असम बोर्ड (ASSEB) की कक्षा 10 की हिंदी ऐच्छिक पाठ्यपुस्तक आलोक भाग-2 का पहला पाठ “नींव की ईंट” हिंदी के प्रसिद्ध निबंधकार रामवृक्ष बेनीपुरी द्वारा लिखा गया एक प्रेरणादायक ललित निबंध है। इस पाठ में लेखक ने एक सुंदर भवन की नींव की ईंट और कंगूरे की ईंट के माध्यम से समाज के अनाम बलिदानियों और यशलोभी सेवकों की तुलना की है। यह पाठ छात्रों को निःस्वार्थ सेवा और त्याग का महत्व समझाता है। यहाँ इस पाठ के पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर और अतिरिक्त महत्वपूर्ण प्रश्न दिए गए हैं।
पाठ-परिचय (Summary)
“नींव की ईंट” रामवृक्ष बेनीपुरी द्वारा लिखा गया एक विचारोत्तेजक ललित निबंध है। लेखक ने इस निबंध में भवन-निर्माण की एक साधारण-सी घटना को आधार बनाकर समाज और राष्ट्र-निर्माण का एक गहन और अर्थपूर्ण संदेश दिया है। एक चमकीली, सुंदर और आलीशान इमारत खड़ी होती है, जिसे देखकर सभी प्रशंसा करते हैं। लोगों की नज़र इमारत के ऊपरी हिस्से — कंगूरे — पर जाती है, परंतु उस इमारत को टिकाए रखने वाली नींव की ईंट की ओर किसी का ध्यान नहीं जाता। नींव की ईंट जमीन के सात हाथ नीचे गड़ी रहती है और उसी पर सारी इमारत की स्थिरता निर्भर करती है।
लेखक का मानना है कि सत्य सदा कठोर होता है और मनुष्य उस कठोरता से बचने के लिए सत्य से मुँह मोड़ लेता है। इसी प्रकार, समाज में भी अधिकांश लोग यश और प्रशंसा के लिए कंगूरे की ईंट बनना चाहते हैं — ऊँचे पद पर बैठना चाहते हैं, चमकना चाहते हैं। लेकिन कोई नींव की ईंट बनने को तैयार नहीं, क्योंकि उसे न तो कोई देखता है और न ही उसकी प्रशंसा करता है। लेखक ने दधीचि मुनि का उदाहरण देते हुए बताया है कि ऐसे महान बलिदानी भी होते हैं जो अपनी अस्थियाँ दान करके भी अमर हो जाते हैं।
लेखक ने इस निबंध में युवाओं का आह्वान किया है कि वे कंगूरे की ईंट बनने की होड़ में न लगकर, नींव की ईंट बनने का साहस करें। जो व्यक्ति समाज की नींव बनने के लिए अपने अस्तित्व को मिटाकर स्वयं को समर्पित कर देता है, वही वास्तव में समाज का सच्चा निर्माता और धन्य आत्मा है। सुंदर सृष्टि हमेशा बलिदान माँगती है — यह इस निबंध का केंद्रीय संदेश है।
लेखक के अनुसार, आज देश के नव-निर्माण के लिए ऐसे नींव की ईंट जैसे व्यक्तियों की आवश्यकता है जो बिना किसी यश-लोभ के, बिना पहचान की चाह के, समाज की भलाई के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दें। यह निबंध त्याग, बलिदान और निःस्वार्थ सेवा की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए पाठकों को प्रेरित करता है कि वे ऐसे महान लोगों के गुण गाएँ जो नींव की ईंट बनकर समाज को मज़बूत करते हैं।
लेखक-परिचय (About the Author)
रामवृक्ष बेनीपुरी का जन्म सन् 1902 ई. में बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के अंतर्गत बेनीपुर नामक गाँव में हुआ था। उनके नाम के साथ ‘बेनीपुरी’ इसी गाँव के नाम पर जुड़ा है। वे हिंदी के एक प्रतिष्ठित गद्यकार, पत्रकार और स्वतंत्रता सेनानी थे।
बेनीपुरी जी का जीवन संघर्षों से भरा रहा। उन्होंने सन् 1920 ई. में महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में उनकी सक्रिय भागीदारी के कारण उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा और उन्होंने कुल लगभग बारह वर्ष कारागार में बिताए। जेल में भी उन्होंने लेखन कार्य जारी रखा।
साहित्य के क्षेत्र में बेनीपुरी जी ने निबंध, रेखाचित्र, संस्मरण और नाटक विधाओं में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने ‘बालक’ नामक पत्रिका का संपादन किया। उनकी प्रमुख रचनाओं में माटी की मूरतें, गेहूँ और गुलाब, पतितों के देश में (पपीतों के देश में), लाल तारा, मशाल, विद्यापति, अंबपाली आदि विशेष उल्लेखनीय हैं। उनकी भाषा सरल, प्रवाहमयी और भावपूर्ण है, जिसमें ललित निबंध शैली का सुंदर उपयोग देखने को मिलता है। सन् 1968 ई. में उनका स्वर्गवास हो गया।
पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर (Textbook Questions and Answers)
बोध एवं विचार
1. पूर्ण वाक्य में उत्तर दो
(क) रामवृक्ष बेनीपुरी का जन्म कहाँ हुआ था?
