“कायर मत बन” हिंदी के प्रसिद्ध कवि पंडित नरेंद्र शर्मा द्वारा रचित एक प्रेरणादायक कविता है, जो ASSEB (असम माध्यमिक शिक्षा बोर्ड) के कक्षा 10 की हिंदी ऐच्छिक पाठ्यपुस्तक आलोक भाग-2 में पाठ 11 के रूप में संकलित है। इस कविता में कवि ने मानव को साहस, वीरता और आत्मबल का संदेश दिया है। कविता का मूल स्वर यह है कि मनुष्य चाहे कुछ भी बने, किंतु कायर कभी न बने। जीवन के संघर्षों का डटकर सामना करना ही सच्ची मानवता की पहचान है।
कविता का सारांश (Summary of the Poem)
कवि नरेंद्र शर्मा की कविता “कायर मत बन” मानव को कायरता त्यागकर साहस के साथ जीवन जीने की प्रेरणा देती है। कविता का केंद्रीय भाव यही है — “कुछ भी बन, बस कायर मत बन।” कवि आग्रह करते हैं कि जीवन की राह में जो भी बाधाएँ आएँ, उन्हें ठोकर मारकर आगे बढ़ो, न कि उनसे टकराकर माथा पीटते रहो।
कविता के दूसरे पद में कवि पूछते हैं — समझौता करके जीना क्या जीना है? दुःख के आँसू कब तक पीते रहोगे? मानवता ने युगों तक खून-पसीना बहाकर मनुष्य को सींचा है। ऐसे में यदि मनुष्य केवल कातर होकर रोता रहे और कुछ न करे, तो यह उस बलिदान का अपमान है। कवि मनुष्य को कर्म और साहस का मार्ग अपनाने के लिए प्रेरित करते हैं।
तीसरे पद में कवि शत्रु का सामना करने का उपाय बताते हैं। वे कहते हैं कि जब कोई पामर (नीच) व्यक्ति युद्ध की चुनौती दे, तो पीठ दिखाकर दुहाई मत दो। बल्कि या तो प्रेम और सद्भाव से विजय प्राप्त करो, या फिर दृढ़ता से उसका मुकाबला करो। प्रतिहिंसा भी एक दुर्बलता है, किंतु कायरता उससे भी अधिक पतन है।
कविता के अंतिम पद में कवि स्पष्ट करते हैं कि तुम्हारी शारीरिक रक्षा का कोई मोल नहीं, किंतु तुम्हारा मानव-धर्म अमोल है। शरीर नश्वर है, वह मिटता है, किंतु मानवता शाश्वत है। इसलिए अपना सर्वस्व मनुजता (मानवता) को अर्पण करो और किसी दुष्ट के समक्ष आत्मसमर्पण मत करो। यही कविता का सबसे शक्तिशाली संदेश है।
कवि-परिचय (About the Poet)
पंडित नरेंद्र शर्मा का जन्म 28 फरवरी 1913 को उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले के जहाँगीरपुर (तहसील खुर्जा) नामक ग्राम में हुआ था। उनके पिता का नाम पूर्णलाल शर्मा था। केवल चार वर्ष की अवस्था में ही पिता की मृत्यु हो जाने के कारण उनका पालन-पोषण मेरठ में हुआ। बचपन से ही उनमें काव्य-प्रतिभा और संस्कृत के प्रति रुचि प्रकट होने लगी थी।
नरेंद्र शर्मा ने सन् 1936 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में एम.ए. की उपाधि प्राप्त की। वे प्रगतिशील लेखक आंदोलन से जुड़े रहे और उनकी कविताओं में देशभक्ति, मानवता, प्रेम, प्रकृति-सौंदर्य, आध्यात्मिकता और सामाजिक विषमता जैसे विषयों की विविधता दिखती है। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान उन्हें कारावास भी हुआ। वे आधुनिक हिंदी काव्यधारा में छायावाद एवं छायावादोत्तर युग के व्यक्तिवादी गीति कविता के प्रमुख रचयिता के रूप में प्रसिद्ध हैं।
जेल से रिहा होने के बाद उन्होंने हिंदी फिल्मों के लिए भी गीत लिखे। सन् 1953 में वे आकाशवाणी (All India Radio) से जुड़े। प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के आमंत्रण पर उन्होंने सन् 1957 में आकाशवाणी के लोकप्रिय मनोरंजन कार्यक्रम “विविध भारती” की स्थापना और संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। “विविध भारती” ने भारतीय रेडियो प्रसारण में क्रांति ला दी और इसके श्रोताओं की संख्या करोड़ों तक पहुँच गई।
