इस लेख में हम ASSEB (असम माध्यमिक शिक्षा बोर्ड) कक्षा 10 हिंदी ऐच्छिक के पाठ्यपुस्तक आलोक भाग-2 के अध्याय 12 (कविता 6) — मृत्तिका के सभी प्रश्नोत्तर प्रस्तुत कर रहे हैं। यह कविता प्रसिद्ध हिंदी कवि नरेश मेहता द्वारा रचित है। इस लेख में कविता का सारांश, कवि-परिचय, सप्रसंग व्याख्या, पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर, अतिरिक्त महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर, काव्य-सौंदर्य और शब्दार्थ सम्मिलित हैं। HSLC परीक्षा की तैयारी के लिए यह लेख अत्यंत उपयोगी है।
कविता का सारांश (Summary of the Poem)
नरेश मेहता द्वारा रचित मृत्तिका कविता मिट्टी और मानव के बीच के गहरे और अटूट संबंध को दर्शाती है। इस कविता में मिट्टी स्वयं बोलती है और मनुष्य के परिश्रम के माध्यम से अपने विभिन्न रूपों का वर्णन करती है। कविता का मूल भाव यह है कि मिट्टी स्वयं तो निर्जीव है, परंतु मानवीय श्रम और पुरुषार्थ से वह नाना रूप धारण कर लेती है। कवि यह संदेश देना चाहते हैं कि मनुष्य का परिश्रम ही सच्चा देवत्व है।
कविता में मिट्टी कहती है कि जब किसान उसे पैरों से रौंदता है और हल के फाल से विदीर्ण करता है, तब वह माँ के समान धन-धान्य देकर परिवार का पालन-पोषण करती है — इस रूप में वह मातृरूपा बन जाती है। जब कुम्हार उसे हाथों से स्पर्श करता है, चाक पर चढ़ाकर घुमाता है, तब वह कुंभ और कलश बनकर जल लाती है — इस रूप में वह अंतरंग प्रिया बन जाती है। जब मेले में मिट्टी के खिलौने बनाकर बच्चों के हाथ में दिए जाते हैं, तब वह बालक-बालिकाओं की क्रीड़ा-सहचरी बनकर प्रजारूपा हो जाती है।
कविता का सबसे महत्वपूर्ण भाव अंतिम पद में है — जब मनुष्य अपने अहंकार को पराजित करके, सच्चे पुरुषार्थ के साथ मिट्टी को पुकारता है, तब मिट्टी अपने ग्राम्य देवत्व के साथ चिन्मयी शक्ति बन जाती है और प्रतिमा का रूप धारण कर पूज्य हो जाती है। कवि का निष्कर्ष है कि “यह सबसे बड़ा देवत्व है, कि तुम पुरुषार्थ करते मनुष्य हो और मैं स्वरूप पाती मृत्तिका।”
इस कविता में कवि ने मिट्टी को सृष्टि के आधार के रूप में प्रतिष्ठित किया है। मिट्टी से ही अन्न उपजता है, मिट्टी से ही बर्तन बनते हैं, मिट्टी से ही खिलौने और मूर्तियाँ बनती हैं — अर्थात मनुष्य का सम्पूर्ण जीवन मिट्टी से जुड़ा है। कवि का संदेश है कि मनुष्य जब तक परिश्रमशील रहेगा, मिट्टी उसे नित नया रूप और नई शक्ति देती रहेगी। पुरुषार्थ ही वह दिव्य शक्ति है जो जड़ मिट्टी को भी चेतना प्रदान कर देती है।
कवि-परिचय (About the Poet)
नरेश मेहता (15 फरवरी, 1922 — 22 नवंबर, 2000) हिंदी के प्रसिद्ध आधुनिक कवि, उपन्यासकार, नाटककार और निबंधकार थे। उनका जन्म मध्यप्रदेश के मालवा अंचल के शाजापुर कस्बे में हुआ था। बचपन में ही उनकी माँ का देहांत हो गया था, जिससे उनका बचपन संघर्षपूर्ण रहा। उनकी प्रारंभिक शिक्षा उज्जैन के माधव कॉलेज में हुई और उन्होंने काशी हिंदू विश्वविद्यालय से हिंदी में एम.ए. किया।
नरेश मेहता दूसरा सप्तक के प्रमुख कवियों में से एक थे। वे नई कविता आंदोलन के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर थे। उन्होंने आकाशवाणी, इलाहाबाद में कार्यक्रम अधिकारी के रूप में कार्य किया। बाद में वे ‘कृति’ और ‘आगामी कल’ पत्रिकाओं के संपादक रहे तथा ‘चौथा संसार’ दैनिक समाचार-पत्र के प्रधान संपादक भी रहे। उन्होंने सन् 1985 से 1992 तक प्रेमचंद सृजनपीठ के निदेशक पद पर भी कार्य किया।