उत्तरः रामवृक्ष बेनीपुरी का जन्म बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के अंतर्गत बेनीपुर नामक गाँव में हुआ था।
(ख) बेनीपुरी जी को जेल क्यों जाना पड़ा?
उत्तरः भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रूप से भाग लेने के कारण बेनीपुरी जी को जेल जाना पड़ा।
(ग) बेनीपुरी जी का स्वर्गवास कब हुआ?
उत्तरः बेनीपुरी जी का स्वर्गवास सन् 1968 ई. में हुआ।
(घ) नींव की ईंट किस पर टिकी होती है?
उत्तरः चमकीली, सुंदर और आलीशान इमारत नींव की ईंट पर टिकी होती है।
(ङ) मनुष्य का ध्यान इमारत के किस भाग पर जाता है?
उत्तरः मनुष्य का ध्यान इमारत के कंगूरे (ऊपरी हिस्से) पर जाता है।
(च) इमारत गिर जाने पर किस ईंट का अस्तित्व समाप्त हो जाता है?
उत्तरः इमारत गिर जाने पर कंगूरे की ईंट का अस्तित्व समाप्त हो जाता है, जबकि नींव की ईंट फिर भी वहीं बनी रहती है।
(छ) दधीचि मुनि ने क्या दान किया था?
उत्तरः दधीचि मुनि ने देवताओं के कल्याण के लिए अपनी हड्डियाँ (अस्थियाँ) दान कर दी थीं।
(ज) पठित निबंध में ‘सुंदर इमारत’ से क्या तात्पर्य है?
उत्तरः पठित निबंध में ‘सुंदर इमारत’ से तात्पर्य एक नए, सुंदर और न्यायपूर्ण समाज के निर्माण से है।
(झ) लेखक के अनुसार आज किसके लिए होड़ा-होड़ी मची है?
उत्तरः लेखक के अनुसार आज कंगूरे की ईंट बनने के लिए, अर्थात् यशलोभी समाज-सेवक बनने के लिए चारों ओर होड़ा-होड़ी मची है।
(ञ) नींव की ईंट का प्रतीकार्थ क्या है?
उत्तरः नींव की ईंट का प्रतीकार्थ है — समाज का वह अनाम शहीद, जो बिना किसी यश-लोभ और प्रसिद्धि की चाह के, समाज के नव-निर्माण के लिए आत्म-बलिदान के लिए तत्पर रहता है।
2. अति संक्षिप्त उत्तर दो (लगभग 25 शब्दों में)
(क) मनुष्य सत्य से क्यों भागता है?
उत्तरः सत्य सदा कठोर होता है। अक्सर सत्य झूठ का पर्दाफाश कर देता है। कठोरता और भद्दापन एक साथ पनपते हैं। इसी कारण मनुष्य कठोरता से बचने और भद्देपन से मुँह मोड़ने के लिए सत्य से भागता है।
(ख) लेखक के अनुसार कौन-सी ईंट अधिक धन्य है?
उत्तरः लेखक के अनुसार वह ईंट अधिक धन्य है जो इमारत को मज़बूत करने और बाकी ईंटों को ऊँचाई देने के लिए, खुद जमीन के सात हाथ नीचे जाकर गड़ जाती है और दूसरों के लिए स्वयं को बलिदान कर देती है।
(ग) नींव की ईंट की क्या भूमिका होती है?
उत्तरः नींव की ईंट ही इमारत का आधार होती है। उसकी मजबूती और पक्केपन पर ही सारी इमारत की स्थायित्व निर्भर करती है। यदि नींव की ईंट कमज़ोर होगी तो पूरी इमारत धराशायी हो जाएगी।
(घ) कंगूरे की ईंट का प्रतीकार्थ क्या है?
उत्तरः कंगूरे की ईंट का प्रतीकार्थ है — समाज का वह यशलोभी सेवक, जो प्रसिद्धि और प्रशंसा पाने के लिए समाज-सेवा का दिखावा करता है, परंतु वास्तविक त्याग और बलिदान से बचता है।
(ङ) “सुंदर सृष्टि हमेशा बलिदान खोजती है” — इसका क्या अर्थ है?
उत्तरः एक सुंदर मकान बनने के पीछे जमीन के नीचे दबी ठोस ईंटों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। ठीक उसी प्रकार, एक सुंदर समाज की रचना के पीछे उन महान व्यक्तियों का हाथ होता है जिन्होंने हँसते-हँसते अपना बलिदान दे दिया।
(च) दधीचि मुनि का उल्लेख इस निबंध में क्यों किया गया है?
