियमित अभ्यास का अभ्यास डालना चाहिए, क्योंकि करत-करत अभ्यास के, जड़मति होत सुजान।
व्याकरण (Grammar)
वचन बदलो
| एकवचन | बहुवचन |
|---|---|
| कवि | कविगण |
| रचना | रचनाएँ |
| पुस्तक | पुस्तकें |
| बालक | बालकों |
| निशान | निशानों |
| पेड़ | पेड़ों |
विलोम शब्द
| शब्द | विलोम |
|---|---|
| विद्वान | मूर्ख |
| कठोर | मुलायम |
| सफलता | असफलता |
| बलवान | कमज़ोर |
| साधारण | असाधारण |
| निराशा | आशा |
पर्यायवाची शब्द
| शब्द | पर्यायवाची |
|---|---|
| विद्या | ज्ञान, शिक्षा |
| परिश्रम | मेहनत, श्रम |
| प्रसिद्ध | मशहूर, ख्यात |
| पत्थर | शिला, चट्टान |
| निरंतर | लगातार, अनवरत |
| कवि | शायर, कविवर |
Summary (English)
Lesson 12 of ASSEB Class 6 Hindi (Elective) Pallav Bhag-1, “अभ्यास की महिमा” (The Glory of Practice), highlights the immense power of continuous practice in human life. The lesson teaches that no one is born great — even the most ordinary person can rise to greatness through regular effort and perseverance. Two famous examples illustrate this truth. The first is the great Sanskrit poet Kalidasa, who was a foolish boy in his childhood and was once seen cutting the very branch of a tree on which he was sitting. Through Goddess Saraswati’s blessings and tireless practice, he became the greatest Sanskrit poet, composing immortal works like ‘Abhijnanashakuntalam’, ‘Meghaduta’, and ‘Raghuvamsha’. The second example is of Varadaraja, a slow-witted boy who, when scolded by his teacher and rejected for being dull, ran away in despair. Near a well, he noticed deep marks made by a soft rope on a hard stone and realised that if a soft rope could leave marks on hard stone through repeated rubbing, then his mind too could absorb knowledge through constant practice. He returned, studied diligently, and went on to become a great scholar who composed the famous Sanskrit grammar ‘Laghusiddhantakaumudi’. The lesson concludes with the timeless message: through continuous practice, even the dullest mind becomes wise — “करत-करत अभ्यास के, जड़मति होत सुजान।”