कबीरदास की साखी आलोक भाग-2 (ASSEB Class 10 Hindi Elective) का सातवाँ पाठ है। यह पाठ मध्यकालीन संत कवि कबीरदास के दोहों (साखियों) का संकलन है। ‘साखी’ शब्द संस्कृत के ‘साक्षी’ शब्द से बना है, जिसका अर्थ है — प्रत्यक्ष ज्ञान या गवाह। कबीरदास ने अपनी साखियों के माध्यम से समाज में व्याप्त अंधविश्वास, जाति-भेद, धार्मिक आडंबर और माया-मोह की कड़ी आलोचना की है। उन्होंने सरल, सहज और प्रभावशाली भाषा में मानव-जीवन के गूढ़ सत्यों को प्रकट किया। इस पाठ में सम्मिलित साखियाँ भक्ति, ज्ञान, गुरु-महिमा, सामाजिक समता और समय के महत्व जैसे विषयों पर प्रकाश डालती हैं।
कविता का सारांश (Summary of the Poem)
कबीरदास की साखियाँ मानव-जीवन के विविध पहलुओं को सरल दोहे के रूप में प्रस्तुत करती हैं। इन साखियों में निहित मुख्य संदेश इस प्रकार हैं:
१. जाति न पूछो साधु की — कबीर इस दोहे में जाति-पाँति के भेदभाव का खंडन करते हैं। वे कहते हैं कि साधु-संत की जाति नहीं पूछनी चाहिए, बल्कि उनके ज्ञान को महत्व देना चाहिए। जैसे तलवार की धार महत्वपूर्ण होती है न कि उसकी म्यान, उसी प्रकार मनुष्य का ज्ञान और चरित्र महत्वपूर्ण है, जाति नहीं।
२. जिन ढूँढ़ा तिन पाइयाँ — इस दोहे में कबीर गहन प्रयास और साधना के महत्व पर बल देते हैं। जो व्यक्ति गहरे पानी में उतरकर ढूँढता है उसे मिलता है, जबकि डूबने के डर से किनारे बैठा व्यक्ति कुछ भी प्राप्त नहीं कर पाता। आध्यात्मिक साधना में भी पूरे समर्पण और निर्भयता की आवश्यकता है।
३. जा घट प्रेम न संचरै — कबीर इस दोहे में भगवान के प्रति प्रेम और भक्ति को सर्वोच्च महत्व देते हैं। जिस हृदय में ईश्वर-प्रेम नहीं, वह हृदय मसान (शमशान) के समान है। जैसे लोहार की धौंकनी बिना प्राण के साँस लेती है, वैसे ही भक्ति-रहित जीवन निरर्थक है।
४. माला फेरत जुग भया — इस दोहे में कबीर बाहरी धार्मिक दिखावे की निंदा करते हैं। वे कहते हैं कि माला फेरते-फेरते युग बीत गए, परंतु यदि मन का फेर (परिवर्तन) नहीं हुआ, तो माला फेरना व्यर्थ है। हाथ की माला को छोड़कर मन की माला फेरनी चाहिए, अर्थात् मन को ही ईश्वर की ओर मोड़ना चाहिए।
५. काल करे सो आज कर — इस प्रसिद्ध दोहे में कबीर समय के महत्व पर प्रकाश डालते हैं। कल करने योग्य काम आज ही कर लो, और आज का काम अभी ही कर लो। किसी भी पल प्रलय हो सकती है — अर्थात् मृत्यु कभी भी आ सकती है, तब फिर काम कब करोगे?
६. पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुवा — इस दोहे में कबीर पुस्तकीय ज्ञान की सीमाओं को स्पष्ट करते हैं। बड़ी-बड़ी पोथियाँ (ग्रंथ) पढ़-पढ़कर संसार के लोग मर गए, परंतु कोई वास्तविक पंडित (ज्ञानी) नहीं बन पाया। जो व्यक्ति ‘प्रेम’ के ढाई अक्षर को समझ लेता है, वही सच्चा पंडित है।
७. बुरा जो देखन मैं चला — इस दोहे में कबीर आत्म-निरीक्षण का संदेश देते हैं। जब कबीर दूसरों की बुराइयाँ देखने चले, तो उन्हें कोई बुरा नहीं मिला। जब उन्होंने अपने हृदय को खोजा, तो पाया कि सबसे अधिक बुरा तो वे स्वयं हैं। इसलिए दूसरों में दोष ढूँढने के बजाय अपना आत्म-शोधन करना चाहिए।
८. कबीरा खड़ा बाज़ार में — इस दोहे में कबीर सार्वभौमिक कल्याण की भावना व्यक्त करते हैं। कबीर बाज़ार में खड़े होकर सबकी भलाई माँगते हैं। उनकी न किसी से दोस्ती है और न किसी से दुश्मनी — वे सभी को समान दृष्टि से देखते हैं।
कवि-परिचय (About the Poet)
कबीरदास हिंदी साहित्य के भक्तिकाल के सर्वाधिक प्रभावशाली और क्रांतिदर्शी कवि हैं। उनका जन्म सन् 1398 ई. में काशी (वाराणसी) में हुआ था और उनका निधन सन् 1518 ई. में मगहर में हुआ। जन्म के विषय में किंवदंती है कि वे किसी विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से उत्पन्न हुए और लोक-लाज के भय से उसने उन्हें लहरतारा तालाब के किनारे छोड़ दिया, जहाँ से नीरू और नीमा नामक जुलाहे दंपति ने उन्हें उठाकर पाला। इस प्रकार उनका लालन-पालन एक मुस्लिम परिवार में हुआ।