उत्तरः लेखक ने दधीचि मुनि का उदाहरण देकर यह बताया है कि आत्म-बलिदान करने वाले व्यक्ति ही वास्तव में अमर होते हैं। दधीचि मुनि ने देवताओं के लिए अपनी अस्थियाँ दान करके सर्वोच्च बलिदान का उदाहरण प्रस्तुत किया। ऐसे नींव की ईंट जैसे लोग ही समाज को सच्चाई देते हैं।
(छ) युवाओं के समक्ष लेखक की क्या अपेक्षा है?
उत्तरः लेखक चाहते हैं कि युवा पीढ़ी कंगूरे की ईंट बनने की होड़ छोड़कर नींव की ईंट बनने का साहस करे। वे चाहते हैं कि युवा निःस्वार्थ भाव से, बिना यश और प्रसिद्धि की चाह के, देश और समाज के नव-निर्माण में योगदान दे।
3. संक्षिप्त उत्तर दो (लगभग 50 शब्दों में)
(क) मनुष्य का ध्यान इमारत की नींव की ओर क्यों नहीं जाता?
उत्तरः सुंदरता सदा दूसरों को अपनी ओर आकर्षित करती है। इमारत के ऊपरी भाग — कंगूरे — चमकदार और आकर्षक होते हैं, इसलिए वे सबका ध्यान खींचते हैं। नींव की ईंट जमीन के नीचे गहरे दबी होती है, इसलिए वह दिखाई नहीं देती। मनुष्य की प्रवृत्ति है कि वह जो दिखता है उसकी प्रशंसा करे, जो छिपा है उसे भूल जाए। यही कारण है कि इमारत को थामे रखने वाली नींव की ओर किसी का ध्यान नहीं जाता।
(ख) लेखक ने कंगूरे का गीत गाने के बजाय नींव का गीत गाने के लिए क्यों आह्वान किया है?
उत्तरः कोई भी इमारत हो, उसकी मज़बूती और स्थायित्व नींव की ईंट पर निर्भर करती है। लेकिन विडंबना यह है कि जिस ईंट पर सुंदर आलीशान भवन खड़ा है, उसकी कोई प्रशंसा नहीं करता और कंगूरे की ईंट की सब प्रशंसा करते हैं। समाज को उन अनाम बलिदानियों के योगदान को स्वीकार करना चाहिए जो नींव की तरह समाज को टिकाए रखते हैं। इसीलिए लेखक ने कंगूरे का गीत छोड़कर नींव का गीत गाने का आह्वान किया है।
(ग) सामान्यतः लोग कंगूरे की ईंट बनना पसंद करते हैं, परंतु नींव की ईंट क्यों नहीं बनना चाहते?
उत्तरः इमारत पर लगे कंगूरे को देखकर लोग प्रसन्न होते हैं और उसकी प्रशंसा करते हैं। लोग प्रसिद्ध होने और प्रशंसा पाने के लिए समाज में काम करना चाहते हैं। वे त्याग और बलिदान देने के लिए तैयार नहीं हैं, क्योंकि नींव की ईंट बनने पर न उन्हें कोई देखेगा, न कोई प्रशंसा मिलेगी। मनुष्य यश-लोभी होता है, इसलिए वह नींव की ईंट नहीं बनना चाहता।
(घ) इस निबंध में लेखक ने किन-किन महान बलिदानियों का उल्लेख किया है और क्यों?
उत्तरः इस निबंध में लेखक ने दधीचि मुनि का विशेष उल्लेख किया है, जिन्होंने देवताओं के कल्याण के लिए अपनी अस्थियाँ दान कर दीं। इसके अलावा, स्वतंत्रता संग्राम के उन अनाम शहीदों का भी परोक्ष रूप से उल्लेख है जिन्होंने देश की आज़ादी के लिए अपने प्राणों की आहुति दी। लेखक ने इन उदाहरणों के माध्यम से यह सिद्ध किया है कि सच्चा बलिदानी ही अमर होता है।
(ङ) “नींव की ईंट” और “कंगूरे की ईंट” की तुलना करो।
उत्तरः नींव की ईंट जमीन के नीचे दबी रहती है, कोई उसे देखता नहीं, परंतु वही इमारत का आधार होती है। कंगूरे की ईंट इमारत के शीर्ष पर चमकती है, सब उसकी तारीफ करते हैं, परंतु इमारत गिरने पर वह भी टूट जाती है। इसी प्रकार, समाज में नींव की ईंट जैसे बलिदानी अनाम रहते हुए भी समाज की नींव होते हैं, जबकि कंगूरे की ईंट जैसे लोग प्रसिद्ध तो होते हैं परंतु समाज के वास्तविक आधार नहीं होते।
(च) राष्ट्र के नव-निर्माण के लिए लेखक क्या अपेक्षा रखता है?