नरेश मेहता की रचनाएँ अत्यंत विपुल और विविध हैं। काव्य के क्षेत्र में उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं — अरण्या, बोलने दो चीड़ को, उत्सवा, महाप्रस्थान, संशय की एक रात, प्रवाद पर्व, दो एकांत, पुरुष, यह पथ बंधु था, हम अनिकेतन, धूमकेतुः एक श्रुति। उपन्यास के क्षेत्र में डूबते मस्तूल, यह पथ बंधु था, नदी यशस्वी है आदि उल्लेखनीय हैं। उनकी संपूर्ण रचनाएँ श्री नरेश मेहता रचनावली (11 खंड) में संकलित हैं।
साहित्य के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान के लिए उन्हें सन् 1988 में साहित्य अकादमी पुरस्कार (काव्य संग्रह ‘अरण्या’ के लिए) और सन् 1992 में भारत के सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार से विभूषित किया गया। 22 नवंबर, 2000 को भोपाल में उनका निधन हो गया। उनकी कविताएँ मानवीय मूल्यों, श्रम की महिमा, प्रकृति-प्रेम और दार्शनिक चिंतन से ओतप्रोत हैं।
कविता की सप्रसंग व्याख्या (Stanza-wise Explanation)
पद 1:
जब तुम मुझे पैरों से रौंदते हो
तथा हल के फाल से विदीर्ण करते हो
तब मैं —
धन-धान्य बनकर मातृरूपा हो जाती हूँ।
प्रसंग: यह पंक्तियाँ नरेश मेहता की कविता ‘मृत्तिका’ से ली गई हैं। यहाँ मिट्टी स्वयं मनुष्य से संवाद करते हुए अपना पहला रूप बताती है।
व्याख्या: मिट्टी कहती है कि जब किसान उसे अपने पैरों से रौंदता है और हल के फाल (धारदार लोहे के अग्रभाग) से उसे काटता-फाड़ता है, उसकी छाती को चीरता है — तब वह बीज को अंकुरित करके धन-धान्य के रूप में फसल उगाती है और माँ की तरह सबका पालन-पोषण करती है। यहाँ मिट्टी का मातृरूपा होना उसकी उस शक्ति का प्रतीक है जिससे वह सृष्टि का पोषण करती है। किसान का श्रम — रौंदना और जोतना — मिट्टी को उर्वर बनाता है। बिना परिश्रम के मिट्टी बंजर रहती है, परंतु मनुष्य के पुरुषार्थ से वह अन्नपूर्णा माँ का रूप ले लेती है।
पद 2:
जब तुम मुझे हाथों से स्पर्श करते हो
तथा चाक पर चढ़ाकर घुमाने लगते हो
तब मैं —
कुंभ और कलश बनकर जल लाती
तुम्हारी अंतरंग प्रिया हो जाती हूँ।
प्रसंग: यह पंक्तियाँ कविता ‘मृत्तिका’ से ली गई हैं। इस पद में मिट्टी कुम्हार के हाथों से बनाए जाने वाले बर्तनों के माध्यम से अपना दूसरा रूप दर्शाती है।
व्याख्या: मिट्टी कहती है कि जब कुम्हार उसे अपने कोमल हाथों से सहलाता है और चाक पर चढ़ाकर गोलाई में घुमाता है — तब वह कुंभ (मटका) और कलश (लोटा) का रूप लेकर जल भरने का काम करती है और उस घर की अंतरंग प्रिया (प्रेम-पात्री) बन जाती है। यहाँ ‘अंतरंग प्रिया’ का तात्पर्य उस घनिष्ठता से है जो मिट्टी के बर्तनों और गृहिणी के बीच होती है। कलश और मटके में संग्रहीत जल जीवन की प्यास बुझाता है, पूजा में उपयोग होता है। कुम्हार का हस्तकौशल और परिश्रम साधारण मिट्टी को उपयोगी और सुंदर बर्तनों में रूपांतरित कर देता है।
पद 3:
जब तुम मुझे मेले में
खिलौने का रूप देते हो
तब मैं —
शिशु-हाथों तक पहुँचकर
प्रजारूपा हो जाती हूँ।
प्रसंग: यह पंक्तियाँ कविता ‘मृत्तिका’ से ली गई हैं। इस पद में मिट्टी मेले में बनाए जाने वाले खिलौनों के माध्यम से अपना तीसरा रूप — प्रजारूपा — दर्शाती है।