कबीरदास के गुरु स्वामी रामानंद थे। एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार कबीर पहले दिन के ब्राह्मण रामानंद के आने पर उनके पैरों तले लेट गए, रामानंद के मुख से ‘राम-राम’ निकला और कबीर ने इसे ही अपना गुरु-मंत्र मान लिया। कबीर पेशे से जुलाहे (बुनकर) थे और जीवन-भर कपड़ा बुनकर अपनी जीविका चलाई।
कबीर निर्गुण-निराकार राम के उपासक थे। उन्होंने हिंदू और मुस्लिम दोनों धर्मों के बाहरी आडंबरों की कड़ी आलोचना की और सच्ची भक्ति को ही श्रेष्ठ बताया। उन्होंने जाति-पाँति, मूर्तिपूजा, तीर्थयात्रा जैसे दिखावों का विरोध किया और ईश्वर को हृदय के भीतर ढूँढने का उपदेश दिया। उनकी रचनाओं का संकलन बीजक नाम से प्रसिद्ध है, जिसके तीन भाग हैं — साखी, सबद और रमैनी।
कबीर की भाषा को ‘सधुक्कड़ी’ या ‘पंचमेल खिचड़ी’ कहा जाता है, क्योंकि उसमें अवधी, राजस्थानी, पंजाबी, ब्रजभाषा, भोजपुरी आदि अनेक भाषाओं के शब्द मिले-जुले हैं। कबीर की साखियाँ दोहा छंद में रचित हैं — जिसमें प्रथम और तृतीय चरण में 13-13 मात्राएँ तथा द्वितीय और चतुर्थ चरण में 11-11 मात्राएँ होती हैं।
साखियों का सप्रसंग व्याख्या (Explanation of Dohas)
साखी १ —
जाति न पूछो साधु की, पूछि लीजिए ज्ञान।
मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान।।
प्रसंग: यह साखी कबीरदास जी द्वारा रचित ‘साखी’ शीर्षक पाठ से ली गई है। इसमें कबीर जाति-भेद का विरोध करते हुए ज्ञान की महत्ता प्रतिपादित करते हैं।
व्याख्या: कबीर कहते हैं कि साधु (संत या महापुरुष) की जाति मत पूछो, बल्कि उनका ज्ञान ग्रहण करो। तलवार का मूल्य उसकी धार में होता है, न कि उसकी म्यान में। म्यान तो उसे ढकने का आवरण मात्र है। ठीक उसी प्रकार, मनुष्य की जाति और कुल-गोत्र उसका बाह्य आवरण है; महत्वपूर्ण है उसका ज्ञान, उसकी विद्या, उसका आचरण और चरित्र। समाज की भलाई और आध्यात्मिक उन्नति के लिए जाति नहीं, ज्ञान की आवश्यकता है। कबीर यहाँ जाति-भेद की निरर्थकता सिद्ध करते हैं और समाज में व्याप्त ऊँच-नीच की भावना को चुनौती देते हैं।
साखी २ —
जिन ढूँढ़ा तिन पाइयाँ, गहरे पानी पैठ।
जो बौरा डूबन डरा, रहा किनारे बैठ।।
प्रसंग: यह साखी कबीरदास जी द्वारा रचित ‘साखी’ शीर्षक पाठ से ली गई है। इसमें कबीर साधना में गहरे प्रयास की आवश्यकता बताते हैं।
व्याख्या: कबीर कहते हैं कि जिन लोगों ने गहरे पानी में डूबकर ढूँढा, उन्हें ईश्वर की प्राप्ति हुई। जो मूर्ख (बौरा) डूबने के डर से किनारे पर बैठा रहा, वह कुछ भी प्राप्त नहीं कर सका। कबीर यहाँ आध्यात्मिक साधना की बात कर रहे हैं। जो साधक पूरे मन और प्राण से साधना में डूब जाता है, उसे ही ईश्वर की अनुभूति होती है। जो लोग भय और आलस्य के कारण आधे-अधूरे मन से साधना करते हैं, वे वंचित रह जाते हैं। जीवन में भी जो व्यक्ति पूरे परिश्रम से प्रयास करता है, वही सफलता पाता है।
साखी ३ —
जा घट प्रेम न संचरै, सो घट जान मसान।
जैसे खाल लोहार की, साँस लेत बिनु प्रान।।
प्रसंग: यह साखी कबीरदास जी द्वारा रचित ‘साखी’ शीर्षक पाठ से ली गई है। इसमें कबीर हृदय में ईश्वर-प्रेम की अनिवार्यता बताते हैं।
व्याख्या: कबीर कहते हैं कि जिस हृदय (घट) में ईश्वर का प्रेम संचरित नहीं होता, वह हृदय श्मशान (मसान) के समान है — उजाड़ और निर्जीव। जैसे लोहार की धौंकनी (खाल) बिना प्राण के साँस लेती है — केवल हवा अंदर-बाहर जाती है, पर उसमें जीवन नहीं होता — उसी प्रकार ईश्वर-भक्ति के बिना मनुष्य का जीवन निरर्थक है। वह केवल साँस लेता है, वास्तव में जीता नहीं। सच्चा जीवन वही है जो ईश्वर-प्रेम से परिपूर्ण हो।
साखी ४ —
माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर।
कर का मनका डारि दे, मन का मनका फेर।।
प्रसंग: यह साखी कबीरदास जी द्वारा रचित ‘साखी’ शीर्षक पाठ से ली गई है। इसमें कबीर बाहरी धार्मिक आडंबर का विरोध करते हैं।