उत्तरः राष्ट्र के नव-निर्माण के लिए लेखक अपेक्षा रखता है कि समाज में ऐसे व्यक्ति आगे आएँ जो नींव की ईंट की तरह, बिना किसी यश और प्रसिद्धि की लालसा के, देश और समाज की सेवा में स्वयं को समर्पित कर दें। लेखक चाहता है कि आज की युवा पीढ़ी कंगूरे की ईंट बनने की होड़ छोड़े और निःस्वार्थ भाव से राष्ट्र-निर्माण के पुनीत कार्य में लगे।
(छ) “धर्म ने सदा बलिदान की माँग की है” — इस कथन की व्याख्या करो।
उत्तरः लेखक का मानना है कि धर्म और सभी महान कार्यों में सदा बलिदान की आवश्यकता होती है। दधीचि मुनि ने धर्म की रक्षा के लिए अपने प्राण त्याग दिए। स्वतंत्रता सेनानियों ने देश-धर्म के लिए अपना जीवन बलिदान किया। इसी प्रकार, समाज के नव-निर्माण के धर्म में भी ऐसे लोगों की आवश्यकता है जो नींव की ईंट बनकर, बिना किसी स्वार्थ के, अपने अस्तित्व को समर्पित कर दें। सुंदर सृष्टि की रचना सदा बलिदान से ही होती है।
4. सम्यक् उत्तर दो (लगभग 100 शब्दों में)
(क) “नींव की ईंट” — इस प्रतीक के माध्यम से लेखक ने क्या संदेश दिया है?
उत्तरः “नींव की ईंट” एक शक्तिशाली प्रतीक है जिसके माध्यम से लेखक रामवृक्ष बेनीपुरी ने समाज के उन अनाम बलिदानियों की महत्ता को उजागर किया है जो बिना किसी यश-लोभ के समाज की भलाई के लिए जीते हैं। जिस प्रकार एक सुंदर इमारत की नींव में दबी ईंट को कोई नहीं देखता, परंतु उसी पर पूरी इमारत टिकी होती है, उसी प्रकार समाज में भी ऐसे महान व्यक्ति होते हैं जो गुमनामी में जीकर समाज को आधार देते हैं।
लेखक का संदेश है कि सच्चे समाज-सेवक वे नहीं हैं जो ऊँचे पद पर बैठकर प्रशंसा बटोरते हैं, बल्कि वे हैं जो नींव की तरह, अदृश्य रहकर, समाज को मज़बूती प्रदान करते हैं। लेखक युवाओं से आग्रह करते हैं कि वे कंगूरे की ईंट बनने की होड़ में न लगकर, नींव की ईंट बनने का संकल्प लें। राष्ट्र के नव-निर्माण के लिए त्याग, बलिदान और निःस्वार्थ सेवा की आवश्यकता है — यही इस निबंध का मूल संदेश है।
(ख) इस निबंध की भाषा-शैली पर प्रकाश डालो।
उत्तरः “नींव की ईंट” ललित निबंध शैली का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। रामवृक्ष बेनीपुरी की भाषा सरल, प्रवाहमयी और भावपूर्ण है। उन्होंने तत्सम और तद्भव शब्दों का सुंदर मिश्रण किया है। उनकी भाषा में एक काव्यात्मक प्रवाह है जो पाठक को बाँध लेता है। लेखक ने भवन-निर्माण के एक सामान्य उदाहरण को लेकर उसे राष्ट्रीय और सामाजिक संदर्भ में इतने प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है कि पाठक स्वयं ही उस संदेश को आत्मसात कर लेता है।
निबंध में मुहावरेदार भाषा का प्रयोग है। वाक्य-विन्यास संतुलित और विचारोत्तेजक है। लेखक ने प्रश्न-शैली का भी प्रयोग किया है जो पाठक को सोचने पर विवश करती है। दधीचि मुनि के उदाहरण से पौराणिक सन्दर्भ भी आते हैं। समग्रतः, यह निबंध बेनीपुरी जी की लेखन-कला का एक श्रेष्ठ नमूना है।
(ग) इस पाठ का केंद्रीय भाव अपने शब्दों में लिखो।
उत्तरः “नींव की ईंट” पाठ का केंद्रीय भाव यह है कि समाज के वास्तविक निर्माण में उन अनाम व्यक्तियों का योगदान सबसे महत्वपूर्ण होता है जो बिना यश-लोभ के, बिना प्रसिद्धि की चाह के, केवल समाज की भलाई के लिए जीते हैं और मरते हैं। जिस प्रकार एक भव्य इमारत की नींव की ईंट, जमीन के नीचे दबकर, पूरी इमारत को थामे रखती है, उसी प्रकार समाज के अनाम शहीद और बलिदानी, गुमनामी में रहते हुए भी, समाज की नींव होते हैं।