उनकी प्रमुख काव्य-कृतियाँ हैं — प्रभात फेरी, प्रवासी के गीत, पलाशवन, मिट्टी और फूल, हंसमाला, रक्त चंदन, कामिनी, शूलफूल, सुवर्णा, उत्तर जय आदि। उन्होंने कुल 17 काव्य-संग्रह लिखे। फिल्मी गीतों में “सत्यम शिवम सुंदरम” (1979) का शीर्षक गीत और “ज्योति कलश छलके” (भाभी की चूड़ियाँ, 1961) उनकी प्रसिद्ध रचनाएँ हैं। वे लोकप्रिय टीवी धारावाहिक महाभारत के वैचारिक परामर्शदाता भी रहे। उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। उनका निधन 11 फरवरी 1989 को हुआ।
कविता की सप्रसंग व्याख्या (Stanza-wise Explanation)
पद 1 —
कुछ भी बन, बस कायर मत बन,
ठोकर मार, पटक मत माथा,
तेरी राह रोकते पाहन।
कुछ भी बन, बस कायर मत बन।
शब्दार्थ: पाहन = पत्थर। माथा पटकना = हार मानकर रोना-धोना।
प्रसंग: यह कविता पंडित नरेंद्र शर्मा द्वारा रचित है जो आलोक भाग-2 में संकलित है। इस पद में कवि मनुष्य को साहसी बनने और कायरता त्यागने का आह्वान करते हैं।
व्याख्या: कवि कहते हैं — हे मनुष्य! तू जो चाहे बन — विद्वान, कलाकार, सैनिक, व्यापारी, नेता — कुछ भी बन, लेकिन कायर कभी मत बन। जीवन की राह में अनेक बाधाएँ, कठिनाइयाँ और समस्याएँ आती हैं। ये बाधाएँ उस पत्थर की तरह हैं जो तेरे रास्ते को रोकते हैं। तू उन्हें ठोकर मारकर आगे बढ़ और उनसे टकराकर अपना माथा मत पीट। अर्थात् — कठिनाइयों का डटकर सामना कर, हार मत मान, रोना-धोना छोड़ और आगे बढ़ता जा। यही जीवन का सच्चा रास्ता है।
पद 2 —
युद्धं देहि कहे जब पामर,
दे न दुहाई पीठ फेर कर,
या तो जीत प्रीति के बल पर,
या तेरा पथ चूमे तस्कर।
प्रतिहिंसा भी दुर्बलता है,
पर कायरता अधिक अपावन।
कुछ भी बन, बस कायर मत बन।
शब्दार्थ: युद्धं देहि = युद्ध करो (संस्कृत)। पामर = नीच, अधम, दुष्ट व्यक्ति। दुहाई देना = गिड़गिड़ाना, भीख माँगना। तस्कर = शत्रु, डाकू। प्रतिहिंसा = हिंसा के बदले हिंसा। अपावन = अपवित्र, पतित।
व्याख्या: कवि कहते हैं — जब कोई नीच और दुष्ट व्यक्ति तुझे ललकारे और युद्ध की चुनौती दे, तो पीठ मोड़कर उससे गिड़गिड़ाते हुए मत भागो। यह कायरता है। इसके बजाय, या तो प्रेम और सद्भाव की शक्ति से उसे जीतने का प्रयास करो — अर्थात् प्यार से उसके मन को बदलो। या फिर यदि यह संभव न हो, तो इतनी दृढ़ता से उसका मुकाबला करो कि वह तुम्हारे पथ को नमन करे। कवि आगे स्पष्ट करते हैं कि प्रतिहिंसा (हिंसा का बदला हिंसा से लेना) भी एक प्रकार की दुर्बलता है, क्योंकि इससे हिंसा का चक्र नहीं टूटता। लेकिन उससे भी बड़ा पतन कायरता है, जो अपवित्र और निकृष्ट है। इसलिए — कुछ भी बन, बस कायर मत बन।
पद 3 —
ले-दे कर जीना क्या जीना,
कब तक गम के आँसू पीना,
मानवता ने सींचा तुझ को,
बहा युगों तक खून-पसीना।
कुछ न करेगा? क्या करेगा
रे मनुष्य! बस कातर क्रंदन।
कुछ भी बन, बस कायर मत बन।
शब्दार्थ: ले-दे कर जीना = समझौते के साथ जीना। गम के आँसू पीना = दुःख सहते रहना। मानवता = मनुष्यता। सींचा = पाला-पोषा। खून-पसीना = परिश्रम और बलिदान। कातर = व्याकुल, भयभीत। क्रंदन = रोना, विलाप।