व्याख्या: कबीर कहते हैं कि हाथ में माला फेरते-फेरते युग बीत गया, परंतु मन का फेर (मन का ईश्वर की ओर मुड़ना) नहीं हुआ। इसलिए हाथ की माला (मनका) को छोड़ो और मन के मनके (मन की ग्रंथियों) को भीतर से फेरो। कबीर यहाँ बाह्य धार्मिक क्रियाओं की निस्सारता बताते हैं। माला, तीर्थ, व्रत — ये सब बाहरी क्रियाएँ हैं। असली भक्ति वह है जो मन और आत्मा में हो। यदि मन में ईश्वर-भक्ति नहीं और केवल दिखावे के लिए धार्मिक क्रियाएँ होती हैं, तो वे निरर्थक हैं। ‘कर का मनका’ से तात्पर्य हाथ की माला से है और ‘मन का मनका’ से तात्पर्य मन को ही ईश्वर में लीन करने से है।
साखी ५ —
काल करे सो आज कर, आज करे सो अब।
पल में परलय होएगा, बहुरि करेगो कब।।
प्रसंग: यह साखी कबीरदास जी द्वारा रचित ‘साखी’ शीर्षक पाठ से ली गई है। इसमें कबीर समय के सदुपयोग और तत्परता का उपदेश देते हैं।
व्याख्या: कबीर कहते हैं कि जो काम कल करने का सोच रहे हो, उसे आज ही करो। जो काम आज करने का है, उसे अभी इसी पल करो। क्योंकि एक ही क्षण में प्रलय (विनाश, मृत्यु) हो सकती है — तब उस काम को फिर कब करोगे? यह दोहा मुख्यतः भक्ति और ईश्वर-स्मरण के संदर्भ में है। कबीर कहते हैं कि भगवान की भक्ति कल के लिए मत टालो, क्योंकि मृत्यु का कोई निश्चित समय नहीं। जीवन की नश्वरता का बोध कराते हुए कबीर मनुष्य को वर्तमान में ही सच्चे कर्म और भक्ति में लगने की प्रेरणा देते हैं।
साखी ६ —
पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुवा, पंडित भया न कोइ।
ऐकै अषिर पीव का, पढ़े सु पंडित होइ।।
प्रसंग: यह साखी कबीरदास जी द्वारा रचित ‘साखी’ शीर्षक पाठ से ली गई है। इसमें कबीर पुस्तकीय ज्ञान की अपेक्षा प्रेम-ज्ञान की श्रेष्ठता प्रतिपादित करते हैं।
व्याख्या: कबीर कहते हैं कि बड़ी-बड़ी पोथियाँ (ग्रंथ) पढ़ते-पढ़ते सारा जग (संसार) मर गया, परंतु कोई वास्तविक पंडित (ज्ञानी) नहीं बन पाया। जो व्यक्ति अपने प्रिय (ईश्वर/पीव) के एक अक्षर को — अर्थात् प्रेम को — पढ़ लेता है, वही सच्चा पंडित बन जाता है। ‘ढाई आखर प्रेम का’ के रूप में भी यह दोहा प्रसिद्ध है। कबीर का मत है कि शास्त्रों और ग्रंथों को कंठस्थ कर लेने से ईश्वर की प्राप्ति नहीं होती। जो व्यक्ति ईश्वर के प्रति सच्चा प्रेम अनुभव करता है, वही वास्तविक ज्ञानी है। पुस्तकीय ज्ञान बाहरी है, प्रेम का ज्ञान आंतरिक और परम है।
साखी ७ —
बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।।
प्रसंग: यह साखी कबीरदास जी द्वारा रचित ‘साखी’ शीर्षक पाठ से ली गई है। इसमें कबीर आत्म-निरीक्षण और आत्म-शोधन का संदेश देते हैं।
व्याख्या: कबीर कहते हैं कि जब मैं दुनिया में दूसरों की बुराइयाँ खोजने निकला, तो मुझे कोई बुरा व्यक्ति नहीं मिला। परंतु जब मैंने अपने हृदय को खोजकर देखा तो पाया कि मुझसे बुरा तो कोई है ही नहीं। कबीर यहाँ मानव की स्वाभाविक प्रवृत्ति पर कटाक्ष करते हैं। मनुष्य दूसरों में दोष देखता है, पर स्वयं के दोषों पर ध्यान नहीं देता। आत्म-शोधन के बिना आध्यात्मिक उन्नति संभव नहीं। कबीर का यह दोहा व्यक्ति को आत्म-परीक्षण की प्रेरणा देता है और दूसरों को दोष देने की बजाय स्वयं को सुधारने का संदेश देता है।
साखी ८ —
कबीरा खड़ा बाज़ार में, मांगे सबकी खैर।
ना काहू से दोस्ती, न काहू से बैर।।
प्रसंग: यह साखी कबीरदास जी द्वारा रचित ‘साखी’ शीर्षक पाठ से ली गई है। इसमें कबीर सार्वभौमिक कल्याण और निष्पक्षता की भावना व्यक्त करते हैं।
व्याख्या: कबीर कहते हैं कि वे बाज़ार में खड़े होकर सभी लोगों की भलाई और कल्याण (खैर) माँगते हैं। उनकी न किसी से विशेष दोस्ती है और न किसी से दुश्मनी। कबीर यहाँ एक संत की निष्पक्ष और समभावी दृष्टि का चित्रण करते हैं। वे सभी मनुष्यों को समान दृष्टि से देखते हैं — न किसी का पक्ष लेते हैं और न किसी का विरोध करते हैं। उनकी कामना सबके लिए समान है — सबका भला हो। यह दोहा वसुधैव कुटुंबकम् की भावना को प्रतिबिंबित करता है और सामाजिक समरसता का संदेश देता है।
पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर (Textbook Questions and Answers)
बोध एवं विचार
१. साधु की जाति क्यों नहीं पूछनी चाहिए?