लेखक इस निबंध के माध्यम से युवाओं को प्रेरित करता है कि वे कंगूरे की ईंट — अर्थात् यशलोभी और दिखावटी सेवक — न बनें, बल्कि नींव की ईंट की तरह, त्याग और बलिदान की भावना से समाज-सेवा करें। सुंदर सृष्टि सदा बलिदान से बनती है — यही इस पाठ का मूलभूत सन्देश है।
(घ) “नींव की ईंट” पाठ के आधार पर नींव की ईंट और कंगूरे की ईंट में अंतर स्पष्ट करो।
उत्तरः “नींव की ईंट” पाठ में लेखक ने इन दोनों ईंटों के बीच एक गहरी तुलना की है। नींव की ईंट जमीन के सात हाथ नीचे दबी रहती है; कोई उसे देखता नहीं, न ही उसकी प्रशंसा करता है। परंतु उसी के बलबूते पर पूरी इमारत खड़ी होती है। यदि नींव कमज़ोर हो तो इमारत ध्वस्त हो जाएगी। इसके विपरीत, कंगूरे की ईंट इमारत के सबसे ऊपर होती है; हर किसी की नज़र उस पर पड़ती है और सब उसकी तारीफ करते हैं। परंतु इमारत गिरने पर कंगूरा भी बिखर जाता है।
समाज में भी नींव की ईंट जैसे व्यक्ति वे हैं जो अनाम रहकर, बिना किसी पुरस्कार या मान्यता की अपेक्षा के, समाज के लिए जीते-मरते हैं। कंगूरे की ईंट जैसे लोग प्रसिद्धि और पुरस्कार के लिए समाज-सेवा का ढोंग करते हैं। लेखक का स्पष्ट मत है कि नींव की ईंट अधिक धन्य और श्रेष्ठ है।
भाषा एवं व्याकरण
(क) निम्नलिखित शब्दों में से अरबी-फारसी मूल के शब्द छाँटकर लिखो:
इमारत, बलिदान, आधार, आज़ाद, किताब, अमर, दुनिया, त्याग, कमज़ोर, सत्य
उत्तरः अरबी-फारसी मूल के शब्द — इमारत, आज़ाद, किताब, दुनिया, कमज़ोर।
(ख) निम्नलिखित मुहावरों के अर्थ बताकर वाक्यों में प्रयोग करो:
1. होड़ा-होड़ी मचना
उत्तरः अर्थ — प्रतिस्पर्धा छिड़ जाना, एक-दूसरे से आगे निकलने की दौड़ लगना।
वाक्य — आजकल बड़े पद पाने के लिए चारों ओर होड़ा-होड़ी मची है।
2. मुँह मोड़ना
उत्तरः अर्थ — ध्यान न देना, उपेक्षा करना।
वाक्य — कठिन परिश्रम से मुँह मोड़ने वाले जीवन में कभी सफल नहीं होते।
3. धराशायी होना
उत्तरः अर्थ — गिर जाना, नष्ट हो जाना।
वाक्य — कमज़ोर नींव के कारण वह भव्य इमारत धराशायी हो गई।
4. आत्म-बलिदान करना
उत्तरः अर्थ — दूसरों की भलाई के लिए स्वयं का त्याग करना।
वाक्य — स्वतंत्रता सेनानियों ने देश की आज़ादी के लिए आत्म-बलिदान किया।
(ग) निम्नलिखित वाक्यों में अशुद्धियाँ सुधारकर लिखो:
1. नींव की ईंट जमीन के नीचे गढ़ी हुई है।
उत्तरः नींव की ईंट जमीन के नीचे गड़ी हुई है।
2. बेनीपुरी जी का जन्म मुज़फ्फरनगर में हुआ।
उत्तरः बेनीपुरी जी का जन्म मुजफ्फरपुर में हुआ।
3. सुंदर सृष्टि हमेशा बलिदान खोजता है।
उत्तरः सुंदर सृष्टि हमेशा बलिदान खोजती है।
अतिरिक्त महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (Additional Important Questions)
लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Questions)
प्रश्न 1: “नींव की ईंट” निबंध के लेखक कौन हैं? उनके बारे में संक्षेप में बताइए।
उत्तरः “नींव की ईंट” निबंध के लेखक रामवृक्ष बेनीपुरी हैं। उनका जन्म 1902 ई. में बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के बेनीपुर गाँव में हुआ। वे हिंदी के प्रसिद्ध निबंधकार, रेखाचित्रकार और स्वतंत्रता सेनानी थे। उन्होंने गांधीजी के असहयोग आंदोलन में भाग लिया और कारागार में लगभग बारह वर्ष बिताए। 1968 ई. में उनका निधन हो गया।
प्रश्न 2: इस पाठ में लेखक ने किस बात की ओर समाज का ध्यान आकर्षित किया है?