व्याख्या: कवि प्रश्न करते हैं — दूसरों से माँगते-गिड़गिड़ाते हुए, तरह-तरह के समझौते करते हुए जीने को क्या जीना कहा जा सकता है? कब तक तू दुःख और निराशा के आँसू पीता रहेगा? कवि याद दिलाते हैं कि मानवता ने युगों-युगों तक अपना खून और पसीना बहाकर तुझे सींचा है, तेरा विकास किया है। पूर्वजों ने अनगिनत बलिदान दिए, ताकि आज तू इस संसार में मनुष्य के रूप में जी सके। ऐसे में यदि तू केवल व्याकुल होकर रोता-चिल्लाता रहे और कुछ न करे, तो तू उस महान विरासत का अपमान कर रहा है। अतः उठ, कर्म कर, साहस दिखा — कुछ भी बन, बस कायर मत बन।
पद 4 —
तेरी रक्षा का ना मोल है,
पर तेरा मानव अमोल है।
यह मिटता है, वह बनता है,
यही सत्य है, यही तोल है।
अर्पण कर सर्वस्व मनुज को,
न कर दुष्ट को आत्मसमर्पण।
कुछ भी बन, बस कायर मत बन।
शब्दार्थ: रक्षा = शरीर की सुरक्षा। मोल = मूल्य। मानव = मानव-धर्म, मानवता। अमोल = जिसका कोई मूल्य न लगाया जा सके, अनमोल। तोल = तुलना, माप। अर्पण = समर्पित करना। सर्वस्व = सब कुछ। मनुज = मनुष्य। आत्मसमर्पण = हार मानना।
व्याख्या: कविता के इस अंतिम और सर्वाधिक शक्तिशाली पद में कवि कहते हैं — तुम्हारे इस नश्वर शरीर की रक्षा का कोई मूल्य नहीं है। किंतु तुम्हारे भीतर जो मानवता है — वह अमोल है, अनमोल है। यह शरीर तो मिटता है, नष्ट होता है; लेकिन मानवता शाश्वत रहती है और निरंतर बनती रहती है। यही सत्य है और यही जीवन का सही माप है। इसलिए अपना सब कुछ — अपनी शक्ति, बुद्धि, समय और जीवन — मानवता की सेवा में अर्पण कर दो, किसी दुष्ट और अन्यायी के सामने कभी आत्मसमर्पण मत करो। अन्याय के आगे झुकना सबसे बड़ी कायरता है — इसलिए: कुछ भी बन, बस कायर मत बन।
पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर (Textbook Questions and Answers)
प्रश्न 1. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर पूर्ण वाक्यों में लिखिए:
(क) कवि ने मनुष्य को क्या बनने से मना किया है?
उत्तरः कवि ने मनुष्य को कायर बनने से मना किया है। उनका कहना है कि मनुष्य चाहे कुछ भी बने, लेकिन उसे कभी कायर नहीं बनना चाहिए।
(ख) ‘पाहन’ किसे कहा गया है और क्यों?
उत्तरः ‘पाहन’ (पत्थर) जीवन की उन कठिनाइयों और बाधाओं को कहा गया है जो मनुष्य की राह में आती हैं और उसे आगे बढ़ने से रोकती हैं। कवि ने इन बाधाओं की तुलना पत्थर से की है, जिसे ठोकर मारकर हटाया जा सकता है — अर्थात् इन बाधाओं का साहस से सामना करना चाहिए।
(ग) ‘ले-दे कर जीना क्या जीना’ — इस पंक्ति का क्या आशय है?
उत्तरः ‘ले-दे कर जीना’ का अर्थ है — दूसरों के सामने झुककर, समझौते करके, माँगते-गिड़गिड़ाते हुए जीना। कवि का आशय यह है कि ऐसे समझौतापरस्त जीवन को वास्तविक जीवन नहीं कहा जा सकता। सच्चा जीवन वह है जिसमें व्यक्ति स्वाभिमान और साहस के साथ जिए।
(घ) मानवता ने मनुष्य को किस प्रकार सींचा है?
उत्तरः मानवता ने युगों-युगों तक खून और पसीना बहाकर मनुष्य को सींचा है। अर्थात् पूर्वजों ने असंख्य बलिदान दिए, अनथक परिश्रम किया और अपना जीवन समर्पित किया, तब जाकर मनुष्य का यह वर्तमान विकसित रूप संभव हो सका।
(ङ) कवि के अनुसार मनुष्य का ‘मानव’ क्यों अमोल है?
उत्तरः कवि के अनुसार मनुष्य का शरीर तो नश्वर है — वह एक न एक दिन मिट जाता है। किंतु उसके भीतर का मानव-धर्म, मानवता और उसके आदर्श शाश्वत हैं। इसीलिए मनुष्य की मानवता (मानव) अमोल है, जिसकी कोई तुलना नहीं की जा सकती।
(च) कवि ने प्रतिहिंसा को क्या कहा है?