उत्तरः कबीरदास के अनुसार साधु की जाति नहीं पूछनी चाहिए क्योंकि जाति मनुष्य का केवल बाहरी आवरण है, जबकि ज्ञान उसकी वास्तविक पहचान होती है। जैसे तलवार की धार का मूल्य होता है, म्यान का नहीं, उसी प्रकार साधु का ज्ञान महत्वपूर्ण है, जाति नहीं। साधु से उनका ज्ञान ग्रहण करना चाहिए, उनकी जाति-कुल के बारे में जिज्ञासा करना अनुचित और अज्ञानता का चिह्न है। समाज के उत्थान के लिए ज्ञान की आवश्यकता है, जाति-भेद से कुछ प्राप्त नहीं होता।
२. डूबने से डरने वाले व्यक्ति की क्या गति होती है?
उत्तरः कबीरदास के अनुसार डूबने से डरने वाला व्यक्ति किनारे पर ही बैठा रहता है और उसे कुछ भी प्राप्त नहीं होता। जिन्होंने गहरे पानी में उतरकर प्रयास किया, उन्होंने ही (ईश्वर को) पाया। जो मनुष्य भय और संकोच के कारण साधना में पूरी तरह नहीं डूबता, वह आध्यात्मिक प्राप्ति से वंचित रह जाता है। जीवन में भी जो व्यक्ति कठिनाइयों से घबराकर प्रयत्न नहीं करता, उसे सफलता नहीं मिलती। कबीर निर्भय और पूर्ण समर्पण के साथ साधना करने की प्रेरणा देते हैं।
३. भक्ति-रहित जीवन किसके समान है और क्यों?
उत्तरः कबीरदास के अनुसार जिस हृदय में ईश्वर-प्रेम नहीं है, वह हृदय श्मशान (मसान) के समान है। इसके अतिरिक्त ऐसे व्यक्ति की तुलना कबीर लोहार की धौंकनी से करते हैं जो बिना प्राण के साँस लेती है। धौंकनी में हवा का आना-जाना होता है, परंतु उसमें जीवन नहीं होता। उसी प्रकार जो मनुष्य केवल शरीर से जी रहा है, परंतु उसके हृदय में ईश्वर-भक्ति और प्रेम नहीं है, उसका जीवन निरर्थक और मृत के समान है। सच्चा जीवन वही है जो ईश्वर-प्रेम से आलोकित हो।
४. माला फेरने से क्या लाभ नहीं होता और कबीर ने क्या करने को कहा है?
उत्तरः कबीरदास कहते हैं कि हाथ में माला फेरने से — यानी बाह्य धार्मिक क्रियाओं से — कोई लाभ नहीं होता, यदि मन का परिवर्तन नहीं हुआ। युग बीत जाने पर भी यदि मन ईश्वर की ओर नहीं मुड़ा तो माला फेरना व्यर्थ है। कबीर ने कहा है कि हाथ के मनके (माला) को छोड़कर मन के मनके को फेरो — अर्थात् मन को ही ईश्वर में लगाओ। सच्ची भक्ति बाहरी आडंबर में नहीं, मन की सच्ची लगन में है।
५. कबीर ‘काल करे सो आज कर’ क्यों कहते हैं?
उत्तरः कबीरदास ‘काल करे सो आज कर’ इसलिए कहते हैं क्योंकि मानव-जीवन अनिश्चित और क्षणभंगुर है। किसी भी पल विनाश (प्रलय) या मृत्यु हो सकती है। इसलिए जो काम कल के लिए टाल रहे हो, उसे आज ही करो; और जो आज करने का सोचा है, उसे अभी इसी पल करो। मृत्यु का कोई निश्चित समय नहीं होता, इसलिए ईश्वर-भक्ति, सत्कर्म और आत्म-कल्याण के कार्य को टालना उचित नहीं। वर्तमान समय ही हमारे पास है, इसलिए इसका भरपूर उपयोग करना चाहिए।
६. पोथी पढ़ने से ज्ञान क्यों नहीं मिलता? सच्चा ज्ञानी कौन है?
उत्तरः कबीरदास के अनुसार पोथियाँ (ग्रंथ) पढ़ने से ज्ञान इसलिए नहीं मिलता क्योंकि पुस्तकीय ज्ञान केवल बाहरी (शाब्दिक) होता है, वह आंतरिक अनुभव नहीं है। बड़े-बड़े ग्रंथ पढ़-पढ़कर लोग मर गए, पर कोई वास्तविक पंडित नहीं बन पाया। सच्चा ज्ञानी वह है जिसने ईश्वर के ‘एक अक्षर’ को — अर्थात् प्रेम को — पढ़ लिया हो। जो व्यक्ति ईश्वर के प्रति सच्चा प्रेम अनुभव करता है और उसे आत्मसात् करता है, वही वास्तविक पंडित है। ईश्वर-प्रेम पुस्तकों से नहीं, हृदय की गहराई से प्राप्त होता है।
७. ‘बुरा जो देखन मैं चला’ — इस दोहे का क्या संदेश है?