उत्तरः इस पाठ में लेखक ने समाज का ध्यान उन अनाम बलिदानियों की ओर आकर्षित किया है जो गुमनाम रहकर भी समाज की नींव को मज़बूत करते हैं। लेखक का कहना है कि हम प्रायः कंगूरे की ईंट की — यानी प्रसिद्ध और दिखावटी लोगों की — तारीफ करते हैं, परंतु नींव की ईंट की — यानी निःस्वार्थ बलिदानियों की — कोई सुध नहीं लेता। लेखक इसी विसंगति को उजागर करते हैं।
प्रश्न 3: मनुष्य स्वाभाविक रूप से कंगूरे की ईंट क्यों बनना चाहता है?
उत्तरः मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है कि वह प्रशंसा और प्रसिद्धि पाना चाहता है। कंगूरे की ईंट सबकी नज़र में रहती है, उसकी तारीफ होती है और वह यश प्राप्त करती है। इसके विपरीत, नींव की ईंट न दिखती है, न उसकी प्रशंसा होती है। इसीलिए मनुष्य स्वाभाविक रूप से ऐसे काम करना चाहता है जिससे उसे पहचान और प्रसिद्धि मिले — अर्थात् वह कंगूरे की ईंट बनना पसंद करता है।
प्रश्न 4: नींव की ईंट के बारे में लेखक क्या कहता है?
उत्तरः लेखक कहता है कि नींव की ईंट वह है जो इमारत को मज़बूत करने के लिए जमीन के सात हाथ नीचे जाकर गड़ जाती है। उसकी मज़बूती पर ही सारी इमारत की अस्थि-नास्ति निर्भर करती है। लेखक के अनुसार नींव की ईंट अधिक धन्य है क्योंकि वह बिना यश-लोभ के, बिना दिखावे के, समाज के लिए स्वयं को बलिदान कर देती है।
प्रश्न 5: इस पाठ के माध्यम से लेखक ने युवाओं को क्या संदेश दिया है?
उत्तरः इस पाठ के माध्यम से लेखक ने युवाओं को संदेश दिया है कि वे यश और प्रसिद्धि की लालसा छोड़कर निःस्वार्थ भाव से देश और समाज की सेवा करें। राष्ट्र के नव-निर्माण के लिए ऐसे व्यक्तियों की आवश्यकता है जो नींव की ईंट की तरह, बिना किसी मान्यता की अपेक्षा के, समाज को आधार दें। त्याग और बलिदान की भावना से ही सुंदर समाज का निर्माण संभव है।
प्रश्न 6: “कंगूरे की ईंट” किसका प्रतीक है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तरः “कंगूरे की ईंट” उन यशलोभी व्यक्तियों का प्रतीक है जो समाज-सेवा के नाम पर प्रसिद्धि और पहचान के लिए काम करते हैं। वे ऊँचे पदों पर रहना चाहते हैं, सबकी नज़र में रहना चाहते हैं, परंतु वास्तविक त्याग और बलिदान से बचते हैं। ये लोग समाज की नींव नहीं होते, बल्कि केवल ऊपरी आवरण होते हैं। इनके बिना भी समाज चल सकता है, परंतु नींव की ईंट के बिना नहीं।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Questions)
प्रश्न 1: “नींव की ईंट” पाठ का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तरः “नींव की ईंट” रामवृक्ष बेनीपुरी द्वारा रचित एक प्रेरणादायक ललित निबंध है। लेखक ने इस निबंध में एक सुंदर इमारत के उदाहरण से यह सिद्ध किया है कि प्रत्येक भव्य संरचना की नींव में अनाम बलिदान होता है।
लेखक कहता है कि मनुष्य की दृष्टि सदा इमारत के सुंदर कंगूरे — अर्थात् ऊपरी सजावटी भाग — की ओर जाती है। वह नींव की उस ईंट को भूल जाता है जो जमीन के सात हाथ नीचे दबकर पूरी इमारत को थामे हुए है। यदि नींव न हो तो इमारत का कोई अस्तित्व ही नहीं।
लेखक ने इस उदाहरण को समाज पर लागू करते हुए कहा है कि आज चारों ओर कंगूरे की ईंट बनने की होड़ मची है। सब लोग प्रसिद्ध होना चाहते हैं, ऊँचे पद पर बैठना चाहते हैं, लेकिन नींव की ईंट बनकर — अर्थात् अनाम और निःस्वार्थ बलिदानी बनकर — कोई नहीं जीना चाहता। लेखक दधीचि मुनि का उदाहरण देते हुए कहता है कि सच्चे बलिदानी ही अमर होते हैं।
निबंध के अंत में लेखक युवाओं का आह्वान करता है कि वे कंगूरे का गीत न गाकर नींव का गीत गाएँ, और नींव की ईंट बनने का संकल्प लें। सुंदर समाज के निर्माण के लिए त्याग और बलिदान की भावना अनिवार्य है।
प्रश्न 2: रामवृक्ष बेनीपुरी की साहित्यिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तरः रामवृक्ष बेनीपुरी हिंदी साहित्य के महत्वपूर्ण गद्यकार हैं। उनकी साहित्यिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
1. ललित निबंध शैली: बेनीपुरी जी ललित निबंध के सिद्धहस्त लेखक हैं। उनके निबंधों में गहरे विचार और काव्यात्मक भाषा का सुंदर संयोग होता है।
2. सरल और प्रवाहमयी भाषा: उनकी भाषा सरल, बोधगम्य और प्रवाहमयी है। तत्सम और तद्भव शब्दों का सुंदर मिश्रण उनकी शैली की विशेषता है।
3. प्रतीकात्मकता: बेनीपुरी जी अपने निबंधों में प्रतीकों का सुंदर उपयोग करते हैं। “नींव की ईंट” और “कंगूरे की ईंट” जैसे प्रतीक इसके उदाहरण हैं।
4. सामाजिक और राष्ट्रीय चेतना: उनके लेखन में सामाजिक और राष्ट्रीय चेतना का स्वर स्पष्ट रूप से सुनाई देता है। वे अपने पाठकों को समाज-सेवा और राष्ट्र-निर्माण के लिए प्रेरित करते हैं।
5. रेखाचित्र और संस्मरण: बेनीपुरी जी रेखाचित्र और संस्मरण विधा में भी निपुण हैं। “माटी की मूरतें” उनकी इस विधा की श्रेष्ठ रचना है।
प्रश्न 3: “नींव की ईंट” और “कंगूरे की ईंट” के बीच अंतर को स्पष्ट करते हुए बताइए कि आज के समाज को किसकी अधिक आवश्यकता है और क्यों?