उत्तरः कवि ने प्रतिहिंसा को ‘दुर्बलता’ कहा है। कवि का मत है कि हिंसा का बदला हिंसा से लेना भी एक प्रकार की कमज़ोरी है, क्योंकि इससे हिंसा का चक्र नहीं थमता। इससे भी बड़ी कमज़ोरी और पतन कायरता है जो ‘अपावन’ (अपवित्र) है।
(छ) कवि ने मनुष्य को किसके सामने आत्मसमर्पण न करने की सलाह दी है?
उत्तरः कवि ने मनुष्य को दुष्टों और अन्यायियों के सामने आत्मसमर्पण न करने की सलाह दी है। वे कहते हैं कि अन्याय और दुष्टता के सामने झुकना सबसे बड़ी कायरता है। इसके बजाय मनुष्य को अपना सर्वस्व मानवता को समर्पित कर देना चाहिए।
प्रश्न 2. सत्य अथवा असत्य लिखिए:
(क) ‘कायर मत बन’ शीर्षक कविता में कवि ने प्रतिहिंसा करने का उपदेश दिया है।
उत्तरः असत्य। कवि ने प्रतिहिंसा को दुर्बलता बताया है और प्रेम तथा दृढ़ता से विजय प्राप्त करने का संदेश दिया है।
(ख) पंडित नरेंद्र शर्मा की गीत-प्रतिभा के दर्शन छोटी अवस्था में ही होने लगे थे।
उत्तरः सत्य।
(ग) कवि के अनुसार मनुष्य के शरीर की रक्षा का मोल बहुत अधिक है।
उत्तरः असत्य। कवि के अनुसार मनुष्य की शारीरिक रक्षा का कोई मोल नहीं है, बल्कि उसकी मानवता अमोल है।
(घ) कवि नरेंद्र शर्मा ने विविध भारती की स्थापना में भूमिका निभाई।
उत्तरः सत्य।
प्रश्न 3. रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए:
(क) तेरी राह रोकते ________।
उत्तरः पाहन।
(ख) प्रतिहिंसा भी ________ है।
उत्तरः दुर्बलता।
(ग) मानवता ने सींचा तुझ को, बहा युगों तक ________।
उत्तरः खून-पसीना।
(घ) अर्पण कर सर्वस्व ________ को।
उत्तरः मनुज।
प्रश्न 4. कवि-परिचय संबंधी प्रश्न:
(क) कवि नरेंद्र शर्मा का जन्म कहाँ हुआ था?
उत्तरः कवि नरेंद्र शर्मा का जन्म सन् 1913 में उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले के जहाँगीरपुर नामक ग्राम में हुआ था।
(ख) नरेंद्र शर्मा ने किस रेडियो कार्यक्रम की स्थापना में योगदान दिया?
उत्तरः नरेंद्र शर्मा ने आकाशवाणी (All India Radio) के लोकप्रिय कार्यक्रम ‘विविध भारती’ की स्थापना और संचालन में महत्वपूर्ण योगदान दिया। यह कार्यक्रम सन् 1957 में प्रारंभ हुआ था।
(ग) कवि नरेंद्र शर्मा की काव्य-भाषा की क्या विशेषता है?
उत्तरः कवि नरेंद्र शर्मा की काव्य-भाषा शुद्ध साहित्यिक खड़ी बोली है जिसमें सरलता और गहराई दोनों का अनूठा संगम है। उनकी कविताओं में प्रेम, प्रकृति, राष्ट्रभक्ति और मानवीय संवेदनाओं की विविधता दिखती है।
प्रश्न 5. निम्नलिखित पंक्तियों का भाव स्पष्ट कीजिए:
(क) “या तो जीत प्रीति के बल पर, या तेरा पथ चूमे तस्कर।”
उत्तरः इन पंक्तियों का भाव यह है कि जब कोई दुष्ट व्यक्ति तुम्हें चुनौती दे, तो दो विकल्प हैं — या तो प्रेम और सद्भाव की शक्ति से उसे जीत लो, उसके मन को बदल दो। और यदि यह संभव न हो, तो इतनी दृढ़ता और वीरता से उसका सामना करो कि वह तुम्हारे मार्ग में झुककर नमन करे। किसी भी परिस्थिति में पीठ दिखाकर भागना उचित नहीं है।
(ख) “तेरी रक्षा का ना मोल है, पर तेरा मानव अमोल है।”
उत्तरः इन पंक्तियों का भाव यह है कि मनुष्य का शरीर नश्वर और क्षणभंगुर है, इसलिए इसकी रक्षा का कोई अंतिम मूल्य नहीं है — यह तो एक दिन मिटना ही है। लेकिन मनुष्य की मानवता — उसके आदर्श, उसके मानवीय मूल्य, उसका मानव-धर्म — ये शाश्वत हैं और अनमोल हैं। इसलिए शरीर को बचाने के लिए मानवता का सौदा नहीं करना चाहिए।
प्रश्न 6. ‘ले-दे कर जीना’ मुहावरे का अर्थ लिखकर वाक्य में प्रयोग कीजिए।
उत्तरः ले-दे कर जीना — अर्थ: समझौता करते हुए, गिड़गिड़ाते हुए या दूसरों पर निर्भर रहकर जीना।
वाक्य प्रयोग: जो व्यक्ति स्वाभिमान से जीता है, वह ले-दे कर जीना पसंद नहीं करता।
प्रश्न 7. ‘कातर क्रंदन’ का क्या अर्थ है? कवि इससे क्या कहना चाहते हैं?