उत्तरः इस दोहे का संदेश यह है कि मनुष्य को दूसरों में दोष ढूँढने के बजाय अपना आत्म-निरीक्षण करना चाहिए। कबीर कहते हैं कि जब वे दूसरों की बुराइयाँ खोजने निकले, तो उन्हें कोई बुरा नहीं मिला; परंतु जब उन्होंने अपने हृदय को खोजा, तो पाया कि उनसे बुरा कोई नहीं। यह दोहा यह सिखाता है कि प्रत्येक व्यक्ति पहले स्वयं को सुधारे। दूसरों की आलोचना करना आसान है, परंतु आत्म-शोधन कठिन और अधिक महत्वपूर्ण है। आध्यात्मिक उन्नति के लिए आत्म-परीक्षण अनिवार्य है।
८. कबीर बाज़ार में खड़े होकर क्या माँगते हैं और उनका दृष्टिकोण क्या है?
उत्तरः कबीर बाज़ार में खड़े होकर सभी लोगों की खैर (भलाई और कल्याण) माँगते हैं। उनकी न किसी से विशेष मित्रता है और न किसी से शत्रुता। कबीर का दृष्टिकोण पूर्णतः निष्पक्ष और सार्वभौमिक है। वे समस्त मानव-जाति को समान दृष्टि से देखते हैं और सभी के सुख-कल्याण की कामना करते हैं। एक सच्चे संत की विशेषता यही होती है कि वह किसी से पक्षपात नहीं करता और सभी के लिए शुभ-कामना रखता है। यह दोहा उनकी सामाजिक और मानवतावादी दृष्टि को स्पष्ट करता है।
९. ‘साखी’ शब्द किससे बना है और इसका क्या अर्थ है?
उत्तरः ‘साखी’ शब्द संस्कृत के ‘साक्षी’ शब्द का तद्भव रूप है। ‘साक्षी’ का अर्थ होता है — गवाह या प्रत्यक्ष ज्ञान का साक्षी। कबीरदास ने जो भी जाना, अनुभव किया और देखा, उसे उन्होंने अपनी साखियों में व्यक्त किया। इस प्रकार साखी वह काव्य-रूप है जिसमें कवि का प्रत्यक्ष आध्यात्मिक अनुभव और ज्ञान अभिव्यक्त होता है। साखी मुख्यतः दोहा छंद में रचित होती है।
१०. कबीरदास की भाषा की क्या विशेषता है?
उत्तरः कबीरदास की भाषा को ‘सधुक्कड़ी’ या ‘पंचमेल खिचड़ी’ कहा जाता है। उनकी भाषा में अवधी, राजस्थानी, पंजाबी, ब्रजभाषा, भोजपुरी, हिंदी, खड़ी बोली आदि अनेक भाषाओं और बोलियों के शब्द घुले-मिले हैं। कबीर शिक्षित पंडित नहीं थे, वे लोकभाषा में बोलते थे और उनकी वाणी सीधे जनसाधारण के हृदय तक पहुँचती थी। उनकी भाषा में सरलता, प्रभावशीलता और सजीवता है। उन्होंने अपनी भाषा के बारे में स्वयं कहा था — ‘तू कहता कागद की लेखी, मैं कहता आँखन की देखी।’
११. कबीरदास का कौन-सा ग्रंथ प्रसिद्ध है और उसके कितने भाग हैं?
उत्तरः कबीरदास का प्रमुख ग्रंथ ‘बीजक’ है। इसके तीन भाग हैं — (१) साखी, (२) सबद (शब्द), और (३) रमैनी। साखी में दोहा छंद में उनके उपदेश हैं; सबद में राग-रागनियों पर आधारित पद हैं; और रमैनी में चौपाई छंद में दार्शनिक विचार हैं। ‘बीजक’ का संपादन कबीर के शिष्यों द्वारा किया गया और यह कबीरपंथियों का प्रमुख धर्मग्रंथ है।
अतिरिक्त महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (Additional Important Questions)
लघु-उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Questions)
१. कबीरदास का जन्म और निधन कब और कहाँ हुआ?
उत्तरः कबीरदास का जन्म सन् 1398 ई. में काशी (वाराणसी) में हुआ था और उनका निधन सन् 1518 ई. में मगहर (उत्तर प्रदेश) में हुआ। उनका पालन-पोषण नीरू और नीमा नामक मुस्लिम जुलाहा दंपति ने किया था।
२. कबीरदास के गुरु कौन थे?
उत्तरः कबीरदास के गुरु स्वामी रामानंद थे, जो वैष्णव संत और भक्त-मंडली के प्रमुख आचार्य थे। कबीर ने उनके पैरों के नीचे लेटकर ‘राम-राम’ नाम को अपना गुरु-मंत्र बनाया। रामानंद की शिष्य-मंडली में उच्च-नीच का भेद नहीं था।
३. कबीरदास किस प्रकार के ईश्वर के उपासक थे?
उत्तरः कबीरदास निर्गुण-निराकार ईश्वर के उपासक थे। उनके राम साकार और सगुण नहीं थे, बल्कि वे निराकार, अजन्मा और सर्वव्यापी ब्रह्म थे। कबीर ने मूर्तिपूजा, तीर्थयात्रा और बाहरी धार्मिक कर्मकांडों का विरोध किया और ईश्वर को हृदय के भीतर ढूँढने का उपदेश दिया।
४. ‘दोहा’ छंद के क्या लक्षण हैं?
उत्तरः दोहा एक मात्रिक छंद है जिसमें दो चरण होते हैं। प्रत्येक चरण में 24 मात्राएँ होती हैं — पहले (विषम) चरण में 13 मात्राएँ और दूसरे (सम) चरण में 11 मात्राएँ। दोहे में अंत्यानुप्रास (तुकबंदी) होती है — दूसरे और चौथे चरण के अंत में समान तुक। दोहा हिंदी की अत्यंत लोकप्रिय और संक्षिप्त काव्य-विधा है जिसमें बड़े-बड़े सत्य थोड़े शब्दों में कहे जाते हैं।
५. कबीरदास ने समाज-सुधार में क्या योगदान दिया?