उत्तरः “नींव की ईंट” और “कंगूरे की ईंट” के बीच का अंतर लेखक ने बड़े सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया है। नींव की ईंट जमीन के नीचे दबी रहती है, न कोई उसे देखता है और न उसकी प्रशंसा करता है। परंतु उसी पर पूरी इमारत टिकी होती है — उसकी मज़बूती ही इमारत की स्थायित्व की गारंटी है। कंगूरे की ईंट सबसे ऊपर होती है, सबकी नज़र में होती है और सब उसकी तारीफ करते हैं। परंतु इमारत ध्वस्त होने पर कंगूरा भी बिखर जाता है।
समाज में भी ऐसे ही दो प्रकार के लोग होते हैं — एक वे जो बिना किसी लालसा के, गुमनाम रहकर समाज की सेवा करते हैं, और दूसरे वे जो यश और प्रसिद्धि के लिए समाज-सेवा का दिखावा करते हैं। आज के समाज को “नींव की ईंट” जैसे लोगों की अधिक आवश्यकता है, क्योंकि देश और समाज का वास्तविक निर्माण उन्हीं के त्याग और बलिदान से होता है। प्रसिद्धि की लालसा में काम करने वाले लोग अपने स्वार्थ के कारण कभी-कभी समाज को हानि भी पहुँचाते हैं। इसीलिए लेखक ने सभी को नींव की ईंट बनने का आह्वान किया है।
प्रश्न 4: “सुंदर सृष्टि हमेशा बलिदान खोजती है” — इस उक्ति को “नींव की ईंट” पाठ के संदर्भ में समझाइए।
उत्तरः यह उक्ति “नींव की ईंट” पाठ का केंद्रीय सत्य है। लेखक का मानना है कि कोई भी सुंदर और महान रचना बिना किसी बलिदान के नहीं होती। एक भव्य इमारत के लिए नींव की ईंट को जमीन के नीचे दबना पड़ता है — यही उसका बलिदान है। इसी बलिदान की नींव पर वह सुंदर इमारत खड़ी होती है।
इसी प्रकार, एक सुंदर और न्यायपूर्ण समाज के निर्माण के लिए भी बलिदान की आवश्यकता होती है। स्वतंत्रता सेनानियों ने अपने प्राण देकर देश की आज़ादी का सपना पूरा किया। दधीचि मुनि ने अपनी अस्थियाँ दान करके धर्म की रक्षा की। इन सभी बलिदानियों के त्याग के कारण ही सुंदर सृष्टि — एक स्वतंत्र, न्यायपूर्ण और विकसित समाज — का निर्माण हुआ। अतः यह सत्य है कि सुंदर सृष्टि सदा बलिदान माँगती है — बिना बलिदान के कोई महान रचना संभव नहीं।
बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQ)
| प्रश्न | विकल्प A | विकल्प B | विकल्प C | विकल्प D | उत्तर |
|---|---|---|---|---|---|
| “नींव की ईंट” के लेखक कौन हैं? | हजारीप्रसाद द्विवेदी | रामवृक्ष बेनीपुरी | महादेवी वर्मा | प्रेमचंद | रामवृक्ष बेनीपुरी |
| रामवृक्ष बेनीपुरी का जन्म किस सन् में हुआ? | 1899 | 1902 | 1910 | 1920 | 1902 |
| बेनीपुरी जी का जन्म किस राज्य में हुआ? | उत्तर प्रदेश | मध्य प्रदेश | बिहार | राजस्थान | बिहार |
| बेनीपुरी जी का निधन किस सन् में हुआ? | 1960 | 1965 | 1968 | 1972 | 1968 |
| बेनीपुरी जी ने किस आंदोलन में भाग लिया? | भारत छोड़ो आंदोलन | असहयोग आंदोलन | दांडी मार्च | स्वदेशी आंदोलन | असहयोग आंदोलन |
| सत्य की प्रकृति कैसी होती है? | मधुर | सरल | कठोर | कोमल | कठोर |
| “नींव की ईंट” का प्रतीकार्थ क्या है? | एक मज़दूर | समाज का अनाम शहीद | एक राजनेता | एक अमीर व्यक्ति | समाज का अनाम शहीद |
| सुंदर सृष्टि हमेशा क्या खोजती है? | धन | यश | बलिदान | प्रसिद्धि | बलिदान |