उत्तरः ‘कातर क्रंदन’ का अर्थ है — व्याकुल होकर रोना-चिल्लाना, विलाप करना। कवि यह कहना चाहते हैं कि जीवन की कठिनाइयों के सामने केवल विलाप करते रहने से कुछ नहीं बदलता। मानवता ने युगों तक बलिदान करके मनुष्य को तैयार किया है। ऐसे में यदि मनुष्य केवल रोता रहे और कोई कर्म न करे, तो यह उस महान बलिदान का अपमान है। कर्म और साहस ही जीवन का सत्य है।
अतिरिक्त महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (Additional Important Questions)
लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Questions)
प्रश्न 1. ‘कायर मत बन’ कविता का मुख्य संदेश क्या है?
उत्तरः इस कविता का मुख्य संदेश है कि मनुष्य को जीवन में कभी कायर नहीं बनना चाहिए। कवि नरेंद्र शर्मा कहते हैं — “कुछ भी बन, बस कायर मत बन।” जीवन में चाहे कितनी भी बाधाएँ और कठिनाइयाँ आएँ, उनका साहस और दृढ़ता के साथ सामना करना चाहिए। अन्याय और दुष्टता के आगे झुकना सबसे बड़ी कायरता है। मानवता की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व समर्पित करना ही सच्ची मानवता है।
प्रश्न 2. कवि ने कायरता को ‘अपावन’ क्यों कहा है?
उत्तरः कवि ने कायरता को ‘अपावन’ (अपवित्र, पतित) इसलिए कहा है क्योंकि कायरता मनुष्य के सबसे बड़े गुण — साहस और मानवता — को नष्ट कर देती है। जो व्यक्ति डर के कारण अन्याय के सामने झुक जाता है, वह न केवल खुद का नहीं, बल्कि पूरी मानवता का अपमान करता है। युगों की तपस्या और बलिदान से निर्मित मानव-धर्म को कायरता से नष्ट करना सबसे बड़ा पाप है, इसीलिए यह ‘अपावन’ है।
प्रश्न 3. ‘प्रीति के बल पर जीत’ से कवि का क्या तात्पर्य है?
उत्तरः ‘प्रीति के बल पर जीत’ से कवि का तात्पर्य यह है कि शत्रु या विरोधी को हिंसा से नहीं, बल्कि प्रेम, सद्भाव और सहानुभूति के बल पर जीतने का प्रयास करना चाहिए। यह महात्मा गांधी के अहिंसा और प्रेम के सिद्धांत से मिलता-जुलता विचार है। यदि प्रेम से जीत संभव न हो, तभी दृढ़ प्रतिरोध का मार्ग अपनाना चाहिए — लेकिन कायर होकर पीठ दिखाना कभी उचित नहीं है।
प्रश्न 4. कविता में ‘खून-पसीना’ शब्द का क्या महत्व है?
उत्तरः ‘खून-पसीना’ शब्द इस कविता में मानवता के युगों-युगों के बलिदान और परिश्रम का प्रतीक है। कवि कहते हैं कि पूर्वजों ने खून और पसीना बहाकर — अर्थात् असंख्य बलिदान और अनथक मेहनत से — आज के मनुष्य को यह जीवन और सभ्यता दी है। इस महान विरासत को कायरता से नष्ट करना उन पूर्वजों के बलिदान का अपमान है। इसलिए मनुष्य को उस बलिदान के योग्य बनकर साहस से जीवन जीना चाहिए।
प्रश्न 5. “यह मिटता है, वह बनता है” — इस पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तरः इस पंक्ति में ‘यह’ शरीर का प्रतीक है और ‘वह’ मानवता का। कवि कहते हैं कि शरीर (यह) नश्वर है — वह एक दिन अवश्य मिट जाता है। लेकिन मानवता (वह) शाश्वत है — वह सदा बनती रहती है, विकसित होती रहती है। यही जीवन का सत्य है। इसलिए मनुष्य को शरीर की रक्षा की चिंता करने की बजाय मानवता की रक्षा और विकास के लिए जीना चाहिए।
प्रश्न 6. कवि नरेंद्र शर्मा के काव्य-जीवन की मुख्य विशेषताएँ क्या हैं?