उत्तरः कबीरदास ने अपनी साखियों और रचनाओं के माध्यम से समाज-सुधार में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने (१) जाति-प्रथा और छुआछूत का विरोध किया, (२) हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रचार किया, (३) धार्मिक आडंबरों और पाखंड की निंदा की, (४) ईश्वर को सभी के भीतर बताकर मानव-समानता का प्रचार किया, और (५) सरल और सहज जीवन जीने का उपदेश दिया। उन्होंने भक्ति को जाति-धर्म से ऊपर रखा।
६. साखी में ‘मनका’ और ‘मनका’ — दो अर्थों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तरः ‘माला फेरत जुग भया’ वाली साखी में ‘मनका’ शब्द दो भिन्न अर्थों में प्रयुक्त हुआ है। ‘कर का मनका’ में ‘मनका’ का अर्थ है — माला के दाने (जपमाला के मोती), जो हाथ (कर) में पकड़े जाते हैं। ‘मन का मनका’ में ‘मनका’ का अर्थ है — मन की माला, अर्थात् मन को ईश्वर की ओर मोड़ना। कबीर कहते हैं कि हाथ के मनकों (माला) को छोड़ो और मन को ही ईश्वर में लगाओ। यहाँ यमक अलंकार का सुंदर प्रयोग है।
दीर्घ-उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Questions)
१. कबीरदास के जीवन और व्यक्तित्व पर एक संक्षिप्त निबंध लिखिए।
उत्तरः कबीरदास हिंदी साहित्य के भक्तिकाल के महान संत-कवि हैं। उनका जन्म सन् 1398 ई. में काशी (वाराणसी) में हुआ था। किंवदंती के अनुसार वे किसी विधवा ब्राह्मणी के पुत्र थे जिन्हें लहरतारा तालाब के किनारे छोड़ दिया गया था। वहाँ से नीरू और नीमा नामक मुस्लिम जुलाहा दंपति ने उन्हें उठाकर पाला।
कबीर की शिक्षा-दीक्षा अधिक नहीं हुई। वे स्वयं कहते थे — “मसि कागद छूयो नहीं, कलम गही नहिं हाथ।” परंतु उनका अनुभव-जनित ज्ञान अद्भुत था। उन्होंने स्वामी रामानंद को अपना गुरु बनाया और उनके ‘राम’ नाम को अपना मंत्र। कबीर पेशे से जुलाहे थे और जीवन-भर कपड़ा बुनकर जीविका चलाई — यह उनके श्रम के प्रति निष्ठा का प्रमाण था।
कबीर हिंदू और मुस्लिम दोनों धर्मों के आडंबरों और कर्मकांडों के कठोर आलोचक थे। वे निर्गुण-निराकार ईश्वर के उपासक थे। उन्होंने जाति-भेद, छुआछूत और धार्मिक पाखंड का खुलकर विरोध किया। उनकी रचनाओं का संकलन ‘बीजक’ है। उनकी मृत्यु सन् 1518 ई. में मगहर में हुई। कहा जाता है कि मृत्यु के बाद हिंदुओं और मुसलमानों में उनके शव को लेकर विवाद हुआ, परंतु जब कपड़ा हटाया गया तो केवल फूल मिले — यह किंवदंती उनकी जाति-निरपेक्षता की प्रतीक है।
२. कबीरदास की साखियों में व्यक्त मुख्य विचारों की समीक्षा कीजिए।
उत्तरः कबीरदास की साखियाँ मानव-जीवन की अमूल्य निधि हैं। इन साखियों में निम्नलिखित मुख्य विचार व्यक्त हुए हैं:
(क) जाति-भेद का विरोध: कबीर जाति को मनुष्य का बाहरी आवरण मानते हैं। ‘जाति न पूछो साधु की’ में उन्होंने स्पष्ट किया है कि ज्ञान महत्वपूर्ण है, जाति नहीं। यह मानव-समानता का संदेश है।
(ख) साधना में पूर्ण समर्पण: ‘जिन ढूँढ़ा तिन पाइयाँ’ में कबीर ने गहन साधना और पूर्ण समर्पण का महत्व बताया। आधे-अधूरे प्रयत्न से ईश्वर-प्राप्ति संभव नहीं।
(ग) सच्ची भक्ति का महत्व: ‘जा घट प्रेम न संचरै’ में उन्होंने बताया कि हृदय में ईश्वर-प्रेम के बिना जीवन निरर्थक है। भक्ति-रहित जीवन श्मशान के समान है।
(घ) बाह्य आडंबर का विरोध: ‘माला फेरत जुग भया’ में कबीर ने बाह्य धार्मिक क्रियाओं की निरर्थकता बताई। मन को ईश्वर की ओर मोड़ना ही सच्ची भक्ति है।
(ङ) समय का सदुपयोग: ‘काल करे सो आज कर’ में जीवन की नश्वरता का बोध कराते हुए तत्परता का संदेश है।
(च) प्रेम का ज्ञान: ‘पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुवा’ में पुस्तकीय ज्ञान की अपेक्षा ईश्वर-प्रेम को श्रेष्ठ बताया गया है।
(छ) आत्म-निरीक्षण: ‘बुरा जो देखन मैं चला’ में दूसरों की आलोचना करने के बजाय अपना आत्म-शोधन करने का संदेश है।
इस प्रकार कबीरदास की साखियाँ व्यक्तिगत आध्यात्मिक उन्नति और सामाजिक सुधार — दोनों का मार्गदर्शन करती हैं।
३. ‘काल करे सो आज कर’ दोहे की संदर्भ सहित व्याख्या करते हुए उसकी प्रासंगिकता पर प्रकाश डालिए।
उत्तरः दोहा: काल करे सो आज कर, आज करे सो अब। / पल में परलय होएगा, बहुरि करेगो कब।।
संदर्भ: यह दोहा महात्मा कबीरदास की ‘साखी’ से लिया गया है। यह आलोक भाग-2 (ASSEB Class 10 Hindi Elective) का पाठ है।
व्याख्या: कबीर इस दोहे में मनुष्य को समय के महत्व का बोध कराते हैं। वे कहते हैं कि जो काम कल करने का विचार है, उसे आज ही करो; और जो काम आज करना है, उसे अभी — इसी पल — करो। क्योंकि किसी एक पल में प्रलय (विनाश या मृत्यु) हो सकती है। यदि एक क्षण में जीवन समाप्त हो जाए, तो फिर वह काम कब करोगे?