व्याख्या: मिट्टी कहती है कि जब कारीगर उसे मेले में खिलौनों का रूप देता है — हाथी, घोड़ा, गुड़िया आदि — और वे खिलौने नन्हें-मुन्ने बच्चों के कोमल हाथों तक पहुँचते हैं — तब मिट्टी प्रजारूपा (जन-साधारण का रूप, लोक-रूप) हो जाती है। मिट्टी के खिलौने गरीब से गरीब बच्चे के भी खेल के साथी होते हैं — यह मिट्टी की सर्वसुलभता और सर्वव्यापकता का प्रतीक है। यहाँ ‘प्रजा’ शब्द का अर्थ है — सामान्य जन, लोक। मिट्टी के खिलौनों में बच्चों की मासूम खुशी और स्नेह मिट्टी को जीवंत बना देते हैं।
पद 4:
पर जब भी तुम
अपने पुरुषार्थ-पराजित स्वत्व से
मुझे पुकारते हो
तब मैं —
अपने ग्राम्य देवत्व के साथ
चिन्मयी शक्ति हो जाती हूँ।
प्रतिमा बन तुम्हारी आराध्या हो जाती हूँ।
यह सबसे बड़ा देवत्व है,
कि तुम पुरुषार्थ करते मनुष्य हो
और मैं स्वरूप पाती मृत्तिका।
प्रसंग: यह कविता ‘मृत्तिका’ का अंतिम और सर्वाधिक महत्वपूर्ण पद है। इसमें कवि कविता का चरम भाव और केंद्रीय संदेश प्रस्तुत करता है।
व्याख्या: मिट्टी कहती है कि जब मनुष्य अपने पुरुषार्थ से अपने अहंकार को पराजित करके, विनम्रता और श्रद्धा के साथ उसे (मिट्टी को) पुकारता है — तब वह ग्राम्य देवत्व (गाँव के देवी-देवताओं की शक्ति) धारण करके चिन्मयी शक्ति (चेतना से युक्त ऊर्जा) बन जाती है। वही मिट्टी प्रतिमा (मूर्ति) का रूप लेकर मनुष्य की आराध्य देवी बन जाती है। ‘पुरुषार्थ-पराजित स्वत्व’ का अर्थ है — वह अवस्था जब मनुष्य अपने अहंकार को त्यागकर निष्काम श्रम करता है। कविता का सबसे बड़ा संदेश है — मनुष्य का परिश्रम और पुरुषार्थ ही सबसे बड़ा देवत्व है; इसी के कारण जड़ मिट्टी भी रूप, अर्थ और चेतना प्राप्त करती है।
पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर (Textbook Questions and Answers)
बोध एवं विचार
1. सही विकल्प चुनिए:
(क) नरेश मेहता का जन्म हुआ था —
उत्तरः (ii) शाजापुर में
(ख) मृत्तिका कब मातृरूपा बन जाती है —
उत्तरः (ii) जब उसे पैरों से रौंदा जाता है और हल के फाल से विदीर्ण किया जाता है।
(ग) मृत्तिका की ‘अंतरंग प्रिया’ किस रूप में बन जाती है —
उत्तरः (iii) कुंभ और कलश बनकर जल लाने पर।
(घ) मृत्तिका ‘प्रजारूपा’ कब बन जाती है —
उत्तरः (i) जब उसे खिलौनों का रूप देकर शिशु-हाथों तक पहुँचाया जाता है।
2. रिक्त स्थान की पूर्ति कीजिए:
उत्तरः
- (क) मैं तो मात्र मृत्तिका हूँ।
- (ख) जब तुम मुझे पैरों से रौंदते हो।
- (ग) प्रतिमा बन तुम्हारी आराध्या हो जाती हूँ।
- (घ) तुम पुरुषार्थ करते मनुष्य हो और मैं स्वरूप पाती मृत्तिका।
3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक-दो वाक्यों में दीजिए:
(क) ‘मृत्तिका’ कविता के कवि का नाम लिखिए।
उत्तरः ‘मृत्तिका’ कविता के कवि का नाम नरेश मेहता है।
(ख) नरेश मेहता की एक प्रसिद्ध उपन्यास का नाम लिखिए।
उत्तरः नरेश मेहता की एक प्रसिद्ध उपन्यास का नाम डूबते मस्तूल है। इसके अतिरिक्त ‘यह पथ बंधु था’ और ‘नदी यशस्वी है’ भी उनके प्रसिद्ध उपन्यास हैं।
(ग) मृत्तिका ने ‘मातृरूपा’ किस प्रकार ग्रहण किया है?
उत्तरः जब किसान मिट्टी को पैरों से रौंदता है और हल के फाल से विदीर्ण करता है, तब मिट्टी धन-धान्य (फसल) उत्पन्न करके मनुष्य का पालन-पोषण करती है। इस प्रकार वह माँ की भाँति पोषण देने वाली — अर्थात मातृरूपा — हो जाती है।
(घ) ‘चिन्मयी शक्ति’ से क्या तात्पर्य है?