| बेनीपुरी जी ने किस पत्रिका का संपादन किया? | सरस्वती | बालक | कादंबिनी | धर्मयुग | बालक |
| दधीचि मुनि ने किसके कल्याण के लिए अस्थियाँ दान कीं? | मनुष्यों के लिए | ऋषियों के लिए | देवताओं के लिए | राजाओं के लिए | देवताओं के लिए |
| आज चारों ओर किसके लिए होड़ा-होड़ी मची है? | नींव की ईंट बनने के लिए | कंगूरे की ईंट बनने के लिए | धन कमाने के लिए | देश छोड़ने के लिए | कंगूरे की ईंट बनने के लिए |
| इमारत गिरने पर किस ईंट का अस्तित्व बचा रहता है? | कंगूरे की ईंट | नींव की ईंट | दोनों | कोई नहीं | नींव की ईंट |
| पठित निबंध में “सुंदर इमारत” किसका प्रतीक है? | एक महल का | एक मंदिर का | नए सुंदर समाज का | एक कारखाने का | नए सुंदर समाज का |
| “नींव की ईंट” किस विधा की रचना है? | कहानी | उपन्यास | ललित निबंध | नाटक | ललित निबंध |
| लेखक ने किसका गीत गाने का आह्वान किया है? | कंगूरे की ईंट का | नींव की ईंट का | देश का | प्रकृति का | नींव की ईंट का |
शब्दार्थ (Word Meanings)
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| नींव | इमारत का आधार, जो जमीन के नीचे होती है (foundation) |
| कंगूरा | इमारत का सबसे ऊपरी सजावटी भाग (battlement/parapet) |
| इमारत | भवन, मकान (building) |
| बलिदान | किसी उद्देश्य के लिए अपना सर्वस्व त्याग देना (sacrifice) |
| त्याग | किसी वस्तु या सुख को छोड़ देना (renunciation) |
| यश-लोभी | यश और प्रसिद्धि का लालची (glory-seeker) |
| होड़ा-होड़ी | प्रतिस्पर्धा, एक-दूसरे से आगे निकलने की दौड़ (competition/rivalry) |
| अनाम | जिसका नाम न हो, गुमनाम (nameless/anonymous) |
| शहीद | देश या किसी आदर्श के लिए प्राण देने वाला (martyr) |
| आत्म-बलिदान | स्वयं का बलिदान (self-sacrifice) |
| नव-निर्माण | नया निर्माण (reconstruction/new creation) |
| प्रतीक | किसी बड़े भाव या विचार का प्रतिनिधित्व करने वाली वस्तु (symbol) |
| दधीचि | एक महान ऋषि जिन्होंने देवताओं के लिए अपनी अस्थियाँ दान कीं |
| अस्थि | हड्डी (bone) |
| धराशायी | जमीन पर गिरा हुआ, नष्ट हुआ (collapsed/fallen) |
| सत्य | सच, जो वास्तव में है (truth) |
| कठोर | कड़ा, कठिन (harsh/hard) |
| आह्वान | पुकार, बुलाना (call/appeal) |
| निःस्वार्थ | जिसमें स्वार्थ न हो, बिना किसी लाभ की इच्छा के (selfless) |
| स्वर्गवास | मृत्यु (passing away) |
| भव्य | शानदार, विशाल और सुंदर (magnificent/grand) |
| आलीशान | शानदार, भव्य (luxurious/grand) |
| पुख्ता | मज़बूत, दृढ़ (strong/firm) |
| अस्तित्व | होने की अवस्था, सत्ता (existence) |
| धन्य | भाग्यशाली, पुण्यात्मा (blessed/fortunate) |
| समर्पण | पूरी तरह अर्पित कर देना (dedication/devotion) |
| विसंगति | असंगतता, विरोधाभास (incongruity/contradiction) |
| पौराणिक | पुराणों से संबंधित (mythological) |
| प्रवाहमयी | जिसमें प्रवाह हो, सुंदर गति वाली (flowing) |
| ललित निबंध | सुंदर, भावपूर्ण और काव्यात्मक गद्य रचना (lyrical essay) |