प्रासंगिकता: यह दोहा आज के जीवन में भी अत्यंत प्रासंगिक है। हम अक्सर अपने कार्यों को, अपनी भक्ति को और अपने सुधार को ‘कल’ के लिए टालते रहते हैं। कबीर की यह चेतावनी हमें याद दिलाती है कि जीवन अनिश्चित है। विद्यार्थियों के लिए यह दोहा यह सीख देता है कि पढ़ाई और अन्य महत्वपूर्ण कार्यों को कल पर मत छोड़ो, अभी करो। यह दोहा आलस्य, टालमटोल और विलंब की प्रवृत्ति का सुंदर प्रतिकार है।
४. ‘पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुवा’ — इस दोहे में कबीर की शिक्षा-दर्शन की दृष्टि को स्पष्ट कीजिए।
उत्तरः कबीरदास अपने इस दोहे में यह सिद्ध करते हैं कि केवल पुस्तकें पढ़ लेने से वास्तविक ज्ञान प्राप्त नहीं होता। बड़े-बड़े पंडित ग्रंथों को कंठस्थ कर लेते हैं, परंतु वे ईश्वर की सच्चाई को नहीं जान पाते। कबीर का शिक्षा-दर्शन अनुभव-आधारित है। उनके अनुसार सच्चा ज्ञान वह है जो हृदय से अनुभव किया जाए, जो आत्मा की गहराई से उठे। ‘प्रेम के ढाई आखर’ से तात्पर्य है — ईश्वर के प्रति सच्चा प्रेम-भाव। जिसने यह प्रेम-भाव जान लिया, वही सच्चा पंडित है। कबीर ब्राह्मणी शिक्षा-पद्धति के आडंबर पर भी प्रहार करते हैं। उनका मत है कि ज्ञान जाति-धर्म का मोहताज नहीं, वह तो हृदय में बसा है। आज के संदर्भ में भी यह सत्य है — केवल डिग्री लेना पर्याप्त नहीं, व्यावहारिक ज्ञान और मानवीय मूल्यों की समझ भी आवश्यक है।
बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQ Questions)
| प्रश्न | विकल्प A | विकल्प B | विकल्प C | विकल्प D | उत्तर |
|---|---|---|---|---|---|
| १. ‘साखी’ शब्द किस संस्कृत शब्द से बना है? | सखा | साक्षी | साक्ष | शाखा | B |
| २. कबीरदास का जन्म किस सन् में हुआ? | 1440 ई. | 1350 ई. | 1398 ई. | 1450 ई. | C |
| ३. कबीरदास के गुरु कौन थे? | रामदास | तुलसीदास | रामानंद | विद्यापति | C |
| ४. ‘जाति न पूछो साधु की’ — इसमें कबीर ने क्या पूछने को कहा है? | कुल | ज्ञान | गोत्र | उम्र | B |
| ५. ‘जिन ढूँढ़ा तिन पाइयाँ’ — किसे मिला? | जो किनारे बैठा | जो गहरे पानी में उतरा | जो डूबने से डरा | जो नहीं गया | B |
| ६. ‘जा घट प्रेम न संचरै’ — वह घट किसके समान है? | मंदिर | उद्यान | मसान (श्मशान) | नदी | C |
| ७. ‘माला फेरत जुग भया’ में कबीर क्या संदेश देते हैं? | माला फेरते रहो | मन को ईश्वर की ओर मोड़ो | तीर्थ जाओ | व्रत रखो | B |
| ८. ‘काल करे सो आज कर’ — ‘काल’ का क्या अर्थ है? | कल (tomorrow) | मृत्यु | समय | युग | A |
| ९. कबीरदास का प्रसिद्ध ग्रंथ कौन-सा है? | रामचरितमानस | बीजक | सूरसागर | पद्मावत | B |
| १०. ‘बीजक’ के कितने भाग हैं? | दो | चार | तीन | पाँच | C |
| ११. कबीर की भाषा को क्या कहा जाता है? | संस्कृत | सधुक्कड़ी | ब्रजभाषा | अवधी | B |
| १२. ‘पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुवा’ — सच्चा पंडित कौन है? | जो बड़े ग्रंथ पढ़े | जो प्रेम के ढाई आखर जाने | जो संस्कृत जाने | जो विद्यालय जाए | B |
| १३. ‘बुरा जो देखन मैं चला’ — कबीर को अपने हृदय में क्या मिला? | ईश्वर | कोई नहीं | सबसे बड़ा बुरा | ज्ञान | C |
| १४. ‘कबीरा खड़ा बाज़ार में’ — कबीर क्या माँगते हैं? | धन-संपत्ति | सबकी खैर (भलाई) | मोक्ष | यश | B |
| १५. दोहा छंद के प्रत्येक चरण में कितनी मात्राएँ होती हैं? | 16 | 20 | 24 | 28 | C |
काव्य-सौंदर्य (Literary Devices/Poetic Beauty)