उत्तरः चिन्मयी शक्ति का तात्पर्य है — चेतना से युक्त दिव्य शक्ति। जब मनुष्य अपने अहंकार को पराजित करके, पुरुषार्थ के साथ मिट्टी को पुकारता है, तब मिट्टी ग्राम्य देवत्व के साथ चिन्मयी शक्ति बन जाती है — अर्थात वह जड़ मिट्टी भी चैतन्य और दिव्य ऊर्जा से भर जाती है।
4. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दो-तीन वाक्यों में दीजिए:
(क) परिश्रमी मनुष्यों के हाथों से मिट्टी किन-किन रूपों में ढल जाती है?
उत्तरः परिश्रमी मनुष्यों के हाथों से मिट्टी अनेक रूपों में ढल जाती है। खेत में जुताई करने पर वह माँ के समान धन-धान्य (फसल) देती है — इस रूप में वह मातृरूपा है। कुम्हार के हाथों चाक पर घुमाने से वह कुंभ और कलश बनकर जल लाती है — इस रूप में वह अंतरंग प्रिया है। मेले में खिलौने का रूप लेकर शिशुओं के हाथों तक पहुँचने पर वह प्रजारूपा बन जाती है। और जब मनुष्य अपने पुरुषार्थ से उसे पुकारता है, तब वह चिन्मयी शक्ति और प्रतिमा (आराध्या) बन जाती है।
(ख) मिट्टी कब प्रतिमा बनकर पूज्य हो जाती है?
उत्तरः जब मनुष्य उद्यमशील (परिश्रमी) रहकर अपने अहंकार को पराजित करता है और अपने पुरुषार्थ-पराजित स्वत्व (अहंकार-मुक्त आत्मा) से मिट्टी को पुकारता है — तब मिट्टी अपने ग्राम्य देवत्व के साथ चिन्मयी शक्ति बन जाती है और प्रतिमा (मूर्ति) का रूप लेकर पूज्य (आराध्या) हो जाती है। अर्थात मनुष्य का निष्काम श्रम और विनम्र भाव ही मिट्टी को देवरूपा बनाता है।
(ग) कवि के अनुसार सबसे बड़ा देवत्व क्या है?
उत्तरः कवि नरेश मेहता के अनुसार सबसे बड़ा देवत्व यह है कि मनुष्य पुरुषार्थ (परिश्रम) करता है और उस परिश्रम के कारण मिट्टी नाना रूपों में परिणत होती है। कवि के शब्दों में — “यह सबसे बड़ा देवत्व है, कि तुम पुरुषार्थ करते मनुष्य हो और मैं स्वरूप पाती मृत्तिका।” अर्थात दैवीय शक्ति कोई अलौकिक तत्व नहीं है — मनुष्य का परिश्रम, उद्यम और श्रद्धा ही सच्चा देवत्व है।
(घ) ‘मृत्तिका’ कविता का प्रतिपाद्य (मूल भाव) लिखिए।
उत्तरः ‘मृत्तिका’ कविता का प्रतिपाद्य मानव श्रम का महत्व बताना है। कवि का कहना है कि मिट्टी में स्वयं अपार उर्वरा शक्ति है, किंतु वह मानवीय परिश्रम के बिना व्यर्थ है। मनुष्य के पुरुषार्थ से ही मिट्टी माँ, प्रिया, प्रजा और देवी के रूप में प्रकट होती है। कवि ने मिट्टी और मनुष्य के संबंध के माध्यम से यह दर्शाया है कि श्रम और पुरुषार्थ ही जीवन का आधार और सच्चा ईश्वर हैं।
5. निम्नलिखित पंक्तियों का सप्रसंग अर्थ लिखिए:
(क) “जब तुम मुझे पैरों से रौंदते हो तथा हल के फाल से विदीर्ण करते हो — तब मैं धन-धान्य बनकर मातृरूपा हो जाती हूँ।”
उत्तरः प्रसंग: यह पंक्तियाँ नरेश मेहता द्वारा रचित ‘मृत्तिका’ कविता के प्रथम पद से ली गई हैं। इसमें मिट्टी अपना पहला रूप — मातृरूप — बताती है।
अर्थ: मिट्टी कहती है कि जब किसान उसे पैरों से रौंदता है (खेत की मिट्टी को कोमल करता है) और हल के फाल (धारदार लौह-अग्र) से उसे काटता-चीरता है, तब वह कृषि के माध्यम से धन-धान्य (अन्न, फसल) के रूप में जन्म लेकर माँ का स्वरूप ग्रहण कर लेती है। जैसे माँ अपनी संतान का पालन-पोषण करती है, वैसे ही मिट्टी अन्न देकर संसार का भरण-पोषण करती है। यहाँ ‘रौंदना’ और ‘विदीर्ण करना’ किसान के कठोर परिश्रम के प्रतीक हैं, और ‘मातृरूपा’ मिट्टी की पोषण-शक्ति का।