उत्तरः कवि नरेंद्र शर्मा आधुनिक हिंदी साहित्य के प्रमुख गीतकार हैं। उनकी काव्य-भाषा शुद्ध साहित्यिक खड़ी बोली है। उनके काव्य में प्रेम, प्रकृति-सौंदर्य, राष्ट्रभक्ति, आध्यात्मिकता और सामाजिक विषमता — ये सभी विषय मिलते हैं। वे प्रगतिशील लेखक आंदोलन से जुड़े थे। उन्होंने 17 काव्य-संग्रह लिखे। विविध भारती की स्थापना में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया गया।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Questions)
प्रश्न 1. ‘कायर मत बन’ कविता का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तरः “कायर मत बन” पंडित नरेंद्र शर्मा रचित एक प्रेरणादायक कविता है। इसमें कवि ने मनुष्य को साहस और वीरता का संदेश दिया है।
कविता के पहले पद में कवि कहते हैं — हे मनुष्य! तू जो चाहे बन, लेकिन कायर कभी मत बन। जीवन में जो भी बाधाएँ आएँ — उन्हें ठोकर मारकर आगे बढ़। उन पत्थरों से सिर टकराकर मत रो।
दूसरे पद में कवि कहते हैं — जब कोई नीच व्यक्ति युद्ध की चुनौती दे, तो पीठ दिखाकर मत भागो। या तो प्रेम से उसे जीतो, या दृढ़ता से उसका मुकाबला करो। प्रतिहिंसा भी एक दुर्बलता है, लेकिन कायरता उससे भी बड़ा पतन है।
तीसरे पद में कवि प्रश्न करते हैं — समझौते करके जीना क्या जीना है? मानवता ने युगों तक खून-पसीना बहाकर तुझे बनाया है। ऐसे में केवल रोते रहना और कुछ न करना उस बलिदान का अपमान है।
चौथे पद में कवि कहते हैं — शरीर नश्वर है, लेकिन मानवता अमोल है। इसलिए अपना सर्वस्व मानवता को समर्पित करो और किसी दुष्ट के आगे आत्मसमर्पण मत करो। यही इस कविता का केंद्रीय संदेश है।
प्रश्न 2. ‘कायर मत बन’ कविता में कवि ने साहस और मानवता के बीच क्या संबंध स्थापित किया है? विस्तारपूर्वक समझाइए।
उत्तरः “कायर मत बन” कविता में कवि नरेंद्र शर्मा ने साहस और मानवता को अविभाज्य रूप से जोड़ा है। उनके अनुसार सच्ची मानवता का अस्तित्व तभी संभव है जब मनुष्य साहसी हो।
कवि कहते हैं कि मानवता ने युगों तक खून और पसीना बहाकर मनुष्य को सींचा है। इसका अर्थ यह है कि मानव-सभ्यता का विकास असंख्य बलिदानों और संघर्षों का परिणाम है। इस महान विरासत की रक्षा करना प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है।
कवि आगे कहते हैं — “तेरी रक्षा का ना मोल है, पर तेरा मानव अमोल है।” अर्थात् शरीर नश्वर है, लेकिन मानवता — मानव के आदर्श और मूल्य — अनमोल हैं। इनकी रक्षा के लिए साहस आवश्यक है। यदि मनुष्य कायर है, तो वह मानवता की रक्षा नहीं कर सकता।
कवि यह भी स्पष्ट करते हैं कि दुष्टता और अन्याय के सामने आत्मसमर्पण करना सबसे बड़ी कायरता है और यह मानवता के विरुद्ध है। इसलिए साहसी बनो, मानवता की रक्षा करो और दुष्ट के आगे कभी मत झुको। इस प्रकार कवि ने साहस को मानवता का अनिवार्य अंग घोषित किया है।
प्रश्न 3. “कायर मत बन” कविता की भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए।
उत्तरः “कायर मत बन” कविता की भाषा-शैली की कई विशेषताएँ हैं:
1. शुद्ध साहित्यिक खड़ी बोली: कवि ने शुद्ध और परिमार्जित हिंदी का प्रयोग किया है। ‘पाहन’, ‘पामर’, ‘तस्कर’, ‘अपावन’ जैसे तत्सम शब्दों का प्रयोग भाषा को गंभीरता और गहराई देता है।
2. संस्कृत का प्रभाव: “युद्धं देहि” जैसे संस्कृत वाक्यांश का प्रयोग कविता को और भी शक्तिशाली बनाता है।
3. प्रत्यक्ष संबोधन: पूरी कविता में कवि ने सीधे पाठक/मनुष्य को संबोधित किया है — “कुछ भी बन, बस कायर मत बन।” यह शैली कविता को अत्यंत प्रभावशाली बनाती है।
4. प्रश्नात्मक शैली: “ले-दे कर जीना क्या जीना?” और “कब तक गम के आँसू पीना?” जैसे प्रश्न पाठक को आत्मचिंतन के लिए प्रेरित करते हैं।
5. गेयता और लय: कविता में एक नियमित लय और गेयता है जो इसे गीत जैसा बनाती है। “कुछ भी बन, बस कायर मत बन” की टेक (refrain) बार-बार दोहराई गई है जो कविता के मुख्य संदेश को मस्तिष्क में स्थायी रूप से बिठा देती है।
प्रश्न 4. “कायर मत बन” कविता किस प्रकार राष्ट्रीय चेतना और स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ी है?