कबीरदास की साखियों में काव्य-सौंदर्य के अनेक तत्व विद्यमान हैं। उनके काव्य में प्रयुक्त प्रमुख अलंकार और काव्य-गुण इस प्रकार हैं:
१. रूपक अलंकार (Metaphor):
‘जा घट प्रेम न संचरै, सो घट जान मसान’ — यहाँ भक्ति-रहित हृदय की तुलना श्मशान से की गई है। ‘जैसे खाल लोहार की’ — यहाँ भक्ति-रहित जीव की तुलना लोहार की धौंकनी से की गई है।
२. यमक अलंकार (Paranomasia):
‘कर का मनका डारि दे, मन का मनका फेर’ — यहाँ ‘मनका’ शब्द दो भिन्न अर्थों में प्रयुक्त हुआ है — (१) माला के दाने (मनका), (२) मन की (मन का)। यह यमक का सुंदर उदाहरण है।
३. अनुप्रास अलंकार (Alliteration):
‘पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुवा’ — यहाँ ‘प’ वर्ण की आवृत्ति से अनुप्रास अलंकार है। ‘काल करे सो आज कर’ — ‘क’ वर्ण की आवृत्ति।
४. उपमा अलंकार (Simile):
‘मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान’ — तलवार-म्यान की उपमा से ज्ञान और जाति की तुलना की गई है।
५. व्यंजना शक्ति (Suggestive Power):
कबीर की भाषा में अभिधा (शाब्दिक अर्थ) के पीछे व्यंजना (गहरा अर्थ) छिपा होता है। ‘गहरे पानी पैठ’ में केवल पानी में गोताखोरी की बात नहीं है, बल्कि आध्यात्मिक साधना में गहरे उतरने का संकेत है।
६. प्रसाद गुण (Clarity and Simplicity):
कबीर की भाषा में प्रसाद गुण प्रधान है — वे जटिल आध्यात्मिक सत्यों को सरल और सहज भाषा में कहते हैं। उनके दोहे पढ़ते ही हृदय में उतर जाते हैं।
७. लोकोक्ति और लोक-जीवन का चित्रण:
कबीर के दोहों में लोक-जीवन के सरल बिम्ब हैं — लोहार, कुम्हार, जुलाहा, तलवार, माला, बाज़ार — ये सभी रोजमर्रा के जीवन से लिए गए हैं, जो दोहों को जीवंत और संप्रेषणीय बनाते हैं।
८. छंद-सौंदर्य:
कबीर की साखियाँ दोहा छंद में हैं। दोहे की संक्षिप्तता और तुकबंदी इसे याद रखने में सहज बनाती है। दो पंक्तियों में बड़े-बड़े सत्य कह देना कबीर की विशेषता है।
शब्दार्थ (Word Meanings)
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| साखी | संस्कृत के ‘साक्षी’ से बना — प्रत्यक्ष ज्ञान, गवाह; कबीर के दोहों का संग्रह |
| साधु | संत, महात्मा, त्यागी और ज्ञानी पुरुष |
| म्यान | तलवार को रखने का खोल / आवरण |
| मोल | मूल्य, कीमत |
| तिन | उन्होंने (जिन्होंने) |
| पाइयाँ | पाया, प्राप्त किया |
| पैठ | प्रवेश किया, उतरा, डूबा |
| बौरा | मूर्ख, अज्ञानी व्यक्ति |
| घट | हृदय, मन, शरीर |
| संचरै | संचरित हो, प्रवाहित हो, उत्पन्न हो |
| मसान | श्मशान, मुर्दे जलाने का स्थान |
| खाल | धौंकनी (लोहार का चमड़े का यंत्र जो हवा फेंकता है) |
| बिनु प्रान | बिना प्राण के, बिना जीवन के |
| माला | जपमाला, माला (धार्मिक क्रिया में प्रयुक्त) |
| जुग | युग, लंबा समय |
| मनका | माला का दाना / मन का (यमक) |
| काल | कल (tomorrow) / मृत्यु |
| परलय | प्रलय, विनाश, मृत्यु |
| बहुरि | फिर, दोबारा |
| पोथी | पुस्तक, ग्रंथ, धार्मिक ग्रंथ |
| मुवा | मर गया |
| पंडित | विद्वान, ज्ञानी |
| ऐकै / एकै | एक |
| अषिर / अक्षर | वर्ण, अक्षर; यहाँ प्रेम का सार |
| पीव | प्रिय, ईश्वर (प्रियतम) |
| बुरा | बुरा, दोषपूर्ण, अवगुणी |
| दिल | हृदय |
| खोजा | ढूँढा, खोज की |
| खैर | भलाई, कल्याण, शुभ |
| काहू | किसी से भी |
| बैर | शत्रुता, दुश्मनी, वैर |
| बीजक | कबीरदास का प्रमुख काव्य-ग्रंथ |
| सधुक्कड़ी | कबीर की मिश्रित भाषा-शैली |
| निर्गुण | गुण-रहित, जिसमें सांसारिक गुण न हों — ईश्वर का निराकार रूप |
| निराकार | जिसका कोई आकार या रूप न हो |