(ख) “यह सबसे बड़ा देवत्व है, कि तुम पुरुषार्थ करते मनुष्य हो और मैं स्वरूप पाती मृत्तिका।”
उत्तरः प्रसंग: यह कविता ‘मृत्तिका’ की अंतिम और सर्वाधिक महत्वपूर्ण पंक्तियाँ हैं। ये कविता के केंद्रीय भाव का सार हैं।
अर्थ: मिट्टी कहती है कि सबसे बड़ी दैवीय शक्ति यह है कि मनुष्य पुरुषार्थ (परिश्रम, उद्यम) करता है और उसी परिश्रम के कारण मिट्टी को स्वरूप मिलता है। अर्थात देवत्व कोई आकाश से उतरी शक्ति नहीं है — मनुष्य का श्रम और पुरुषार्थ ही सच्चा देवत्व है। बिना मनुष्य के प्रयास के मिट्टी का कोई आकार नहीं, कोई उद्देश्य नहीं। इस प्रकार यह पंक्ति श्रम की महिमा का उद्घोष करती है और मानव-पुरुषार्थ को ईश्वर की श्रेणी में स्थापित करती है।
अतिरिक्त महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (Additional Important Questions)
लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Questions)
प्रश्न 1: ‘मृत्तिका’ कविता में ‘मैं’ कौन है और वह किससे बात कर रही है?
उत्तरः ‘मृत्तिका’ कविता में ‘मैं’ मिट्टी (मृत्तिका) है। मिट्टी स्वयं बोलती है और मनुष्य से बात कर रही है। कविता में मिट्टी मनुष्य के विभिन्न कार्यों के आधार पर अपने अनेक रूपों का वर्णन करती है — जैसे किसान, कुम्हार, खिलौने बनाने वाले और मूर्तिकार के हाथों से उत्पन्न होने वाले उसके रूप।
प्रश्न 2: कविता में मिट्टी को ‘अंतरंग प्रिया’ क्यों कहा गया है?
उत्तरः जब कुम्हार मिट्टी को हाथों से गढ़कर चाक पर चढ़ाता है और उसे कुंभ तथा कलश का रूप देता है, तब वे बर्तन घर-घर में जल संग्रह के लिए काम आते हैं। मिट्टी के ये बर्तन घर की गृहिणी के नित्य जीवन से इतने घनिष्ठ रूप से जुड़े होते हैं कि मिट्टी अंतरंग प्रिया (अत्यंत निकट की प्रिय) बन जाती है। मिट्टी के घड़े और कलश न केवल जल देते हैं, बल्कि पूजा-पाठ में भी उनका उपयोग होता है, इसलिए उन्हें ‘अंतरंग’ कहा गया है।
प्रश्न 3: ‘पुरुषार्थ-पराजित स्वत्व’ का क्या अर्थ है?
उत्तरः ‘पुरुषार्थ-पराजित स्वत्व’ का अर्थ है — वह आत्मभाव जो पुरुषार्थ (परिश्रम, उद्यम) के द्वारा अपने अहंकार को परास्त कर चुका हो। जब मनुष्य अहंकार-शून्य होकर, विनम्रता और निष्काम श्रम के साथ कार्य करता है — तब उसका ‘स्वत्व’ (अहंभाव) पराजित हो जाता है। ऐसी अवस्था में मनुष्य की पुकार में दिव्यता होती है और मिट्टी भी उसके लिए चिन्मयी शक्ति और प्रतिमा बन जाती है।
प्रश्न 4: नरेश मेहता को कौन-कौन से पुरस्कार मिले?
उत्तरः नरेश मेहता को सन् 1988 में उनके काव्य संग्रह ‘अरण्या’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। सन् 1992 में उन्हें भारत के सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार से विभूषित किया गया। ये दोनों पुरस्कार हिंदी साहित्य में उनके असाधारण योगदान के प्रमाण हैं।
प्रश्न 5: मिट्टी के किन-किन रूपों का वर्णन ‘मृत्तिका’ कविता में किया गया है?
उत्तरः ‘मृत्तिका’ कविता में मिट्टी के चार प्रमुख रूपों का वर्णन किया गया है — (1) मातृरूपा — जब मिट्टी खेत में जोती-बोई जाकर धन-धान्य देती है; (2) अंतरंग प्रिया — जब मिट्टी कुंभ और कलश बनकर जल लाती है; (3) प्रजारूपा — जब मिट्टी खिलौने बनकर शिशुओं के हाथ पहुँचती है; (4) चिन्मयी शक्ति/आराध्या — जब मिट्टी प्रतिमा बनकर पूज्य हो जाती है।
प्रश्न 6: मिट्टी के ‘प्रजारूपा’ होने का क्या तात्पर्य है?