उत्तरः “कायर मत बन” कविता की रचना ऐसे समय में हुई जब भारत अंग्रेज़ी शासन से स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रहा था। कवि नरेंद्र शर्मा स्वयं स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रहे और उन्हें कारावास भी भोगना पड़ा।
इस कविता में “दुष्ट के सामने आत्मसमर्पण न करो” का संदेश सीधे तौर पर ब्रिटिश शासन के आगे झुकने से इनकार करने का आह्वान था। “अर्पण कर सर्वस्व मनुज को” — यह पंक्ति देशवासियों को मातृभूमि की सेवा में सब कुछ न्योछावर करने की प्रेरणा देती है।
कविता में “मानवता ने सींचा तुझ को, बहा युगों तक खून-पसीना” — यह पंक्ति उन असंख्य वीर स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान की याद दिलाती है जिन्होंने देश की स्वतंत्रता के लिए अपना जीवन दिया। इस प्रकार यह कविता केवल व्यक्तिगत साहस की नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्वाभिमान और स्वतंत्रता की कविता भी है।
बहुविकल्पीय प्रश्न / MCQ (Multiple Choice Questions)
| प्रश्न | विकल्प A | विकल्प B | विकल्प C | विकल्प D | उत्तर |
|---|---|---|---|---|---|
| 1. ‘कायर मत बन’ कविता किसने लिखी है? | महादेवी वर्मा | नरेंद्र शर्मा | सुमित्रानंदन पंत | रामधारी सिंह दिनकर | B |
| 2. ‘कायर मत बन’ कविता किस पाठ्यपुस्तक में है? | आलोक भाग-1 | क्षितिज भाग-2 | आलोक भाग-2 | अंतरा भाग-2 | C |
| 3. कविता में ‘पाहन’ का अर्थ क्या है? | पहाड़ | पानी | पत्थर | रास्ता | C |
| 4. कवि के अनुसार प्रतिहिंसा क्या है? | वीरता | दुर्बलता | साहस | देशभक्ति | B |
| 5. मानवता ने मनुष्य को किससे सींचा है? | आँसुओं से | जल से | खून-पसीने से | प्रेम से | C |
| 6. कवि नरेंद्र शर्मा का जन्म कब हुआ था? | 1910 | 1911 | 1912 | 1913 | D |
| 7. कवि नरेंद्र शर्मा का जन्म कहाँ हुआ था? | मेरठ | जहाँगीरपुर, बुलंदशहर | इलाहाबाद | लखनऊ | B |
| 8. नरेंद्र शर्मा ने किस रेडियो कार्यक्रम की स्थापना की? | रेडियो मिर्ची | आकाशवाणी | विविध भारती | सुर संगम | C |
| 9. ‘युद्धं देहि’ किस भाषा का शब्द है? | हिंदी | उर्दू | संस्कृत | फारसी | C |
| 10. ‘कायर मत बन’ में ‘तस्कर’ का अर्थ है? | सेनापति | मित्र | शत्रु/डाकू | राजा | C |
| 11. कवि के अनुसार मनुष्य का क्या अमोल है? | शरीर | मानव (मानवता) | धन | बुद्धि | B |
| 12. ‘पामर’ शब्द का अर्थ क्या है? | वीर पुरुष | राजा | नीच/अधम व्यक्ति | विद्वान | C |
| 13. कवि ने किसके आगे आत्मसमर्पण न करने की सलाह दी? | मित्र के | ईश्वर के | दुष्ट के | गुरु के | C |
| 14. नरेंद्र शर्मा को किस पुरस्कार से सम्मानित किया गया? | पद्म श्री | पद्म विभूषण | पद्म भूषण | भारत रत्न | C |
| 15. कविता की काव्य-भाषा कैसी है? | ब्रज भाषा | अवधी | शुद्ध साहित्यिक खड़ी बोली | उर्दू मिश्रित | C |