उत्तरः जब मेले में मिट्टी के खिलौने बनाए जाते हैं और वे बच्चों के हाथों में पहुँचते हैं, तब मिट्टी प्रजारूपा हो जाती है। ‘प्रजा’ का अर्थ है — सामान्य जनता, लोक। मिट्टी के खिलौने लोक-जीवन का अभिन्न अंग हैं। वे गरीब और अमीर सभी बच्चों को एक समान आनंद देते हैं। इस प्रकार मिट्टी लोकजीवन से जुड़कर ‘प्रजारूपा’ बन जाती है — वह जन-जन की है, सबकी है।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Questions)
प्रश्न 1: ‘मृत्तिका’ कविता में कवि ने मनुष्य और मिट्टी के संबंध को किस प्रकार चित्रित किया है? विस्तार से समझाइए।
उत्तरः नरेश मेहता की ‘मृत्तिका’ कविता में मनुष्य और मिट्टी का संबंध अत्यंत गहरा और द्विपक्षीय है। कविता में मिट्टी स्वयं बोलती है और मनुष्य से कहती है कि उसके बिना वह निर्जीव और निर्रूप है, किंतु मनुष्य के स्पर्श और श्रम से वह जीवंत हो उठती है।
पहले रूप में, जब किसान मिट्टी को जोतता-बोता है, वह माँ बनकर धन-धान्य देती है। इस संबंध में मनुष्य पुत्र है और मिट्टी माँ है। दूसरे रूप में, जब कुम्हार मिट्टी को चाक पर गढ़ता है, वह प्रिया का रूप लेती है। यहाँ मनुष्य और मिट्टी का संबंध प्रेमी-प्रेमिका जैसा आत्मीय है। तीसरे रूप में, जब कारीगर मिट्टी को खिलौना बनाता है, वह प्रजारूपा बनकर बच्चों की सहचरी बनती है। चौथे रूप में, जब मनुष्य अहंकार-मुक्त होकर मिट्टी को पुकारता है, वह देवीरूपा बन जाती है।
इस प्रकार मनुष्य और मिट्टी का संबंध पारस्परिक है। मनुष्य के परिश्रम से मिट्टी को रूप मिलता है और मिट्टी के कारण मनुष्य को जीवन मिलता है। कवि का संदेश है कि यह संबंध ही सृष्टि का आधार है और मानव श्रम ही सच्चा देवत्व है।
प्रश्न 2: ‘मृत्तिका’ कविता के आधार पर नरेश मेहता की काव्य-दृष्टि पर प्रकाश डालिए।
उत्तरः ‘मृत्तिका’ कविता से नरेश मेहता की काव्य-दृष्टि के अनेक महत्वपूर्ण पहलू सामने आते हैं।
मानवतावादी दृष्टि: कवि मनुष्य के श्रम और पुरुषार्थ को सर्वोच्च देवत्व मानते हैं। वे ईश्वर को मंदिर में नहीं, मनुष्य के उद्यम में खोजते हैं। यह दृष्टि उनकी मानवतावादी चेतना को दर्शाती है।
प्रकृति-प्रेम: मिट्टी एक प्राकृतिक तत्व है। कवि ने मिट्टी को माँ, प्रिया, प्रजा और देवी के रूप में देखकर प्रकृति के प्रति गहरे प्रेम और सम्मान का परिचय दिया है।
दार्शनिक दृष्टि: कविता का अंतिम भाव अत्यंत दार्शनिक है। मिट्टी और मनुष्य के संबंध के माध्यम से कवि सृष्टि, श्रम और चेतना के संबंध पर दार्शनिक विचार प्रस्तुत करते हैं।
नई कविता की विशेषताएँ: यह कविता नई कविता आंदोलन की विशेषताओं — छंद-मुक्तता, सरल भाषा, प्रतीकात्मकता और जीवन से जुड़े विषय — को भली-भाँति प्रदर्शित करती है। नरेश मेहता की काव्य-भाषा संस्कृतनिष्ठ होते हुए भी बोधगम्य है।
प्रश्न 3: ‘मृत्तिका’ कविता से हमें क्या जीवन-संदेश मिलता है? अपने विचार लिखिए।
उत्तरः ‘मृत्तिका’ कविता से हमें अनेक महत्वपूर्ण जीवन-संदेश मिलते हैं।
सबसे पहला संदेश है — श्रम की महिमा। मिट्टी चाहे कितनी भी उर्वर क्यों न हो, बिना किसान के परिश्रम के उसमें अन्न नहीं उगेगा। इसी प्रकार जीवन में प्रतिभा और साधन तो हो सकते हैं, परंतु बिना परिश्रम के कोई उपलब्धि नहीं।
दूसरा संदेश है — अहंकार-मुक्ति। जब मनुष्य अहंकार छोड़कर निष्काम भाव से कार्य करता है, तभी वह उच्चतम फल पाता है। मिट्टी भी तभी प्रतिमा और आराध्या बनती है जब मनुष्य का अहंकार पराजित होता है।
तीसरा संदेश है — प्रकृति का सम्मान। मिट्टी माँ है, प्रिया है, देवी है — इसलिए उसका सम्मान और संरक्षण करना हमारा कर्तव्य है। आज जब भूमि-क्षरण और प्रदूषण बड़ी समस्या है, तब यह संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है।
चौथा संदेश है — ईश्वर मनुष्य के श्रम में है। कवि का मत है कि देवत्व कोई अलौकिक और दूर की चीज नहीं है — वह हमारे दैनिक परिश्रम और पुरुषार्थ में ही निवास करता है।
MCQ (बहुविकल्पीय प्रश्न)
| प्रश्न | विकल्प A | विकल्प B | विकल्प C | विकल्प D | उत्तर |
|---|---|---|---|---|---|
| नरेश मेहता का जन्म कहाँ हुआ था? | उज्जैन | शाजापुर | भोपाल | इलाहाबाद | शाजापुर |
| नरेश मेहता को साहित्य अकादमी पुरस्कार कब मिला? | 1985 | 1990 | 1988 | 1992 | 1988 |
| नरेश मेहता को ज्ञानपीठ पुरस्कार किस वर्ष मिला? | 1990 | 1992 | 1995 | 1988 | 1992 |
| मृत्तिका मातृरूपा कब बनती है? | जब उसे चाक पर चढ़ाया जाए | जब खिलौना बनाया जाए | जब हल से जोती जाए | जब प्रतिमा बनाई जाए | जब हल से जोती जाए |
| मिट्टी ‘अंतरंग प्रिया’ किस रूप में बनती है? | खिलौने के रूप में | कुंभ और कलश के रूप में | अन्न के रूप में | प्रतिमा के रूप में | कुंभ और कलश के रूप में |
| मिट्टी ‘प्रजारूपा’ कब होती है? | जब फसल उगाती है | जब बर्तन बनती है | जब खिलौना बनकर शिशु-हाथों तक पहुँचती है | जब प्रतिमा बनती है | जब खिलौना बनकर शिशु-हाथों तक पहुँचती है |
| ‘चिन्मयी शक्ति’ का क्या अर्थ है? | जड़ शक्ति | चेतना से युक्त दिव्य शक्ति | सैन्य शक्ति | राजनीतिक शक्ति | चेतना से युक्त दिव्य शक्ति |
| कविता के अनुसार सबसे बड़ा देवत्व क्या है? | ईश्वर की भक्ति | धन-संपदा | पुरुषार्थ (मानव श्रम) | मंदिर में पूजा | पुरुषार्थ (मानव श्रम) |
| नरेश मेहता ‘दूसरा सप्तक’ के किस पद पर थे? | प्रमुख कवि | संपादक | आलोचक | अनुवादक | प्रमुख कवि |
| नरेश मेहता का निधन कब हुआ? | 22 नवंबर 2000 | 15 फरवरी 2000 | 10 अक्टूबर 1998 | 5 जनवरी 2001 | 22 नवंबर 2000 |
| ‘हल के फाल’ का अर्थ क्या है? | हल की मूठ | हल का पहिया | हल का धारदार लौह-अग्र | हल की रस्सी | हल का धारदार लौह-अग्र |
| कविता में मिट्टी किस विश्वविद्यालय से पढ़े कवि ने लिखी? | दिल्ली विश्वविद्यालय | काशी हिंदू विश्वविद्यालय | पटना विश्वविद्यालय | मुंबई विश्वविद्यालय | काशी हिंदू विश्वविद्यालय |
काव्य-सौंदर्य (Literary Devices / Poetic Beauty)
‘मृत्तिका’ कविता काव्य-कला की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध है। नरेश मेहता ने इस कविता में अनेक काव्य-शिल्प और अलंकारों का सुंदर प्रयोग किया है।
1. मानवीकरण (Personification): कविता में मिट्टी को मानवीय रूप दिया गया है। मिट्टी स्वयं बोलती है, अपनी भावनाएँ व्यक्त करती है — “मैं धन-धान्य बनकर मातृरूपा हो जाती हूँ।” यह मानवीकरण अलंकार का उत्कृष्ट उदाहरण है।
2. रूपक (Metaphor): मिट्टी को क्रमशः माँ (मातृरूपा), प्रिया (अंतरंग प्रिया), प्रजा (प्रजारूपा) और देवी (आराध्या) के रूप में चित्रित किया गया है। ये सभी रूपक अलंकार के सुंदर उदाहरण हैं।