काव्य-सौंदर्य (Literary Devices / Poetic Beauty)
कविता “कायर मत बन” में निम्नलिखित काव्य-गुण और अलंकार दृष्टिगत होते हैं:
1. अनुप्रास अलंकार: “कुछ भी बन, बस कायर मत बन” — ‘ब’ वर्ण की आवृत्ति। “पटक मत माथा” — ‘म’ वर्ण की आवृत्ति। “बहा युगों तक खून-पसीना” — में लय और ध्वनि-सौंदर्य है।
2. रूपक अलंकार: “तेरी राह रोकते पाहन” — जीवन की बाधाओं को पत्थर के रूप में चित्रित किया गया है।
3. प्रतीक (Symbol): ‘पाहन’ (पत्थर) = जीवन की कठिनाइयाँ। ‘खून-पसीना’ = बलिदान और परिश्रम। ‘प्रीति’ = प्रेम और सद्भाव की शक्ति।
4. पुनरावृत्ति (Refrain/Epiphora): “कुछ भी बन, बस कायर मत बन” — यह टेक प्रत्येक पद के अंत में दोहराई गई है, जो कविता के मुख्य संदेश को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से उभारती है।
5. प्रश्नालंकार (Rhetorical Questions): “ले-दे कर जीना क्या जीना?” और “कब तक गम के आँसू पीना?” — ये प्रश्न उत्तर की अपेक्षा नहीं रखते, बल्कि पाठक को आत्मचिंतन की ओर प्रेरित करते हैं।
6. विरोधाभास (Antithesis): “यह मिटता है, वह बनता है” — शरीर और मानवता के बीच नश्वर-शाश्वत का विरोधाभास अत्यंत प्रभावी है।
7. समानांतर संरचना (Parallelism): “या तो जीत प्रीति के बल पर, / या तेरा पथ चूमे तस्कर।” — दो विकल्पों को समानांतर रूप में प्रस्तुत किया गया है।
8. गेयता और छंद: कविता में संगीतात्मकता और छांदसिक लय है जो इसे गीत के रूप में भी पढ़ने योग्य बनाती है। यह कवि की गीतकार प्रतिभा का प्रमाण है।
9. ओजगुण: पूरी कविता में वीर रस और ओज गुण की प्रधानता है। कविता का स्वर आह्वान और उत्साह का है जो पाठक में ऊर्जा और साहस का संचार करता है।
शब्दार्थ (Word Meanings)
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| कायर | डरपोक, भीरु |
| पाहन | पत्थर |
| माथा पटकना | हार मानकर दुःख से सिर पीटना |
| युद्धं देहि | युद्ध करो (संस्कृत शब्द) |
| पामर | नीच, अधम, दुष्ट व्यक्ति |
| दुहाई देना | गिड़गिड़ाना, भीख माँगना |
| प्रीति | प्रेम, प्यार |
| तस्कर | शत्रु, डाकू, विरोधी |
| प्रतिहिंसा | हिंसा के बदले हिंसा करना |
| दुर्बलता | कमज़ोरी |
| अपावन | अपवित्र, पतित, गंदा |
| ले-दे कर जीना | समझौते के साथ, गिड़गिड़ाते हुए जीना |
| गम | दुःख, शोक |
| मानवता | मनुष्यता, मानव-धर्म |
| सींचना | पालना-पोषना, विकसित करना |
| खून-पसीना | बलिदान और परिश्रम (का प्रतीक) |
| कातर | व्याकुल, भयभीत, दुःखी |
| क्रंदन | रोना, विलाप करना |
| रक्षा | बचाव, सुरक्षा |
| मोल | मूल्य, कीमत |
| अमोल | अनमोल, जिसका कोई मोल न हो |
| तोल | तुलना, माप, संतुलन |
| अर्पण | समर्पित करना, न्योछावर करना |
| सर्वस्व | सब कुछ, समस्त संपत्ति/जीवन |
| मनुज | मनुष्य, मानव |
| आत्मसमर्पण | हार मानकर शत्रु के सामने झुकना |
| दुष्ट | बुरा, अन्यायी व्यक्ति |