3. प्रतीक (Symbol): मिट्टी पूरी कविता में एक बड़े प्रतीक के रूप में कार्य करती है। वह केवल मिट्टी नहीं है — वह जीवन का आधार, सृष्टि का स्रोत और मानव-पुरुषार्थ की प्रतीक है। ‘पुरुषार्थ’ भी मानवीय श्रम और दैवीय शक्ति के प्रतीक के रूप में प्रयुक्त है।
4. अनुप्रास अलंकार: “चाक पर चढ़ाकर” में ‘च’ वर्ण की आवृत्ति तथा “धन-धान्य” में ‘ध’ की आवृत्ति अनुप्रास अलंकार को जन्म देती है।
5. पुनरुक्ति प्रकाश: “जब तुम मुझे… तब मैं…” की संरचना पूरी कविता में बार-बार आती है, जिससे एक लयात्मक और संगीतात्मक प्रभाव उत्पन्न होता है।
6. बिंब (Imagery): “हल के फाल से विदीर्ण करते हो”, “चाक पर चढ़ाकर घुमाने लगते हो”, “शिशु-हाथों तक पहुँचकर” — ये सभी ज्वलंत बिंब हैं जो कविता को दृश्यात्मक बनाते हैं।
7. छंद-मुक्त रचना (Free Verse): यह कविता मुक्त छंद में लिखी गई है। इसमें पारंपरिक तुकबंदी नहीं है, फिर भी पंक्तियों में एक आंतरिक लय और संगीत है। यह नई कविता की प्रमुख विशेषता है।
8. संस्कृतनिष्ठ भाषा: “विदीर्ण, मातृरूपा, अंतरंग, प्रजारूपा, पुरुषार्थ-पराजित स्वत्व, चिन्मयी, ग्राम्य देवत्व, आराध्या” जैसे संस्कृत-जन्य शब्दों का प्रयोग कविता की भाषा को गरिमा और गहराई प्रदान करता है।
9. विरोधाभास (Paradox): मिट्टी को पैरों से रौंदना और हल से काटना कष्ट जैसा लगता है, परंतु इसी से वह माँ बनती है — यह विरोधाभास कविता की दार्शनिक गहराई को उजागर करता है।
10. दार्शनिक स्वर: कविता का समापन एक दार्शनिक उद्घोष के साथ होता है — “यह सबसे बड़ा देवत्व है, कि तुम पुरुषार्थ करते मनुष्य हो और मैं स्वरूप पाती मृत्तिका।” यह पंक्ति उपनिषदीय दार्शनिक चिंतन की याद दिलाती है।
शब्दार्थ (Word Meanings)
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| मृत्तिका | मिट्टी, clay |
| रौंदना | पैरों से कुचलना, to trample |
| हल | खेत जोतने का उपकरण, plough |
| फाल | हल का धारदार लौह-अग्र जो मिट्टी काटता है, ploughshare |
| विदीर्ण करना | काटना, चीरना, फाड़ना, to split/tear |
| धन-धान्य | अन्न, फसल, संपदा, wealth and grain |
| मातृरूपा | माँ के समान, mother-form |
| चाक | मिट्टी के बर्तन बनाने का गोल यंत्र, potter’s wheel |
| कुंभ | मिट्टी का बड़ा बर्तन, मटका, earthen pot |
| कलश | धातु या मिट्टी का लोटा, pitcher/vessel |
| अंतरंग | अत्यंत निकट, घनिष्ठ, intimate/close |
| प्रिया | प्रिय स्त्री, प्रेम-पात्री, beloved |
| प्रजारूपा | जनता/लोक के रूप में, in the form of the people |
| पुरुषार्थ | परिश्रम, उद्यम, मानव-प्रयास, human effort/endeavour |
| स्वत्व | स्वयं का भाव, अहंभाव, selfhood/ego |
| पुरुषार्थ-पराजित स्वत्व | पुरुषार्थ के द्वारा पराजित अहंकार, ego defeated by righteous effort |
| ग्राम्य देवत्व | गाँव के लोक-देवताओं जैसी दिव्यता, rural/folk divinity |
| चिन्मयी | चेतना से युक्त, ज्ञानमय, full of consciousness |
| प्रतिमा | मूर्ति, statue/idol |
| आराध्या | पूजनीय, जिसकी आराधना की जाए, one who is worshipped |
| देवत्व | ईश्वरीय गुण, दिव्यता, divinity |
| स्वरूप पाना | रूप धारण करना, आकार लेना, to take form/shape |